रविवार, 26 दिसंबर 2010

खास खबर

शहरों में हिंसा फैलाना चाहते थे राजद्रोही
रायपुर। डा. बिनायक सेन, नारायण सान्याल और पीजूष गुहा पर ढाई साल चले राजद्रोह के मुकदमे के बाद जज एडीजे बीपी वर्मा ने फैसला सुनाया तो उन्होंने साफ लिखा है कि आरोपी नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को बढ़ावा देकर शहरों में हिंसक वारदात करवाना चाहते थे।

फैसले में इस बात का उल्लेख किया गया है कि नारायण सान्याल नक्सली माओवादियों की सबसे बड़ी संस्था पोलित ब्यूरो का सदस्य है, वह बिनायक सेन व पीजूष गुहा के माध्यम से जेल में रहकर ही शहरी क्षेत्रों में हिंसक वारदातों को अंजाम देने की कोशिश में था। पुलिस को जब यह पता चला तो सबसे पहले शहर में बाहर से आने वाले संदिग्ध व्यक्तियों के बारे में होटल, लाज, धर्मशाला व ढाबों पर दबिश दी गई। दबिश के कारण ही पीजूष गुहा पुलिस के हत्थे चढ़ा।यह भी पाया गया है कि बिनायक सेन नारायण सान्याल के पत्र पीजूष गुहा को गोपनीय कोड के माध्यम से प्रेषित किया करता था। तीनों अभियुक्तों की मंशा नक्सलियों के खिलाफ चल रहे आंदोलन सलवा जुड़ूम को समाप्त करने की भी थी। फैसले में सुनवाई के दौरान गवाह के रूप में आए दंतेवाड़ा व कांकेर में कलेक्टर के पद पर रहे के आर पिस्दा ने नक्सलियों की मंशा की पुष्टि की है। फैसले के अनुसार पूरा दंतेवाड़ा जिला नक्सल प्रभावित क्षेत्र है।कांकेर आंशिक नक्सली प्रभावित क्षेत्र है। नक्सली समस्या इलाके में 30 साल पहले ही अपनी जड़ें जमा चुकी थी। शुरूआत में नक्सलियों ने अपने आपको आम जनता के समक्ष उनके हितचिंतक एवं हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया। इससे उन्हें आम जनता का सहयोग एवं समर्थन भी मिला। जनता के इसी सहयोग के बल पर नक्सलियों ने पूरे क्षेत्र में अपने संगठन का विस्तार किया। नक्सली संगठन जैसे-जैसे मजबूत होते गए, वैसे वैसे आदिवासियों का उनके जीवन में हस्तक्षेप बढ़ता गया। इसके बाद नक्सलियों ने अवैध चंदा उगाही शुरू की। आदिवासियों को संगठन में भर्ती करने लगे। विकास के कामों को रोकने की पूरी कोशिश की। इन गतिविधियों से नक्सलियों के खिलाफ बढ़ रहा आक्रोश भी नजर आने लगा। नक्सलियों की बात नहीं मानने पर गांवों वालों को नक्सली जन अदालत लगाकर सजा दी जाती थी। नक्सलियों का आतंक व प्रताड़ना इतनी अधिक बढ़ गई कि आदिवासियों के बीच जीवन मरण का प्रश्न उत्पन्न हो गया। इन्हीं कारणों से जून 2005 में नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन शुरू किया गया।
डा. बिनायक सेन के मकान की तलाशी में नारायण सान्याल का लिखा पत्र, सेंट्रल जेल बिलासपुर में बंद नक्सली कमांडर मदन बरकड़े का डा. सेन को कामरेड के नाम से संबोधित किया पत्र व 8 सीडी जिसमें सलवा जुडूम की क्लीपिंग व नारायणपुर के गांवों में डा. सेन के द्वारा गांव वासियों व महिलाओं के मध्य बातचीत के अंश मिले हैं।
6 फ्रंट संगठनों पर लगाया प्रतिबंध
दंतेवाड़ा में जो नक्सली संगठन काम करता है उसे सीपीआई माओवादी के नाम से जाना जाता है। ये जोनल कमेटी, दलम कमेट, एरिया कमेटी व अन्य संगठन बनाकर नक्सल गतिविधियों का संचालन करते हैं। छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 एक्ट के लागू होने के बाद 12 अप्रैल 2007 को 6 फ्रंट संगठनों को विधि विरूद्ध संगठन घोषित किया गया। > भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी > दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ > क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ > क्रांतिकारी आदिवासी बालक संघ > क्रांतिकारी किसान कमेटी > महिला मुक्ति मंच।

