रविवार, 30 मई 2010

खुशनुमा पलों

तसव्वुर में बसा गर्मियों का मौसम

फुरसत के पलों में जब कभी हमारा मन अतीत के फ्लैशबैक में जाता है तो वह बार-बार बचपन की ओर ही झांकता है। गर्मी की छुट्टियों का बचपन से कुछ ऐसा नाता है कि जब भी हम अपने बचपन के खुशनुमा पलों को याद करते हैं तो उसमें समर वेकेशंस के यादगार पलों का कोलाज सा दृश्य हमारी आंखों के आगे घूमने लगता है। दोस्तों के साथ की जाने वाली शरारतें, लूडो-कैरम और अंत्याक्षरी, बर्फ की ठंडी-ठंडी चुस्की..और न जाने ऐसी ही कितनी खूबसूरत यादें इस मौसम के साथ जुडी हैं।

वे भी क्या दिन थे

गर्मियों की छुट्टियों का नाम सुनते ही मन नॉस्टैल्जिक होने लगता है। ऐसे में यादों की उंगली थामे अतीत की गलियारों में बस यूं ही बेमतलब घूमना-टहलना बडा सुखद लगता है। जरा याद कीजिए अपने बचपन के दिनों को, आप पूरे साल कितनी बेसब्री से गर्मी की छुट्टियों का इंतजार करते थे। तब घरों में आज की तरह सुख-सुविधाएं नहीं थीं। फिर भी जिंदगी में एक अलग तरह का सुकून था। स्नेह और अपनत्व की ठंडी छांव चिलचिलाती धूप की तपिश को भी सुहाना बना देती थी।

गर्मियों की खुशनुमा सुबह को याद करते हुए बैंकिंग कंसल्टेंट आकाश सरावगी कहते हैं, हमें आज के बच्चों की तरह छुट्टियों में देर रात तक जागकर टीवी देखने, इंटरनेट पर चैटिंग करने और सुबह देर तक सोने की इजाजत नहीं थी। तब केवल दूरदर्शन ही होता था, जिस पर चित्रहार और रात नौ बजे वाला सीरियल (हमारे जमाने में नुक्कड आता था) देखकर हम सो जाते थे। हमें सुबह साढे पांच बजे ही उठा दिया जाता था और हम दादा जी के साथ मॉर्निग वॉक के लिए निकल पडते थे। तब पॉलीथीन बैग का जमाना नहीं था। इसलिए सैर पर जाते वक्त दादाजी अपने साथ कपडे का थैला ले जाते और लौटते वक्त ताजा-ताजा खीरा, ककडी और खरबूजे खरीदकर जरूर लाते। फिर मम्मी और दादी बडी तसल्ली से इन फलों को काटकर, हमें खिलातीं। सच वे भी क्या दिन थे!

