रविवार, 2 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ की खास खबरें

फर्जी हस्ताक्षर कर दी 79 को सरकारी नौकरी
छत्तीसगढ़ के पंचायत विभाग में नौकरी देने के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। इसमें विभाग के पुराने संचालक के हस्ताक्षर कर 79 लोगों की नियुक्ति और पदस्थापना के आदेश जारी कर दिए गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि उक्त संचालक का तबादला 20 सितंबर को हो गया था, जबकि आदेश 8 दिसंबर की तारीख पर जारी किए गए हैं।
इस मामले में शनिवार को रायपुर के गोलबाजार थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है। पंचायत विभाग के पूर्व संचालक जीएस धनंजय के हस्ताक्षर से राज्य के विभिन्न जिलों में सहायक आंतरिक लेखा परीक्षण एवं करारोपण अधिकारी के पद 79 लोगों की नियुक्ति की गई। इससे संबंधित फाइल जब पंचायत मंत्री रामविचार नेताम के पास गई तो उन्हें संदेह हुआ क्योंकि धनंजय का तबादला तो अक्टूबर माह में ही हो गया था। श्री नेताम ने विभाग के अफसरों को पूरे मामले की पड़ताल करने के आदेश दिए। उसके बाद आदेश की जांच की गई तो फर्जीवाड़ा सामने आ गया।
सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश के अनुसार जीएस धनंजय के स्थान पर 20 सितंबर को बीएस अनंत को पंचायत का संचालक बनाया गया था। उसके बाद 26 नवंबर से आलोक अवस्थी विभाग के संचालक हैं। इसकी पूरी जानकारी मंत्री श्री नेताम को दी गई तो उन्होंने इस मामले में दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए। उसके बाद गोलबाजार थाने में लिखित में मामले की शिकायत की गई।

नौकरी के नाम पर उगाही का शक
अनुमान है कि इस खेल में लिप्त लोगों ने बेरोजगारों को नौकरी देने के नाम पर उगाही की होगी। जिन लोगों की नियुक्ति और पदस्थापना की गई है, उनमें से कोई भी विभाग का पुराना कर्मचारी नहीं है। इस कारण यह माना जा रहा है कि यह बेरोजगारों से ठगी का बड़ा मामला है।
जीएस धनंजय के नाम से पूर्व में जारी आदेश के उस हिस्से की फोटोकापी की गई जहां उनके हस्ताक्षर हैं। इसमें फोटोकापी में डेट बदलकर फिर नई फोटोकापी की गई जिसमें 8 दिसंबर की तारीख डाली गई।
फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर किसी को नौकरी पर नहीं रखने के आदेश सभी जिलों में जारी कर दिए गए हैं। इसके अलावा सभी जिलांे में कलेक्टर और एसपी को भी ऐसे लोगों के सामने आने पर सीधे कानूनी कार्रवाई के लिए पत्र लिखा गया है।
आलोक अवस्थी, संचालक, पंचायत विभाग

बेघरों को मिला रैन बसेरा
बिलासपुर शहर में रहने वाले आवासहीन भिखारियों को मूलभूत सुविधाएं मुहैय्या कराने की संवेदनशील पहल करते हुए जिला प्रशासन द्वारा उन्हें रैन बसेरा उपलब्ध कराया गया है।
राज्य कीर स्थापना की दसवीं वर्षगांठ पर जिला प्रशासन द्वारा संवेदनशील पहल करते हुए रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले गरीबों को ठंड, बरसात के मौसम में एक सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने के लिए अधिकारियों की एक टीम गठित कर सर्वे कराया गया।
टीम ने रात में 10 बजे से 12 बजे तक शहर में भ्रमण कर ऐसे लोगों को चिन्हित किया तथा 18 वर्ष से कम तथा 18 से 50 वर्ष और 50 वर्ष से उपर के निराश्रित लोगों की पृथक-पृथक सूची तैयार की। ऐसे व्यक्तियों में 174 पुरुष और 94 महिलाएं तथा 18 वर्ष तक के 27 बच्चे शामिल किए गए।
इन व्यक्तियों के लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से अस्थाई रूप से रैन बसेरा की व्यवस्था की गई तथा उन्हें ठंड से बचाने के लिए कंबल वितरित किया गया। रैनबसेरा में रहने वाले लोगों को प्रतिदिन भोजन की व्यवस्था भी इन्ही संगठनों के सहयोग से की जा रही है।

शतरंज खिलाड़ी ने लगाया अनाचार का आरोप
बिलासपुर शादी के मारपीट करने पर अंतरराष्ट्रीय शतरंज खिलाड़ी महिला ने खिलाड़ी पति पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए पुलिस से शिकायत की है। कोनी पुलिस ने खिलाड़ी के खिलाफ जुर्म दर्ज कर लिया है।
कोनी कृष्ण विहार निवासी पीड़ित महिला की शिकायत के मुताबिक 6 माह पूर्व विदेश में अंतरराष्ट्रीय शतरंज स्पर्धा के दौरान झारखंड में रेलवे में पदस्थ शतरंज खिलाड़ी इमरान हुसैन से उसकी मुलाकात हुई।
इस दौरान दोनों के बीच प्रेम संबंध स्थापित हो गया। महिला का कहना है कि दोनों ने मर्जी से शादी भी कर ली। इसके बाद वह वापस आ गई और इमरान झारखंड चला गया। महिला के मुताबिक 28 दिसंबर को इमरान कोनी आया था।
इस दौरान उसके घर के सामने इमरान ने उससे मारपीट की थी। महिला दो माह से गर्भवती है। मारपीट की घटना के बाद महिला ने कोनी थाने में इमरान पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई है। पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया है।

