मंगलवार, 3 सितंबर 2013

चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की सधी चालें

कांग्रेस ने चुनावों को दृष्टिगत रखते हुए अपनी चालें बेहद सधे अंदाज में चलनी शुरू कर दी हैं। संसद के मानसून सत्र से पहले जहां तेलंगाना गठन का निर्णय कर एक बड़े विवाद को खत्म करने की दिशा में कदम उठाया गया वहीं सत्र में कांग्रेस 'गेम चेंजर' माने जा रहे अपने दो महत्वपूर्ण विधेयकों खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक को पास करवाने में सफल रही। हालांकि अभी इन विधेयकों को राज्यसभा की मंजूरी मिलना बाकी है लेकिन लोकसभा में जिस आसानी से यह विधेयक पास हो गये उसे देखते हुए राज्यसभा में इन्हें किसी प्रकार की मुश्किल पेश आने की उम्मीद नहीं है। अब संसद सत्र के बाद तेलंगाना गठन की प्रक्रिया में तेजी आएगी जिसके तहत गृह मंत्रालय कैबिनेट के समक्ष एक नोट प्रस्तुत करेगा और फिर नए राज्य के गठन को लेकर आंध्र प्रदेश विधानसभा में प्रस्ताव भेजा जाएगा। एकीकृत आंध्र समर्थकों की मांगों पर विचार के भी पार्टी ने संकेत दिये हैं। कांग्रेस का प्रयास है कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकपाल विधेयक को पास करा लिया जाए ताकि विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए मुद्दों का अभाव हो जाए। विपक्ष कांग्रेस नीत संप्रग सरकार को मुख्यतः भ्रष्टाचार, आतंकवाद के प्रति कथित नरम रुख और महंगाई के मोर्चे पर घेरता रहा है। भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों के खुलासों ने निश्चित ही सरकार की छवि को ठेस पहुंचाई है लेकिन समय समय पर सरकार की ओर से कार्रवाई के माध्यम से यह संकेत दिया जाता रहा है कि वह भ्रष्टाचारियों को नहीं बख्शेगी। हालांकि कोयला खदान आवंटन संबंधी फाइलें गायब हो जाना सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को और बड़े नेताओं का नाम आने पर कैसे मामले को दबाने को प्रयास किया जाता है, यह दर्शाता है। आतंकवाद के मोर्चे पर सरकार को जरूर कुछ कामयाबी मिली है। कुछ बड़े आतंकवादियों को सुनाई गई सजा ए मौत के आदेश पर अमल किया गया तथा कुछ भागते फिर रहे बड़े आतंकवादी गिरफ्त में आए, जिससे सरकार को कुछ राहत मिली। जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है तो यह बात खुद प्रधानमंत्री ने मानी है कि यह मुश्किल घड़ी है। विपक्ष जहां इस हालत के लिए सरकारी नीतियों को दोषी ठहरा रहा है तो वहीं सरकार इसके लिए बहुत हद तक वैश्विक हालात को जिम्मेदार मानती है। सरकार ने हाल ही में विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई नियमों में ढील प्रदान की है और इस प्रयास में है कि लोकसभा चुनावों से पहले यह निवेश देश में आए और इसके सकारात्मक प्रभाव दिखने लगें। सरकार के समक्ष पिछले दो तीन वर्षों में बड़ी चुनौती बन कर उभरे कुछ समाजसेवियों और सामाजिक संगठनों के आंदोलन भी अब ठंडे पड़ चुके हैं। शुरू में सरकार के हठ के चलते ही इन आंदोलनों को गति मिली थी लेकिन बाद में सरकार की कूटनीति के चलते यह आंदोलन खुद ही शांत होते चले गये। संप्रग सरकार के समक्ष इस बार बड़ी चुनौती है क्योंकि दस वर्षों के उसके कार्यकाल में सकारात्मक बातें भी हुईं तो नकारात्मक बातें भी खूब रहीं। जनता के मन के बारे में कई सर्वेक्षणों का कहना है कि वह बदलाव के मूड में है। शायद यह भी एक कारण हो कि संप्रग सरकार अपने वादों को पूरा करने में बेहद जल्दबाजी दिखा रही है। ऐसे समय में जबकि कई आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अर्थव्यवस्था की खराब हालत के चलते