बृहस्पतिवार, 14 जुलाई 2011

कई महिलाओं का साथ चाहते हैं पुरुष

आमतौर पर पत्‍नी को चिट करने वाले पतियों के बारे में कहा जाता है कि उन्‍हें घर में प्‍यार नहीं मिलता इसलिए वे विवाहेत्‍तर संबंध बनाते हैं।
लेकिन हाल ही में जेन हेव्लिकेक के नेतृत्व में चार्ल्स विश्वविद्यालय के एक दल द्वारा किए गए अध्ययन में पाया कि पुरुष के भटकाव पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वह अपने संबंधों में खुश और संतुष्ट है या नहीं।
वे सुखी विवाहित जीवन जीते हुए भी विवाहेत्‍तर संबंध बनाते हैं क्‍योंकि वे साथी के तौर पर कई महिलाओं का साथ चाहते हैं। जबकि महिलाओं के साथ ऐसा बहुत कम होता है।
महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के संबंध सेक्स से ज्यादा प्रेरित होते हैं। वे संबंधों के मामलों में विभिन्‍नता चाहते हैं और इसी से प्रेरित होकर ऐसे कदम उठाते हैं।

पुरुष महिलाओं में क्या ढूंढते हैं ?

बदलते समय के साथ पुरुषों के पसंद में भी काफी बदलाव आया है। हाल ही में हुए सर्वे में पुरुषों के पसंद के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है।
ऑनलाइन हुए सर्वे में पता चला है कि स्‍क्रीन पर जीरो फिगर भले अच्‍छा लगता है लेकिन जब निजी जिंदगी की बात आती है तो पुरुषों को मांसल देह वाली महिलाएं ज्यादा भाती हैं।
जब मर्दों के आसपास कोई नहीं होता, तो महिलाओं के बारे में उनकी क्या जिज्ञासाएं होती हैं। यह जानने के लिए रिसर्चर्स ने विभिन्‍न देशों के 1 अरब से ज्‍यादा पुरुषों पर शोध किया।
रिसर्चर ने पाया कि पुरुषों को महिलाओं के सेक्‍सी पैर बहुत पसंद है साथ ही पतली की बजाए भरे बदन वाली महिलाएं ज्यादा पसंद आती हैं।
जबकि महिलाएं पुरुषों में सेक्‍स अपील से ज्‍यादा रोमांस पसंद करती हैं। उन्‍हें रोमांटिक पुरुष काफी पसंद आते हैं।

आज की लड़कियों को चाहिए कुछ इस तरह के पति

अगर आप एक अच्छी जीवनसाथी की तलाश में हैं तो शायद आपको अपना जॉब बदलना पड़ सकता है क्योंकि हाल ही में एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि महिलाएं ऐसे व्यक्ति से शादी करना चाहती हैं। जिसकी न सिर्फ सैलरी ज्यादा हो बल्कि एक अच्छे ओहदे पर भी हो।
ब्रिटिश वेबसाइट मैच डॉट कॉम ने हाल ही में सर्वे कर यह खुलासा किया है कि महिलाएं आज भी पद और पैसे के प्रति आकर्षित होती हैं। शोधकर्ता केट टेलर का कहना है कि जीवनसाथी के रूप में मैनेजर के पद पर कार्यरत पुरुष महिलाओं की पहली पसंद हैं। दूसरे नंबर पर डॉक्टर , तीसरे नंबर पर वकील, शिक्षक और बिजनेस मैन चौथे और पांचवे नंबर पर है।
साथ ही ऐसे लोगों के कुवांरे रह जाने की आशंका है जो लाइब्रेरियन, फूल व्यवसायी, दमकलकर्मी, सेल्समैन या ड्राइवर की नौकरी करते हैं।
महिलाओं का कहना है कि एक मैनेजर पति ज्यादा समझदार, समर्पित और महत्वकांक्षी होता है। इसके साथ ही सप्ताह में 5 दिन 9 से 5 बजे की नौकरी और सप्ता‍ह में दो दिन की छुट्टी भी महिलाओं को ऐसे पुरुषों के प्रति आकर्षित करती है।
मैनेजेर के अलावा महिलाएं डॉक्टर से शादी करना पसंद करती हैं क्योंकि डॉक्टर अपने परिवार का बेहतर ख्याल रख सकता है। महिलाओं को अपने परिवार तथा रिश्तेरदारों के सेहत की चिंता नहीं होती है। इसके साथ ही डॉक्टर अमीर और जिम्मेदार भी होते हैं। वकीलों के तार्किक क्षमता के कारण अपना दिल दे बैठती हैं।