खस की भीनी खुशबू

गर्मियों की दुपहरी को याद करते हुए 38 वर्षीया गृहिणी सुमेधा शर्मा कहती हैं, तब घरों में एसी होना तो बहुत दूर की बात थी, कूलर रखना भी सामाजिक प्रतिष्ठा की निशानी थी। लेकिन हमारे घर में तो केवल पंखे थे। दोपहर वक्त जब छत धूप से तप जाती तो पंखों से ऐसी गर्म हवाएं निकलतीं कि उन्हें बंद ही कर देने को जी चाहता। इस परेशानी से बचने के लिए हमारे पापा खिडकियों पर खस के परदे टंगवा देते और हम हर दो घंटे के बाद उन पर पानी का छिडकाव करते रहते। इससे कमरे का तापमान कम हो जाता और खस की भीनी-भीनी खुशबू पूरे माहौल को सुहाना बना देती। तेज धूप में घर से बाहर निकलने की सख्त मनाही थी। फिर भी हम दबे पांव सहेलियों के घर चले जाते या उन्हें अपने यहां बुलाकर उनके साथ कई तरह के इंडोर गेम्स खेलते। एक-दूसरे से हैंडीक्रॉफ्ट की चीजें बनाना सीखते। दोपहर के वक्त अगर बिजली जाए तो कोई गम नहीं। हमारे घर में एक ऐसा अंधेरा कमरा था जहां सूरज की रोशनी अच्छी तरह नहीं जाती थी। पूरे साल वह कमरा खाली पडा रहता लेकिन गर्मियों की दोपहर में वही जगह हमारे लिए जन्नत साबित होती। हम पोंछा डाल कर ठंडे फर्श पर लेट जाते। यह बात सुनने में थोडी लो प्रोफाइल जरूर लगती है। पर ईमानदारी से कहूं तो तब फर्श पर भी ऐसी मीठी नींद आती थी, जो अब एसी में भी नसीब नहीं होती। दोपहर को सोकर उठने के बाद शर्बत और शिकंजी का लंबा सेशन चलता। कभी बेल का शर्बत, कभी कच्चे आम का पना तो कभी नीबू की शिकंजी..मम्मी बडे जतन से बनातीं और उस दौरान हम पांच भाई-बहन उन्हें घेरे बैठे रहते। मम्मी सभी ग्लासों में एक बराबर शर्बत उडेलतीं। फिर भी उनके भगौने में थोडा शर्बत बच ही जाता, घर की सबसे छोटी बच्ची होने के कारण दो घूंट अतिरिक्त शर्बत पीने का सौभाग्य मुझे ही प्राप्त होता और अपने बडे भाई-बहनों की नजरों में उस पल के लिए मैं ईष्र्या की पात्र बन जाती।

आम होता था बहुत खास

फलों के राजा आम के बिना गर्मियों के मौसम की चर्चा अधूरी रह जाएगी। 36 वर्षीया रचना टंडन पेशे से शिक्षिका हैं। वह अपने बचपन के दिनों को याद करती हुई कहती हैं, लखनऊ में हमारा घर काफी बडा था और उसके कैंपस में आम के दो-तीन पेड लगे थे। पेडों पर बौर लगने के साथ ही कोयल कूकने लगती, जैसे उसे भी आमों के पकने का इंतजार हो, लेकिन हमें तो पहले कच्ची अमिया का ही इंतजार होता था। नमक के साथ अमिया खाने का मजा ही कुछ और होता था। दादी हमें डांटती रहतीं कि घर से बाहर मत निकलो, लू लग जाएगी। लेकिन हम कच्चे आम की तलाश में भरी दुपहरी में बाहर निकल पडते। फिर थोडे ही दिनों में डाल के पके दशहरी और सफेदा खाने का समय आ जाता। आम के बिना इस मौसम में डिनर अधूरा लगता।

इसके अलावा रस से भरे छोटे आमों का मजा ही कुछ और होता था। मुझे आज भी याद है इन आमों को ठंडे पानी से भरी बाल्टी में डुबोकर रख दिया जाता था और दोपहर की नींद पूरी करने के बाद हम सब भाई-बहन साथ बैठकर आम चूसते और अकसर हमारे बीच शर्त लगती कि कौन सबसे ज्यादा आम चूस सकता है? लीची के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला था। लेकिन आम का कोई मुकाबला नहीं था।