अंकों के आधार पर जाने जाते हैं गांव
डीएनके प्रोजेक्ट के तहत बंगलादेश से विस्थापित बंग परिवारों को पखांजूर क्षेत्र में बसाया गया। तत्कालिक व्यवस्था के तहत गांवों का नामकरण अंकों के आधार पर कर दिया गया। 1986 में जब प्रोजेक्ट समाप्त कर राज्य शासन को स्थानांतरित किया तो राज्य शासन द्वारा इन गांवों का नामकरण किया गया लेकिन इतने वर्षों बाद भी गांवों का नाम प्रचलन में नहीं आ पाया है। आज भी अधिकांश लोग अपने या दुसरे गांवों को डीएनके के दौरान आबंटित अंकों के आधार पर ही जानते है।
1962 में क्षेत्र में विस्थापित बंग परिवारों को पुर्नवास कराने हेतु डीएनके प्रोजेक्ट की शुरूआत केंद्र शासन द्वारा की गई। 1972 तक डीएनके द्वारा नए गांव बसाए जाते रहे। इस तरह पीवी 1 से पीवी 133 तक कुल 133 गांव बसाए गए और क्रम से इन्हें नंबर दिया जाता रहा। कुछ गांव को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो सारे गांव क्रम से ही बसाए गए जिसकी शुरूआत कापसी क्षेत्र के पीवी 1 परलकोट गांव से 1 से हुई और अंत बांदे क्षेत्र में हुआ। इन अंको का सर्वाधिक फायदा यह है कि इससे उस गांव की भौगोलिक स्थिति जान सकते है कि यह गांव पखांजूर, कापसी या बांदे किस क्षेत्र में है। अंकनुमा गांव का नाम लोगों की जुबान पर कुछ ऐसा चढ़ा की राज्य शासन द्वारा दिए गए नाम प्रचलन में नही आ पा रहे है। प्रशासनिक कार्यों में अब राज्य शासन द्वारा आबंटित गांव का नाम जरूर लिखा जाता है किंतु उसके उस अंक भी लिख दिए जाते है। जब से ग्राम पंचायत व्यवस्था राज्य शासन ने लागू की है तब से पंचायत मुख्यालय का नाम जरूर लोगों द्वारा लिया जाने लगा है लेकिन आश्रित ग्राम आज भी अंकों के आधार पर ही जानेे जाते है।

शुरू होने से पहले ही बंद कॉल सेंटर
रायपुर.स्कूल में शिक्षक देर से आते हैं? पढ़ाई नहीं हो रही? कक्षा में बैठने के लिए जगह नहीं है? ऐसी शिकायतें टेलीफोन के माध्यम से सुनने के लिए शिक्षा संचालनालय में खोला जा रहा काल सेंटर खुलने के पहले ही ध्वस्त हो गया।
ऐसी योजना थी कि बच्चों के माता-पिता टोल फ्री नंबर पर फोन करके स्कूल से संबंधित सभी तरह की शिकायतें सीधे मुख्यालय में कर सकें। टोल फ्री नंबर इसलिए रखा गया ताकि कोई भी कहीं से भी फोन करें, उन्हें उसका शुल्क अदा न करना पड़े।
काल सेंटर के लिए मुख्यालय के एक बड़े कक्ष को खाली कराया गया। वहां 20 से ज्यादा कंप्यूटर लगाए गए। बीएसएनल से टोल फ्री नंबर के लिए संपर्क किया गया। साल भर की फीस के रुप में 68 हजार रुपए अदा किए गए।
काल सेंटर संचालित करने के लिए आफिस में स्टाफ नहीं था। अफसरों ने वित्त विभाग से चार आपरेटरों के नए पद मांगे। वित्त में प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह बात किसी को नहीं मालूम लेकिन विभागीय अधिकारियों की कवायद यहीं तक सीमित रही। नतीजन काल सेंटर का फामरूला अस्तित्व में आने के पहले ही ध्वस्त हो गया।
काल सेंटर के जरिए स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधारने में खासी मदद मिल सकती थी। काल सेंटर अस्तित्व में आने के बाद प्रत्येक स्कूल के बाहर टोल फ्री नंबर बड़े-बड़े बोर्ड पर चस्पा करना तय किया गया।
ताकि स्कूली बच्चों के पालक आसानी से नंबर देख सकें। उसके बाद स्कूल में शिक्षकों के गायब रहने पर या पढ़ाई न होने पर बच्चों के पालक टोल फ्री नंबर के जरिये सीधे मुख्यालय में शिकायत कर सकते थे।
अभी दूर-दराज के इलाकों की शिकायतें महीनों मुख्यालय नहीं पहुंच पाती। यह मुख्यालय से संपर्क करने का सीधा साधन हो सकता था। इसके जरिये आला अफसरों को यह मालूम हो पाता कि कौन से स्कूल में पढ़ाई नहीं हो रही है। ऐसी दशा में उस समस्या का जल्द से जल्द निदान हो सकता था।
एक नजर में
> शासन ने योजना पर खर्च किए 3 लाख 75 हजार।
> कंप्यूटर और इनवर्टर खरीदा गया।
> बीएसएनएल के छह कनेक्शन लिए गए।
> मुख्यालय में कंप्यूटर लगाकर बकायता सिस्टम आन किया गया।
> पूरी तैयारी और रुपयों की हुई बरबारी।
> 2008-09 में बनी थी योजना।
> दिसंबर 2009 में पूरा सेटअप किया था तैयार।
"काल सेंटर क्यों बंद हैं? इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है। जांच करवाई जाएगी।
अगर कोई तकनीकी दिक्कत है तो उसे दूर करने के प्रयास होंगे।"

