रविवार, 20 जून 2010

कोकणा सेन

शादी का ख्याल छिपता नहीं
कोंकणा ने न केवल आर्ट फ़िल्मों में, बल्कि कमर्शियल फ़िल्मों में भी ख़ुद को प्रूव किया है। ग्लैमर से दूर होने के बावजूद उन्होंने ग्लैमर वर्ल्ड को अपना कायल कर लिया है। अब लोगों को उनकी शादी का इंतज़ार है..


सनी देओल की ‘राइट या रॉन्ग’ हो, रणबीर की ‘वक अप सिड’ या अजय की ‘अतिथि तुम कब जाओगे’, इन जैसी बिल्कुल अलग फ़िल्मों के साथ तालमेल बिठाकर चलना कठिन होता है। मुख्यधारा की इन फ़िल्मों को कोंकणा सेनशर्मा ने अच्छी तरह निभाया है, जबकि उनके टोटल लुक में ग्लैमर ढूंढ़ना मुश्किल है। यानी हिंदी फ़िल्मों की एक ज़रूरी शर्त को वह पूरी नहीं करती हैं।

फिर भी दर्शक उनके कायल हैं और उनके काम की सराहना होती है। शायद यही वजह है कि मुख्य धारा और मल्टीप्लैक्स फ़िल्मों में वह ख़ासी बिज़ी हैं। एक ताज़ा मुलाक़ात में वह बॉयफ्रैंड रणबीर शौरी के बारे में पूछे गए सवालों से बचते हुए फ़िल्मी गतिविधियों से जुड़े सवालों का जवाब खुलकर देती हैं—

शबाना जी ने आपकी तारीफ़ में कहा कि मसाला फ़िल्मों में आपको ज़ाया किया जा रहा है?
उन्होंने मेरी तारीफ़ की, इस बारे में कुछ नहीं कहूंगी। वह मेरी मां की अच्छी दोस्त हैं और मेरे लिए फैमिली की तरह हैं। जहां तक कमर्शियल फ़िल्मों का सवाल है, इन फ़िल्मों में काम करने का फैसला मेरा था। यह फ़िल्में मुझे पसंद हैं। मैं ख़ास तरह की फ़िल्में करके ख़ुद को दायरे में क़ैद नहीं रखना चाहती थी, इसलिए कमर्शियल फ़िल्मों में काम करना मैंने जारी रखा।

‘राइट या रॉन्ग’ जैसी थ्रिलर या ‘अतिथि..’ जैसी कॉमेडी फ़िल्में आपको कितना सुकून देती हैं?
जहां तक मेरी पसंद या सुकून का सवाल है, सीरियस रोल मुझे सबसे ज्यादा संतुष्टि देते हैं। पर जैसा कि मैंने कहा अगर आपको दायरे से निकलना है, तो बहुत कुछ ऐसा करना होगा, जो पसंद का नहीं है। मैंने इस मामले में कोई एड्जस्ट नहीं किया, बल्कि इसे एक्टिंग के चैलेंज के तौर पर लिया है। मैं ख़ुशनसीब हूं कि इस फैसले को लेकर मुझे परेशानी नहीं हुई।

इसीलिए आपको नए दौर की शबाना कहा जाता है?
मैं अभी इस तरह की तुलना से बचना चाहती हूं। सच तो यह है कि मैं अभी ख़ुद को इस क़ाबिल नहीं मानती हूं कि शबाना आज़मी जैसी अदाकारा से अपनी तुलना करूं। फ़िलहाल मैंने भी शबाना जी की तरह आर्ट और कमर्शियल सिनेमा के बीच कोई लकीर नहीं खींची है। मैं मानती हूं कि इस दिशा में आगे बढ़ने में शबाना जी ने मुझे बहुत प्रेरित किया है।

आप दोनों ने तो साथ काम भी किया है?
साथ तो बहुत ज्यादा काम नहीं किया। बस, मां की फ़िल्म ‘15 पार्क एवेन्यू’ में उनके साथ काम करने का अच्छा मौक़ा मिला। उन्होंने मां के साथ कई फ़िल्में की हैं। ‘15 पार्क एवेन्यू’ में काम करने के दौरान उनका को-ऑपरेटिव नैचर मुझे याद आता है। एक सीनियर एक्ट्रैस की परफैक्ट इमेज। मैं भी ख़ुद में यह कॉन्फीडेंस लाना चाहती हूं।

आप कैसी फ़िल्मों को प्राथमिकता देती हैं?
फ़िल्में मनोरंजन से भरपूर हों, इस बात के पक्ष में तो मैं भी हूं। इसी के साथ मेरा यह प्रयास होता है कि मैं इश्यू बेस्ड फ़िल्मों में ज्यादा काम करूं। ऐसी फ़िल्मों में किरदार का स्कैच क्लीयर होता है। ऐसे किरदारों का असर भी बहुत होता है।

अपनी मां की ताज़ा रिलीज़ फ़िल्म ‘जापानीज़ बहू’ में आप दिखाई नहीं दी हैं?
मैं मानती हूं कि वह मेरी मां न होतीं, तो उनके साथ इतनी जल्दी काम करने का मौक़ा मुझे हरगिज़ नहीं मिलता। मैं ‘जापानीज़ बहू’ में भी काम करना चाहती थी। पर डेट प्रॉब्लम के कारण मुझे यह फ़िल्म छोड़नी पड़ी। वैसे मैं फिर मां की अगली फ़िल्म कर रही हूं। ख़ैर, अब मुझे एक एक्ट्रैस के तौर पर ग्रो करना है। मॉम की उम्मीदों को पूरा करना है। यह मां जैसी संजीदा डायरैक्टर की •यादा फ़िल्में करके ही संभव है।

आप एक व़क्त में काफ़ी फ़िल्में कर रही हैं?
‘मिर्च’, ‘मेरेडियन’ जैसी चार-पांच फ़िल्में हैं। देखा जाए, तो यह संख्या ज्यादा है, क्योंकि मेरे काम करने का स्टाइल जुदा है। वैसे मेरी ऱफ्तार बहुत सुस्त है। मैं अचानक ही किसी फ़िल्म को साइन कर उसे पूरा कर देती हूं। ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ की शूटिंग मैंने इसी अंदाज़ में पूरी की थी।

अब तो आप बहुत अच्छी हिंदी बोलने लगी हैं?
हिंदी बोलने में मुझे कभी मुश्किल नहीं हुई। फिर अहम बात यह है कि मैं लगातार हिंदी फ़िल्में कर रही हूं। किसी भाषा की इतनी फ़िल्में करने पर आप असानी से उस भाषा को सीख लेते हैं। अच्छी बात यह है कि इसमें बंगला के कई शब्दों का भी आप उपयोग कर सकते हैं। फिर भी जब कठिन संवाद समझ में नहीं आते हैं, मैं तुरंत उसकी डिटेलिंग में जाती हूं।

आप रणबीर शौरी से शादी कब करने वाली हैं?
फ़िलहाल इतना जान लीजिए कि अभी हम दोनों ही अपने-अपने कैरियर को एक मुक़ाम पर पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। शादी का ख्याल आया, तो बात छिपी नहीं रहेगी। फिर हमारी शादी को लेकर इतनी जिज्ञासा क्यों?

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