ननिहाल में छुट्टियां

ननिहाल का गर्मी की छुट्टियों से बडा गहरा रिश्ता है। 45 वर्षीय आर्किटेक्ट प्रतीक मिश्र अपनी यादों को ताजा करते हुए कहते हैं, हमारा ननिहाल पटना में है। वहां जानलेवा गर्मी पडती है। फिर भी हर साल गर्मी की छुट्टियों में किसी हिल स्टेशन पर जाने के बजाय हम सीधे नानी केघर ही जाते थे। वहां बडा सा संयुक्त परिवार था। मां के अलावा हमारी दो मौसियां भी अपने बच्चों समेत वहां पहुंचती थीं। नाना-नानी के अलावा वहां दो मामाओं का परिवार पहले से ही रहता था। बडा-सा दो मंजिला मकान था। फिर भी रहने को जगह कम पडती। इसलिए रात को ड्राइंग रूम में जमीन पर गद्दे बिछाए जाते और हम सब बच्चे वहीं सोते। कुल मिलाकर हम बारह कजंस हर साल इकट्ठे होते थे। लडकों और लडकियों के अलग-अलग ग्रुप बन जाते थे। उसके बाद खूब शरारतें होतीं। बिजली की दि क्कत की वजह से अकसर पानी की भी समस्या हो जाती। जिस रोज नल में पानी नहीं आता, वह दिन हमारे लिए सबसे अच्छा होता। क्योंकि घर से वाकिंग डिस्टेंस पर गंगा बहती थीं। हमारे एक मामा बडे अच्छे तैराक थे और वह हम बच्चों को साथ लेकर गंगा जी की ओर निकल पडते। जहां हम जी भर कर नहाते और तैरते। मुझे इस बात की खुशी है कि स्विमिंग सीखने के लिए आज के बच्चों की तरह मैंने अपने पेरेंट्स से पैसे नहीं खर्च करवाए। नहाने के बाद वहीं नदी किनारे बने छोटे से ढाबेनुमा होटल में हम कचौरी-जलेबी का नाश्ता करते और लस्सी पीते। हमारी एक दीदी जो उन दिनों टीनएजर थीं, वह बेचारी घर पर अकेली रोती-बिसूरती रहतीं क्योंकि उन्हें हमारे साथ जाने की इजाजत नहीं होती थी। लेकिन लौटते वक्त हम उनके लिए नाश्ता ले जाना नहीं भूलते। वहां हर साल हमारा जाना होता था, लिहाजा पास-पडोस के कुछ बच्चे भी हमारे अच्छे दोस्त बन गए थे। उनमें से कुछ तो ऐसे हैं, जिनसे आज भी फेसबुक पर संपर्क बना हुआ है।

ढेर सारी बतकहियां

हर मौसम का लुत्फ उठाने के पीछे अलग तरह की सामाजिकता की भावना निहित होती है। गर्मियों में यह भावना ज्यादा अच्छी तरह दिखाई देती है। क्योंकि सर्दियों में तो शाम होते ही लोग अपने-अपने घरों में दुबक जाते हैं, लेकिन गर्मियों की शामें बहुत सुहानी होती हैं। हालांकि दुपहरी लंबी और बोरियत भरी होती है। फिर भी इसका बहुत बडा फायदा यह होता है कि लोगों के पास एक-दूसरे से बोलने-बतियाने का भरपूर वक्त होता है। 36 वर्षीय सुब्रत मुखर्जी डॉक्टर हैं और वह इस मौसम को बडी शिद्दत से याद करते हुए कहते हैं, इस मौसम में हम दोपहर के वक्त दोस्तों को अपने घर पर बुलाकर कैरम खेलते थे। छुट्टियों में हमारे मुहल्ले में बाकायदा कैरम टूर्नामेंट का आयोजन होता था। शाम को घरों के सामने ठंडे पानी का छिडकाव होता तो मिट्टी की सौंधी खुशबू बडी प्यारी लगती। छुट्टियों में हम अपने दोस्तों के साथ कहानियों की किताबों और कॉमिक्स का खूब आदान-प्रदान करते। उन दिनों अमर चित्र कथा और इंद्रजाल कॉमिक्स का बडा क्रेज था। हमारे चाचा का परिवार भी साथ रहता था। रात के वक्त छत पर एक साथ कई चारपाइयां बिछ जातीं। जहां हम सारे बच्चे एक साथ सोते और सोने से पहले एक-दूसरे को पहेलियां बुझाते, जोक्स सुनाते और ढेर सारी बातें करते। लेकिन अब जीवनशैली इतनी बदल गई है कि तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद आज के बच्चों के पास वह जीवंत माहौल नहीं है, जहां वह वे बेफिक्री से अपनी छुट्टियों का लुत्फ उठा सकें। हम माहौल नहीं बदल सकते, लेकिन दोबारा अपने बचपन को जी तो सकते ही हैं।