सिर्फ किस नहीं है महिलाओं की प्राथमिकता

रिश्तों के मामले में पुरुषों को ज्यादा बोल्ड समझा जाता है लेकिन बदले समय के साथ महिलाओं की सोच में भी काफी बदलाव आया है। हाल ही में इंडियाना यूनि‍वर्सिटी के शोधकर्ताओं ने खुलासा किया है कि पुरूष आलिंगन और चुंबन को ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं दूसरी ओर महिलाएं सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं।
शोधकर्ताओं ने पांच देशों के एक हजार से अधिक दंपतियों पर अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि रिश्ते के शुरूआती 15 वर्ष में महिलाएं बच्चों के पालन पोषण में व्यस्त रहने के कारण ज्यादा भावनात्मक होती हैं ।
इस दौर में वे बच्चों की परवरिश और घर की देखभाल में व्यस्त रहती हैं लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उनके ऊपर दबाव कम होता जाता है।
महिलाओं को अपने संबंधों के बारे में सोचने के लिए ज्यादा समय मिलता है। वे अपने पार्टनर के साथ ज्यादा समय बिताती हैं और सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं। उम्र के इस दौर में सेक्स उनकी प्राथमिकता होती है।
www.bhaskar.com

सोमवार, 20 जून 2011

सिनेमा में स्त्री : स्त्री होने की दुविधा और दावेदारी

वह एक हिंदुस्तानी औरत थी जो चाह रही थी कि उसके दुख, दर्द और उसकी विपत्तियों को पहचाना जाए। कोई उसके माथे का बुखार महसूस कर पाए। कोई उसे सुने। कोई यह समझ सके कि वह बहुत थकी है। उसे थोड़ी-सी अपनी जगह चाहिए । जितना उसका पैर दुख रहा है, उतना ही उसका माथा और उतना ही उसका मन। वह भारतीय मर्दवाद के बीहड़ों में घूमती रही थी - बदहवास और लहूलुहान। उसने तीन चार मदोर्ं को जाना लेकिन वे सारे ही उसे रौंदना चाहते थे। यह सब ‘भूमिका’ (1977) नाम की फिल्म की नायिका के साथ होता है। फिल्म में एक जगह कहा भी जाता है कि सब कुछ बदलता है लेकिन मर्द नहीं बदलता।

कहना पड़ेगा कि अगर कोई एक कथा फिल्म भारतीय स्त्री के दुख, दुविधा और दावेदारी को आमूल तरीके से सामने ला पाती है तो वह है ‘भूमिका’ जिसे श्याम बेनेगल ने 1977 में ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ के बाद चौथी फिल्म के तौर पर निर्देशित किया था। वह एक स्त्री की आत्मकथा पर आधारित फिल्म थी।

अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा। बस हुआ यह कि श्याम बेनेगल की फिल्म में हंसा उषा में बदल गई। लेकिन हुआ यह भी कि हंसा और उषा भारतीय स्त्री की जीवनी में बदलती गईं। आत्मकथा कथा में बदल गई। हंसा वाडकर मराठी सिनेमा में चौथे दशक में एक महत्वपूर्ण अदाकारा के तौर पर जानी-पहचानी गईं। मराठी थियेटर और अपने फिल्मी सफर के दौरान उन्होंने जो देखा जाना उसे उन्होंने अपनी आत्मकथा में कह दिया, जो उन्होंने अरुण साधु की मदद से लिखी। आत्मकथा का नाम उन्होंने 1959 की अपनी एक फिल्म के नाम पर रखा - ‘सुनो जो कहूंगी’। और सबने इस कहानी को बहुत मर्म और अवधान के साथ सुना।