खाद्य सुरक्षा विधेयक लाना सही नहीं है, संप्रग सरकार इसे मजबूती के साथ लेकर आई है। भूमि अधिग्रहण विधेयक को भी वाणिज्यिक संगठनों ने पीछे ले जाने वाला कदम बताया है। लेकिन कांग्रेस जानती है कि उसे अभी कारपोरेट जगत या विशेषज्ञों की सराहना की नहीं बल्कि जनता के उस वर्ग के वोटों की सख्त जरूरत है जोकि मतदान करने जरूर जाता है। कांग्रेस ने केंद्रीय स्तर पर और कई प्रदेशों में संगठन में बदलाव कर भी चुनावी तैयारियों को गति प्रदान की है। पार्टी ने आजकल काफी चर्चित हो रहे सोशल मीडिया में अपने पिछड़ने को स्वीकार कर इस दिशा में कई कदम उठाये हैं। पिछले दिनों पार्टी ने 'खिड़की' नाम से ऑनलाइन सामाजिक मंच तैयार किया जहां लोगों को अपने विचार प्रकट करने की और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा आयोजित करने की पूरी आजादी है। पार्टी ने प्रवक्ताओं का एक बहुत बड़ा पैनल भी तैयार किया है जिसको ऑनलाइन सामाजिक मंचों पर पार्टी की उपस्थिति मजबूत करने के लिए हाल ही में कांग्रेस मुख्यालय में गूगल और टि्वटर के भारतीय प्रमुखों ने सुझाव भी दिये। कांग्रेस जनता को आरटीआई जैसा बड़ा हथियार देने, पारदर्शिता बरतने और चुनाव सुधार के नाम पर बड़े बड़े दावे और वादे तो करती है लेकिन हाल ही में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दागियों के चुनाव लड़ने पर लगाई गई रोक हटाने को मंजूरी दे दी। इसके अलावा मंत्रिमंडल ने राजनीतिक दलों को सूचना उपलब्ध कराने से सुरक्षा प्रदान करने के लिए आईटीआई कानून में संशोधन को भी मंजूरी प्रदान की। यह सही है कि इन दोनों मामलों में कैबिनेट पर सभी दलों का दबाव था लेकिन सरकार के पास यह एक मौका था जब वह अपनी छवि को सुधार सकती थी। संप्रग अपने वर्तमान स्वरूप के साथ ही चुनाव में जायेगा यह तो तय हो चुका है और सीटों के बंटवारे पर भी अंदरखाने चर्चा शुरू हो चुकी है। लेकिन कुछ राज्यों के बारे में स्थिति बिलकुल स्पष्ट नहीं है जैसे कि कांग्रेस को अभी यह तय करना है कि वह उत्तर प्रदेश में सिर्फ रालोद के साथ ही सीटों का बंटवारा करे या फिर सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में से किसी के साथ मिलकर चुनाव लड़े। बिहार में भी स्थिति साफ नहीं है। वहां कांग्रेस ने पिछला चुनाव अपने बलबूते लड़ा था इस बार उसे चयन करना है कि संभावित सहयोगी जनता दल यू के साथ मिलकर लड़ें या फिर पुराने सहयोगियों लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान के साथ ही चुनाव मैदान में उतरा जाए। पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में भी ऐसी ही तसवीर है। बंगाल में ममता साथ आने को तैयार नहीं हैं ऐसे में कांग्रेस के समक्ष 'एकला चलो' की मजबूरी है वहां वामपंथी दल चुनाव बाद सरकार को सहयोग कर सकते हैं। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस मानकर चल रही है कि तेलंगाना में तो वह टीआरएस के साथ मिलकर लाभ में रहेगी और आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस का सहयोग लेने पर माथापच्ची जारी है। बहरहाल, बहुत कुछ राजनीतिक समीकरण टिके हैं इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर। दिल्ली और राजस्थान में जहां कांग्रेस के समक्ष सत्ता में वापसी की चुनौती है तो वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वह दस वर्षों बाद सत्ता में आने के प्रयास में है। यह विधानसभ चुनाव चूंकि नवंबर माह में होने हैं ऐसे में कांग्रेस के पास बेहद कम समय है मतदाताओं को लुभाने के लिए।

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