गुरुवार, 17 जून 2010

छोटा सा प्रयास

इम्प्रेशन का है जमाना
स्कूल एजुकेशन कम्पलीट होते ही स्टूडेंट्स में कॉलेज का क्रेज होता है। क्या पहने... कौन-सा बैग ले जाएं... हेयर कटिंग कैसी हो... कोर्स ज्यादा कठिन तो नहीं होगा... जैसी कई कशमकश स्टूडेंट्स के मन में होती है। आखिर हो भी क्यों न, फर्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन जो होता है। ऎसे में कोई कमी न रह जाए, इसलिए स्टूडेंट्स कई तैयारियां कर रहे हैं।
हर स्टूडेंट्स की आंखों में कॉलेज के पहले दिन के लिए कई सपने होते हैं। इन सपनों को वे कॉलेज के पहले दिन से ही महसूस करने लगते हैं। दोस्तों और टीचर्स पर अच्छा इम्प्रेशन पड़े, इसलिए वे इस दिन को यादगार और सबसे खास बनाना चाहते हैं। इन दिनों अधिकांश 12वीं पास स्टूडेंट्स कॉलेज की तैयारियों में जुट गए हैं। कहीं कोई पैरेंट्स से गिफ्ट मिली बाइक को संवारने में लगा हुआ है तो कहीं गल्र्स अपनी अटे्रक्टिव डे्रस और स्मार्टनेस से सबको आकर्षित करने की प्लानिंग कर रही है। ऎसा ही कुछ माहौल इन दिनों हर घर में देखने को मिल रहा है।

दोस्त बनाने के लिए नेट सर्च
स्टूडेंट निखार अग्रवाल कॉलेज के पहले दिन के लिए काफी एक्साइटेड हैं। वे कहते हैं मैं इसी सोच में हूंकि दोस्त कैसे बनाऊंगा। दोस्त बनाने की नई तकनीक के लिए मैं नेट में सर्चआउट कर रहा हूं, क्योंकि फर्स्ट इम्प्रेशन लास्ट इम्प्रेशन होता है। मैं पहली मुलाकात में ही दोस्तों को इम्प्रेस कर दूंगा।

ड्रेस करवा रही हूं डिजाइन
मुझे नई-नई डे्रसेस पहनने का शौक है, इसलिए मैं अटे्रक्टिव डे्रसेस खरीद रही हूं। यह कहना है अदिति निगम का। वे कहती हैं कॉलेज के फर्स्ट डे के लिए मैंने स्पेशल डे्रस डिजाइन करवाई है और उसमें खास वर्क करवाया है, ताकि मैं सबसे अलग दिखूं।

ले रही हूं कोर्स की जानकारी
स्टूडेंट अरवा सैफी का कहना है कि क्लास में पहले ही दिन टीचर को इम्प्रेस करने के लिए मैं अपने कोर्स की पूरी जानकारी ले रही हूं, इसलिए जनरल नॉलेज की बुक से तो नॉलेज बढ़ा ही रही हूं, साथ-साथ अपने कोर्स की भी तैयारियों में जुट गई हूं, ताकि टीचर्स को प्रभावित कर सकूं।

हर चीज होगी अटे्रक्टिव
कॉलेज के पहले दिन यदि सब कुछ नया-नया हो तो काफी अच्छा लगता है, इसलिए मैं हर चीज नई खरीदने वाला हूं। बैग, मोबाइल, जींस-टीशर्ट यहां तक कि मेरा पेन-डायरी भी सबसे डिफरेंट होगा। ये कहना है ललित पाटीदार का।

एक्साइटेड हूं कॉलेज के लिए
कॉलेज जाने के लिए एक्साइटेड दीक्षा अग्रवाल की कई तैयारियां एक साथ चल रही हैं। डे्रस तो डिसाइड कर ली है, लेकिन हेयर कटिंग को लेकर काफी कशमकश में हूं। वे बताती हैं कि इसके लिए मैं मैगजीन और नेट का सहारा ले रही हूं। इससेकुछ नई हेयर स्टाइल के बारे में मालूम कर रही हूं।

कैसे होंगे नए दोस्त
सुरूचि माहेश्वरी को उस पल का इंतजार है, जब वे अपनी नई स्कूटी से कॉलेज जाएंगी। वे कहती हैं कि मैं और मेरी दोस्त दोनों मेरी स्कूटी से कॉलेज जाएंगे। पैरेंट्स द्वारा गिफ्ट की हुई स्कूटी से कॉलेज जाने का अलग ही मजा होगा। मैंने अपने लिए ढेर सारी एसेसरीज भी खरीदी है।


...तो रहेंगी नजरें सही
सूरज की पराबैंगनी किरणों (अल्ट्रा वाएलेट) से बचने के लिए हम शरीर पर क्रीम लगते हैं। इन किरणों से त्वचा के जलने का डर रहता है। साथ ही समय से पहले बुढ़ापा आने और कैंसर होने का खतरा रहता है। लेकिन, बहुत से लोग यह नहीं जानते कि पराबैंगनी किरणें आंखों को गंभीर और संभवत: अपरिवर्तनीय नुकसान पहुंचा सकती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार त्वचा के मुकाबले आंखें पराबैंगनी किरणों के प्रति दस गुना ज्यादा संवेदनशील होती हैं। इन किरणों से सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को होता है क्योंकि व्यस्कों के मुकाबले इनकी आंखों की पुतली बड़ी होती है और लैंस काफी साफ होते हैं जिससे दृष्टिपटल (रेटिना) में 70 प्रतिशत ये किरणें पहुंचती हैं। इस शोध के बाद वैज्ञानिक चाहते हैं कि चाहे गर्मी या सर्दी का मौसम हो, बच्चों और बड़ों को सूरज की तीखी नजर से बचने के लिए धूप का चश्मा पहन लेना चाहिए। यहां तक कि बादल छाए होने के बावजूद किरणों द्वारा आंखों को नुकसान पहुंचाने का खतरा रहता है, इसलिए ऎसे मौसम में भी चश्मा लगाकर रहना चाहिए। वैज्ञानिकों के अनुसार गर्मियों में पांच से छह घंटे धूप में रहने से उम्र से सम्बन्घित "मैक्युलर डीजेनेरेशन" का खतरा 50 प्रतिशत रहता है, जो अंधेपन के लिए जिम्मेदार होता है।