यह एक स्त्री के कांटों पर चलने की कहानी थी। एक औरत के बार-बार हतप्रभ होने का वृत्तांत। बार-बार ठगे जाने की कराह। यह एक स्त्री की कहानी थी जिसकी नींद उड़ी हुई है, जो उनींदी है और जो ठौर की तलाश में है। जो नीमहोशी में चली जा रही है। यह मदोर्ं की दुनिया में एक स्त्री का भटकाव था जहां बार बार मोहभंग होता था। स्वप्न टूटता था। उषा ने कलाओं को साधा था - गाने और अभिनय और नृत्य की कलाएं। लेकिन मदोर्ं से निपटने की कला उसे नहीं आती थी। यह उसकी त्रासदी है। लेकिन यह तो भारतीय स्त्री की त्रासदी भी है। तो ‘भूमिका’ एक दस्तावेज है।

‘भूमिका’ में उषा की भूमिका स्मिता पाटिल ने निभाई - बिना किसी विवाद के स्मिता पाटिल हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्री हैं और ‘भूमिका’ शायद उनकी सबसे अच्छी फिल्म है। उषा के तौर पर स्मिता फिल्म का केंद्रीय पात्र थीं लेकिन जैसा कि कहा गया है समस्या भी वही थीं। कहना यह है कि स्त्री होना दूसरे दर्जे की नागरिकता का आरोपण और वरण दोनों है और इस अनंतरता को स्मिता ने क्या ही खूबी से निभाया ।

उषा कमजोर और काइयां केशव देहलवी (अमोल पालेकर) से शादी करती है जो अधिकारवाद का लिजलिजापन है। वह कितना भी टेढ़ा-मेढा क्यों न हो, अपनी स्त्री को वह अंगूठे के नीचे रखना जानता है। श्याम बेनेगल केशव के जरिए कहना भी यही चाहते हैं कि पुरुष का मूल गुण यह है कि वह पुरुष है, जिसका यह मायने भी है कि वह स्त्री की नियति का नियंत्रक है।

उर्वशी उर्फ उषा इस कैद को स्वीकार नहीं करना चाहती। वह दांपत्य का किला ढहाती है लेकिन तब वह और निष्कवच हो जाती है। कहां है स्वातं˜य। परंपरा, बाजार और सामंत में से किसी एक का वरण उसे करना ही होगा। लेकिन यह इसलिए भी तो है कि वह मदोर्ं के बनाए विकल्पों में से किसी एक का चुनाव कर रही है। अनंत नाग, कुलभूषण खरबंदा, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी के तौर पर पुरुष चरित्रों की एक कतार है जो स्मिता को अपने-अपने तरीकों से रौंदने को तैयार है। कोई सामंत है तो कोई तिÊारती।

संबंध उसे स्वतंत्र नहीं करता, बंधुआ बनाता है। वह साथी को पुकारती है तो मिलता है जेलर। वह एक बंधनमुक्त यूटोपिया चाहती है लेकिन बदलती है वह माल में। श्याम बेनेगल स्त्री के सब कुछ खोने की दास्तान को एक स्त्री की जीवनी के ज़रिये कहते हैं। वे पुरुष के सत्तात्मक मन की जांच काफी हद तक नारीवादी औज़ारों से करते हैं। फिल्म में फैले अंधेरे में वह मर्दवाद के चूहेपन पर लगातार अपनी जासूसी टॉर्च की रौशनी फेंकते रहते हैं। तो होता यह है कि पुरुष का बौनापन छिपाए नहीं छिपता और इस सबके बीच स्त्री के अपराजेय होने की हंसी जब-तब सुनाई देती रहती है - उसकी अपनी सतत चीखों के बीच।
www.bhaskar.com

