गुरुवार, 28 अगस्त 2014

मजबूत इरादा

लेखक - अरुण कुमार बंछोर
जीवन को सुंदर ढंग से जीने की कला तो कोई विक्की से सीखे। ऐसा भी नहीं कि रजना से शादी के बाद उसने जिंदगी को सुंदर मोड दिया हो। अच्छी जीवनसंगिनी मिलने से पहले भी वह जिंदादिल इंसान था। मगर शादी के बाद खुशियां बढ गई। चलो कहीं बाहर चलते हैं। दिन भर तुम घर में और मैं दफ्तर में.., शाम तो हम दोनों साथ बिताएं, दफ्तर से लौटते ही विक्की ने रंजना से कहा। रंजना ने नौकरी नहीं की। वह दिन भर घर के कामों में व्यस्त रहती और विकी के घर लौटने की प्रतीक्षा करतीहै। शाम की उदासी मुझे भाती नहीं, जी चाहता है उदासी को चुरा कर इसमें खुशियां भर दूं.., रंजना को बांहों में लेते हुए विक्की ने कहा । अरे कुछ तो ख्याल करो ,दरवाजा खुला है। वैसे भी शाम में उदासी कहां होती है! इसमें चाहे जितने रंग भर दो, यह निखरती जाती है.., बांहों की कैद से निकलते हुए रंजना चहकी। शाम की दीवानगी में डूबे विक्की को देखकर रंजना का मन कभी-कभी अतीत में गोते लगाने लगता। लेकिन यादों को झटक कर वह वर्तमान में लौट आती। स्मृति-पटल की दस्तक को अनसुना करना भी उसकी विवशता है। दरिया किनारे की वह शाम जब वह राजेश के साथ घूमती वहां आ गई थी। ..रंजना फिर अतीत में खो गई। अर्थशास्त्र विभाग के ऑनर्स के विद्यार्थियों ने महानदी पर पिकनिक मनाने का प्रोग्राम बनाया था। लडकियां कुछ डर रही थीं पर लडके उत्साहित थे। महानदी पार करने में तो देर हो जाएगी, मुझे डर लगता है, कामिनी ने कहा। पूरी नदी थोडे ही पार करेंगे। नदी जहां सूख जाती है, वहां रेत भरी जमीन होती है, उसे ही दियारा कहते हैं। वहीं सभी पिकनिक मनाने जाते हैं, रमेश ने लडकियों को समझाया। लहराती नदी को सभी नाव से झुक-झुक कर छू रहे थे। रायपुर यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों की उमंग देख कर महानदी भी मचल उठी थी। ऐसे चुप रहकर भला पिकनिक मनाते हैं? नाव पर नाच नहीं सकते तो क्या, गा तो सकते हैं, राजेश ने कहा तो सभी ने एक स्वर में सहमति जताई। गाने का सिलसिला चल पड़ा तो फिर रेत पर पहुंचकर ही रुका। इनके शोर से इठलाती नदी छल-छल करती ताल से ताल मिलाने लगी। अंतिम वर्ष होने के कारण सभी अपनी जुदाई के दर्द को नदी में बहा देना चाहते थे। अचानक रंजना की नजर राजेश से मिली जो अपलक उसे निहार रहा था। कुछ घबरा कर रंजना ने पलकें झुका लीं। कुछ देर वह यूं ही इधर-उधर देखती रही, लेकिन चोर नजरों से उसने देखा तो राजेश अभी भी उसे ही निहार रहा था। रेत पर पहुंचकर पहले कुछ लडकों ने चादर बिछाई तो कुछ ने खाना बनाने की तैयारियां शुरू कर दीं। लडकियों ने भी साथ दिया। लडके सूखी लकडियां ले आए। सबने मिल कर खाना बनाया। खाना लाजवाब था या फिर संग का स्वाद मीठा था। खाने के बाद अंत्याक्षरी शुरू हुई। लडकों और लडकियों के अलग-अलग ग्रुप बने। एक से बढ कर एक नए और पुराने फिल्मी गाने सबने अपने-अपने स्मृति-कोष से निकाले। दोनों समूहों ने मिल कर समां बांध दिया। प्रोफेसर भी दो समूहों में बंट गए। युवाओं के सुर में सुर मिला कर वे भी युवावस्था के दिनों में जा पहुंचे। चलो अब दियारा किनारे घूमा जाए। फिर भला ये दिन कहां लौटेंगे! हां, हां, सभी चलते हैं, कामिनी ने कहा। शाम होने से पहले लौटना भी है, इसीलिए जल्दी चलना होगा, विपुल ने कहा। भाई, हम लोग