अब तो खोल दीजिए खिड़की
बिलासपुर। रेल प्रशासन को आम यात्रियों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। शायद यही वजह है कि सेंट्रल इंक्वायरी के तीनों नंबर बंद करने के बाद भी रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर की दूसरी खिड़की नहीं खोली जा रही है। पूछताछ करने वालों की संख्या दोगुनी हो गई है और यात्रियों को जानकारी के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ रही है।
बिलासपुर रेल मंडल में मेनुअल इंक्वायरी सिस्टम के बंद होने से रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर में भीड़ बढ़ने लगी है। औसतन हर दिन 5 हजार यात्रियों को जानकारी देने वाले पूछताछ काउंटर में अब 7 हजार यात्री जानकारी लेने पहुंच रहे हैं। यह संख्या आगे और भी बढ़ेगी। भीड़ के अनुरूप रेलवे स्टेशन में जानकारी देने की समुचित व्यवस्था नहीं है। प्लेटफार्म नंबर एक पर खुले पूछताछ काउंटर में दो खिड़की है। पहली खिड़की प्लेटफार्म की ओर तो दूसरी प्लेटफार्म के बाहर की ओर है। इंक्वायरी काउंटर में दो खिड़की देने के पीछे रेल प्रशासन की मंशा यही रही कि यात्रियों को जानकारी लेने के लिए लंबी लाइन न लगानी पड़े। यह व्यवस्था चंद दिनों में ही दम तोड़ गई। दरअसल इंक्वायरी काउंटर पर इतना स्टाफ ही नहीं होता कि दोनों खिड़कियों से यात्रियों को जानकारी दी जा सके। यहां दो-दो कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती है, जिनके जिम्मे यात्रियों को जानकारी देने के अलावा अनाउंसमेंट, कंप्यूटर में कोच की स्थिति दर्ज करना, ट्रेनों के आने-जाने का समय रजिस्टर में दर्ज करने से लेकर दर्जनों कागजी कार्रवाई करना होता है। इंक्वायरी काउंटर की स्थिति ऐसी रहती है कि एक कर्मचारी कागजी कार्रवाई में तो दूसरा जानकारी देने में जुटा रहता है। इन कर्मचारियों ने रेल प्रशासन से स्टाफ बढ़ाने की मांग की है, ताकि दोनों ओर की खिड़कियों को खोला जा सके। रेल प्रशासन ने इंक्वायरी काउंटर को दो से ज्यादा कर्मचारी देने से मना कर दिया है। बहरहाल आम यात्री को ट्रेन संबंधी छोटी-छोटी जानकारियों के लिए परेशान होते देखा जा रहा है।
समस्या क्यों
बिलासपुर रेल मंडल ने मेनुअल इंक्वायरी की सुविधा 18 दिसंबर को बंद कर दी है। पूछताछ के लिए लगाए गए फोन नंबर 411183, 411184 और 411185 बंद कर दिए गए हैं। रेल प्रशासन का कहना है कि इंक्वायरी सिस्टम को हाईटेक किया जा रहा है, इसके लिए यात्रियों को 139 की सुविधा दी गई है। रेल प्रशासन इस बात को मानने से इंकार करता है कि सेंट्रल इंक्वायरी नंबर बंद करने से यात्रियों की परेशानी बढ़ेगी। इधर मेनुअल इंक्वायरी बंद होने से रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर में भीड़ दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रही है।

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