शनिवार, 28 मई 2011

उपयोगी सामग्री

कैंसर को हराकर मशरूम हुआ दुनिया में मशहूर!!
प्रकृति हमें जीवन और समृद्धि तो देती ही है पर साथ ही बीमार होने पर हमें उससे छुटकारा भी दिलाती है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपेथिक...आदि चिकित्सा पद्धतियां तो पूरी तरह से प्रकृति और उसके अंगों की सहायता से ही रोगी को रोग से छुटकारा दिलाती है। यह बात एक बार फिर से साबित की स्वादिष्ट मशरूम ने। जी हां मशरूम ने....
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने अपने शोध के आधार पर दावा किया है कि प्रोस्टेट कैंसर को मिटाने में एशियाई क्षेत्रों में प्रयुक्त चिकित्सकीय मशरूम बेहद कारगर है। क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि तुर्की टेल मशरूम प्रयोगशाला में चूहों में प्रोस्टेट कैंसर को विकसित होने से दबाने में 100 फीसदी कारगर सिद्ध हुआ है।
यह शोध -पीएल ओएस वन- जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
तुर्की टेल मशरूम में मिलने वाले तत्व पॉलीसेकैरोपेप्टाइड के बारे में पता चला है कि यह चूहों में प्रोस्टेट कैंसर स्टेम कोशिकाओं को निशाना बनाते हुए ट्यूमर बनने की संभावना को कम करता है। निश्चित ही यह शोध इस बीमारी से लडऩे में अहम् कदम साबित हो सकता है। इसकी प्रयोग की एक खाशियत यह भी रही कि इससे ट्यूमर का विकास तो पूरी तरह से रुक ही जाता है साथ ही इसका कोई नकारात्मक प्रभाव यानी साइट इफेक्ट भी नहीं होता।

शादी में क्यों निभाई जाती है संगीत की रस्म?
शादी में मंगलगीत गाए जाते हैं संगीत की रस्म निभाई जाती है जिसमें घर के सभी सदस्य आनंद और उल्लास के साथ भाग लेते हैं। दरअसल इसका कारण यह है कि संगीत आंनद आपस में गहरा ताल्लुक है। संगीत के बगैर किसी भी प्रकार के सेलीबे्रशन की सफलता अधूरी ही मानी जाती है। ढ़ोल, नगाड़े और शहनाई संगीत के पारंपरिक साधन हैं। इनका प्रयोग हमारे यहां बड़े प्राचीन समय से होता आ रहा है।
इसके अंतर्गत पहले घर की महिलाएं मंगलगीत गाती थी और इस कार्यक्रम में ही ढोल बजाकर गीत गाती थी। सतीजी व शिव की शादी हो राम सीताजी का स्वयंवर सभी में महिलाओं द्वारा मंगलगीत गाए जाने का वर्णन मिलता है धीरे-धीरे इस क्रिया को परंपरा के रूप में शामिल कर लिया गया। हम देखते हैं कि भगवान शिव के पास भी अपना डमरु था, जो कि तांडव करते समय वे स्वयं ही बजाते भी थे।
जीवन युद्ध और ढ़ोल- संगीत के अन्य वाद्य यंत्रों की बजाय ढ़ोल की अपनी अलग ही खासियतें होती हैं। मन में उत्साह, साहस और जोश जगाने में ढ़ोल का बड़ा ही आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। तभी तो पुराने समय में युद्ध का प्रारंभ भी ढ़ोल-नगाड़ों से ही होता था। ढ़ोल से निकलने वाली ध्वनि तरंगें योद्धओं को जोश और साहस से भर देती थीं।