तो यहीं गपशप करेंगे। तुम लोग जाओ लेकिन जल्दी लौट आना क्योंकि शाम तक लौटना भी है.., प्रोफेसर गुप्ता ने दरी पर लेटते हुए कहा। मुझे तो सोच कर ही भय लगता है कि वह दिन दूर नहीं, जब नदी हमसे रूठ कर दूर चली जाएगी। फिर रेत ही रेट रहेगा। आज हम नाव से यहां तक पहुंचे हैं फिर रेत का महत्व कम हो जाएगा। किनारे से ही लोग रेट को देखेंगे, और नदी का जल कहीं दूर दिखाई देगा, एक साथी दार्शनिक भाव से बोल उठा। मस्ती चल ही रही थी कि अचानक जोरों से रेत भरी आंधी आ गई। संभलने का मौका भी नहीं मिला। रेत ने सबकी आंखों पर हमला बोल दिया था। आंखें बंद किए सभी तेज आंधी में पत्ते की तरह इधर-उधर दौडने लगे। किसी को यह होश नहीं था कि कौन किस दिशा में दौड रहा है। आंखों में रेत भरी थी, लेकिन सभी चीख रहे थे। रंजना ने दुपट्टे से अपना सिर ढका था। उसने सोचा भी नहीं था आंधी इस वेग से आएगी। वह भी किसी दिशा में भाग रही थी या रेत की आंधी उसे बहा ले जा रही थी। आंखें खोल नहीं सकती थी। आंधी के शोर में किसी दोस्त की आवाज भी नहीं सुनाई दे रही थी। भय से उसके हाथ-पांव कांपने लगे। कंठ सूख गया। थक गई तो किसी तरह एक ही जगह पर बैठ गई और मुंह छिपा लिया। एकाएक जैसे ही महसूस हुआ कि वह दूर आ गई है और अकेली है, सब्र का बांध टूट गया और वह जोरों से फूट कर रोने लगी। काफी देर बाद आंधी का वेग कम हुआ, पर रंजना इतनी डरी हुई थी कि आंखें नहीं खोल पा रही थी। थोडी देर बाद एकाएक उसे अपने कंधे पर किसी पुरुष के हाथों का स्पर्श महसूस हुआ। वह भय से चीख उठी। डरो नहीं रंजना, मैं हूं- राजेश। देखो सभी इधर-उधर भागे हैं। एक-दूसरे को ढूंढ रहे हैं.., राजेश ने उसके पास बैठते हुए कहा। आंधी कम हो रही है, थोडी देर में पूरी थम जाएगी तो सभी आ जाएंगे, राजेश ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा। रंजना की सिसकियां और बढ गई। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। यह देख कर राजेश ने उसे अपनी बांहों का सहारा दिया। उस अशांत माहौल में इतना बडा संबल पाकर रंजना उससे लिपट गई। एकाएक वह घटा जो दोनों ने कभी सोचा भी नहीं था। आंधी और भय ने उन्हें इतना करीब ला दिया। रंजना घबराओ नहीं, मैं तुम्हारे साथ हूं, राजेश ने उसे सीने से लगाते हुए कहा। बांहों का कसाव बढता गया। सांसें आपस में टकराने लगीं। मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं रंजना, तुम्हें हमेशा करीब देखना चाहता हूं, अधीरता से राजेश ने कहा। राजेश की बांहों की जकडन में रंजना बेसुध सी हो गई थी। प्रेम का एहसास जन्म ले चुका था। भावनाएं शब्दों में बदलतीं, तभी कुछ जोडी कदमों की आहट ने उन्हें छिटका दिया। राजेश .. रंजना.. कहां हो तुम लोग? आवाजों ने रंजना की सुधि लौटा दी थी। उसकी आंखों में अब रेत के साथ ही शर्म की लाली भी थी। काफी देर बाद उसने आंखें खोलीं और भरपूर नजरों से राजेश को देखा। राजेश की आंखें बोल रहीं थीं कि यह शाम उसे हमेशा याद रहेगी। रंजना को याद आया कैसे क्लास में भी अकसर राजेश उसे निहारता रहता था। आज वह कितनी अजीब सी स्थिति में उसकी बांहों में समा गई थी। आंधी खत्म हो गई थी और दोनों के मन में एक असीम शांति थी। लडके-लडकियों का एक झुंड पास आ गया था..। विदाई के पल सभी के लिए मुश्किल हो रहे थे और लौटते हुए सभी खामोश थे। दरवाजे की घंटी बजते