शबाना आजमी, अभिनेत्री

बावडी में सीखती थी स्विमिंग

बचपन में गर्मी की छुट्टियों में हम हैदराबाद जाते थे। मेरी पैदाइश हैदराबाद की है। वहां मेरी खालाएं रहती हैं। मेरे बहुत से फ‌र्स्ट कजंस भी वहीं रहते हैं। हालांकि वहां बहुत गर्मी होती थी। फिर भी हम पूरे दिन धूप में घूमते रहते। मुझे याद है कि मेरी खालाओं ने मुर्गियां पाल रखी थीं और हम उनके पीछे भाग कर उन्हें पकडने की कोशिश करते। हमारे घर में अमरूद का बाग था। वहां हम पेड पर चढते थे। हैदराबाद में जो गंगा-जमुनी तहजीब है, उसका मुझे शिद्दत से एहसास है। वहां हमारे बहुत सारे पडोसी हिंदू थे। हम उनके साथ होली-दिवाली मनाते और वे हमारे साथ ईद मनाते थे। हम खूब नाटक खेलते थे। भाई-बहनों के साथ मिलकर हम नाटक खुद ही लिखते। घर का ही कोई एक दृश्य लेकर हम उस पर नाटक करते। वहां शाम को आंगन में पानी का छिडकाव होता था और तख्त लगती थी। उसके ऊपर सफेद चादर बिछाई जाती, जिसे चांदनी कहते थे। फिर चादर के ऊपर मोगरे के फूल रखे जाते और उसकी खुशबू से पूरी फिजा महक उठती।

छुट्टियों में जब मुझे दिन भर अपनी अम्मी के साथ रहने का वक्त मिलता तो उनके बारे में कई दिलचस्प बातें जानने को मिलतीं। मसलन, वह अपने गीले बालों को सुखाने के लिए एक तवे पर जलते हुए कोयले रखकर, उसमें लोबान डालतीं। फिर तवे पर बडे-बडे सूराखों वाली एकबेंत की टोकरी रखी जाती। उसके बाद अम्मी दरी पर लेट कर अपने बाल उसी लोबान के धुएं से सुखातीं। इससे लोबान की खुशबू उनके बालों में आ जाती। वह खुशबू मुझे आज भी याद है। मेरे आग्रह पर मंडी में श्याम बेनेगल ने यह दृश्य स्मिता पाटिल पर फिल्माया था। हमारे अब्बू के पास बहुत ज्यादा पैसा नहीं था। लेकिन हमने कभी भी इस कमी को महसूस नहीं किया। अब्बू शायर थे, इसलिए घर में हमेशा पढने-लिखने का माहौल रहा। बचपन में मैं अकसर सफेद गरारा-कुर्ता पहनती थी। मुझे याद है जब मैं आठ साल की थी तब मेरे एक कजन ने मुझे बावडी में धक्का देकर स्विमिंग करना सिखाया था। उस वक्त पानी के अंदर जाते समय मुझे थोडा डर जरूर लगा था, लेकिन पानी के ऊपर आते समय जो खुशी हुई थी, वह मुझे आज तक याद है।