रानी ने क्यों दिया मुसीबत से बचाने वाले को ही शाप?
दमयन्ती जब कुछ शांत हुई। व्याध ने पूछा सुन्दरी तुम कौन हो? किस कष्ट में पड़कर किस उद्देश्य से तुम यहां आई हो? दमयन्ती की सुन्दरता, बोल-चाल और मनोहरता देखकर व्याध मोहित हो गया। वह दमयंती से मीठी-मीठी बातें करके उसे अपने बस में करने की
कोशिश करने लगा। दमयन्ती उसके मन के भाव समझ गई। दमयंती ने उसके बलात्कार करने की चेष्टा को बहुत रोकना चाहा लेकिन जब वह किसी प्रकार नहीं माना तो उसने शाप दे दिया कि मैंने राजा नल के अलावा किसी और का चिंतन कभी नहीं किया हो तो यह व्याध मरकर गिर पड़े। दमयंती के इतना कहते ही व्याध के प्राण पखेरू उड़ गए। व्याध के मर जाने के बाद दमयंती एक निर्जन और भयंकर वन में जा पहुंची।
राजा नल का पता पूछती हुई वह उत्तर की ओर बढऩे लगी। तीन दिन रात दिन रात बीत जाने के बाद दमयंती ने देखा कि सामने ही एक बहुत सुन्दर तपोवन है। जहां बहुत से ऋषि निवास करते हैं। उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। ऋषियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने दमयन्ती का सत्कार किया और उसे बैठने को कहा- दमयन्ती ने एक भद्र स्त्री के समान सभी के हालचाल पूछे।
फिर ऋषियों ने पूछा आप कौन है तब दमयंती ने अपना पूरा परिचय दिया और अपनी सारी कहानी ऋषियों को सुनाई। तब सारे तपस्वी उसे आर्शीवाद देते हैं कि थोड़े ही समय में निषध के राजा को उनका राज्य वापस मिल जाएगा। उसके शत्रु भयभीत होंगे व मित्र प्रसन्न होंगे और कुटुंबी आनंदित होंगे। इतना कहकर सभी ऋषि अंर्तध्यान हो गए।

पाण्डवों को कृष्ण क्यों पसंद करते थे?
पं.विजयशंकर मेहता
उद्धवजी ने कहा-भगवन देवर्षि नारदजी ने आपको यह सलाह दी है कि फुफेरे भाई पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होकर उनकी सहायता करनी चाहिए। उनका यह कथन ठीक ही है और साथ ही यह भी ठीक है कि शरणागतों की रक्षा अवश्यकर्तव्य है। पाण्डवों के यज्ञ और शरणागतों की रक्षा दोनों कामों के लिए जरासन्ध को जीतना आवश्यक है।
प्रभो! जरासन्ध का वध स्वयं ही बहुत से प्रयोजन सिद्ध कर देगा। बंदी नरपतियों के पुण्य परिणाम से अथवा जरासन्ध के पाप-परिणाम से सच्चिदानंद स्वरूप श्रीकृष्ण! आप भी तो इस समय राजसूय यज्ञ का होना ही पसंद करते हैं। इसलिए पहले आप वहीं पधारिए।
उद्धवजी की यह सलाह सब प्रकार से हितकर और निर्दोष थी। देवर्षि नारद, यदुवंश के बड़े-बूढ़े और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने भी उनकी बात का समर्थन किया। अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने वसुदेव आदि गुरुजनों से अनुमति लेकर दारुक, जैत्र आदि सेवकों को इन्द्रप्रस्थ जाने की तैयारी करने के लिए आज्ञा दी।
हस्तिनापुर जाना -भगवान् को सूचना मिली और भगवान बहुत दुखी हो गए। सूचना यह थी कि कौरवों ने छल से पाण्डवों को लाक्ष्यागृह में भेजा और पांडव और कुंती जलकर मर गए। यह सूचना जब कृष्णजी को मिली तो कृष्णजी बहुत चिंतित हो गए, लेकिन उनको विश्वास नहीं हुआ। कुछ उदास भी हुए।
पाण्डव भगवान् को क्यों पसंद थे समझ लें। कर्म करने से अनुभव होता है। पवित्र कर्म से धर्ममय अनुभव होते हैं।
श्रीकृष्ण संकेत देते हैं कि अध्यात्म शक्ति की जागृति, प्रत्यक् चेतना छिगम् अर्थात् अन्तर्गुरु ईश्वर की चेतन सत्ता का प्रत्यक्ष अनुभव। साधन (कर्म) के तीन स्तर होते हैं। प्रथम स्तर पर साधक अपने कत्र्तत्याभिमान से युक्त रहता है। (मैं साधन कर रहा हूं, कर्म कर रहा हूं, सेवा कर रहा हूं आदि) दूसरे स्तर पर ईश्वर की शरण में रहता है और अपनी प्रगति को ईश्वर की अनुकम्पा के अधीन अनुभव करता है। तीसरे स्तर पर ब्रम्हभाव में रत रहता हुआ जीवन सफल करता है।