छोटा सा प्रयास, प्रॉफिट बड़ा
यदि हम जागरूक हो जाएं तो प्रतिदिन निकलने वाले लगभग हजारों टन कचरे को भी उपयोगी बनाया जा सकता है। बस आवश्यकता है एक पहल की। मेट्रो सिटीज में एक स्वयं सेवी संस्था डेली डम्प ने अनोखा अभियान चलाया है।

घरों से प्रतिदिन निकलने वाले कचरे को कम्पोस्ट खाद में बदलने जुटी है। इसके लिए संस्था ने घर-घर आकर्षक गमले बांटे हैं। लोगों से कचरे को इन्हीं गमलों में फेंकने अपील की है। लोग कचरे के सुनियोजन के प्रति जागरूक हों, इसलिए संस्था घर-घर जाकर कम्पोस्ट खाद को खरीदने का काम भी कर रही है। जबलपुर में भी प्रतिदिन लगभग 400 टन कचरा निकलता है। अगर घरों में कंपोस्ट खाद बनाने की मुहिम छेड़ दी जाए तो न केवल कचरे के विनष्टीकरण की प्रक्रिया से हमें निजात मिलेगी। शहर को साफ-सुथरा भी बनाया जा सकेगा।

दो डस्टबीन एक गमला

घर में मुख्यत: तीन प्रकार का कचरा निकलता है, रद्दी कागज, पालीथीन के बैग, और किचन का वेस्ट। तीनों समस्याओं का निदान हमारे पास है, बस जरूरत है जागरूक बनने की। अगर हम प्रतिदिन खाद्य सामग्री के साथ आने वाली पॉलीथीन को एक बकेट में एकत्र करते जाएं तो कचरा नहीं फैलेगा। दूसरे बकेट में कागज की रद्दी को एकत्र कर लें तो कचरा फैलेगा ही नहीं और महीने में पेपर के साथ बेचने पर धनार्जन भी होगा। किचन में निकलने वाले सब्जी के छिलके आदि को गमले में डालकर रखें, इससे आपको बेहतर कम्पोष्ट खाद मिलेगी जो आपके घर के पेड़-पौधों में डालने के काम आएगी।

हो जाएगी रीसाइकि्लंग

हम पॉलीथीन को यहां-वहां न फेंककर यदि घर पर एकत्र करेंगे और रद्दी खरीदने वाले को दे देंगे तो कचरा नहीं फैलेगा और रीसाइकि्लंग के माध्यम से इसका बेहतर उपयोग हो जाएगा। पालीथीन सड़ता नहीं है जिसके कारण पानी जमीन के अन्दर नहीं जा पाता जिसके कारण जमीन की उर्वराशक्ति कम होती जाती है। इसे जलाने पर हानिकारक गैसें निकलती है जो हमारे और पर्यावरण दोनों के लिए घातक होती हैं। यदि हमने पालीथीन को एकत्र करना शुरू कर दिया तो यकीन मानिए कुछ महीनों में ही आपको अपने आस-पास स्वच्छता दिखाई देने लगेगी।

नहीं होंगी चोक नालियां

आधुनिकता के चलते पालीथीन का उपयोग दिन-ब-दिन बढ़ता ही चला जा रहा है। यह हमारे लिए जितनी उपयोगी है उतने ही इसके दुष्परिणाम भी हैं। यदि हम जागरूकता का परिचय देंगे तो इस समस्या से निजात मिल जाएगी। पालीथीन को घर पर एकत्र कर रद्दी वाले को देने की पहल से बरसात में सड़कों पर 2 से 3 फिट तक पानी नहीं भरेगा।

समस्याएं

- प्रदूषण को बढ़ावा
- नालियों में पानी जमा होने से गंदगी का फैलना
- मच्छरों की संख्या बढ़ना
- जल प्लावन की स्थिति निर्मित होना
- बीमारियों का खतरा बढ़ता है
- जमीन के अन्दर नहीं जा पाता पानी

ऎसे हो सकता है निदान

- हर व्यक्ति करे कचरे का सही प्रबंधन
- कचरे को सुनियोजित तरीके से करें डम्प
- पालीथीन को एकत्र कर लें
- कागज को एकत्र कर लें
- घर से निकले अपशिष्ठ को नाली में नहीं डालें
- कचरा भी बन सकता है उपयोगी

समस्याओं का हल नगर-निगम प्रशासन को कोसने से नहीं निकलेगा, बल्कि इसके लिए आम जनता को जागरूकता का परिचय देना होगा। लोगों के एक छोटे से प्रयास से प्रदूषण में कमी आएगी।

प्रो. पी. के सिंघल, विभागाध्यक्ष, बायोसाइंस डिपार्टमेंट

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