जिया खान, अभिनेत्री

छुट्टियों में जाती थी फ्रांस

अपने बचपन की सारी बातें मुझे आज भी अच्छी तरह याद हैं। मेरे पिता अली रिजवी खान अमेरिका में पले-बढे भारतीय हैं और मां रबाया अमिन मूलत: आगरे की रहने वाली हैं। गर्मी की छुट्टियों में अलग-अलग गेटअप बनाकर मैं अकेले ही एक्टिंग करती रहती। हालांकि मेरे मम्मी-पापा के तलाक की वजह से मेरा बचपन वैसा खुशहाल नहीं था जैसा कि आम बच्चों का होता है। लेकिन जब तक मेरे पेरेंट्स साथ थे। मेरा समय अच्छा ही बीता। मैंने लंदन के ली स्ट्रेसबर्ग एकेडमी से ड्रमैटिक आर्ट का कोर्स पूरा किया। लेकिन मेरी गर्मी की छुट्टियां माता-पिता के आपसी अलगाव के कारण तनहा हो गई थीं। मेरी अम्मी ने अकेले अपने बलबूते मुझे और मेरी बहन को हमेशा खुश रखने की पूरी कोशिश की। मुझे हर साल समर वेकेशंस का इंतजार रहता। स्कूल मुझे बहुत बोरिंग लगता और मैं स्कूल जाने के नाम से ही रोने लगती थी। जब तक मम्मी-पापा साथ थे, मैं उनके साथ फ्रांस घूमने जाती थी और कभी-कभी इंडिया भी आती थी। यहां के बच्चों का आजाद बचपन मुझे बहुत प्रभावित करता था। आज भी मुझे शूटिंग की वजह से बहुत घूमने को मिलता है। लेकिन अब मैं बचपन की तरह एंजॉय नहीं करती पाती। आज भी मैं गर्मी की छुट्टियों को बहुत मिस करती हूं। मुझे ऐसा लगता है कि बचपन के दिन सबसे खूबसूरत होते हैं।

सांसों में बसी मिट्टी की सौंधी खुशबू

गुलजार, गीतकार

बचपन में ही मुझे देश के विभाजन का सदमा झेलना पडा। उस वक्त मेरी उम्र तकरीबन 10-11 साल रही होगी। फिर भी मेरा बचपन काफी खुशहाल था। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि मैं मूलत: सिख हूं और मेरा असली नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। झेलम (अब पाकिस्तान में ) जिले के एक छोटे से गांव में मेरा ननिहाल था। मैं हर साल ननिहाल जाता था। तब मेरे पिताजी मुझसे कहते थे कि तुम छुट्टियों में नानी के घर जाते हो तो जल्दी वापस लौट आया करो। यहां तुम्हारे बिना मेरा मन नहीं लगता। जब मैं वहां जाता तो नानी मेरी शरारतों से परेशान हो जातीं। दिन के किसी भी वक्त मुझे गांव के पास बहती नदी में तैरना बहुत अच्छा लगता था। वहां जो लडके मुझसे बडे थे। वे मुझ पर बहुत रौब जमाते। जब मैं नदी में नहाने जाता तो वे मेरे कपडे तक छिपा देते थे। नानी कहतीं कि अगर इसी तरह दिनभर धूप में खेलता रहेगा तो रंगत काली पड जाएगी। तब अपने घर जाने के बाद तेरे पिता तुझे पहचानेंगे कैसे? नानी का वह प्यार-दुलार आज भी मुझे फ्लैश बैक में ले जाता है। हमारे घर के पास रावी नदी बहती थी। जब मुझे साथ खेलने-कूदने के लिए कोई साथी नहीं मिलता था तो मैं अकेले ही रावी नदी के किनारे घूमता रहता। पंछियों का कलरव और बहती नदी की मीठी लय मुझे मंत्रमुग्ध कर देती थी। आज मैं जो भी थोडा-बहुत लिख पाता हूं, वह सिर्फ इसी वजह से कि मेरा बचपन प्रकृति के साथ बीता है। मैं रावी और झेलम नदी को तैरकर पार कर लेता था। अपने गांव की संस्कृति और वहां की मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू से मैं पूरी तरह वाकिफ था। उन यादों को आज भी मैंने अपने सीने से लगा रखा है। लेकिन आज के बच्चों पर तो पढाई और होमवर्क का इतना जबरदस्त दबाव है कि वे फुरसत के पलों का लुत्फ भी नहीं उठा पाते।