जिगरी दोस्त नशे में अंधे ही नहीं मूर्ख भी बन गए!!
यह शिकायत कइयों की रहती है कि जी-तोड़ मेहनत करने और हर कोशिश आजमाने के बाद भी हमें सफलता क्यों नहीं मिल पाती? ऐसा कई बार होता है कि सारी की सारी मेहनत बेकार चली जाती है। समस्या की असलियत को जानने के लिय जब हम गहराई में जाकर बारीकी से खोजबीन करते हैं तब पता चलता है कि मेहनत बेकार इसलिये हुई क्योंकि वह गलत दिशा में बगैर सोचे-समझे की गई थी। इस बात को आसानी से समझने के लिये आइये चलते हैं एक रोचक घटना की ओर...
दो जिगरी दोस्त चांदनी रात का मजा लूटने के लिये नदी किनारे जा पहुंचे। जमकर शराब की चुस्कियां ली और जब नशे में धुत हो गए तो खूब नाच-गाना हुआ। कभी किशोर कुमार बन जाते तो कभी माइकल जेक्शन, शराब की मदहोंशी ने शर्म-संकोच की सारी हदें मिटा दी थीं। नाच गाने से जब मन भर गया तो उनके मन में नदी की सैर करने का सुन्दर खयाल आया। दोनों परम मित्र एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर लडख़ड़ाते हुए पैरों से नदी के किनारे बंधी नाव की ओर चल दिये। नशे की मदहोंसी में थे, पूरे शुरूर में थे उतावली में सीधे कूद कर नाव में सवार हो गए। जल्दबाजी में इतना भी होंश नहीं रहा कि नाव जिस रस्सी से किनारे से बंधी है उसे खोला ही नहीं है। दोनों ने जल्दी-जल्दी नाव में रखे चप्पू उठाए और लगे चप्पुओं को चलाने। नशे की मदहोंशी को चांदनी रात की खूबसूरती ने और भी बढ़ा दिया था। सोचने-समझने की दिमागी क्षमता को नशे के थपेड़ों में कभी का बहा चुके थे। नाव आगे बढ़ भी रही है या नहीं इस बात को दोनों में से किसी को ध्यान ही नहीं रहा। बस लगे हैं चप्पुओं को चलाने में।
दोनों ने जमकर शराब गटकी थी इसलिये जल्दी होंश लोटने के का सवाल ही नहीं था। चप्पू चलाते-चलाते सारी रात गुजर गई। सवेरा होने को था, एक मित्र जो थोड़ा अधिक समझदार था बोला-लगता है हम किनारे से कुछ ज्यादा ही दूर निकल आए हैं अब लौट चलना चाहिये। सवेरा होने लगा था उजाले में नदी का खूबसूरत किनारा साफ नजर आ रहा था। जब पीछे मुड़ कर दोनों ने देखा तो दिमाग में कुछ ठनका, सारी बात समझ में आने लगी। पता चल गया कि सारी रात नाव तो किनारे से ही बंधी रही है, जल्दी में रस्सी को खोलना भूल गए थे। रात भर चप्पू चलाने की बेवकूफी भरी मेहनत के बारे में सोच कर मन ही मन शर्मिंदगी भी हुई और हंसी भी खूब आई। दोनों की मिलीभगत से हुई इस मूर्खतापूर्ण घटना को किसी से न कहने का पक्का वादा करके एक दूसरे को विदा देकर अगली बार किसी अच्छी जगह पर पार्टी करने की सलाह करके अपने घरों को चल गए।
इस कहानी को पढ़कर उन शराबी मित्रों को कोई भी आसानी से मूर्ख कह देगा लेकिन ऐसा जाने-अनजाने हम सभी के साथ होता रहता है। हम मेहनत तो खूब करते हैं लेकिन कामवासना, गुस्सा, आलस्य, लालच.. जैसी जाने कितनी ही रस्सियां हमारे पैरों से बंधी रहती हैं और मौत को सामने देखकर हमें समझ में आता है कि सारी दोड़-धूप बैकार ही चली गई आखिर हम पहुंचे तो कहीं भी नहीं। नशे भी कई तरह के होते हैं, कुछ नजर आते हैं लेकिन अधिक घातक नशों को तो इंसान कभी देख भी नहीं पाता।
www.bhaskar.com

