शनिवार, 10 अप्रैल 2010

प्रेम कथाएँ

बच्चों का खेल
नाम - मानिक अस्थाना, उम्र - लगभग पचास, पता - प्रेम नगर, दिल्ली। देखिए साहब बात यह है कि आज की दुनिया में सच सुनने का रिवाज नहीं है। सच सुनने को कोई तैयार नहीं। सच लिए घूमते रहिये, सूँघना तो दूर रहा आपकी तरफ कोई देखेगा भी नहीं। सच में झूठ की मिलावट कर दीजिए और देखिए मजा। थोड़ा नमक-मिर्च लगाकर बात करिये, सब सुनेंगे और आपकी तारीफ होगी। सचाई को सच तभी समझेंगे जब उसे कुछ बढ़ाकर पेश करिये या फिर उसमें से मनचाही चीजें घटाकर।

खैर यह तो दूसरी बात हुई। वैसे यह दूसरी बात भी उसी बात से जुड़ी हुई है जिससे मैंने अपनी बात शुरू की थी। यानी सच की सचाई। देखिए जी, आज बदली छाई हुई है। ठंडी मंद बयार बह रही है, छत पर अकेला पड़ा हूँ और रेडियो पर विविध भारती से लताजी की आवाज में जाने क्यूँ लोग मोहब्बत किया करते हैं... दिल के बदले... वाला गाना बज रहा है।

किसी पढ़े-लिखे बंदे से जरा पूछिए कि भाई तुम्हारी नजर में दुनिया का सच क्या है तो वह बाल में उँगली फेरते हुए कहेगा कि सच तो यह है कि हम सभी को एक न एक दिन मरना है। कोई और कहेगा कि यह दुनिया फानी है, क्षण-भंगुर है। उसी बात को कोई और सज्जन घुमा फिराकर कहेंगे - सच तो यह है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है, अस्थायी है, टेम्पररी है - यहाँ तक कि हमारे दुख भी। आप वाह-वाह कर उठेंगे और सच का नया-पुराना नुस्खा लेकर अपने घर का रुख करेंगे।

अब जरा मेरी स्थिति पर गौर फरमाएँ। मेरे इलाके में आज कैसा मौसम है? बदली छाई है, ठंडी-ठंडी बयार बह रही है। मैं कहाँ हूँ? छत पर अकेले... फुर्सत से विविध भारती सुन रहा हूँ - जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं... दिल के बदले दर्दे-दिल लिया करते हैं। ऐसे में कोई मुझसे पूछे, अच्छा बताइए आपकी नजर में दुनिया का सच क्या है।

आप सोच रहे होंगे मैं तपाक से कहूँगा - प्रेम, मोहब्बत, इश्क...। जी नहीं, मैं भी बात को घुमाना जानता हूँ। मैं कहूँगा दुनिया में एक नहीं, दो सच हैं और वह हैं औरत और मर्द। शुद्ध हिन्दी में कहेंगे दुनिया में दो शाश्वत सत्य हैं - स्त्री और पुरुष। आपका मुँह खुला का खुला रह गया न! इतना बोरिंग जवाब, घिसा-पिटा सा।

अगर मैं कहता प्रेमी-प्रेमिका या आशिक-माशूक तो यह जवाब थोड़ा फिल्मी तो लगता लेकिन स्त्री-पुरुष से बेहतर होता, विशेषकर मेरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कि मैं कहाँ हूँ, क्या कर रहा हूँ और मेरी तरफ मौसम कैसा है।

भाइयों, यह दुनिया एक भूलभुलैया है दोनों इसी में चक्कर काटते रहते हैं। लेकिन हम भूलते कुछ नहीं। भूल जाने का भ्रम पालते रहते हैं या उसका नाटक करते रहते हैं। मैं जरा दिमाग पर जोर देता हूँ तो एक-एक करके वे सारी लड़कियाँ-स्त्रियाँ याद आने लगती हैं जो मुझे मिलीं और अच्छी लगीं। आपको ताज्जुब होगा कि जब मैं बहुत छोटा था - सात या आठ साल का। और दो या तीन में पढ़ता था तो शर्मिला नाम की एक हमउम्र लड़की मुझे बहुत अच्छी लगती थी।

उसकी मम्मी भी मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। हालाँकि उन्होंने कभी मुझसे बात नहीं की। वह शर्मिला को टिफिन खिलाकर चली जाती थी। उन दोनों की शक्ल मुझे अभी तक हू-ब-हू याद है। अगर मैं बताने लगूँ कि शर्मिला और उसकी मम्मी के बाद कब कब कौन मुझे अच्छा लगा और किसने-किसने मुझे आकर्षित किया - कहाँ-कहाँ मेरी भावनाएँ अटकीं तो आप हँसेंगे। मेरा मजाक उड़ाएँगे।