गोपीचंद, बैडमिंटन कोच

आजादी के वे दिन

मैं पूरे साल इन दो महीनों का इंतजार करता था। आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव में मेरी नानी का घर था, जहां मैं गर्मी की छुट्टियां मनाने जाता था। एक तो नानी का घर, उस पर से दोस्तों का साथ। छुट्टियों की मस्ती का परफेक्ट माहौल था वह। वहां बहुत सारे नारियल के पेड थे। जिन पर चढकर मैं नारियल तोडने की कोशिश करता था। क्रिकेट खेलना मुझे बहुत पसंद था। आए दिन पडोसियों की खिडकियों के शीशे हमारे खेल पर कुर्बान होते। शीशे तोड कर मजा तो बहुत आता था, पर बहुत डांट भी पडती थी। लेकिन हम अपनी शरारतों से कहां बाज आने वाले थे! दोपहर को निकल जाती थी- हम शैतानों की टोली पूरे मुहल्ले की शांति भंग करने। अलग ही मजा था आजादी के उन दिनों का। अफसोस है कि आज की जेनरेशन उस तरह का समय एंजॉय नहीं कर पाती। आज तो होमवर्क का बोझ ही इतना ज्यादा है कि छुट्टी होने के बावजूद बच्चे स्कूल से आजाद नहीं हो पाते। आज के बच्चों के बारे में सोच कर मुझे बहुत दुख होता है। अब वक्त बहुत बदल गया हे। हमारी गर्मी की छुट्टियों में बचपन का अल्हडपन, शरारतें और मस्तियां थीं लेकिन आज उनकी जगह विडियो गेम्स, सोशल नेटवर्किग और चैटिंग ने ले ली है।

अरशद वारसी, अभिनेता

आज भी नहीं भूलतीं वो शरारतें

मैं मुंबई से लगभग डेढ सौ किलोमीटर दूर देवलाली स्थित बार्नेस बोर्डिग स्कूल में पढता था। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही हमें अपने घर मुंबई भेज दिया जाता था। मुंबई की उमस भरी गरमी इतनी भयावह होती कि बस, यही इच्छा होती थी कि हमेशा स्विमिंग पूल में पडा रहूं। मुंबई में जब गर्मी असहनीय होने लगती थी तब मैं अपने पेरेंट्स के साथ मुंबई के करीबी हिल स्टेशंस मसलन खंडाला, महाबलेश्वर, पंचगनी या पनवेल जैसी जगहों पर चला जाता था। वैसे तो यह मौसम मुझे बेहद नापसंद है, लेकिन गर्मियों में सुबह के वक्त समुद्र के किनारे टहलना बहुत अच्छा लगता है। बचपन में मैं बहुत शरारती था और अपनी शरारत से जुडा एक वाकया आपको सुनाता हूं। दरअसल जहां हमारा स्कूल है, वह जगह फलों के लिए मशहूर है। वहां आम, अंगूर, अमरूद, चीकू, शरीफा आदि के बडे-बडे बाग हैं। जब हमारा अंतिम पेपर होता था, उस रात हम योजना बना कर खूब मौज-मस्ती करते थे।

क्योंकि अगले दिन सभी बच्चों को अपने-अपने होम टाउन के लिए रवाना होना पडता था। ऐसी ही एक रात थी, जब मैं कुछ लडकों के साथ अंगूर के बाग में घुस गया। अपनी शर्ट के भीतर ढेर सारे अंगूर के गुच्छे भरकर हम ज्यों ही बाग से बाहर आने लगे, बाग का मालिक आ गया। हम सब की बोलती बंद हो गई। पहले तो उसने हमें खूब डराया कि वह स्कूल में हमारी शिकायत कर देगा। फिर बाद में उसने मुसकुराते हुए कहा कि कभी मैं भी तुम्हारी तरह बच्चा था और ऐसी ही शरारतें करता था। कल तुम लोग अपने अपने घर चले जाओगे, हमारी तरफ से अंगूर और अमरूद की दो-दो पेटियां लेते जाओ। जब स्कूल वापस आओगे तो यहां भी जरूर आना। हालांकि दोबारा उस व्यक्ति से मेरा मिलना नहीं हो पाया। लेकिन बचपन की उन शरारतों को मैं आज भी बहुत मिस करता हूं।