शुक्रवार, 27 मई 2011

अपनी आमदानी का उपयोग ऐसे करें...

पं. विजयशंकर मेहता
अपने लिए तो सभी कमाते हैं, पर हमारी कुछ कमाई ऐसी होना चाहिए जो सेवा के रूप में बदल सके। आजकल सेवा भी हथियार बना ली गई है। धंधा बना ली गई थी यहां तक तो ठीक था, लेकिन अब शस्त्र के रूप में सेवा और खतरनाक हो जाती है।
जो दुनियादारी के सेवक हैं, यह अक्सर ऐसे ही काम करते हैं। कोई सेवक कहता है कि मैं हिन्दू धर्म को संगठित करना चाहता हूं। कोई कह रहा है मैं इस्लाम की सेवा करना चाहता हूं। कोई ईसा की सेवा में घूम रहा है। नेता कह रहे हैं कि हम देश की सेवा कर रहे हैं। यह सब समाजसेवा तो हो सकती है, लेकिन इससे भीतर परमात्मा पैदा नहीं होता।
जब चित्त में ईश्वर या कोई परम शक्ति होती है तो सेवा का रूप बदल जाता है। हिन्दू धर्म के साधु-संतों की, इस्लाम के ठेकेदारों की, क्रिश्चनिटी के पादरियों की और हमारे राष्ट्र के नेताओं की सेवा के ऐसे परिणाम नहीं आते, जैसे आज धर्म के नाम पर मिल रहे हैं। इसलिए सेवा के ईश्वर वाले स्वरूप को समझना होगा। अभी सेवा चित्त के आनंद से वंचित है। परमात्मा का एक स्वरूप है सत्य।
ईमानदारी से देखा जाए तो चाहे धर्म हो या राजधर्म, जो लोग सेवा का दावा कर रहे हैं उनके भीतर से सत्य गायब है। धर्म का चोला ओढ़ लें यहां तक तो ठीक है, अब तो लोगों ने भगवान का ही चोला ओढ़ लिया है। वेष के भीतर से जब विचार समाज में फिंकता है तो लोग सिर्फ झेलने का काम करते हैं। वे यह समझ नहीं पाते कि सत्य कहां है। इसलिए दूसरे जो कर रहे हैं उनसे सावधान रहें और हमें जो करना है उसके प्रति ईमानदार रहें। लगातार प्रयास करें कि भीतर परमात्मा जागे और तब बाहर हमारे हाथ से सेवा के कर्म हों।
www.bhaskar.com