दरअसल आप सच का मजाक उड़ाएँगे। लेकिन कई लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें मेरा यह कुबूलनामा पढ़कर हिम्मत बँधेगी और वे अपना कलेजा टटोलने लगेंगे। उनके सामने भानुमती का पिटारा खुलने लगेगा। मैं गलियों, सड़कों या बाजार में घूम रहा होता हूँ तो कभी-कभी महिलाओं को दूसरी ही नजर से देखता हूँ। वह ऐसे कि अरे ये कितना हँसते-बोलते मस्ती करते, या फिर किसी बात पर चिंता-मग्न फिक्र करते हुए अकेले या सहेलियों के साथ या फिर पति बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ चली जा रही हैं। लेकिन जब कमसिन थीं तो किसी से प्रेम करती थीं... प्रेम-पत्र लिखती थीं... उसके लिए रोती-गाती थीं। उसी के साथ जीवन-भर साथ रहने के सपने देखती थीं।लेकिन आज नियम-कानून से किसी और के साथ रह रही हैं तो कहीं बॉसगिरी दिखा रही हैं, प्रिंसिपल और प्रोफेसर बनी लेक्चर झाड़ रही हैं। लेकिन पहले! पहले तो एक अदने से लड़के के पीछे पागल हुआ करती थीं। उस पर जान छिड़कती थीं। वही जो साड़ी पहने शॉल ओढ़े गाड़ी से उतर रही हैं। अगर ये मन के सारे भेद खोल दें तो मजा आ जाए। क़यामत भी आ सकती है।

लेकिन सभी स्त्री-पुरुष यदि मन के भेद खोल दें तो दुनिया कैसी दिखेगी! पहले तो बड़ी खलबली मचेगी, बड़ा हंगामा होगा। लेकिन धीरे-धीरे इन सत्यों और संबंधों के खुलासों को लेकर हम शिथिल पड़ते जाएँगे। दुनिया कितनी अपनी-अपनी लगेगी, सब लोग कितने नजदीकी लगेंगे। लेकिन तब भी कुछ लोग होंगे जिन्हें चिंता होगी और ये लोग एक-दूसरे को फिर से न अच्छे लगने लगें, फिर से न प्रेम करने लगें।

इसे कहते हैं खाम खयाली। आप कहते होंगे, मैं नहीं। आज तो मुझे बस समीरा की याद आ रही है। समीरा सुबह से ‍ही दिमाग पर चढ़ी हुई है। जैसा मौसम है, जैसा गाना बज रहा है और जैसे फुर्सत से मैं छत पर अकेले पड़ा हूँ, उसमें यह तो होना ही था। उसमें यही होता है। समीरा समीरा समीरा समीरा कहाँ हो तुम? कहाँ गायब हो गई तुम दुनिया की भीड़ में? मेरे साथ मेला देखते-देखते कहाँ गुम हो गई? क्या किया तुमने मेरे लौट आने के बाद? किस किस से दोस्ती की? और किस किससे प्रेम?

और शादी किन साहब से हुई? बच्चे कितने पैदा किए? फुटबॉल टीम बनाई कि नहीं। क्या कभी मेरी भी याद आई? आते वक्त तो ऐसे सिसक रही थी जैसे मेरे बिना मर ही जाओगी। देखो समीरा, आज तुम्हारे नाम का एक खत लिखना चाहता हूँ। एक प्रेम पत्र अपनी समीरा को। एक लव लेटर। जैसे हम तब लिखा करते थे।

मैं अपने बच्चों से कहना चाहता हूँ कि वे दूसरे कमरे में चले जाएँ। पत्नी से कहना चाहता हूँ कि वह शॉपिंग करने चली जाए और दिल खोलकर पैसा खर्च कर ले। नौकरों से कहता हूँ कि ‍वे दिनभर की छुट्‍टी ले लें। मेरा लव लेटर कोई न पढ़े। यह समीरा के लिए है उसके मनु की तरफ से। सभी सुन लें कि मानिक साहब एक दिन के लिए इस दुनिया में नहीं रहे। मेरे बच्चे मेरे ऊपर हँसें या मेरी पत्नी मेरे कारण रोए, मुझे परवाह नहीं। मुझे बहुत पहले किसी से इश्क हो गया था। आज न जाने क्यों उसी की याद तरोताजा हो गई है। उसे बताना है कि वह दुनिया की सबसे अच्छी लड़की थी। सबसे सुंदर।

सबसे ज्यादा प्यार करने वाली। सबसे ज्यादा लड़ने वाली। सबसे ज्यादा सोन पापड़ी पसंद करने वाली। दुनिया की सबसे खट्‍टी लड़की, दुनिया की सबसे मीठी लड़की। समीरा मेरी जान! समीरा मेरी डॉल मेरी गुड़िया!

लेकिन बात अभी भी नहीं बन रही है। मेरे कहे के मुताबिक आज सभी लोगों ने मुझे अकेला छोड़ दिया है। अब मुझे एक अँधेरा कमरा चाहिए क्योंकि मैं उसी में अपना असली रूप देख पाऊँगा। अँधेरे के आईने में खुद को निहारूँगा। फिर काली अँधेरी गुफा से समीरा को बाहर बुलाऊँगा और पूछूँगा - पहचानी?

प्रिय समीरा,
लिखता हूँ ख़त से स्याही न समझना।
मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना।

हँसो मत समीरा। पूरा खत पढ़ लो फिर चाहे जो करना। इस शेर का बुरा मत मानना डियर। तुम सोच रही हो कि क्या आज भी मेरे पास इस सस्ते सड़क छाप शेर के अलावा कुछ लिखने को नहीं है। मुँह का स्वाद अगर खराब हो गया है तो माफी चाहता हूँ... पर क्या करूँगा, मैं हूँ ही ऐसा और इसे आखिर तुमसे बेहतर कौन समझ सकता है!

हुआ यों कि छत पर लेटे लेटे... विविध-भारती सुनते हुए... अपने एक साहित्यकार मित्र की एक पुस्तक पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा था - बचपन के अनुभवों की स्मृति स्त्री-पुरुष के पहले-पहले प्यार की तरह है जो अद्वितीय और अविस्मरणीय होती है। बस तुम याद आ गई। जीवन का एक काल-खंड सजीव हो गया जो सिर्फ मेरा और तुम्हारा है। वह एक साल! हमारा एक साल - हम दोनों का एक साल। तुम्हारे पति और मेरी पत्नी से अनछुआ प्रेमपगा।

एक अँधेरे कमरे में अकेले बैठा हूँ और अंदर क्या-क्या घट रहा है कैसे बताऊँ। आँखों के सामने सब कुछ कौंध रहा है। एक-एक कर। सच तो यह है कि तुमसे कभी भी मुक्त नहीं हो सका पूरी तरह... तुम्हें प्यार करना बंद कर दिया तब भी। तुम यहीं कहीं रही हो... सदा... लेकिन जिन अनगिनत कोणों से तुम्हें कभी देखा था... देखता था... वे कोण अब नहीं बनते। वे लकीरें अब आपस में नहीं मिलतीं। मिलकर नये चित्र नहीं रचतीं।

जिस दिन मित्र की पुस्तक में वे पंक्तियाँ पढ़कर तुम्हारे बारे में सोचने लगा, उसी रात सपने में तुम आई। अपनी माँ के साथ तुम छत पर बैठी थी। शायद उनका पैर दबा रही थीं। जाने कहाँ से मैं पहुँच गया। मैं भी नीचे ही बैठ गया। मुझे अचरज हुआ कि तुम्हारी मम्मी मुझसे अच्छी-अच्छी बातें कर रही हैं। कह रही हैं, मानिक बाबू... लीजिए गुड़िया का हाथ मैं आपके हाथों में देती हूँ... आप इसको चाहते हैं न! इसने आज मुझे बताया कि आप इसे बहुत चाहते हैं... तो ले जाइए इसे... खुश रहेगी आपके साथ।

लेकिन उन दिनों... किन दिनों... याद करो... बहुत दिनों पहले... बहुत बहुत दिनों पहले युगों पहले... जब छोटे शहरों की सड़कें इतनी भरी-भरी नहीं होती थीं... जब जाड़े की इतवारों को सब कुछ कितना शांत और सुलझा रहता था... जब र‍ेडियो और स्कूटर का राज था... जब पोस्टमैन को देखकर दिल खुश होता था... तब तो तुम्हारी मम्मी मुझे तुम्हारी ओर ताकने भी नहीं देती थीं। हम लोग उन दिनों कितने बड़े थे? क्या बहुत छोटे थे हम? इतने छोटे भी नहीं थे कि लोग हमें बेहिचक एक-दूसरे से मिलने-जुलने की छूट देते। कब देखा था तुम्हें पहली बार?

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