पद्मा सचदेव, साहित्यकार

बचपन खो रहे हैं आज के बच्चे

गर्मी की छुट्टियों में हमें बडा मजा आता था। हमारे मुहल्ले में दोपहर के वक्त एक फेरी वाला बहुत चटपटे और खट्टे कचालू आलू बेचने आता था। हमें धूप में बाहर निकलने की सख्त मनाही थी। लेकिन जैसे ही कचालू वाला आवाजें लगाता सबकी नजरें बचा कर हम बाहर निकल पडते और कचालू खरीद कर खाते। मुझे चांद-तारों को देखते हुए छत पर सोना बहुत पसंद था। मेरा भाई मुझे अकसर डराता कि जंगली भेडिया तुम्हें उठाकर ले जाएगा। लेकिन उसकी बातों का मुझ पर कोई असर नहीं होता। जम्मू में हमारा बहुत बडा कुनबा था, परिवार के अन्य सदस्य नीचे आंगन में सोते और सुबह होते ही मेरी मां आवाज लगाकर मुझे जगाने लगतीं। फिर हम भाई-बहनें मिलकर अपनी गायों को चरने के लिए जंगल में छोड आते थे। लौटते वक्त हम पेडों पर चढकर आम-इमली तोडते और उनका बंटवारा करते। उसबंटवारे में जो भी घपला करता, उससे हमारा झगडा हो जाता। दोपहर के वक्त मेरी मां मुझे कढाई, सिलाई और क्रोशिए का काम सिखातीं। गर्मियों की लंबी दुपहरी में शरतचंद्र और बंकिमचंद्र की किताबें पढने का सुख कुछ और ही होता था। ऐसी ही छुट्टियों में साहित्य से मेरा नाता प्रगाढ हुआ। मुझे डोगरी लोकगीत गाना बहुत पसंद था और मैं ढोलक भी बहुत अच्छा बजाती थी। अकसर दोपहर के वक्त हमारे गाने का कार्यक्रम चलता। आज के बच्चों को जब मैं पीठ पर भारी बस्ता लादे देखती हूं तो मुझे बहुत दुख होता है। पढाई के बोझ तले वे अपना बचपन खोते जा रहे हैं।

सिद्धार्थ टाइटलर, फैशन डिजाइनर

कभी नहीं करता था होमवर्क

मेरा ननिहाल अमेरिका में है। जहां मेरे 18 ममेरे-मौसेरे भाई-बहन रहते हैं। वैसे भी मुझे गर्मियों का मौसम बिलकुल पसंद नहीं है। इसलिए मैं हर साल गर्मियों की छुट्टियों में अमेरिका जाता हूं और यह सिलसिला आज तक जारी है। वहां हम सारे कजंस मिलकर बहुत मौज-मस्ती करते थे। खास तौर से मुझे हॉरर फिल्में देखना बहुत अच्छा लगता था। बचपन में मैं बहुत शरारती और बिगडा हुआ बच्चा था। छुट्टियों की मौज-मस्ती में हमेशा होमवर्क करना भूल जाता था। स्कूल में पनिशमेंट भी मिलती, पर मुझ पर कोई असर नहीं होता था। फिर भी मुझे ऐसा लगता है कि हम आज के बच्चों की तुलना में कहीं ज्यादा सीधे और शरीफ थे। मैंने तो अठारह साल की उम्र के बाद पार्टियों में जाना शुरू किया, लेकिन आज तो छोटी उम्र से ही बच्चों का एक्सपोजर बहुत ज्यादा है। अब उनमें बच्चों वाली मासूमियत देखने को नहीं मिलती।

1 टिप्पणी: