रविवार, 25 अप्रैल 2010

'निराला'

ठहरा वक्त
चिलचिलाती धूप में आज भी
वह बूढ़ी महिला इलाहाबाद की
सड़कों पर अपने पसीने से
सँवार रह‍ी है पथरीले रास्ते को
इतने वर्षों बाद भी
'निराला' की कल्पना सजीव थी
लेकिन वक्त के साथ
सबकुछ बदल गया
नहीं बदला
तो उस बूढ़ी महिला के
हाथों की लकीरें
नहीं बदला
इतने वर्षों बाद भी उसका भाग्य
चेहरे पर छाया
असीम झुर्रियों का वह जाल
कराता है अहसास इस बात का
कि नारी का भाग्य
कई बार सड़क के किनारे
बने फुटपाथ की त‍रह
सख्त हो जाता है जहाँ कदमों की
पदचापों के बीच
रोज रौंदा जाता है उसका भाग्य।
सौजन्य से - गर्भनाल

बेटी का बाप
- डॉ. सुरेंद्र मीणा
एक आम आदमी
की तरह वह
पसीने से अपने सँवारता है
आशियाना अपना
थोड़ी-थोड़ी जोड़ कर सहेजता है
अपनी जमा पूँजी
तन पर भले न हो चिथड़े
लेकिन
चिंता सताने लगी है उसे
दस साल की
बेटी की शादी की अभी से
नींद नहीं आती
उसे रात-रात भर
बीड़ी के बचे हुए टुकड़े के बल
बिता देता है सारी रात
बैठे-बैठे
साइकिल-रिक्शे की
छोटी कमाई से
कैसे कर पाएगा
आठ साल बाद बेटी का विवाह
सोच-सोच कर चिंतित रहता है
क्योंकि वह है
एक बेटी का बाप।
सौजन्य से - गर्भनाल

बारिश के गाँव में
दीपाली पाटील

जब समंदर किनारों की हवाएँ
चुराने लगे लहरों से नमी
तब ग्रीष्म का कैलेंडर बदल
हम बारिश के गाँव जाएँगे
प्रतीक्षा की धुल बह जाएगी
समय के पत्तों से जब
मिलन की सौंधी खुशबू आएगी
तब गीली मिट्टी पर दूर तलक
हम कदमों के निशान बनाएँगे
शिकवे-शिकायतों की झड़ी
देर तक बरस कर थम जाएगी
खुशियों के फूलों से जब
पूरी वादी महक जाएगी
तब फिर तुम ठहर मत जाना
और थोड़ी दूर तक चलना साथ
तुम्हे दिखाना है

बारिश के बाद धुले हुए पत्तों पर
बूँदों के मोती कैसे चमक उठते है
जैसे कोई सपना लिए चमक उठती है
आँखें तुम्हारी
एक दरिया भी दिखाना है
जो चट्टानों से डर नहीं जाता
तुम्हारे ‍विश्वास की तरह
सिर्फ बहता जाता है
हम वक्त के इस दरिया को पार कर
अपनी मंजिल तक जाएँगे
और पाएँगे
कि बहुत खूबसूरत था
बारिश का ये गाँव
क्योंकि भीगे-से उसके
हर मोड़ पर
था सिर्फ तुम्हारा साथ।

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