संगीत के बीच होगा इलाज, गूंजेंगे सभी धर्मो के मंत्र
प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में अब मरीजों का इलाज संगीत के बीच किया जाएगा। यहां म्यूजिक सिस्टम लगाया जा रहा है जिससे मंत्र, गुरुबाणी व कुरान की आयतें गूंजेंगी।
पूरे अस्पताल में 350 माइक्रो स्पीकर लगाए जाएंगे। योजना को जनवरी में होने वाली स्वशासी समिति की बैठक में मंजूरी दी जाएगी। म्यूजिक सिस्टम लगने के बाद अपनी बारी का इंतजार कर रहे मरीजों को बोर नहीं होना पड़ेगा। इस पूरे सिस्टम पर पांच लाख लागत आएगी।
मधुर संगीत कई बीमारियों के इलाज में मददगार होता है। इसी बात के मद्देनजर अस्पताल प्रबंधन ने म्यूजिक सिस्टम लगाने का निर्णय लिया है। यह ओपीडी, आईपीडी, अधीक्षक, सहायक अधीक्षक व सीएमओ कार्यालय में लगेगा। ऑपरेशन थिएटर में भी म्यूजिक सिस्टम लगाने की योजना है।
माइक्रो स्पीकर के संचालन के लिए अधीक्षक कार्यालय व ओपीडी गेट के सामने मे आई हेल्प यू काउंटर के पास कंट्रोल रूम बनेगा। दोनों स्थानों से सभी माइक्रो स्पीकर संचालित होंगे।
माइक्रो स्पीकर से किसी भी समय टू वे बात की जा सकेगी। यह सिस्टम 24 घंटे काम करेगा। आपातकाल में माइक्रो स्पीकर काफी मददगार होंगे। उदाहरण के लिए अधीक्षक कार्यालय से एक साथ कैजुअल्टी व दूसरे वार्ड में बात की जा सकेगी।
किसी डॉक्टर को बुलाना हो तो फोन करने के बजाय माइक्रो स्पीकर के माध्यम से बुलाया जा सकता है। कोई मरीज गंभीर है तो संबंधित डॉक्टर को तत्काल बुलाया जा सकेगा। कंट्रोल रूम से जो बात होगी वह सभी माइक्रो स्पीकर में गूंजेगी।
कई बार फोन लाइन इंगेज रहने के कारण संबंधित डॉक्टर या अन्य व्यक्ति से तत्काल बात नहीं हो पाती। ऐसे में माइक्रो स्पीकर की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। प्रबंधन आपातकाल में डॉक्टरों को लाने के लिए चार पहिया वाहन की व्यवस्था पहले ही कर चुका है।
खाली समय में माइक्रो स्पीकर से विभिन्न धर्मो के मंत्र गूंजेंगे। गायत्री मंत्र के अलावा गुरुबाणी व कुरान की आयतें गूंजेंगी। साउंड इतना रहेगा जिससे दूसरों के काम में बाधा न पहुंचे।
प्रबंधन इस बात पर विशेष ध्यान देगा कि म्यूजिक सिस्टम से बहुद्देशीय कार्य लिया जाए। जानकारों के अनुसार मंत्रोच्चर मन को शांति देने वाला होती है। ऐसे में मरीज को दर्द में भी सुकून के दो पल मिलेंगे।
"लगभग पांच लाख रुपए की लागत से अस्पताल में 350 माइक्रो स्पीकर लगाए जाएंगे। दो कंट्रोल रूम के जरिए इसका संचालन होगा। जनवरी में मेडिकल कॉलेज में स्वशासी समिति की होने वाली बैठक में इसे मंजूरी मिलने की संभावना है। म्यूजिक सिस्टम आपातकाल में काफी मददगार होगा।"
डॉ. सुनील गुप्ता, सहायक अधीक्षक आंबेडकर अस्पताल

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