ही रंजना की विचार-तंद्रा टूटी। किसी काम से बाहर गए विक्की लौट गए थे। दरवाजा खुलते ही बोले, रंजना, चलो.. जल्दी तैयार हो जाओ, आज ट्रेन से आरंग घूमने चलते हैं। इतने दिनों से हम दिल्ली में हैं लेकिन ट्रेन में एक ही बार बैठे हैं, विक्की ने कहा। पहले चाय पी लो। फिर तैयारी करना, रंजना ने किचन में जाते हुए कहा। आज संडे है, शायद भीड कम हो, कमरे में जाते हुए विक्की ने कहा। संडे होने के बावजूद पार्किग में कहीं जगह नहीं मिली। अंत में कार पार्किग के बाहर छोड कर वे ट्रेन की ओर बढने लगे। हवा तेज थी। रंजना का आंचल लहरा रहा था। बालों की लट बार-बार चेहरे पर आकर परेशान कर रही थी। इन्हें खुला ही छोड दो न! तुम्हारे खुले बाल अच्छे लगते हैं, विक्की ने पीछे से क्लचर हटा कर उसके बाल खोल दिए। ट्रेन से शहर कुछ ज्यादा ही खूबसूरत दिख रहा था। लोटस टेंपल, इस्कॉन को उन्होंने चमकती रोशनी में देखा। उसने अपने बालों को समेटना चाहा तो विक्की ने रोक दिया। रंजना एक बार फिर यादों में खो गई। वर्षो पहले राजेश की कही बात उसे याद आने लगी, खुले बालों में तुम बहुत अच्छी लगती हो रंजना , बालों से रेत झाडते हुए राजेश ने उससे कहा था। आज उसे बार-बार राजेश क्यों याद आ रहा है! लौटते वक्त उन्हें बैठने की जगह नहीं मिली तो खडे रहे। भीड नहीं थी, फिर भी विक्की ने हिदायत दी, उतरते समय आराम से उतरना, हडबडाना नहीं। अचानक रंजना को महसूस हुआ कि कोई शख्स उसे अपलक निहार रहा है। ध्यान बंटने से वह लडखडा गई। तभी विक्की ने उसे थाम लिया। रंजना के मन में उत्सुकता जाग उठी कि वह व्यक्ति आखिर है कौन? उसने अस्त-व्यस्त हो आई साडी को चुपके से ठीक किया और खुले उलझे बालों को हाथ से सुलझाने की चेष्टा की। बातें करते-करते विक्की कुछ दूर हुआ तो वह शख्स फिर दिखा। पांच मिनट में हमारा स्टेशन आने वाला है, विक्की ने उसे परेशान देख कर कहा। इस बार रंजना ने भी उस व्यक्ति को ध्यान से देखा। मस्तिष्क पर जोर नहीं देना पडा। उम्र की परतें इंसान पर जम जाती हों, लेकिन चेहरे के हाव-भाव तो वही रहते हैं। सामने बैठा इंसान वही था, जिसने उस दिन अपनी बांहों का सहारा दिया था। रंजना को उसकी सांसों की गंध महसूस होने लगी। पहचान के भाव आते ही दोनों ओर से एक मुसकान झलकी। रंजना की आंखों में पहचान की झलक देख राजेश सीट से उठने लगा। उसने सोचा, रंजना से मिल ले। रंजना भी क्षण भर आगे बढी। रंजना स्टेशन आ गया है। धीरे-धीरे बाहर निकलना, कहता हुआ विक्की बाहर निकला। पीछे-पीछे रंजना भी गई। बाहर जाकर वह मुडी तो दरवाजे पर राजेश खडा था। तभी दरवाजा बंद हो गया। आगे देख कर चलो वर्ना गिर जाओगी, विक्की ने रंजना का हाथ थाम लिया। अनजाने में कही गई विक्की की बात रंजना को ठीक लगी। अतीत उसके वर्तमान को डिगा सकता है। मेरे हाथ थामे रहो और आराम से चलो। इतनी नर्वस क्यों हो जाती हो? विक्की ने उसे सहारा देते हुए कहा। दोनों चलते रहे। ट्रेन शायद कुछ स्टेशन आगे बढ चुकी होगी। इस शाम ने रंजना के शांत मन में उथल-पुथल मचा दी थी। लेकिन जो आंधी अचानक जीवन में आई वह अब थम भी चुकी थी। वह मजबूती से विक्की का हाथ थाम उसके साथ आगे बढती गई। अब जीवन में शांती थी..। एल -297 , न्यू सुभाष नगर ,भोपाल (मप्र) (बिना अनुमति के प्रकाशित ना करे)

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