<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762</id><updated>2011-10-30T20:57:08.620+05:30</updated><title type='text'>खुल्लम खुल्ला</title><subtitle type='html'>मे समाचार न्यूज़ एजेंसी का समाचार सम्पादक हूँ.खुल्लम खुल्ला मेरी अभिव्यक्ति  है .अपना विचार खुलेआम दुनिया के सामने व्यक्त करने का यह सशक्त माध्यम है.अरुण बंछोर-मोबाइल -9302208609,9425025393                  सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे, कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>468</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7127732378623114912</id><published>2011-07-14T21:33:00.000+05:30</published><updated>2011-07-14T21:34:03.290+05:30</updated><title type='text'>कई महिलाओं का साथ चाहते हैं पुरुष</title><content type='html'>आमतौर पर पत्‍नी को चिट करने वाले पतियों के बारे में कहा जाता है कि उन्‍हें घर में प्‍यार नहीं मिलता इसलिए वे विवाहेत्‍तर संबंध बनाते हैं। &lt;br /&gt;लेकिन हाल ही में जेन हेव्लिकेक के नेतृत्व में चार्ल्स विश्वविद्यालय के एक दल द्वारा किए गए अध्ययन में पाया कि पुरुष के भटकाव पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वह अपने संबंधों में खुश और संतुष्ट है या नहीं। &lt;br /&gt;वे सुखी विवाहित जीवन जीते हुए भी विवाहेत्‍तर संबंध बनाते हैं क्‍योंकि वे साथी के तौर पर कई महिलाओं का साथ चाहते हैं। जबकि महिलाओं के साथ ऐसा बहुत कम होता है। &lt;br /&gt;महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के संबंध सेक्स से ज्यादा प्रेरित होते हैं। वे संबंधों के मामलों में विभिन्‍नता चाहते हैं और इसी से प्रेरित होकर ऐसे कदम उठाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7127732378623114912?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7127732378623114912/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post_4141.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7127732378623114912'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7127732378623114912'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post_4141.html' title='कई महिलाओं का साथ चाहते हैं पुरुष'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-1359496861253571961</id><published>2011-07-14T21:32:00.000+05:30</published><updated>2011-07-14T21:33:22.952+05:30</updated><title type='text'>पुरुष महिलाओं में क्या ढूंढते हैं ?</title><content type='html'>बदलते समय के साथ पुरुषों के पसंद में भी काफी बदलाव आया है। हाल ही में हुए सर्वे में पुरुषों के पसंद के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है। &lt;br /&gt;ऑनलाइन हुए सर्वे में पता चला है कि स्‍क्रीन पर जीरो फिगर भले अच्‍छा लगता है लेकिन जब निजी जिंदगी की बात आती है तो पुरुषों को मांसल देह वाली महिलाएं ज्यादा भाती हैं। &lt;br /&gt;जब मर्दों के आसपास कोई नहीं होता, तो महिलाओं के बारे में उनकी क्या जिज्ञासाएं होती हैं। यह जानने के लिए रिसर्चर्स ने विभिन्‍न देशों के 1 अरब से ज्‍यादा पुरुषों पर शोध किया।&lt;br /&gt;रिसर्चर ने पाया कि पुरुषों को महिलाओं के सेक्‍सी पैर बहुत पसंद है साथ ही पतली की बजाए भरे बदन वाली महिलाएं ज्यादा पसंद आती हैं। &lt;br /&gt;जबकि महिलाएं पुरुषों में सेक्‍स अपील से ज्‍यादा रोमांस पसंद करती हैं। उन्‍हें रोमांटिक पुरुष काफी पसंद आते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-1359496861253571961?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/1359496861253571961/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post_2669.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1359496861253571961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1359496861253571961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post_2669.html' title='पुरुष महिलाओं में क्या ढूंढते हैं ?'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-6240736089802036674</id><published>2011-07-14T21:31:00.000+05:30</published><updated>2011-07-14T21:32:12.040+05:30</updated><title type='text'>आज की लड़कियों को चाहिए कुछ इस तरह के पति</title><content type='html'>अगर आप एक अच्छी जीवनसाथी की तलाश में हैं तो शायद आपको अपना जॉब बदलना पड़ सकता है क्योंकि हाल ही में एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि महिलाएं ऐसे व्यक्ति से शादी करना चाहती हैं। जिसकी न सिर्फ सैलरी ज्यादा हो बल्कि एक अच्छे ओहदे पर भी हो। &lt;br /&gt;ब्रिटिश वेबसाइट मैच डॉट कॉम ने हाल ही में सर्वे कर यह खुलासा किया है कि महिलाएं आज भी पद और पैसे के प्रति आकर्षित होती हैं। शोधकर्ता केट टेलर का कहना है कि जीवनसाथी के रूप में मैनेजर के पद पर कार्यरत पुरुष महिलाओं की पहली पसंद हैं। दूसरे नंबर पर डॉक्टर , तीसरे नंबर पर वकील, शिक्षक और बिजनेस मैन चौथे और पांचवे नंबर पर है। &lt;br /&gt;साथ ही ऐसे लोगों के कुवांरे रह जाने की आशंका है जो लाइब्रेरियन, फूल व्यवसायी, दमकलकर्मी, सेल्समैन या ड्राइवर की नौकरी करते हैं। &lt;br /&gt;महिलाओं का कहना है कि एक मैनेजर पति ज्यादा समझदार, समर्पित और महत्वकांक्षी होता है। इसके साथ ही सप्ताह में 5 दिन 9 से 5 बजे की नौकरी और सप्ता‍ह में दो दिन की छुट्टी भी महिलाओं को ऐसे पुरुषों के प्रति आकर्षित करती है। &lt;br /&gt;मैनेजेर के अलावा महिलाएं डॉक्टर से शादी करना पसंद करती हैं क्योंकि डॉक्टर अपने परिवार का बेहतर ख्याल रख सकता है। महिलाओं को अपने परिवार तथा रिश्तेरदारों के सेहत की चिंता नहीं होती है। इसके साथ ही डॉक्टर अमीर और जिम्मेदार भी होते हैं। वकीलों के तार्किक क्षमता के कारण अपना दिल दे बैठती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-6240736089802036674?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/6240736089802036674/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post_14.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6240736089802036674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6240736089802036674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post_14.html' title='आज की लड़कियों को चाहिए कुछ इस तरह के पति'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8815158260714229105</id><published>2011-07-14T21:30:00.000+05:30</published><updated>2011-07-14T21:31:11.384+05:30</updated><title type='text'>सिर्फ किस नहीं है महिलाओं की प्राथमिकता</title><content type='html'>रिश्तों के मामले में पुरुषों को ज्यादा बोल्ड समझा जाता है लेकिन बदले समय के साथ महिलाओं की सोच में भी काफी बदलाव आया है। हाल ही में इंडियाना यूनि‍वर्सिटी के शोधकर्ताओं ने खुलासा किया है कि पुरूष आलिंगन और चुंबन को ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं दूसरी ओर महिलाएं सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं।&lt;br /&gt;शोधकर्ताओं ने पांच देशों के एक हजार से अधिक दंपतियों पर अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि रिश्ते के शुरूआती 15 वर्ष में महिलाएं बच्चों के पालन पोषण में व्यस्त रहने के कारण ज्यादा भावनात्मक होती हैं ।&lt;br /&gt;इस दौर में वे बच्चों की परवरिश और घर की देखभाल में व्यस्त रहती हैं लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उनके ऊपर दबाव कम होता जाता है।&lt;br /&gt;महिलाओं को अपने संबंधों के बारे में सोचने के लिए ज्यादा समय मिलता है। वे अपने पार्टनर के साथ ज्यादा समय बिताती हैं और सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं। उम्र के इस दौर में सेक्स उनकी प्राथमिकता होती है।&lt;br /&gt;www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8815158260714229105?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8815158260714229105/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8815158260714229105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8815158260714229105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='सिर्फ किस नहीं है महिलाओं की प्राथमिकता'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-6784247954881740836</id><published>2011-06-20T22:30:00.000+05:30</published><updated>2011-06-20T22:32:30.637+05:30</updated><title type='text'>सिनेमा में स्त्री : स्त्री होने की दुविधा और दावेदारी</title><content type='html'>वह एक हिंदुस्तानी औरत थी जो चाह रही थी कि उसके दुख, दर्द और उसकी विपत्तियों को पहचाना जाए। कोई उसके माथे का बुखार महसूस कर पाए। कोई उसे सुने। कोई यह समझ सके कि वह बहुत थकी है। उसे थोड़ी-सी अपनी जगह चाहिए । जितना उसका पैर दुख रहा है, उतना ही उसका माथा और उतना ही उसका मन। वह भारतीय मर्दवाद के बीहड़ों में घूमती रही थी - बदहवास और लहूलुहान। उसने तीन चार मदोर्ं को जाना लेकिन वे सारे ही उसे रौंदना चाहते थे। यह सब ‘भूमिका’ (1977) नाम की फिल्म की नायिका के साथ होता है। फिल्म में एक जगह कहा भी जाता है कि सब कुछ बदलता है लेकिन मर्द नहीं बदलता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहना पड़ेगा कि अगर कोई एक कथा फिल्म भारतीय स्त्री के दुख, दुविधा और दावेदारी को आमूल तरीके से सामने ला पाती है तो वह है ‘भूमिका’ जिसे श्याम बेनेगल ने 1977 में ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ के बाद चौथी फिल्म के तौर पर निर्देशित किया था। वह एक स्त्री की आत्मकथा पर आधारित फिल्म थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभिनेत्री हंसा वाडकर की आत्मकथा। बस हुआ यह कि श्याम बेनेगल की फिल्म में हंसा उषा में बदल गई। लेकिन हुआ यह भी कि हंसा और उषा भारतीय स्त्री की जीवनी में बदलती गईं। आत्मकथा कथा में बदल गई। हंसा वाडकर मराठी सिनेमा में चौथे दशक में एक महत्वपूर्ण अदाकारा के तौर पर जानी-पहचानी गईं। मराठी थियेटर और अपने फिल्मी सफर के दौरान उन्होंने जो देखा जाना उसे उन्होंने अपनी आत्मकथा में कह दिया, जो उन्होंने अरुण साधु की मदद से लिखी। आत्मकथा का नाम उन्होंने 1959 की अपनी एक फिल्म के नाम पर रखा - ‘सुनो जो कहूंगी’। और सबने इस कहानी को बहुत मर्म और अवधान के साथ सुना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक स्त्री के कांटों पर चलने की कहानी थी। एक औरत के बार-बार हतप्रभ होने का वृत्तांत। बार-बार ठगे जाने की कराह। यह एक स्त्री की कहानी थी जिसकी नींद उड़ी हुई है, जो उनींदी है और जो ठौर की तलाश में है। जो नीमहोशी में चली जा रही है। यह मदोर्ं की दुनिया में एक स्त्री का भटकाव था जहां बार बार मोहभंग होता था। स्वप्न टूटता था। उषा ने कलाओं को साधा था - गाने और अभिनय और नृत्य की कलाएं। लेकिन मदोर्ं से निपटने की कला उसे नहीं आती थी। यह उसकी त्रासदी है। लेकिन यह तो भारतीय स्त्री की त्रासदी भी है। तो ‘भूमिका’ एक दस्तावेज है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘भूमिका’ में उषा की भूमिका स्मिता पाटिल ने निभाई - बिना किसी विवाद के स्मिता पाटिल हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी अभिनेत्री हैं और ‘भूमिका’ शायद उनकी सबसे अच्छी फिल्म है। उषा के तौर पर स्मिता फिल्म का केंद्रीय पात्र थीं लेकिन जैसा कि कहा गया है समस्या भी वही थीं। कहना यह है कि स्त्री होना दूसरे दर्जे की नागरिकता का आरोपण और वरण दोनों है और इस अनंतरता को स्मिता ने क्या ही खूबी से निभाया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उषा कमजोर और काइयां केशव देहलवी (अमोल पालेकर) से शादी करती है जो अधिकारवाद का लिजलिजापन है। वह कितना भी टेढ़ा-मेढा क्यों न हो, अपनी स्त्री को वह अंगूठे के नीचे रखना जानता है। श्याम बेनेगल केशव के जरिए कहना भी यही चाहते हैं कि पुरुष का मूल गुण यह है कि वह पुरुष है, जिसका यह मायने भी है कि वह स्त्री की नियति का नियंत्रक है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्वशी उर्फ उषा इस कैद को स्वीकार नहीं करना चाहती। वह दांपत्य का किला ढहाती है लेकिन तब वह और निष्कवच हो जाती है। कहां है स्वातं˜य। परंपरा, बाजार और सामंत में से किसी एक का वरण उसे करना ही होगा। लेकिन यह इसलिए भी तो है कि वह मदोर्ं के बनाए विकल्पों में से किसी एक का चुनाव कर रही है। अनंत नाग, कुलभूषण खरबंदा, नसीरुद्दीन शाह, अमरीश पुरी के तौर पर पुरुष चरित्रों की एक कतार है जो स्मिता को अपने-अपने तरीकों से रौंदने को तैयार है। कोई सामंत है तो कोई तिÊारती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संबंध उसे स्वतंत्र नहीं करता, बंधुआ बनाता है। वह साथी को पुकारती है तो मिलता है जेलर। वह एक बंधनमुक्त यूटोपिया चाहती है लेकिन बदलती है वह माल में। श्याम बेनेगल स्त्री के सब कुछ खोने की दास्तान को एक स्त्री की जीवनी के ज़रिये कहते हैं। वे पुरुष के सत्तात्मक मन की जांच काफी हद तक नारीवादी औज़ारों से करते हैं। फिल्म में फैले अंधेरे में वह मर्दवाद के चूहेपन पर लगातार अपनी जासूसी टॉर्च की रौशनी फेंकते रहते हैं। तो होता यह है कि पुरुष का बौनापन छिपाए नहीं छिपता और इस सबके बीच स्त्री के अपराजेय होने की हंसी जब-तब सुनाई देती रहती है - उसकी अपनी सतत चीखों के बीच।&lt;br /&gt;www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-6784247954881740836?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/6784247954881740836/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6784247954881740836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6784247954881740836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='सिनेमा में स्त्री : स्त्री होने की दुविधा और दावेदारी'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-4376483221401611723</id><published>2011-05-28T22:27:00.001+05:30</published><updated>2011-05-28T22:29:53.046+05:30</updated><title type='text'>उपयोगी सामग्री</title><content type='html'>&lt;strong&gt;कैंसर को हराकर मशरूम हुआ दुनिया में मशहूर!!&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;प्रकृति हमें जीवन और समृद्धि तो देती ही है पर साथ ही बीमार होने पर हमें उससे छुटकारा भी दिलाती है। आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा, होम्योपेथिक...आदि चिकित्सा पद्धतियां तो पूरी तरह से प्रकृति और उसके अंगों की सहायता से ही रोगी को रोग से छुटकारा दिलाती है। यह बात एक बार फिर से साबित की स्वादिष्ट मशरूम ने। जी हां मशरूम ने....&lt;br /&gt;हाल ही में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने अपने शोध के आधार पर दावा किया है कि प्रोस्टेट कैंसर को मिटाने में एशियाई क्षेत्रों में प्रयुक्त चिकित्सकीय मशरूम बेहद कारगर है। क्वींसलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि तुर्की टेल मशरूम प्रयोगशाला में चूहों में प्रोस्टेट कैंसर को विकसित होने से दबाने में 100 फीसदी कारगर सिद्ध हुआ है।&lt;br /&gt;यह शोध -पीएल ओएस वन- जर्नल में प्रकाशित हुआ है।&lt;br /&gt;तुर्की टेल मशरूम में मिलने वाले तत्व पॉलीसेकैरोपेप्टाइड के बारे में पता चला है कि यह चूहों में प्रोस्टेट कैंसर स्टेम कोशिकाओं को निशाना बनाते हुए ट्यूमर बनने की संभावना को कम करता है। निश्चित ही यह शोध इस बीमारी से लडऩे में अहम् कदम साबित हो सकता है। इसकी प्रयोग की एक खाशियत यह भी रही कि इससे ट्यूमर का विकास तो पूरी तरह से रुक ही जाता है साथ ही इसका कोई नकारात्मक प्रभाव यानी साइट इफेक्ट भी नहीं होता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;शादी में क्यों निभाई जाती है संगीत की रस्म?&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt; &lt;br /&gt;शादी में मंगलगीत गाए जाते हैं संगीत की रस्म निभाई जाती है जिसमें घर के सभी सदस्य आनंद और उल्लास के साथ भाग लेते हैं। दरअसल इसका कारण यह है कि संगीत आंनद आपस में गहरा ताल्लुक है। संगीत के बगैर किसी भी प्रकार के सेलीबे्रशन की सफलता अधूरी ही मानी जाती है। ढ़ोल, नगाड़े और शहनाई संगीत के पारंपरिक साधन हैं। इनका प्रयोग हमारे यहां बड़े प्राचीन समय से होता आ रहा है।&lt;br /&gt;इसके अंतर्गत पहले घर की महिलाएं मंगलगीत गाती थी और इस कार्यक्रम में ही ढोल बजाकर गीत गाती थी। सतीजी व शिव की शादी हो राम सीताजी का स्वयंवर सभी में महिलाओं द्वारा मंगलगीत गाए जाने का वर्णन मिलता है धीरे-धीरे इस क्रिया को परंपरा के रूप में शामिल कर लिया गया। हम देखते हैं कि भगवान शिव के पास भी अपना डमरु था, जो कि तांडव करते समय वे स्वयं ही बजाते भी थे।&lt;br /&gt;जीवन युद्ध और ढ़ोल- संगीत के अन्य वाद्य यंत्रों की बजाय ढ़ोल की अपनी अलग ही खासियतें होती हैं। मन में उत्साह, साहस और जोश जगाने में ढ़ोल का बड़ा ही आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। तभी तो पुराने समय में युद्ध का प्रारंभ भी ढ़ोल-नगाड़ों से ही होता था। ढ़ोल से निकलने वाली ध्वनि तरंगें योद्धओं को जोश और साहस से भर देती थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रानी ने क्यों दिया मुसीबत से बचाने वाले को ही शाप?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;दमयन्ती जब कुछ शांत हुई। व्याध ने पूछा सुन्दरी तुम कौन हो? किस कष्ट में पड़कर किस उद्देश्य से तुम यहां आई हो? दमयन्ती की सुन्दरता, बोल-चाल और मनोहरता देखकर व्याध मोहित हो गया। वह दमयंती से मीठी-मीठी बातें करके उसे अपने बस में करने की &lt;br /&gt;कोशिश करने लगा। दमयन्ती उसके मन के भाव समझ गई। दमयंती ने उसके बलात्कार करने की चेष्टा को बहुत रोकना चाहा लेकिन जब वह किसी प्रकार नहीं माना तो उसने शाप दे दिया कि मैंने राजा नल के अलावा किसी और का चिंतन कभी नहीं किया हो तो यह व्याध मरकर गिर पड़े। दमयंती के इतना कहते ही व्याध के प्राण पखेरू उड़ गए। व्याध के मर जाने के बाद दमयंती एक निर्जन और भयंकर वन में जा पहुंची। &lt;br /&gt;राजा नल का पता पूछती हुई वह उत्तर की ओर बढऩे लगी। तीन दिन रात दिन रात बीत जाने के बाद दमयंती ने देखा कि सामने ही एक बहुत सुन्दर तपोवन है। जहां बहुत से ऋषि निवास करते हैं। उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। ऋषियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने दमयन्ती का सत्कार किया और उसे बैठने को कहा- दमयन्ती ने एक भद्र स्त्री के समान सभी के हालचाल पूछे।&lt;br /&gt;फिर ऋषियों ने पूछा आप कौन है तब दमयंती ने अपना पूरा परिचय दिया और अपनी सारी कहानी ऋषियों को सुनाई। तब सारे तपस्वी उसे आर्शीवाद देते हैं कि थोड़े ही समय में निषध के राजा को उनका राज्य वापस मिल जाएगा। उसके शत्रु भयभीत होंगे व मित्र प्रसन्न होंगे और कुटुंबी आनंदित होंगे। इतना कहकर सभी ऋषि अंर्तध्यान हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पाण्डवों को कृष्ण क्यों पसंद करते थे?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;पं.विजयशंकर मेहता &lt;br /&gt;उद्धवजी ने कहा-भगवन देवर्षि नारदजी ने आपको यह सलाह दी है कि फुफेरे भाई पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में सम्मिलित होकर उनकी सहायता करनी चाहिए। उनका यह कथन ठीक ही है और साथ ही यह भी ठीक है कि शरणागतों की रक्षा अवश्यकर्तव्य है। पाण्डवों के यज्ञ और शरणागतों की रक्षा दोनों कामों के लिए जरासन्ध को जीतना आवश्यक है।&lt;br /&gt;प्रभो! जरासन्ध का वध स्वयं ही बहुत से प्रयोजन सिद्ध कर देगा। बंदी नरपतियों के पुण्य परिणाम से अथवा जरासन्ध के पाप-परिणाम से सच्चिदानंद स्वरूप श्रीकृष्ण! आप भी तो इस समय राजसूय यज्ञ का होना ही पसंद करते हैं। इसलिए पहले आप वहीं पधारिए।&lt;br /&gt;उद्धवजी की यह सलाह सब प्रकार से हितकर और निर्दोष थी। देवर्षि नारद, यदुवंश के बड़े-बूढ़े और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने भी उनकी बात का समर्थन किया। अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने वसुदेव आदि गुरुजनों से अनुमति लेकर दारुक, जैत्र आदि सेवकों को इन्द्रप्रस्थ जाने की तैयारी करने के लिए आज्ञा दी।&lt;br /&gt;हस्तिनापुर जाना -भगवान् को सूचना मिली और भगवान बहुत दुखी हो गए। सूचना यह थी कि कौरवों ने छल से पाण्डवों को लाक्ष्यागृह में भेजा और पांडव और कुंती जलकर मर गए। यह सूचना जब कृष्णजी को मिली तो कृष्णजी बहुत चिंतित हो गए, लेकिन उनको विश्वास नहीं हुआ। कुछ उदास भी हुए। &lt;br /&gt;पाण्डव भगवान् को क्यों पसंद थे समझ लें। कर्म करने से अनुभव होता है। पवित्र कर्म से धर्ममय अनुभव होते हैं। &lt;br /&gt;श्रीकृष्ण संकेत देते हैं कि अध्यात्म शक्ति की जागृति, प्रत्यक् चेतना छिगम् अर्थात् अन्तर्गुरु ईश्वर की चेतन सत्ता का प्रत्यक्ष अनुभव। साधन (कर्म) के तीन स्तर होते हैं। प्रथम स्तर पर साधक अपने कत्र्तत्याभिमान से युक्त रहता है। (मैं साधन कर रहा हूं, कर्म कर रहा हूं, सेवा कर रहा हूं आदि) दूसरे स्तर पर ईश्वर की शरण में रहता है और अपनी प्रगति को ईश्वर की अनुकम्पा के अधीन अनुभव करता है। तीसरे स्तर पर ब्रम्हभाव में रत रहता हुआ जीवन सफल करता है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिगरी दोस्त नशे में अंधे ही नहीं मूर्ख भी बन गए!!&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;यह शिकायत कइयों की रहती है कि जी-तोड़ मेहनत करने और हर कोशिश आजमाने के बाद भी हमें सफलता क्यों नहीं मिल पाती? ऐसा कई बार होता है कि सारी की सारी मेहनत बेकार चली जाती है। समस्या की असलियत को जानने के लिय जब हम गहराई में जाकर बारीकी से खोजबीन करते हैं तब पता चलता है कि मेहनत बेकार इसलिये हुई क्योंकि वह गलत दिशा में बगैर सोचे-समझे की गई थी। इस बात को आसानी से समझने के लिये आइये चलते हैं एक रोचक घटना की ओर...&lt;br /&gt;दो जिगरी दोस्त चांदनी रात का मजा लूटने के लिये नदी किनारे जा पहुंचे। जमकर शराब की चुस्कियां ली और जब नशे में धुत हो गए तो खूब नाच-गाना हुआ। कभी किशोर कुमार बन जाते तो कभी माइकल जेक्शन, शराब की मदहोंशी ने शर्म-संकोच की सारी हदें मिटा दी थीं। नाच गाने से जब मन भर गया तो उनके मन में नदी की सैर करने का सुन्दर खयाल आया। दोनों परम मित्र एक-दूसरे के गले में हाथ डालकर लडख़ड़ाते हुए पैरों से नदी के किनारे बंधी नाव की ओर चल दिये। नशे की मदहोंसी में थे, पूरे शुरूर में थे उतावली में सीधे कूद कर नाव में सवार हो गए। जल्दबाजी में इतना भी होंश नहीं रहा कि नाव जिस रस्सी से किनारे से बंधी है उसे खोला ही नहीं है। दोनों ने जल्दी-जल्दी नाव में रखे चप्पू उठाए और लगे चप्पुओं को चलाने। नशे की मदहोंशी को चांदनी रात की खूबसूरती ने और भी बढ़ा दिया था। सोचने-समझने की दिमागी क्षमता को नशे के थपेड़ों में कभी का बहा चुके थे। नाव आगे बढ़ भी रही है या नहीं इस बात को दोनों में से किसी को ध्यान ही नहीं रहा। बस लगे हैं चप्पुओं को चलाने में। &lt;br /&gt;दोनों ने जमकर शराब गटकी थी इसलिये जल्दी होंश लोटने के का सवाल ही नहीं था। चप्पू चलाते-चलाते सारी रात गुजर गई। सवेरा होने को था, एक मित्र जो थोड़ा अधिक समझदार था बोला-लगता है हम किनारे से कुछ ज्यादा ही दूर निकल आए हैं अब लौट चलना चाहिये। सवेरा होने लगा था उजाले में नदी का खूबसूरत किनारा साफ नजर आ रहा था। जब पीछे मुड़ कर दोनों ने देखा तो दिमाग में कुछ ठनका, सारी बात समझ में आने लगी। पता चल गया कि सारी रात नाव तो किनारे से ही बंधी रही है, जल्दी में रस्सी को खोलना भूल गए थे। रात भर चप्पू चलाने की बेवकूफी भरी मेहनत के बारे में सोच कर मन ही मन शर्मिंदगी भी हुई और हंसी भी खूब आई। दोनों की मिलीभगत से हुई इस मूर्खतापूर्ण घटना को किसी से न कहने का पक्का वादा करके एक दूसरे को विदा देकर अगली बार किसी अच्छी जगह पर पार्टी करने की सलाह करके अपने घरों को चल गए। &lt;br /&gt;इस कहानी को पढ़कर उन शराबी मित्रों को कोई भी आसानी से मूर्ख कह देगा लेकिन ऐसा जाने-अनजाने हम सभी के साथ होता रहता है। हम मेहनत तो खूब करते हैं लेकिन कामवासना, गुस्सा, आलस्य, लालच.. जैसी जाने कितनी ही रस्सियां हमारे पैरों से बंधी रहती हैं और मौत को सामने देखकर हमें समझ में आता है कि सारी दोड़-धूप बैकार ही चली गई आखिर हम पहुंचे तो कहीं भी नहीं। नशे भी कई तरह के होते हैं, कुछ नजर आते हैं लेकिन अधिक घातक नशों को तो इंसान कभी देख भी नहीं पाता।&lt;br /&gt;www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-4376483221401611723?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/4376483221401611723/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4376483221401611723'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4376483221401611723'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html' title='उपयोगी सामग्री'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-5013523999452263306</id><published>2011-05-27T22:48:00.001+05:30</published><updated>2011-05-27T22:48:33.295+05:30</updated><title type='text'>अपनी आमदानी का उपयोग ऐसे करें...</title><content type='html'>पं. विजयशंकर मेहता &lt;br /&gt;अपने लिए तो सभी कमाते हैं, पर हमारी कुछ कमाई ऐसी होना चाहिए जो सेवा के रूप में बदल सके। आजकल सेवा भी हथियार बना ली गई है। धंधा बना ली गई थी यहां तक तो ठीक था, लेकिन अब शस्त्र के रूप में सेवा और खतरनाक हो जाती है। &lt;br /&gt;जो दुनियादारी के सेवक हैं, यह अक्सर ऐसे ही काम करते हैं। कोई सेवक कहता है कि मैं हिन्दू धर्म को संगठित करना चाहता हूं। कोई कह रहा है मैं इस्लाम की सेवा करना चाहता हूं। कोई ईसा की सेवा में घूम रहा है। नेता कह रहे हैं कि हम देश की सेवा कर रहे हैं। यह सब समाजसेवा तो हो सकती है, लेकिन इससे भीतर परमात्मा पैदा नहीं होता।&lt;br /&gt;जब चित्त में ईश्वर या कोई परम शक्ति होती है तो सेवा का रूप बदल जाता है। हिन्दू धर्म के साधु-संतों की, इस्लाम के ठेकेदारों की, क्रिश्चनिटी के पादरियों की और हमारे राष्ट्र के नेताओं की सेवा के ऐसे परिणाम नहीं आते, जैसे आज धर्म के नाम पर मिल रहे हैं। इसलिए सेवा के ईश्वर वाले स्वरूप को समझना होगा। अभी सेवा चित्त के आनंद से वंचित है। परमात्मा का एक स्वरूप है सत्य।&lt;br /&gt;ईमानदारी से देखा जाए तो चाहे धर्म हो या राजधर्म, जो लोग सेवा का दावा कर रहे हैं उनके भीतर से सत्य गायब है। धर्म का चोला ओढ़ लें यहां तक तो ठीक है, अब तो लोगों ने भगवान का ही चोला ओढ़ लिया है। वेष के भीतर से जब विचार समाज में फिंकता है तो लोग सिर्फ झेलने का काम करते हैं। वे यह समझ नहीं पाते कि सत्य कहां है। इसलिए दूसरे जो कर रहे हैं उनसे सावधान रहें और हमें जो करना है उसके प्रति ईमानदार रहें। लगातार प्रयास करें कि भीतर परमात्मा जागे और तब बाहर हमारे हाथ से सेवा के कर्म हों।&lt;br /&gt;www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-5013523999452263306?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/5013523999452263306/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_9069.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5013523999452263306'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5013523999452263306'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_9069.html' title='अपनी आमदानी का उपयोग ऐसे करें...'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7400244980652217889</id><published>2011-05-27T22:47:00.000+05:30</published><updated>2011-05-27T22:48:09.611+05:30</updated><title type='text'>सहायता और प्रार्थना का यह नियम है....</title><content type='html'>पं.विजयशंकर मेहता &lt;br /&gt;आप स्वयं जगदीश्वर हैं और आपने जगत् में अपने ज्ञान, बल आदि कलाओं के साथ इसलिए अवतार ग्रहण किया है कि संतों की रक्षा करें और दुष्टों को दण्ड दें। ऐसी अवस्था में प्रभो! जरासन्ध आदि कोई दूसरे राजा आपकी इच्छा और आज्ञा के विपरित हमें कैसे कष्ट दे रहे हैं, यह बात हमारी समझ में नहीं आती।&lt;br /&gt;आपने 18 बार जरासन्ध से युद्ध किया और सत्रह बार उसका मान मर्दन करके उसे छोड़ दिया, परन्तु एक-बार उसने आपको जीत लिया। हम जानते हैं कि आपकी शक्ति, आपका बल-पौरुष अनन्त है। मनुष्यों का सा आचरण करते हुए आपने हारने का अभिनय किया, परन्तु इसी से उसका घमंड बढ़ गया है। हे अजित! अब वह यह जानकर हम लोगों को और भी सताता है कि हम आपके भक्त हैं, आपकी प्रजा हैं। &lt;br /&gt;अब आपकी जैसी इच्छा हो वैसा कीजिए।&lt;br /&gt;यह सहायता और प्रार्थना का नियम है, जिससे आप सहायता मांग रहे हैं, उसके सामथ्र्य की भी थाह आपको होनी चाहिए। परमात्मा असीम शक्तिशाली हैं, हम उनसे सहायता मांगते हैं तो यह भाव भी होना चाहिए कि हम आपकी शक्ति जानते हैं, आप हमें इस संकट से बचा सकते हैं।दूत ने कहा - भगवन जरासन्ध के बंदी नरपतियों ने इस प्रकार आपसे प्रार्थना की है। वे आपके चरणकमलों की शरण में हैं और आपका दर्शन चाहते हैं। आप कृपा करके उन दीनों का कल्याण कीजिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7400244980652217889?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7400244980652217889/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_6025.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7400244980652217889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7400244980652217889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_6025.html' title='सहायता और प्रार्थना का यह नियम है....'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-3029432492432018325</id><published>2011-05-27T22:46:00.001+05:30</published><updated>2011-05-27T22:47:29.764+05:30</updated><title type='text'>प्यार की एक अनोखी दास्तान</title><content type='html'>एक बड़ी सुन्दर लाइन है जो सच्चे स्नेह और प्यार की ताकत को बयान करती है। वो पंक्ति कुछ इस तरह है कि -जाकर जापर सत्य सनहू, सो ताहि मिलहिं न कछु संदेहू , यानी जिस भी किसी का किसी के प्रति सच्चा प्यार होगा, तो उसका उससे मिलन होकर रहेगा।&lt;br /&gt;कई प्रेम कहानियां अधूरी रह जाती हैं, लेकिन इसका अर्थ नहीं कि वे समाप्त ही हो गईं हैं। अगर आपका प्यार सच्चा है तो एक न एक दिन आपको जरूर मिलता है। पुराणों में ऐसी ही एक प्रेम कहानी है राजा नल और दयमंती की। तो आइये चलते हैं उस अमर प्रेम कथा की ओर.........&lt;br /&gt;एक बार राजा नल अपने भाई से जुए में अपना सब कुछ हार गए। उनके भाई ने उन्हें राज्य से बाहर कर दिया। नल और दयंमती जगह जगह भटकते फिरे। एक रात राजा नल चुपचाप कहीं चले गए। साथ उन्होने दयमंती के लिए एक संदेश छोड़ा जिसमें लिखा था कि तुम अपने पिता के पास चली जाना मेरा लौटना निश्चित नहीं हैं। दयमंती इस घटना से बहुत दुखी हुई उसने राजा नल को ढ़ूढऩे का बड़ा प्रयत्न किया लेकिन राजा नल उसे कहीं नहीं मिले। दुखी मन से दयंमती अपने पिता के घर चली गई। &lt;br /&gt;लेकिन दयमंती का प्रेम नल के लिए कम नहीं हुआ। और वह नल के लौटने का इंतजार करने लगी। राजा नल अपना भेष बदलकर इधर उधर काम कर अपना गुजारा करने लगे। बहुत दिनों बाद दयमंती को उसकी दासियों ने बताया कि राज्य में एक आदमी है जो पासे के खेल का महारथी है। दयमंती समझ गई कि वह व्यक्ति कोई और नहीं राजा नल ही है। वह तुरंत उस जगह गई जहां नल रुके हुए थे लेकिन नल ने दयमंती को पहचानने से मना कर दिया लेकिन दयमंती ने अपने सच्चे प्रेम के बल पर राजा नल से उगलवा ही लिया कि वही राजा नल है। फिर दोनों ने मिलकर अपना राज पाट वापस हासिल कर लिया। कथा कहती है कि आपका समय कैसा भी हो अगर आपका प्याार सच्चा है तो आपके साथी को आपके वापस लौटा ही लाता है। www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-3029432492432018325?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/3029432492432018325/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_8245.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3029432492432018325'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3029432492432018325'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_8245.html' title='प्यार की एक अनोखी दास्तान'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-4720104400230999440</id><published>2011-05-27T22:45:00.001+05:30</published><updated>2011-05-27T22:46:16.252+05:30</updated><title type='text'>क्या हुआ जब स्वयंवर में पहुंच गए परशुराम?</title><content type='html'>उसी मौके पर शिवजी के धनुष का टूटने की बात सुनकर उस जगह परशुरामजी भी आए। उन्हें देखकर सब राजा सकुचा गए। परशुरामजी का भयानक वेष देखकर सब राजा डर गए व्याकुल होकर उठ खड़े हुए। परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गई। फिर जनकजी ने आकर प्रणाम किया और सीताजी ने भी उन्हें नमन किया।&lt;br /&gt;परशुरामजी ने सीताजी को अर्शीवाद दिया। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयों को उनके चरण छूने को कहा। दोनों को परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। फिर सब देखकर, जानते हुए भी उन्होंने राजा जनक से पूछा कहो यह इतनी भीड़ कैसी है? उनके मन में क्रोध छा गया। &lt;br /&gt;जिस कारण सब राजा आए थे। राजा जनक ने सब बात उन्हें विस्तार से बताई। बहुत गुस्से में आकर वे बोले- मुर्ख जनक बता धनुष किसने तोड़ा? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो आज जहां तक तेरा राज्य है, वहां तक की पृथ्वी उलट दूंगा। राजा को बहुत डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं दे पा रहे थे। सीताजी की माताजी भी मन में पछता रही थी कि विधाता ने बनी बनाई बात बिगाड़ दी। &lt;br /&gt;तब श्रीरामजी सभी को डरा हुआ देखकर बोले- शिवजी के धनुष को तोडऩे वाला आपका ही कोई दास होगा। क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर परशुरामजी गुस्से में बोले सेवक वह है जो सेवक का काम करे। शत्रु का काम करके तो लड़ाई ही करना चाहिए। जिसने शिवजी का धनुष तोड़ा है वह मेरा दुश्मन है। तब लक्ष्मणजी मुस्कुराए और परशुरामजी का अपमान करते हुए बोले- हमने आज तक बहुत से धनुष तोड़े। आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है? यह सुनकर भृगुवंश की ध्वजास्वरूप परशुरामजी क्रोधित होकर कहने लगे।क्रमश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-4720104400230999440?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/4720104400230999440/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_4341.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4720104400230999440'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4720104400230999440'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_4341.html' title='क्या हुआ जब स्वयंवर में पहुंच गए परशुराम?'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7769079874292423926</id><published>2011-05-27T22:44:00.000+05:30</published><updated>2011-05-27T22:45:21.305+05:30</updated><title type='text'>लाइलाज कैंसर का भी काल है यह पौधा!!!</title><content type='html'>तुलसी का पौधा कितना अनमोल है, यह इसी बात से पता चल जाता है कि इसे गुणों को देखकर इसे भगवान की तरह पूजा जाता है। &lt;br /&gt;यूं तो आज हर आदमी को किसी न किसी बीमारी ने अपने कब्जे में कर रखा है। लेकिन कैंसर एक ऐसी बीमारी है जो लाइलाज कही जाती है। &lt;br /&gt;अभी तक इस बीमारी का कोई परमानेंट इलाज नहीं है। आज यह बीमारी तेजी से फैल रही है। वैसे तो कैंसर का कोई परमानेंट इलाज नहीं है लेकिन फिर भी आर्युवेद ने तुलसी को कैंसर से लडऩे का एक बड़ा तरीका बताया है। &lt;br /&gt;आर्युवेद में बताया गया है कि तुलसी की पत्तियों के रोजाना प्रयोग से केंसर से लड़ा जा सकता है। और इसके लगातार प्रयोग से कैंसर खत्म भी हो सकता है।&lt;br /&gt;- कैंसर की प्रारम्भिक अवस्था में रोगी अगर तुलसी के बीस पत्ते थोड़ा कुचलकर रोज पानी के साथ निगले तो इसे जड़ से खत्म भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;-तुलसी के बीस पच्चीस पत्ते पीसकर एक बड़ी कटोरी दही या एक गिलास छाछ में मथकर सुबह और शाम पीएं कैंसर रोग में बहुत फायदेमंद होता है।&lt;br /&gt;केंसर मरीज के लिए विशेष आहार&lt;br /&gt;अंगूर का रस, अनार का रस, पेठे का रस, नारियल का पानी, जौ का पानी, छाछ, मेथी का रस, आंवला, लहसुन, नीम की पत्तियां, बथुआ, गाजर, टमाटर, पत्तागोभी, पालक और नारियल का पानी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7769079874292423926?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7769079874292423926/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_339.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7769079874292423926'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7769079874292423926'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_339.html' title='लाइलाज कैंसर का भी काल है यह पौधा!!!'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-3468884213913936547</id><published>2011-05-27T22:42:00.001+05:30</published><updated>2011-05-27T22:44:39.982+05:30</updated><title type='text'>ऐसा क्यों</title><content type='html'>&lt;strong&gt;गुरुवार के दिन घर की सफाई नहीं की जाती?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;हमारे बढ़े-बूजुर्गों द्वारा बनाई गई सारी परंपराओं और रीति-रिवाजों के पीछे एक सुनिश्वित वैज्ञानिक कारण है। किसी बात को पूरा का पूरा समाज यूं ही नहीं मानने लग जाता। हर मान्यता के पीछे कोई ना कोई धार्मिक या वैज्ञानिक कारण जरूर होता है। ऐसी ही एक परंपरा गुरुवार के दिन सफाई ना करने की। इससे जुड़ी हमारे शास्त्रों में विष्णु भगवान की एक कहानी है&lt;br /&gt;जिसके अनुसार एक राजा जो कि विष्णु भगवान का भक्त था उसने गुरुवार के दिन अपने महल की साफ-सफाई करवा दी और जाले झड़वा दिए। जबकि कहानी के अनुसार उस दिन विष्णुजी लक्ष्मीजी सहित उसके महल में आने वाले थे। वैसे उस राजा को उस दिन विष्णु भगवान की पूजा करनी चाहिए थी। उनकी आराधना और आवाह्न करना चाहिए था। &lt;br /&gt;लेकिन ऐसा कुछ नहीं करते हुए बल्कि उल्टा राजा ने उनके आने से पहले पूरे महल में सफाई काम फैला दिया। जब विष्णु भगवान लक्ष्मीजी के साथ उसके महल में पहुंचे तो धूल व जाले देखकर लक्ष्मीजी रूष्ट हो गई और वहां से चली गई और विष्णुजी ने जब देखा कि लक्ष्मीजी रूठ कर जा रही हैं तो वे भी वहां से चल दिए और उस राजा को शाप दे दिया कि आज से तुम लक्ष्मीविहिन रहोगे और गुरूवार के दिन जो भी घर में साफ-सफाई करेगा उसके घर में कभी लक्ष्मी निवास नहीं करेगी। इसी कहानी के कारण ऐसी मान्यता है कि गुरुवार के दिन घर की सफाई नहीं करना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-3468884213913936547?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/3468884213913936547/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_346.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3468884213913936547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3468884213913936547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_346.html' title='ऐसा क्यों'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-873498070958563930</id><published>2011-05-27T22:41:00.000+05:30</published><updated>2011-05-27T22:42:14.983+05:30</updated><title type='text'>...और मगर ने रानी को निगलने के लिए जकड़ लिया</title><content type='html'>थोड़ी देर बाद जब राजा नल का हृदय शांत हुआ ,तब वे फिर धर्मशाला में इधर-उधर घूमने लगे और सोचने लगे कि अब तक दमयन्ती परदे में रहती थी, इसे कोई छू भी नहीं सकता था। आज यह अनाथ के समान आधा वस्त्र पहने धूल में सो रही है। यह मेरे बिना दुखी होकर वन में कैसे रहेगी? मैं तुम्हे छोड़कर जा रहा हूं सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें। उस समय राजा नल का दिल दुख के मारे टुकड़े- टुकड़े हुआ जा रहा था। &lt;br /&gt;शरीर में कलियुग का प्रवेश होने के कारण उनकी बुद्धि नष्ट हो गई थी। इसीलिए वे अपनी पत्नी को वन में अकेली छोड़कर वहां से चले गए। जब दमयंती की नींद टूटी, तब उसने देखा कि राजा नल वहां नहीं है। यह देखकर वे चौंक गई और राजा नल को पुकारने लगी।&lt;br /&gt;जब दमयंती को राजा नल बहुत देर तक नहीं दिखाई पड़ें तो वे विलाप करने लगी। वे भटकती हुई जंगल के बीच जा पहुंची। वहां अजगर दमयंती को निगलने लगा। दमयंती मदद के लिए चिल्लाने लगी तो एक व्याध के कान में पड़ी। वह उधर ही घूम रहा था। वह वहां दौड़कर आया और यह देखकर दमयंती को अजगर निगल रहा है। अपने तेज शस्त्र से उसने अजगर का मुंह चीर डाला। उसने दमयन्ती को छुड़ाकर नहलाया, आश्वासन देकर भोजन करवाया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-873498070958563930?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/873498070958563930/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/873498070958563930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/873498070958563930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_27.html' title='...और मगर ने रानी को निगलने के लिए जकड़ लिया'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7407345725096936040</id><published>2011-05-17T22:22:00.001+05:30</published><updated>2011-05-17T22:22:47.057+05:30</updated><title type='text'>जीवन का सफर किसके भरोसे करें पूरा...</title><content type='html'>पं. विजयशंकर मेहता &lt;br /&gt;अपनी जीवन यात्रा अपने ही भरोसे पूरी की जाए। यदि सहारे की आवश्यकता पड़े तो परमात्मा का लिया जाए। सहयोग संसार से लिया जा सकता है, पर इसके भरोसे न रहें। संसार के भरोसे ही अपना काम चला लेंगे यह सोचना नासमझी है, लेकिन केवल अपने ही दम पर सारे काम निकाल लेंगे, यह सोच मूर्खता है। &lt;br /&gt;इसलिए सहयोग सबका लेना है लेकिन अपनी मौलिकता को समाप्त नहीं करना है। इसके लिए अपने भीतर के साहस को लगातार बढ़ाते रहें। अपने जीवन का संचालन दूसरों के हाथ न सौंपें। हमारे ऋषिमुनियों ने एक बहुत अच्छी परंपरा सौंपी है और वह है ईश्वर का साकार रूप तथा निराकार स्वरूप। कुछ लोग साकार को मानते हैं। &lt;br /&gt;उनके लिए मूर्ति जीवंत है और कुछ निराकार पर टिके हुए हैं। पर कुल मिलाकर दोनों ही अपने से अलग तथा ऊपर किसी और को महत्वपूर्ण मानकर स्वीकार जरूर कर रहे हैं। जो लोग परमात्मा को आकार मानते हैं, मूर्ति में सबकुछ देखते हैं वह भी धीरे-धीरे मूर्ति के भीतर उतरकर उसी निराकार को पकड़ लेते हैं जिसे कुछ लोग मूर्ति के बाहर ढूंढ रहे होते हैं। भगवान के ये दोनों स्वरूप हमारे लिए एक भरोसा बन जाते हैं। &lt;br /&gt;वह दिख रहे हैं तो भी हैं और नहीं दिख रहे हैं तो भी हैं। यहीं से हमारा साहस अंगड़ाई लेने लगता है। जीवन में किसी भी रूप में परमात्मा की अनुभूति हमें कल्पनाओं के संसार से बाहर निकालती है। भगवान की यह अनुभूति यथार्थ का धरातल है। व्यर्थ के सपने बुनकर जो अनर्थ हम जीवन में कर लेते हैं, परमात्मा के ये रूप हमें इससे मुक्त कराते हैं। क्योंकि हर रूप के पीछे एक अवतार कथा है। &lt;br /&gt;अवतार का जीवन हमारे लिए दर्पण बन जाता है। आइने में देखो, उस परमशक्ति पर भरोसा करो और यहीं से खुद का भरोसा मजबूत करो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-6964486472729767524</id><published>2011-05-17T22:21:00.000+05:30</published><updated>2011-05-17T22:22:09.662+05:30</updated><title type='text'>स्वयंबर</title><content type='html'>&lt;strong&gt;दमयन्ती ने कैसे पहचाना असली राजा नल को? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;स्वयंवर की घड़ी आई। राजा भीमक ने सभी को बुलवाया। शुभ मुहूर्त में स्वयंवर रखा। सब राजा अपने-अपने निवास स्थान से आकर स्वयंवर में यथास्थान बैठ गए। तभी दमयन्ती वहां आई। सभी राजाओं का परिचय दिया जाने लगा। दमयन्ती एक-एक को देखकर आगे बढऩे लगी। आगे एक ही स्थान पर नल के समान ही वेषभुषा वाले पांच राजकुमार खड़े दिखाई दिए। यह देखकर दमयन्ती को संदेह हो गया, वह जिसकी और देखती उन्हें सिर्फ राजा नल ही दिखाई देते। इसलिए विचार करने लगी कि मैं देवताओं को कैसे पहचानूं और ये राजा है यह कैसे जानूं? उसे बड़ा दुख हुआ। अन्त में दमयन्ती ने यही निश्चय किया कि देवताओं की शरण में जाना ही उचित है। हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करने लगी। देवताओं हंसों के मुंह से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूपण से वरण कर लिया है। &lt;br /&gt;मैंने नल की आराधना के लिए ही यह व्रत शुरू कर लिया है। आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे में राजा नल को पहचान लूं। देवताओं ने दमयन्ती की बात सुनकर उसके दृढ़-निश्चय को देखकर उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दी जिससे वह देवता और मनुष्य में अंतर कर सके। दमयन्ती ने देखा कि शरीर पर पसीना नहीं है। पलके गिरती नहीं हैं। माला कुम्हलाई नहीं है। शरीर स्थिर है। शरीर पर धूल व पसीना भी नहीं है। दमयन्ती ने इन लक्षणों को देखकर ही राजा नल को पहचान लिया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-6964486472729767524?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/6964486472729767524/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_6071.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6964486472729767524'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6964486472729767524'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_6071.html' title='स्वयंबर'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8337798785822704285</id><published>2011-05-17T22:20:00.000+05:30</published><updated>2011-05-17T22:21:16.559+05:30</updated><title type='text'>पूर्णिमा पर क्या और क्यों करना चाहिए?</title><content type='html'>कहते हैं किसी भी माह की पूर्णिमा को दान करने से इसका बहुत ज्यादा फल मिलता है। आखिर पूर्णिमा को ही दान क्यों किया जाए? इसके पीछे क्या कारण और दर्शन है? कौन सी बात है जो पूर्णिमा को इतना खास बनाती है? पूर्णिमा पर नदियों में स्नान के बाद दान का महत्व क्यों है? इस परंपरा के पीछे दार्शनिक कारण भी और वैज्ञानिक भी। पूर्णिमा पर नदियों में स्नान और फिर उसके बाद दान, दोनों अलग-अलग विषय है। स्नान सीधे हमारे स्वास्थ्य से जुड़ा और दान हमारे व्यवहार से।&lt;br /&gt;पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी सबसे ज्यादा होती है। इससे कई ऐसी किरणें निकलती हैं जो नदियों के पानी, वनस्पति और भूमि पर औषधीय प्रभाव डालती हैं। इसलिए पूर्णिमा पर नदियों में स्नान करने से उस औषधीय जल का प्रभाव हम पर भी होता है, जिससे हमें स्वास्थ्यगत फायदा होता है। नदी में स्नान के बाद दान का महत्व इसलिए है कि चंद्रमा मन का अधिपति होता है।&lt;br /&gt;चंद्रमा की किरणों से युक्त जल में स्नान करने से मन को शांति और निर्मलता आती है। दान का महत्व इसीलिए रखा गया है क्योंकि जब हम शांत और निर्मल होते हैं तो ऐसे समय अच्छे कार्य करने चाहिए ताकि हमारे व्यक्तित्व का विकास हो। दान करने से मन पर सद्भाव और प्रेम जैसी भावनाओं का प्रभाव बढ़ता है। इससे हमारे व्यक्तित्व का सकारात्मक विकास होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8337798785822704285?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8337798785822704285/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_9498.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8337798785822704285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8337798785822704285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_9498.html' title='पूर्णिमा पर क्या और क्यों करना चाहिए?'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7722640055479605312</id><published>2011-05-17T22:19:00.000+05:30</published><updated>2011-05-17T22:20:24.355+05:30</updated><title type='text'>कहानी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;एक शहादत ऐसी भी!&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;सुरेंद्र शर्मा &lt;br /&gt;चमनपुर पर घोर संकट आ गया था। शत्रु सेना ने चारों ओर से उसे घेर लिया था। किसी भी समय हमला हो सकता था। इस मुसीबत का सामना करने के लिए सेना तैयार नहीं थी। समय बहुत कम था। राजा तिमनपाल ने सेनापतियों और मंत्रियों की एक बैठक बुलाई। संकट से निपटने के लिए विचार-विमर्श किया जाने लगा।&lt;br /&gt;सभी को असमंजस में पड़ा देखकर वृद्ध और सेवानिवृत सेनापति बोल पड़े, ‘चमनपुर की रक्षा मैं अकेले करुंगा।’&lt;br /&gt;‘आप निश्चित हो जाइए, महाराज’, सेवानिवृत सेनापति महायायन आत्मविश्वास से बोले और उठकर बाहर चले गए।&lt;br /&gt;शत्रु सेना गांवों और नगरों को रौंदती हुई दो दिन बाद चमनपुर के एकदम नज़दीक आ गई। एक दिन शत्रु सेना ने आसपास घूमते हुए वृद्ध महायायन को पकड़ लिया और अपने राजा के सामने पेश किया।&lt;br /&gt;‘यह कौन है?’ राजा ने प्रश्न किया। ‘हुज़ूर, यह हमारे पड़ाव के आसपास घूम रहा था। शायद यह शत्रु का जासूस है’, सेनापति ने जवाब दिया। ‘नहीं’, महायायन गरजकर बोले। ‘मैं जासूस नहीं हूं बल्कि चमनपुर का सैनिक हूं। तुम चमनपुर को उजाड़ नहीं सकते। उसपर हमले का विचार छोड़ दो।’&lt;br /&gt;‘यदि हम विचार न छोड़ें तो?’ शत्रु राजा ने ठहाका मारकर प्रश्न किया।&lt;br /&gt;‘तब तुम्हें मेरी लाश पर से गुज़रना होगा’ वृद्ध ने दृढ़ता से कहा।&lt;br /&gt;तभी शत्रु राजा को एक मज़ाक सूझा। ‘हम चमनपुर पर हमले का विचार त्याग सकते हैं, लेकिन हमारी एक शर्त है।’&lt;br /&gt;‘तुम्हें नदी में डुबकी लगानी होगी। जितनी देर तुम्हारा सिर पानी में डूबा रहेगा, मैं आक्रमण नहीं करूंगा। लेकिन जैसे ही तुम्हारा सिर पानी से बाहर आया तो मेरी सेना कूच कर देगी।’ शत्रु राजा ने ठहाका मारकर कहा। वृद्ध महायायन गम्भीर थे। कुछ देर विचार कर वह बोले, ‘मुझे शर्त मंज़ूर है।’&lt;br /&gt;भद्रावती नदी के तट पर भारी भीड़ थी। एक और शत्रु सेना कूच की तैयारी के साथ खड़ी थी, दूसरी और चमनपुर की जनता। महायायन नदी में कूद पड़े।&lt;br /&gt;समय बीतता गया। एक घंटा हो गया पर महायायन का सिर पानी से ऊपर न आया। शत्रु राजा को संदेह हुआ कि बूढ़ा पानी के अंदर तैर कर भाग तो नहीं गया। उसने गोताखोर पानी में उतारे।&lt;br /&gt;कुछ देर में वे एक लाश को निकाल लाए। वह लाश महायायन की ही थी। ‘महाराज’ गोताखोरों ने कहा, ‘इसने नदी के तल में एक चट्टान को हाथों से जकड़ रखा था। बड़ी मुश्किल से हम इसे चट्टान से अलग कर पाए।’&lt;br /&gt;गोताखोरों का जवाब सुनकर शत्रु राजा सन्न रह गया। उस का दिल पिघल गया और वह हमला किए बगैर ही वापस लौट गया। दूसरे तट से महायायन की जय-जयकार गूंजने लगी। &lt;br /&gt;www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7722640055479605312?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7722640055479605312/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_3468.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7722640055479605312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7722640055479605312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_3468.html' title='कहानी'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-4369174033577215975</id><published>2011-05-17T22:18:00.000+05:30</published><updated>2011-05-17T22:19:32.481+05:30</updated><title type='text'>लोककथाः</title><content type='html'>&lt;strong&gt;चिड़ा-चिड़िया की कहानी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;देवेश सिंगी &lt;br /&gt;एक चिड़िया के जोड़े को अंडे देने के लिए घोंसला बनाना था। उन्होंने एक बूढ़े साधू से पूछकर उसकी लम्बी दाढ़ी में अपना घोंसला बनाया और उसमें दो अंडे दिए। एक शाम को चिड़िया अंडे सेने लगी थी और चिड़ा चिड़िया के लिए खाने की तलाश में गया। एक बड़ा-सा सुंदर कमल का फूल देखकर वह उसपर बैठकर उसका मीठा रस चूसने लगा। तभी आकाश काला होने लगा, रात घिरी और कमल बंद हो गया। चिड़ा भी उसमें बंद हो गया। वह जब घोंसले पर वापस नहीं आया, तो चिड़िया समझी कि वह उसे छोड़कर कहीं ओर चला गया है।&lt;br /&gt;दूसरे दिन सुबह जब कमल फिर से खिला तो चिड़ा हांफता-कांपता हुआ वापस घोंसले में पहुंचा। चिड़िया बहुत नाराज़ थी। चिड़े ने लाख समझाया कि वह किस तरह कमल के अंदर बंद हो गया था। परंतु चिड़िया मानने को तैयार नहीं थी। चिड़ा चतुर था बोला, ‘मैं सौगंध खाकर कहता हूं कि यदि मैं झूठ बोल रहा हूं तो अभी इसी समय इस बूढ़े साधू का सिर कटकर धरती पर गिर जाए।’ साधू ने सुना तो वह गुस्सा हो गया। उसने उन्हें अपनी दाढ़ी में घोंसला बनाने की जगह दी और वह उसी के मरने की बात कह रहा है। उसने उसी समय घोंसला अपनी दाढ़ी में से निकाला और दूर एक घाटी में फेंक दिया। घोंसला घनी लम्बी घास पर जा गिरा। चिड़ा चिड़ी दोनों घबराए। लड़ना भूलकर वे उड़कर अंडों के पास गए। अंडे सुरक्षित देखकर उनकी जान में जान आई।&lt;br /&gt;कुछ समय बाद अंडे फूटे और उसमें से प्यारे से बच्चे निकलकर चीं-चीं करने लगे। वे दोनों खुश थे परंतु एक दिन कुछ लोग घाटी में आए और सफाई करने के लिए घास में आग लगा दी। बच्चे बहुत छोटे-छोटे थे। उनके तो पंख भी नहीं निकले थे। दोनों क्या करें? आग लगातार पास आ रही थी। चिड़िया ने कहा, ‘मैं बच्चों के ऊपर और तुम नीचे रहो। हम अपने बच्चों के साथ ही मरेंगे। मैं पहले मरुंगी।’&lt;br /&gt;परंतु चिड़ा नहीं माना, ‘नहीं, मैं ऊपर रहता हूं, तुम नीचे रहो। पहले मैं मरुंगा।’ अंत में यही तय हुआ कि चिड़ा ऊपर रहेगा। आग के नज़दीक आते ही चिड़ा फुर्ती से उड़ गया। आग ने घोंसले को जला दिया। चिड़िया और बच्चे मर गए। चिड़िया मर कर दूसरे जन्म एक राजा के यहां पैदा हुई परंतु उसे यह याद रहा कि कैसे धोखा देकर चिड़ा उन्हें मरने के लिए छोड़कर उड़ गया था। वह दुनिया के हर आदमी से इतनी नाराज़ थी कि वह किसी से बोलती भी न थी। चिड़ा भी कुछ समय बाद मर कर एक आदमी के रूप में पैदा हुआ। राजा ने घोषणा कर रखी थी, जो राजकुमारी को बात करना सिखा देगा वह उसका विवाह भी उससे कर देगा।&lt;br /&gt;एक नवयुवक ने घोषणा सुनी। वह एक शोवा (बहुत बुद्धिमान व्यक्ति जिसे सभी कुछ मालूम होता है) के पास गया और उसकी मदद मांगी। शोवा चिड़िया के जलने वाली बात जानता था। उसने कहा, ‘तुम्हें याद है कि जब घाटी की बड़ी-बड़ी घास में आग लगी थी तब तुम चिड़िया और बच्चों को जलने के लिए छोड़कर उड़ गए थे। तुम वहां जाओ राजा के समाने तुम उसे चिड़ा-चिड़िया की वही कहानी सुनाना परंतु ध्यान रखना, यह कहने के बजाय कि तुम चिड़िया और बच्चों को जलता छोड़ कर उड़ गए थे, कहना कि चिड़िया घोसले के ऊपर थी और वह तुम्हें व बच्चों को जलने के लिए छोड़कर उड़ गई थी।’&lt;br /&gt;वह नवयुवक राजा को साथ लेकर राजकुमारी के पास गया। और अपनी कहानी सुनाने लगा। बहुत समय पहले एक सुंदर चिड़िया का जोड़ा था। वे एक दूसरे को बहुत चाहते थे। उन्होंने मिलकर एक बूढ़े साधू की लम्बी दाढ़ी में घोंसला बनाया परंतु किसी बात पर गुस्सा होकर साधू ने घोंसला निकालकर घाटी की बड़ी-बड़ी घास पर फेंक दिया। कुछ लोगों ने घाटी की घास में आग लगा दी तो चिड़े ने चिड़िया से कहा मैं ऊपर रहता हूं तुम नीचे रहो। हम बच्चों के साथ ही मरेंगे। परंतु चिड़िया नहीं मानी। और उसने खुद ऊपर रहने की ज़िद की। परंतु जब आग पास आई तो वह फुर्र से उड़ गई। बेचारा चिड़ा बच्चों के साथ जलकर मर गया। राजकुमारी युवक के इस झूठ को सहन न कर सकी। वह गुस्से से लाल होकर चिल्ला पड़ी, ‘झूठ, बिलकुल झूठ। तेरी बात बिलकुल झूठ है। ऊपर चिड़ा था और वह धोखा देकर उड़ गया था।’&lt;br /&gt;‘नहीं राजकुमारी जी, सच्चाई यही है कि चिड़िया ऊपर थी और मरने से डरकर उड़ गई थी।’ युवक ने फिर कहा।&lt;br /&gt;वे दोनों ‘कौन बचा, कौन जला’ पर बहस करने लगे। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। राजा चकित होकर उन्हें देख रहा था। अंत में उसने उन्हें रोककर कहा, ‘नौजवान, तुम्हारी इस चिड़ा-चिड़ी की कहानी का कुछ-कुछ मतलब मैं समझ गया हूं। लगता है तुमने जानबूझकर चिड़िया को धोखा दिया था परंतु तुम राजकुमारी को बुलवाने में सफल रहे हो अत: वादे के अनुसार मैं राजकुमारी का विवाह तुमसे करता हूं। इस बार उसे धोखा मत देना।’&lt;br /&gt;युवक ने मुस्कुराकर राजकुमारी की ओर देखा। फिर दोनों का विवाह हो गया।&lt;br /&gt;www.bhaskar.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-4369174033577215975?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/4369174033577215975/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_17.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4369174033577215975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4369174033577215975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post_17.html' title='लोककथाः'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-3015999206865923447</id><published>2011-05-17T22:17:00.000+05:30</published><updated>2011-05-17T22:18:40.596+05:30</updated><title type='text'>कहानी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;स्वर्ग का चाचा&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;Bhaskar &lt;br /&gt;बहुत पहले की बात है। धरती पर दो सालों तक बिलकुल वर्षा नहीं हुई। अकाल पड़ गया।&lt;br /&gt;अपने तालाब को सूखता देख कर मेढ़क मेंढक को चिंता हुई। उसने सोचा, अगर ऐसा रहा तो वह भूखा मर जाएगा। उसने सोचा कि इस अकाल के बारे स्वर्ग में जाकर वहां के राजा को बताया जाए।&lt;br /&gt;साहस कर मेंढक अकेला ही स्वर्ग की ओर चल पड़ा। राह में उसे मधुमक्खियों का एक झुंड मिला। मक्खियों के पूछने पर उसने बताया कि भूखे मरने से अच्छा है कि कुछ किया जाए। मक्खियों का हाल भी अच्छा नहीं था। जब फूल ही नहीं रहे तो उन्हें शहद कहां से मिलता। वे भी मेंढक के साथ चल दीं।&lt;br /&gt;आगे जाने पर उन्हें एक मुर्गा मिला। मुर्गा बहुत उदास था। जब फसल ही नहीं हुई, तो उसे दाने कहां से मिलते। उसे खाने को कीड़े भी नहीं मिल रहे थे। इसलिए मुर्गा भी उनके साथ चल दिया।&lt;br /&gt;अभी वे सब थोड़ा ही आगे गए थे कि एक खूंखार शेर मिल गया। वह भी बहुत दुखी था। उसे खाने को जानवर नहीं मिल रहे थे। उनकी बातें सुन शेर भी उनके साथ हो लिया।&lt;br /&gt;कई दिनों तक चलने के बाद वे स्वर्ग में पहुंचे। मेंढक ने अपने सभी साथियों को राजा के महल के बाहर ही रुकने को कहा। उसने कहा कि पहले वह भीतर जाकर देख आए कि राजा कहां है।&lt;br /&gt;मेंढक उछलता हुआ महल के भीतर चला गया। कई कमरों में से होता हुआ वह राजा तक पहुंच ही गया। राजा अपने कमरे में बैठा परियों के साथ बातें कर रहा था। मेंढक को क्रोध आ गया। उसने लम्बी छलांग लगाई और उनके बीच पहुंच गया। परियां एकदम चुप हो गईं। राजा को एक छोटे से मेंढक की करतूत देख गुस्सा आ गया।&lt;br /&gt;‘पागल जीव! तुमने हमारे बीच आने का साहस कैसे किया?’ राजा चिल्लाया। परंतु मेंढक बिलकुल नहीं डरा। उसे तो धरती पर भी भूख से मरना था। जब मौत साफ दिखाई दे तो हर कोई निडर हो जाता है।&lt;br /&gt;राजा फिर चीखा। पहरेदार भागे आए ताकि मेंढक को पकड़ कर महल से बाहर निकाल दें। मगर इधर-उधर उछलता मेंढक उनकी पकड़ में नहीं आ रहा था। मेंढक ने मधुमक्खियों को आवाज दी। वे सब भी अंदर आ गईं। वे सब पहरेदारों के चेहरों पर डंक मारने लगीं। उनसे बचने के लिए सभी पहरेदार भाग गए।&lt;br /&gt;राजा हैरान था। तब उसने तूफान के देवता को बुलाया। पर मुर्गे ने शोर मचाया और पंख फड़फड़ा कर उसे भी भगा दिया। तब राजा ने अपने कुत्तों को बुलाया। उनके लिए भूखा खूंखार शेर पहले से ही तैयार बैठा था।&lt;br /&gt;अब राजा ने डर कर मेंढक की ओर देखा। मेंढक ने कहा, ‘महाराज! हम तो आपके पास प्रार्थना करने आए थे। धरती पर अकाल पड़ा हुआ है। हमें वर्षा चाहिए।’&lt;br /&gt;राजा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा, ‘अच्छा चाचा! वर्षा को भेज देता हूं।’&lt;br /&gt;जब वे सब साथी धरती पर वापस आए तो वर्षा भी उनके साथ थी। इसलिए वियतनाम में मेंढक को ‘स्वर्ग का चाचा’ कह कर पुकारा जाता है। लोगों को जब मेंढक की आवाज़ सुनाई देती है वे कहते हैं, ‘चाचा आ गया तो वर्षा भी आती होगी।’&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-3015999206865923447?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/3015999206865923447/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3015999206865923447'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3015999206865923447'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='कहानी'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-3477671845169878843</id><published>2011-04-21T21:51:00.001+05:30</published><updated>2011-04-21T21:56:32.822+05:30</updated><title type='text'>ब्लॉग बतंगड़ से</title><content type='html'>&lt;strong&gt; भूषण को हम भगाएंगे कीचड़ उछालकर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;रमाशंकर सिंह   &lt;br /&gt;भ्रष्टाचार से त्रस्त देश की सामान्य जनता के परित्राण के लिए अन्ना हजारे नामक एक फकीर ने दिल्ली के जंतर-मंतर चौराहे पर बैठ कर जन लोकपाल बिल के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया, जिसे देशव्यापी समर्थन मिला और अनशन के पांचवें दिन ही सरकार को घुटने टेकने पड़े जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने ड्राफ्टिंग कमिटी के गठन की अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना में सरकार की ओर से पांच भीमकाय मंत्रियों-प्रणव मुखर्जी (वित्त मंत्री)-अध्यक्ष, पी. चिदंबरम (गृह मंत्री), वीरप्पा मोइली (विधि मंत्री), कपिल सिब्बल (मानव संसाधन एवं संचार मंत्री) तथा सलमान खुर्शीद (अल्पसंख्यक मंत्री) सदस्य- को कमिटी में नामजद किया गया और सिविल सोसायटी की ओर से जिन पांच कृशकाय लोगों को शामिल किया गया उनमें भूतपूर्व विधि मंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांतिभूषण (सह- अध्यक्ष) उनके पुत्र प्रशांत भूषण, पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़े, अन्ना हजारे और सामाजिक कार्यकर्ता तथा इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट के अगुआ अरविंद केजरीवाल सदस्य हैं।&lt;br /&gt;ड्राफ्टिंग कमिटी बनाने की प्रक्रिया में अन्ना के प्रतिनिधियों की कपिल सिब्बल के साथ बातचीत के दौरान कुछेक कांग्रेसी शुभचिंतकों, मंत्रियों की ओर से जिस तरह की बयानबाजी की गई उसे मीडिया में देख-सुन कर कोई भी संवेदनशील आदमी यह सोचने पर विवश हो सकता था कि हे राम! इन्हें क्षमा कर देना क्योंकि इन निर्बुद्धों को खुद ही यह मालूम नहीं कि ये क्या और क्यों कह रहे हैं। मस्तिष्क मंथन के बाद अमृत या विषरूपी जो विचार सतह पर आया उसका लब्बोलुआब यह है कि इन भाई लोगों ने खुद को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार का सबसे बड़ा खैरख्वाह साबित करने की कोशिश की। मनु महाराज जो काफी दिनों तक अंतर्धान रहने के बाद राजनीतिक क्षितिज पर अचानक अवतरित हुए थे उन्होंने अपनी क्रोधातुर वाणी में कुतर्क किया कि अन्ना हजारे और उनकी टोली के लोग होते कौन हैं सरकार से अधिसूचना जारी करने की मांग करने वाले? किसने बनाया इन्हें सिविल सोसायटी का प्रतिनिधि? कुछ-कुछ इसी टोन में मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को बोलते सुना। हमेशा गंभीर और कभी-कभी हंसमुख दिखने वाली अम्बिका सोनी का वह तमतमाया चेहरा आज भी मेरी आंखों के सामने नाच-नाच जाता है। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में मनीष तिवारी का तो जोश में होश खो देना समझ में आता है, लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे परिपक्व और संवेदनशील नेता अन्ना और उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को लेकर जिस तरह के बयान दे रहे हैं उससे तो यही लगता है कि 125 साल पुरानी यह राजनीतिक नाव अविश्वसनीयता के भार से दिन-ब-दिन दबती जा रही है और कभी भी डूब सकती है। नीति का एक श्लोक बरबस याद गया है जिसे पाठकों से शेयर करना मैं जरूरी मानता हूं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परोक्षे कार्यहंतारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्जयेतादृशं मित्रं विष कुंभं पयोमुखम्&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका भावार्थ यह है कि पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुंह पर ठकुर सुहाती बोलने वाले मित्र उस मटके के समान हैं जिसके घट में विष और मुख में दूध भरा हुआ है, इनसे बचना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जरा भ्रष्टाचार की लड़ाई में अन्ना का साथ देने की सोनिया गांधी और कांग्रेस की सदाशयतारूपी विवशता पर भी एक नजर डालना समीचीन होगा। जिस प्रकार का अभूतपूर्व एवं देशव्यापी जनसमर्थन अन्ना हजारे के अनशन को मिल रहा था उसे देखते हुए कांग्रेस के कर्णधारों के हाथ-पांव फूलने लगे थे। उन्हें लगा कि अगर इस समय अन्ना के आंदोलन को अधिक समय तक चलने दिया गया तो पांच राज्यों में आसन्न चुनावों में कांग्रेस की लुटिया डूब सकती है। सरकार को इस बात की भी खुफिया रिपोर्टें मिल रही थीं कि एक ओर योगी बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को यह समझाने में सफलता प्राप्त कर रहे थे कि उनकी सभी समस्याओं का कारण भ्रष्टाचार और बेईमान नेता हैं, जिन्होंने जनता के खून-पसीने की कमाई को लूट-लूट कर विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है, दूसरी ओर बैरागी बाबा अन्ना हजारे दिल्ली दरबार की छाती पर छोलदारी लगाकर अनशन पर बैठ गए हैं और जान देने पर आमादा हैं। इसलिए उन्होंने तात्कालिक उपाय के तौर पर अनशन को समाप्त कराने और बाद में अन्ना की टोली से तकनीकी तौर पर निपट लेने की रणनीति अपनाई। कपिल सिब्बल (परोक्षत:) दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी प्रत्यक्षत: और द ग्रेट फिक्सर अमर सिंह का सीडी अभियान इसी रणनीति के तहत चलाया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य यह है कि नकटों की टोली के सामने नाक वाले सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को टिकने न दिया जाए। थक-हार कर बेचारे आत्मसमर्पण करते हुए नैतिकता से तौबा कर लेंगे और कमिटी के सरकारी सदस्यों को अपनी पीठ थपथपाते हुए यह कहने का मौका मिल जाएगा कि 'हम तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अन्ना का साथ देने को तैयार थे, लेकिन जब वे खुद ही दुम दबा कर भाग गए तो हम क्या करें?' यानी नतीजा हासिल सिफर। लोकपाल बिल का जिन्न एक बार फिर बोतल में बंद हो जाएगा और बाद में किसी सियासी लाभ के मद्दे नजर उसे दुबारा बाहर निकाला जा सकेगा।&lt;br /&gt;चरित्र हनन अभियान के तहत जिस तरह कांग्रेस के कुछ हलकों से शान्ति भूषण की सम्पत्ति संबंधी बयान आ रहे हैं वे निराधार नहीं हैं। ऐसे बयानों की वजह कमिटी के गैर सरकारी सदस्यों या अन्ना-टोली की वह पहलकदमी है जिसके तहत उन्होंने पहली मीटिंग में जाने से पहले ही अपनी सम्पत्ति की घोषणा कर दी। कांग्रेस के किसी सदस्य ने न तो अब तक अपनी सम्पत्ति की घोषणा की और न ही उनका घोषणा करने का कोई विचार है। बेचारे करें भी तो कैसे, अन्ना ने सम्पत्ति घोषणा रूपी ट्रंप कार्ड इतनी जल्दी चल दिया कि उन्हें हिसाब-किताब लगाने का मौका ही नहीं मिल पाया। कैसे बताएं कि कितनी दौलत सफेद है और कितनी काली। कितनी भारत में है और कितनी की स्विस बैंक करता है रखवाली। इसलिए फिलहाल सबसे कारगर नुस्खा कांग्रेसियों को यही रास आ रहा है कि वे देश के सभी भ्रष्टाचारियों, बेईमानों को यह संदेश दें कि 'ओ बेईमान तू न तनिक भी मलाल कर/भूषण को हम भगाएंगे कीचड़ उछाल कर।'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-3477671845169878843?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/3477671845169878843/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/04/blog-post_21.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3477671845169878843'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3477671845169878843'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/04/blog-post_21.html' title='ब्लॉग बतंगड़ से'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-3910352410306021896</id><published>2011-04-15T23:33:00.002+05:30</published><updated>2011-04-15T23:37:36.106+05:30</updated><title type='text'>भव्य शादी करने से पहले जरा सोचिए!</title><content type='html'>- वि‍शाखा दत्त&lt;br /&gt;करीबी सहेली ने अपने घर का एक किस्सा सुनायाः उसके मौसाजी बैंक में साधारण-सी नौकरी करते थे। उन्होंने अपनी बेटी को बड़े लाड़-प्यार से पाला। जब उसकी शादी का वक्त आया तो बरसों से मन में संजोए सपने को साकार करने के लिए बड़ी 'धूमधाम' से लोन लेकर शादी की। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-3hF8Qpynmwo/TaiJNEGZzSI/AAAAAAAACGI/1gPZ8CygIa8/s1600/photo.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 155px; height: 115px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-3hF8Qpynmwo/TaiJNEGZzSI/AAAAAAAACGI/1gPZ8CygIa8/s320/photo.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5595873394539744546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों बाद वे इतने बीमार हो गए कि समय पूर्व रिटायरमेंट लेकर नौकरी छोड़ना पड़ी। पीएफ का आधा पैसा बीमारी के इलाज में लग गया। शादी की धूमधाम के लिए लिया लोन उनके लिए अब तक मुसीबत बना हुआ है। इस किस्से को सुन स्मृतियों में सुप्त एक विवाह समारोह बरबस ही याद आ गया। &lt;br /&gt;6 माह पहले मेरे एक रिश्तेदार के बेटे ने आर्थिक संपन्नता के बावजूद अपनी शादी बहुत ही सादे तरीके से की। शादी में करीबी रिश्तेदारों के बीच फेरे की रस्म हुई। महँगे परिधानों, आभूषणों, रोशनी से जगमगाते मैरिज हॉल के बिना घर पर ही हुए एक सादा समारोह को देखकर मन को बहुत सुकून मिला। &lt;br /&gt;वर निकासी न होने के कारण न तो ट्रैफिक जाम हुआ, न शादियों के आठ दिन पहले से शुरू होने वाले गीत-संगीत से पड़ोसी को परेशानी और न ही रिसेप्शन में भरी की भरी थालियों में छोड़ी गई जूठन से भोजन की बर्बादी हुई। साथ ही यह शादी पर्यावरण हितैषी भी लगी, क्योंकि उसमें डिस्पोजेबल का इस्तेमाल भी सीमित मात्रा में ही हुआ था। मन में पूरे समय यही विचार आता रहा कि काश देश में इस ढंग से शादियाँ करने का चलन बढ़े!&lt;br /&gt;कुछ दिनों पूर्व एक राजनेता के बेटे को उपहार में हेलिकॉप्टर मिला और यह भव्य शादी अखबारों की सुर्खियों में छाई रही। भारत में अक्सर उद्योगपतियों, राजनेताओं और प्रसिद्घ व्यक्तियों की शादियाँ चर्चा का विषय बनती हैं। इन भव्य शादियों में करोड़ों रुपए शानो-शौकत और दिखावे पर पानी की तरह बहाए जाते हैं। &lt;br /&gt;शादियों की भव्यता अब संपन्न परिवारों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि यह मध्यमवर्गीय परिवारों तक भी पहँच चुकी है। फिर भले ही इस भव्यता के शामियाने 'लोन' लेकर खड़े किए गए हों या फिर जिंदगीभर मेहनत से की गई गाढ़ी कमाई से। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-JheR2URnVdY/TaiJRTbf8AI/AAAAAAAACGQ/kvHEBOp-nAo/s1600/30311032710559735.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 189px; height: 189px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-JheR2URnVdY/TaiJRTbf8AI/AAAAAAAACGQ/kvHEBOp-nAo/s320/30311032710559735.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5595873467374235650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारत एक उत्सवप्रिय देश है। लोग दिल खोलकर उत्सवों में पैसा खर्च करते हैं, फिर चाहे वह उत्सव नवरात्रि का हो या शादी। इन भव्य शदियों की भव्यता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। ये उस देश की सचाई है, जहाँ आज भी लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं और कइयों को सिर्फ एक वक्त भोजन करके गुजारा करना पड़ता है, देश का आम आदमी आज भी आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है। &lt;br /&gt;अब देश के युवाओं के लिए यह बात विचारणीय है कि शादियों पर इस तरह की फिजूलखर्ची कितनी जायज है? कुछ लोगों का मत है कि शादी जीवन में एक बार होती है तो कंजूसी क्यों की जाए! धूमधाम से शादी के फेर में ही लड़की के माता-पिता जिन्दगीभर कष्ट उठाते हैं।&lt;br /&gt;सोचिए, गर शादियाँ सादगीपूर्वक होने लगें तो लोग बेटियों को भी बोझ नहीं समझेंगे। जन्म से ही उन्हें बेटी की शादी में होने वाले खर्च की चिंता नहीं सताएगी। इससे कन्या भ्रूण हत्याओं में भी कमी आएगी। युवाओं को चाहिए कि वे अपनी शादियों के भव्य तमाशे में पैसा बहाने की अपेक्षा समझदारी से पैसा खर्च करें। इसके लिए अपने माता-पिता से भी इस बात पर विचार करें। शादी में बेवजह दिखावे पर पैसा बर्बाद करने से तो बेहतर है कि किसी जरूरतमंद की मदद कर दी जाए। &lt;br /&gt;शादी-ब्याह के मामले में लोग सोचते हैं कि अगर साधारण रूप से शादी कर दी तो समाज के लोग बातें बनाएँगे या इससे उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। प्रतिष्ठा की चिंता किए बगैर आप अच्छे कार्य की पहल तो कीजिए, फिर समाज वाले भी आपका अनुकरण करने लगेंगे। &lt;br /&gt;आप चाहें तो शादी के कुछ ऐसे नए रिवाज भी शुरू कर सकते हैं, जैसे संपन्न नवदंपति एक जरूरतमंद को पढ़ाई या प्रोफेशनल कोर्स करवाने में मदद करें, किसी को रोजगार मुहैया करवाएँ। &lt;br /&gt;www.webdunia.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-3910352410306021896?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/3910352410306021896/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/04/blog-post_15.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3910352410306021896'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3910352410306021896'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/04/blog-post_15.html' title='भव्य शादी करने से पहले जरा सोचिए!'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-3hF8Qpynmwo/TaiJNEGZzSI/AAAAAAAACGI/1gPZ8CygIa8/s72-c/photo.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8461382830235946303</id><published>2011-04-15T23:29:00.000+05:30</published><updated>2011-04-15T23:33:36.274+05:30</updated><title type='text'>ऐसे बुलबुलों से बचके रहना...</title><content type='html'>दीपाली एक पढ़ी-लिखी गृहिणी हैं, लेकिन उसकी हर समय बुराई करने की बहुत खराब आदत है। वह न माहौल देखती है, न ही समय, बस, शुरू हो जाती है। कभी उसका निशाना उसकी सासूजी होती हैं तो कभी देवरानी या ननद। एक बार शुरू होने पर तो उसको रोकना बड़ा मुश्किल हो जाता है। &lt;br /&gt;सामने वाला टॉपिक चेंज भी करे तो थोड़ी देर बाद घूम-फिरके वह वहीं पहुँच जाती है। निंदापुराण उसका पसंदीदा विषय है। इसने इतना दिया, उसने उतना लिया जैसी फिजूल बातों में वह अपना समय तो बर्बाद करती ही है, दूसरों का भी मूड चौपट कर देती है। &lt;br /&gt;आप नजर दौड़ाएँगी तो आसपास ही कई दीपाली मिल जाएँगी आपको। कई लोग सबको केवल टेंशन ही बाँटते रहते हैं। कई लोगों को तो इतना भी होश नहीं रहता कि हम कहाँ बैठे हैं? वे तो बस शुरू हो जाते हैं। ऐसे लोगों से लोग फिर कन्नाी काटने लगते हैं। &lt;br /&gt;चाहे होटल का वेटर हो या वॉचमैन, घर के सेवक हों या आपके अधीन काम करने वाला, आपको सबसे अदब से बात करनी चाहिए, गुरूर से नहीं। आखिर हर इंसान का आत्मसम्मान होता है, अगर आपको सबके दिल में जगह बनानी है तो अपने अंदाजे बयाँ को रोचक बनाइए। &lt;br /&gt;आपकी 'बॉडी लैंग्वेज' तो सलीकेदार हो ही, आपका लहजा भी लाजवाब होना चाहिए। कई लोग शिकायतों का पिटारा लिए घूमते हैं, अगर किसी से शिकायत है भी तो तीसरे आदमी से शिकायत करने से समाधान तो शायद ही निकले, बल्कि समस्या के बढ़ने के पूरे आसार नजर आते हैं। जिससे भी परेशानी हो उसी से बात करके उसे सुलझाया जाए तो बेहतर है। कई लोग सीधी बात करते ही नहीं हैं, वे घुमा-फिराके बात करने में माहिर होते हैं। आइए, कुछ इसी तरह के लोगों के बारे में जानते हैं। &lt;br /&gt;दुःखियारे लोगः ये लोग उदासी की चादर ओढ़े, बिलकुल ठंडे किस्म के होते हैं। उनसे कोई गर्मजोशी से भी मिले तो भी उनके चेहरे पर न मुस्कराहट होती है, न उत्साह। वे किसी को हँसते हुए भी देखते हैं तो घूर-घूर के, मानो वे कोई गुनाह कर रहे हों। &lt;br /&gt;व्यंग्यबाण चलाने वालेः इन लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है। वे एक तीर से दो निशाने साध लेते हैं। ताना मारने में तो ये लोग निपुण होते हैं। वर्षों की इकट्ठी सड़ी-गली बातें भी इनके दिमाग में तरोताजा होती हैं। मजाक की आड़ में ये कुछ भी कह जाते हैं, चाहे सामने वाले को कितना भी दुःख हो। &lt;br /&gt;बहसबाजः बात-बात में बहस करने पे उतारू लोग भी तर्क-कुतर्क देकर सबसे उलझते रहते हैं। &lt;br /&gt;बातूनीः ऐसे लोग सामने वाले को बोलने का मौका नहीं देते। ये लोग भी अपनी बातों का आकर्षण खो देते हैं। उनकी बातों को फिर कोई तवज्जो नहीं देता। इतनी वाचालता भाषा का स्तर भी गिरा देती है। &lt;br /&gt;अपशब्दों का प्रयोग करने वालेः बात-बात पर गालियाँ देना इनका शगल होता है। इस तरह बात करके वे यह जताना चाहते हैं कि हममें बहुत नजदीकी रिश्ता है या घनिष्ठता है, लेकिन ये उनकी गलतफहमी होती है। गलत भाषा इस्तेमाल करने से रिश्ते की घनिष्ठता या आत्मीयता हर्गिज सिद्ध नहीं होती। ध्यान रखिए आपके दिल में सामने वाले के लिए कितना प्यार और सम्मान है, वह तो आपकी बातों से अंदाज लगाया जाएगा। आप किस तहजीब के साथ पेश आते हैं, इसी से आपके संस्कारों का पता चलता है। &lt;br /&gt;स्वार्थी किस्म के लोगः ये भी हमेशा अपना मतलब पूरा करने की फिराक में होते हैं। लच्छेदार बातों का जादू चलाकर वे अपना फायदा उठा लेते हैं। &lt;br /&gt;गॉसिप में डूबे-डूबेः इस किस्म के लोग भी बड़े फुर्सती होते हैं। दूसरों की जिन्दगी में बिना किसी कारण के झाँकना इनका शगल होता है। मुँह पर लच्छेदार व मीठी-मीठी बातें करने में इनका कोई सानी नहीं है। आपके पीछे ये आपका भी मजाक बना सकते हैं। &lt;br /&gt;झूठी शान दिखाने वालेः अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के लिए ऐसे लोग झूठ का सहारा लेते हैं। कहीं से कोई चीज ५०० रु. की लाएँगे तो १००० रु. की बताने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। शुरुआत में तो लोगों पर प्रभाव जमाने में ये माहिर होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लोग उन्हें जान जाते हैं।&lt;br /&gt;www.webdunia.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8461382830235946303?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8461382830235946303/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8461382830235946303'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8461382830235946303'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='ऐसे बुलबुलों से बचके रहना...'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-5139676116425757889</id><published>2011-01-19T21:49:00.003+05:30</published><updated>2011-01-19T21:55:28.990+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;वैज्ञानिक फॉर्मूले से बचाएंगे वन भैंसे की नस्ल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcPfD6HdsI/AAAAAAAAB1U/otE2mua4kro/s1600/dhritrastra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcPfD6HdsI/AAAAAAAAB1U/otE2mua4kro/s320/dhritrastra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5563932890938963650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रायपुर.छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसा (वाइल्ड बफेलो) की खत्म हो रही नस्ल ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। उदंती अभयारण्य में मौजूद सात वन भैंसों में से सिर्फ एक मादा है और गर्भधारण के दोनों ही बार इसने नर को जन्म दिया है। ऐसे में अब उम्मीदें वैज्ञानिक फॉमरूले पर टिक गई हैं। विभाग ने इनकी वंश वृद्धि के लिए कृत्रिम गर्भाधान की योजना बनाई है। &lt;br /&gt;वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया (डब्लूटीआई) ने कृत्रिम गर्भाधान के सिस्टम का खाका बना लिया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद इसे अमल में लाया जाएगा।&lt;br /&gt;राज्य के रिजर्व फॉरेस्ट उदंती में विचरण करने वाले वन भैंसे देश की इकलौती विशुद्ध नस्ल हैं। दूसरे अभयारण्यों में उनकी नस्ल बिगड़ चुकी है। यही वजह है कि डब्लूटीआई यहां के वन भैंसों की नस्ल को लेकर ज्यादा चिंतित है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एकमात्र मादा के स्वास्थ्य ने बढ़ाई चिंता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एकमात्र मादा वन भैंसा के स्वास्थ्य की देखभाल के साथ-साथ सुरक्षित गर्भधारण करवाना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है। इसे सुरक्षा देने के लिए उसे पिछले दो साल से बाड़े में रखा गया है। उसके लिए उदंती में पौने दो एकड़ में बाड़ा बनाया गया है। उसी बाड़े में नर भी है। &lt;br /&gt;बाड़े में ही दो बार मां बनने के दौरान मादा वन भैंसा ने नर को जन्म दिया। अफसर इस बात को लेकर आशान्वित नहीं है कि तीसरी बार भी वह मादा वनभैंसा को जन्म देगी। अब उन्हें उसके स्वास्थ्य भी चिंता सताने लगी है। इस कारण भी वंश वृद्धि के लिए वैज्ञानिक तकनीक आजमाने का निर्णय लिया गया है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शुद्धता पर नहीं पड़ेगा असर &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;डब्लूटीआई के छत्तीसगढ़ प्रभारी डा. राजेंद्र मिश्रा का कहना है कि वन भैंसों की नस्ल बढ़ाने के लिए यह फॉमरूला अपनाना जरूरी है। इसके जरिये पैदा होने वाली नस्ल बिलकुल शुद्ध होगी। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ऐसे बढ़ाया जाएगा वंश&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;उदंती में बाड़ के घेरे में बंद मादा वनभैंसा के अंडाणु को नर वनभैंसे के स्पर्म में मिलाया जाएगा। उसे पालतू मादा वन भैंसे में प्रविष्ट करवाकर गर्भधारण कराने के प्रयास होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार 10-12 पालतू मादा वनभैंसों में यही फॉमरूला अपनाने से कोई न कोई मादा वनभैंसा को जन्म देगी। तीन-चार मादा वनभैंसों के जन्म के बाद नस्ल बढ़ाने में दिक्कत नहीं होगी।&lt;br /&gt;उदंती में बाड़ के घेरे में बंद मादा वनभैंसा के अंडाणु को नर वनभैंसे के स्पर्म में मिलाया जाएगा। उसे पालतू मादा वन भैंसे में प्रविष्ट करवाकर गर्भधारण कराने के प्रयास होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार 10-12 पालतू मादा वनभैंसों में यही फॉमरूला अपनाने से कोई न कोई मादा वनभैंसा को जन्म देगी। तीन-चार मादा वनभैंसों के जन्म के बाद नस्ल बढ़ाने में दिक्कत नहीं होगी।&lt;br /&gt;"अभी पूरी योजना प्रारंभिक स्तर पर है। विशेषज्ञों से रायशुमारी के बाद इसका प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। वन मंत्रालय से मंजूरी के बाद ही इस दिशा में आगे कदम उठाया जाएगा।" &lt;br /&gt;-राकेश चतुर्वेदी, फील्ड डायरेक्टर वाइल्ड लाइफ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में तलाशे जाएंगे बाघ&lt;/strong&gt;    &lt;br /&gt;जगदलपुर/रायपुर.बीजापुर जिले के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में बाघ के होने के प्रमाण मिले हैं। वहीं इस टाइगर रिजर्व में बड़ी संख्या में चीतल, नीलगाय व कोटरी सहित वनभैंसे के होने की भी जानकारी सामने आई है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcQDYdfMTI/AAAAAAAAB1c/tQmJ1p8RvaQ/s1600/jajsahab1_f_2501_f.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcQDYdfMTI/AAAAAAAAB1c/tQmJ1p8RvaQ/s320/jajsahab1_f_2501_f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5563933514931319090" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नेशनल पार्क में माओवादी गतिविधियों के चलते बाहरी लोगों की आमदरफ्त न के बराबर होने और घास के मैदान की अधिकता से यहां की परिस्थितियां जंगली जानवरों के रहने के अनुकूल बताई गई है। हाल ही में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के एडीजी राकेश डोगरा और नेशनल बोर्ड आफ वाईल्डलाइफ की सदस्य प्रेरणा बिंद्रा ने भी इस इलाके का दौरा किया। उन्हें बड़ी संख्या में जंगली जानवरों के मल और उनके पैरों के निशान दिखे हैं। &lt;br /&gt;अनुकूल हैं घास के मैदान : &lt;br /&gt;सीएफ वाइल्डलाइफ अरूण पांडे ने बताया कि अभयारण्य में घास के कई जंगल उपस्थित है। अब तक नौ स्थानों पर घास के मैदान मिले हैं, जो कई सौ हेक्टेयर में फैले हैं। इनमें इड़ेपल्ली, ताड़मेंड्री, सालेपल्ली, पिल्लूर, सागमेटा, पिनगुंडा, मुचनेर, गुंडापुरी और नेती काकले शामिल हैं। इन जंगलों में नीलगाय व चीतल के गोबर एक ही स्थान पर पाए गए हैं।&lt;br /&gt;इनकी विशेषता होती है कि ये जानवर एक ही जगह पर आकर मलत्याग करते हैं। जिससे यहां गोबर का ढेर लग जाता है। ये घास के मैदान दरअसल शेर के लिए किचन का काम करते हैं। यहां शेर शिकार करने आता है और भोजन लेकर चला जाता है। &lt;br /&gt;बैलों का शिकार किया, बाघ होने का प्रमाण&lt;br /&gt;अभयारण्य में बाघ की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ताड़मेंड्री इलाके को प्रमुख रूप से चुना गया है। यहां ग्रामीणों ने बाघ द्वारा बैलों को मारने की शिकायत की थी। जिसके बाद इस इलाके में इसके प्रमाण भी मिले हैं। अब ऐसे स्थान पर ऑप्टिकल कैमरे लगाए जा रहे हैं जहां जंगली जानवर पानी पीने के लिए पहुंचते हैं। &lt;br /&gt;इसके अलावा सेंड्रा इलाके के अन्नापुर और मट्टीमारका क्षेत्र में कैमरे लगाए जाने की योजना है। यह कार्य शीघ्र ही पूरा कर लिया जाएगा जिसके बाद जंगली जानवरों की उपस्थिति के साथ ही उनकी गणना में भी आसानी होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-5139676116425757889?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/5139676116425757889/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_4496.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5139676116425757889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5139676116425757889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_4496.html' title='छत्तीसगढ़ की खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcPfD6HdsI/AAAAAAAAB1U/otE2mua4kro/s72-c/dhritrastra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-4647121298641820484</id><published>2011-01-19T21:46:00.001+05:30</published><updated>2011-01-19T21:49:06.821+05:30</updated><title type='text'>अब खनकेगा 150 रुपए का सिक्का</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcO7haPAdI/AAAAAAAAB1M/a8VHQ2UnQ-o/s1600/jajsahab1_f_2501_f.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcO7haPAdI/AAAAAAAAB1M/a8VHQ2UnQ-o/s320/jajsahab1_f_2501_f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5563932280383013330" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; देश में पहली बार 150 रुपए कीमत का सिक्का जारी किया गया है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती वर्ष के मौके पर भारत सरकार ने यह सिक्का जारी किया है।&lt;br /&gt;भारतीय स्टेट बैंक के विपणन कार्यपालक सुरेश शुक्ला ने बताया कोलकाता स्थित टकसाल द्वारा विशेष श्रंखला के तहत जारी 150 रुपए का सिक्का 40 मिलीमीटर व्यास का है और इसका वजन 35 ग्राम है। &lt;br /&gt;चांदी,तांबा,निकेल और जिंक धातुओं के मिश्रण से निर्मित सिक्के में दातें (सिरेशन) की संख्या 200 है। इसी प्रकार 5 रुपए कीमत का टैगोर स्मृति विशेष श्रंखला सिक्का भी जारी किया गया है। इसका वजन 6 ग्राम और व्यास 23 मिलीमीटर है। इसमें 100 दातें हैं। यह सिक्का तांबा, निकेल एवं जिंक धातुओं के मिश्रण से बनाया गया है।&lt;br /&gt;ये सिक्के भी होंगे जारी&lt;br /&gt;इसी वर्ष भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 75 रुपए का विशेष सिक्का जारी किया जाएगा। कॉमनवेल्थ गेम्स की स्मृति में भी 100 रुपए का सिक्का जारी किया जा रहा है। इसी तरह इस साल देश में पहली बार 10 रुपए का पॉलीमर नोट लाया जा रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-4647121298641820484?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/4647121298641820484/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/150.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4647121298641820484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/4647121298641820484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/150.html' title='अब खनकेगा 150 रुपए का सिक्का'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTcO7haPAdI/AAAAAAAAB1M/a8VHQ2UnQ-o/s72-c/jajsahab1_f_2501_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8258903715102103495</id><published>2011-01-19T21:43:00.000+05:30</published><updated>2011-01-19T21:44:39.262+05:30</updated><title type='text'>जहां बच्चे नहीं जानते पिता का नाम</title><content type='html'>सांवरडा गांव : बाड़मेर&lt;br /&gt;गांव : बाड़मेर जिला का सांवरडा गांव&lt;br /&gt;क्यों चर्चा में : यहां बच्चे अपने पिता का नाम तक नहीं जानते&lt;br /&gt;कारण : नगरवधुओं का गांव है&lt;br /&gt;कुल परिवारों की संख्या : 70&lt;br /&gt;जीं हां बात आश्चर्यजनक लेकिन बाड़ेमेर जिले के सांवरडा गांव की कहानी तो यहीं कहती है। जब आप इस गांव में जाएंगे तो आपको यहां एक प्राथमिक स्कूल मिलेगा और यहां पढ़ने वाले बच्चे अपने पिता का नाम नहीं जानते। और कुछ सालों बाद इनकों जो मार्कशीट मिलेगी उस पर भी इनके पिता का नाम नहीं होगा क्योंकि स्कूल में भी इनकी पहचान इनकी माता के नाम पर ही दर्ज है। गांव में 70 परिवारों के करीब 45 बच्चों की जिंदगी का एक कड़वा सच है और ये बच्चे नहीं जानते कि वो पापा कहकर किसे बुलाएं। &lt;br /&gt;दरअसल इस गांव में देह व्यापार में लिप्त एक जाति विशेष के लगभग सत्तर परिवार यहां रहते हैं इस बस्ती में देह व्यापार में लिप्त महिलाएं और उनके बच्चें निवास करते है।इन बच्चों को कभी पिता का नाम नहीं मिलता और ये बच्चे अपनी माताओं के नाम से ही जाने जाते है। &lt;br /&gt;सत्तर परिवारों के इस गांव में 132 नगर वधुएं है और करीब 45 बच्चें है। इस गांव में प्राथमिक स्तर का एक विद्यालय है जिसमें इनके बच्चें शिक्षा ग्रहण करते है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8258903715102103495?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8258903715102103495/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8258903715102103495'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8258903715102103495'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_19.html' title='जहां बच्चे नहीं जानते पिता का नाम'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7978548546248371300</id><published>2011-01-16T21:41:00.002+05:30</published><updated>2011-01-16T21:46:38.850+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;चाय-नाश्ते’ का पैसा दो तब होता है रजिस्ट्रेशन&lt;/strong&gt;    &lt;br /&gt; राजधानी स्थित स्टेट फार्मेसी काउंसिल के कार्यालय में प्रदेशभर से रजिस्ट्रेशन और नवीनीकरण के लिए आने वाले छात्रों को लूटा जा रहा है। इन बेरोजगारों से दफ्तर के बाबू चाय-नाश्ते के नाम पर खुलेआम पैसा मांगते हैं। इसकी जानकारी जिम्मेदारों को भी है, लेकिन वे कार्रवाई के बदले बहाने कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTMY-by-pfI/AAAAAAAABz0/oYNC8G9OlrA/s1600/dhritrastra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTMY-by-pfI/AAAAAAAABz0/oYNC8G9OlrA/s320/dhritrastra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5562817425625228786" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;डीबी स्टार टीम ने स्टिंग ऑपरेशन में गीतांजली नगर स्थित छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल के दफ्तर में खुलेआम चल रही घूसखोरी को पकड़ा है। यहां रोजाना प्रदेशभर से डी. फार्मेसी और बी. फार्मेसी के सैकड़ों छात्र रोजगार के लिए जरूरी रजिस्ट्रेशन व नवीनीकरण करवाने आते हैं। स्टिंग में सामने आया कि यहां शासन द्वारा निर्धारित फीस की रसीद देकर चाय-नाश्ते के नाम पर 500 से 1000 रुपए तक अधिक लिए जा रहे हैं। इनके द्वारा नया रजिस्ट्रेशन करवाने आए छात्रों से ही ज्यादा पैसों की मांग की जाती है। हद तो यह है कि यहां आने वाले छात्र व पालक जब तक बाबुओं (तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी) को चढ़ावा नहीं चढ़ाते तब तक उनका काम अटकाकर ही रखा जाता है। इसके अलावा जल्द काम करवाने के नाम पर भी छात्रों और पालकों से अधिक पैसे ऐंठे जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह किया खुलासा&lt;br /&gt;मिली शिकायत पर डीबी स्टार टीम 10 जनवरी 2011 को छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल के रजिस्ट्रार कार्यालय में पहुंची। इस दौरान रिपोर्टर अपने छोटे भाई को डी.फार्मा डिप्लोमाधारी बताकर रजिस्ट्रेशन करवाने की जानकारी ली। यहां बैठकर छात्रों से उगाही कर रहे बाबुओं ने पहले 100 रुपए का फॉर्म खरीदने को कहा। जब कर्मचारियों से पूछा गया कि कब तक काम हो जाएगा तो उन्होंने कहा फॉर्म के साथ पैसा लेकर आ जाना सब तुरंत हो जाएगा। कितना पैसा पूछा तो बोले, उसी समय बताएंगे। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान टीम ने देखा कि कर्मचारियों का रैकेट छात्रों से निर्धारित 300-350 शुल्क लेने के अलावा चाय-नाश्ते के लिए दोगुना पैसा तक ले लेते हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पकड़े न जाएं इसलिए कर रखे हैं इंतजाम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बाबुओं ने पकड़े न जाने के लिए पुख्ता इंतजाम कर रखे हैं। वे छात्र के अंदर आते ही दरवाजा बंद कर देते हैं। छात्र या तो अकेले या अपने पालक के साथ ही अंदर जा सकता है। इस पर डीबी स्टार टीम ने कुछ छात्रों को हिडन वीडियो कैमरा देकर अंदर भेजा। इस दौरान हुई रिकॉर्डेड बातचीत..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;?कर्मचारी- किसका नवीनीकरण करवाने आए हो, वह खुद क्यों नहीं आई? &lt;br /&gt;—मेरी बहन का है, वह कॉलेज गई है इसलिए मैं ही आ गया हूं। उसके दस्तावेज के साथ मैं हस्ताक्षर के मिलान के लिए ड्राइविंग लाइसेंस और पैन कार्ड लेकर आया हूं। &lt;br /&gt;?चलो इस बार तो करे दे रहा हूं पर दोबारा ऐसा नहीं चलेगा, तुम्हारी बहन को ही आना पड़ेगा? &lt;br /&gt;—ठीक है सर। &lt;br /&gt;(इसी दौरान वहां बैठे अनिरुद्ध नामक कर्मचारी ने युवक द्वारा निर्धारित फीस 300 रुपए दिए जाने के बाद चाय-नाश्ते के लिए और पैसे मांगे..)&lt;br /&gt;—सर, अभी तो इतना ही लाया हूं। वैसे भी रजिस्ट्रेशन के समय तो आपने जितना मांगा था, उतना दिया ही। अब और क्या लेंगे। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अलाव से जल गईं दो बच्चियां&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कवर्धा/रायपुर। शहर से 30 किमी दूर रानीदहरा गांव में दो बच्चियों की जलने से मौत हो गई, जबकि उनके दादा गंभीर रूप से झुलस गए। घटना के समय तीनों झोपड़ी में सो रहे थे। 60 वर्षीय लामू अपने खलिहान के पास बनी झोपड़ी में शुक्रवार रात सोने जा रहे थे। &lt;br /&gt;उनकी पौत्री चार वर्षीय सीमा और 10 साल की श्यामवती भी साथ सोने चली गईं। ठंड से बचने के लिए लामू ने झोपड़ी के पास ही अलाव जला रखा था। 11 बजे के करीब अचानक झोपड़ी में आग लग गई। लामू किसी तरह बाहर निकला और आसपास के लोगों को आवाज लगाई। जब तक लोग आग बुझाने पहुंचे, दोनों बच्चियां दम तोड़ चुकी थीं। वहीं लामू की स्थिति चिंताजनक है। बोड़ला टीआई यूके वर्मा ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि जलने से ही बच्चियों की मौत हुई है। &lt;br /&gt;सौतेली थीं दोनों बच्चियां &lt;br /&gt;मृत दोनों बच्चियां सौतेली बहनें थीं। पिता सुक्कलराम मेरावी ने दोनों बच्चियों को अपने पास ही रखा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7978548546248371300?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7978548546248371300/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7978548546248371300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7978548546248371300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_16.html' title='छत्तीसगढ़ की खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TTMY-by-pfI/AAAAAAAABz0/oYNC8G9OlrA/s72-c/dhritrastra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-2955669168111721629</id><published>2011-01-03T21:48:00.002+05:30</published><updated>2011-01-03T21:50:07.376+05:30</updated><title type='text'>बिछुड़े प्यार को भूल जाना बेहतर</title><content type='html'>- मानसी&lt;br /&gt;NDहेलो दोस्तो! जब आप कोई पाठ याद करना चाहें तो कितनी मुश्किल होती है। बार-बार उसे दुहराना। थोड़ा समय बीतने पर फिर उसे याद करके चेक करना कि कहीं आप उसे भूल तो नहीं गए। याद रखने के लिए कई तरीके ईजाद किए गए हैं। कोई किसी रूखे-सूखे जवाब को तुकबंदी बनाकर याद करने की कोशिश करता है तो कोई बार-बार लिखकर या फिर तारीखों को अपनी निजी तारीखों से जोड़कर याद करता है।&lt;br /&gt;आप किसी को भी थोड़ा-ज्यादा काम बता दें वह कुछ न कुछ भूल ही जाता है। दफ्तरों में भी लोग न जाने कितनी डायरी, कितने प्लैनर इसी काम के लिए भरते रहते हैं। फिर भी अपनों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि याद रखना आसान नहीं लगता है तो मोबाइल में रिमाइंडर लगाते हैं। ये सारे जतन बस इसलिए किए जाते हैं कि आप भूलें न।&lt;br /&gt;पर उस समय आप हैरान रह जाते हैं जब एक मामूली सी, छोटी-सी बात भूलना चाहें और हजार कोशिश के बावजूद आप उसे भूल न पाएँ। उन बातों को जिसे आपको याद करने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ा पर उसे भुला पाना असंभव लग रहा हो। आप के लिए उस पीड़ा को बयान करना मुश्किल हो जाता है जब अनचाही यादें आ-आकर आपको बताती हैं कि आप उन्हें भूल नहीं पाओगे। &lt;br /&gt;ऐसी ही यादों को पूरी तरह भूल जाना चाहते हैं महेश (बदला हुआ नाम)। महेश का प्यार टूटे दो वर्ष हो गए हैं पर अभी तक महेश एक पल के लिए भी अपनी दोस्त को नहीं भूल पाए हैं। महेश से अलग होने के बाद उनकी दोस्त ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा। न कभी मिलने या बात करने की कोशिश की। दोनों के पहचान वालों के सामने भी कोई जिक्र नहीं छेड़ा। अलग होने के बाद ऐसी खामोश हुई मानो उसे जानती ही नहीं। &lt;br /&gt;इधर महेश हैं कि अब भी उसका इंतजार कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके गम से निजात और खुशी की वजह केवल उनकी दोस्त है, जो बस एक बार फिर मिल जाए।&lt;br /&gt;महेश जी, आपको अपने-आप से भी शिकायत है कि वह इतनी बेदर्द है फिर भी आप उसे जी जान से चाहते हैं। दरअसल, यह आपका पहला प्यार था इसलिए आप हजार गिले-शिकवे के बाद भी वहीं अपना सुकून व मंजिल महसूस करते हैं। इस प्यार की तुलना करने के लिए आपके पास दूसरा कोई अनुभव भी नहीं है। आप लोगों के बीच क्यों झगड़ा हुआ, क्यों आप लोग अलग हुए, किस प्रकार का मन-मुटाव या गलतफहमी हुई इसके बारे में आपने कुछ नहीं लिखा है। पर, दो वर्ष तक उसे याद करके उदास होने से यह बात तो तय है कि आप में एक प्रकार का गहरा कमिटमेंट है और साथ ही शिकायतों को नजरअंदाज कर माफ करने की क्षमता भी है।&lt;br /&gt;ऐसा मुमकिन नहीं है कि आपकी ये खूबियाँ आपकी दोस्त की नजरों से ओझल होंगी। आपके एकतरफा चाहत की बात भी उन तक पहुँचती होगी। आपके इंतजार की खबरें भी उन्हें मिलती होंगी। इसके बावजूद वह आपसे कोई संवाद नहीं रखना चाहती हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि वह इस अध्याय को बंद कर देना चाहती है। दो साल का अरसा बहुत बड़ा समय होता है। नाराजगी की बर्फ इस बीच पिघल जानी चाहिए थी। &lt;br /&gt;ऐसा नहीं हुआ है तो इसका एक ही मतलब है कि वह अब कभी नहीं लौटेंगी। इसलिए किसी चमत्कार का इंतजार करना बेकार है। आप में सबसे अच्छी बात यह है कि आप जीवन जीना चाहते हैं, खुश रहना चाहते हैं। आपने लिखा, आपको दूसरा कोई और भाता नहीं है। शायद इसकी वजह यह हो कि आप अपनी दोस्त को गलत न समझते हों।&lt;br /&gt;इसका एक ही मतलब है कि वह अब कभी नहीं लौटेंगी। इसलिए किसी चमत्कार का इंतजार करना बेकार है। आप में सबसे अच्छी बात यह है कि आप जीवन जीना चाहते हैं, खुश रहना चाहते हैं।हो सकता है, इस अलगाव की वजह के पीछे आप हों और उन्होंने आपकी इस भूल को आपकी तमाम खूबियों पर भारी माना। आप नौकरी करते हैं इसलिए आप व्यस्त रह सकते हैं। फिलहाल आप अपनी नौकरी यानी जिम्मेदारियों से प्यार करना शुरू कर दें। यदि आपकी कोई हॉबी हो जिसे आपने अभी तक ज्यादा समय नहीं दिया है तो उसे समय दें।&lt;br /&gt;व्यायाम करें अपनी सेहत के बारे में सोचें। रोज सुबह टहलें और खाने-पीने में सुधार करें। फल-सब्जी, अंकुरित अनाज खाएँ। चाय-कॉफी कम कर दें। अपने पहनावे पर ध्यान दें। अच्छे स्टाइलिश कपड़े खरीदें। खुद को सँवारने-सजाने पर समय लगाएँ। सबसे अहम आप हैं। अपने आप से प्यार करें। दुनिया- जहाँ की खबरें देखें और अपना ज्ञान बढ़ाएँ। अपने कॅरिअर में आगे बढ़ने की सोचें।&lt;br /&gt;यदि आपने ये सब पूरी लगन और गंभीरता से किया तो आपका व्यक्तित्व ही कुछ और हो जाएगा। आपको अपनी दोस्त की यादों से न केवल मुक्ति मिलेगी बल्कि आप अपने दम पर खुश होना सीख जाएँगे। जब आप अपने आपको सराहेंगे और दूसरे भी आपकी तारीफ करेंगे तो आपके खयालों में सोच के केंद्र बिंदु में आप होंगे।&lt;br /&gt;दूसरी छवि गायब होती जाएगी और वह दिन दूर नहीं होगा जब आप फिर किसी और से भी प्यार या शादी की स्थिति में होंगे। आप नए अनुभव से डरते हैं क्योंकि आप हर समय, अपनी दोस्त से उसकी तुलना करते रहते हैं। अभी आप किसी प्रेम-प्रेमिका के बारे में न सोचें। कुछ दिन अकेले रहकर अपने-आप पर ध्यान दें, सब कुछ ठीक हो जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-2955669168111721629?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/2955669168111721629/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_5473.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2955669168111721629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2955669168111721629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_5473.html' title='बिछुड़े प्यार को भूल जाना बेहतर'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-5347237245792902817</id><published>2011-01-03T21:48:00.001+05:30</published><updated>2011-01-03T21:48:49.236+05:30</updated><title type='text'>बेवफाई हुई हाईटेक</title><content type='html'>प्यार और विश्वास हाइटेक हुआ हो या नहीं, बेवफाई जरूर इन दिनों हाइटेक हो गई है। वर्चुअल दुनिया विवाहेतर रिश्तों की राह सुगम बना रही है। जो सुविधाएँ दूरियों को कम करने के लिए जानी जाती हैं, वे ही अब रिश्तों में दूरियाँ बढ़ाने में भी योगदान कर रही हैं।&lt;br /&gt;आशिमा (नाम परिवर्तित) की जिंदगी दफ्तर, घर और पति के बीच करीब-करीब इसी प्राथमिकता क्रम से चल रही थी, या कहें भागी जा रही थी। शादी को पाँच साल होने आए थे और आशिमा तथा उसका पति अश्विन अपना-अपना करियर बनाने में व्यस्त थे। सुबह से लेकर देर रात तक की व्यस्त दिनचर्या में उनके लिए एक-दूसरे के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल था। &lt;br /&gt;आशिमा एक दि‍न यह देखकर दंग रह गई कि अश्विन के मोबाइल में 'एस' नाम से सेव किए गए किसी नंबर से आए मैसेजेस का अंबार लगा था... और इन मैसेजेस के कंटेंट ने अश्विन के प्रति आशिमा के विश्वास को तार-तार कर दिया। &lt;br /&gt;'एस' जो भी थी, वह अश्विन को लगातार आत्मीय, उत्तेजक यहाँ तक कि कामुक प्रकृति के संदेश भेज रही थी... और अश्विन की ओर से भी उसे वैसे ही बल्कि उससे भी दो कदम आगे के मैसेज जा रहे थे! उस दिन आशिमा ने खुद को हाइटेक बेवफाई के शिकार लोगों की बढ़ती फेहरिस्त में पाया।&lt;br /&gt;NDनए मौके, नई सुविधाएँ &lt;br /&gt;बेवफाई का सिलसिला यूँ तो उतना ही पुराना है जितना कि प्यार का लेकिन इन दिनों बेवफाई के लिए नए 'मौके', नई 'सुविधाएँ' उपलब्ध हैं। जिस टेक्नोलॉजी ने शहरों, देशों और महाद्वीपों की दूरियाँ समाप्त कर लोगों को पास लाने का काम किया है, वही टेक्नोलॉजी रिश्तों में दूरियाँ लाने में भी सहयोग करती देखी जा रही है। &lt;br /&gt;मोबाइल के अलावा ईमेल, इंटरनेट के चैट रूम, स्काइप आदि ने बेवफाई के मौकों को नए आयाम दिए हैं। आज की युवा पीढ़ी टेक्नो-सैवी तो है ही, गला-काट प्रतिस्पर्धा और करियर बनाने की होड़ में वह अक्सर व्यक्तिगत भावनात्मक संबंध बनाने और निभाने में खुद को नाकाम होता पाती है। &lt;br /&gt;जीवन के इस अहम पहलू के खालीपन को भरने के लिए नए जमाने के गैजेट्स उसे बड़ा सहारा देते हैं। अश्विन का जिस लड़की से अफेयर चल रहा था, उससे वह मिला तो था केवल दो-एक बार काम के सिलसिले में की गई यात्राओं के दौरान लेकिन फोन पर दोनों का अफेयर लगातार चला आ रहा था।&lt;br /&gt;परंपरागत रूप से तब बेवफाई की गई मानी जाती है जब दंपत्ति में से कोई एक किसी और के साथ दैहिक संबंध बना ले या इस दिशा में बढ़े। आज इसकी परिभाषा बदल गई है। मूल मुद्दा है अपने पार्टनर के विश्वास को तोड़ना। &lt;br /&gt;चाहे रिश्ता कितना ही लांग डिस्टेंस क्यों न हो, भले ही दूरियों के कारण या अवसरों की अनुपलब्धता के चलते दैहिक संबंध न बन पाए हों और न ही उनके बनने की संभावना हो लेकिन यदि आपने अपने पार्टनर का विश्वास तोड़ा है तो आपने बेवफाई की है।&lt;br /&gt;सामान्य मित्रता की हद को लांघते हुए स्थापित किया गया कोई भी रिश्ता, भले ही वह वास्तविक न होकर 'वर्चुअल' हो, बेवफाई की जद में आता है। मैरिज काउंसलर बताते हैं कि यही वर्चुअल बेवफाई इन दिनों खास तौर पर महानगरों में बढ़ती हुई देखी जा रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छुपने के रास्ते, बचने का तरीका&lt;br /&gt;टेक्नोलॉजी न केवल शारीरिक उपस्थिति के बिना विवाहेतर संबंधों को बनाने की सुविधा दे रही है, बल्कि अपनी करतूतों को छुपाने के भी रास्ते उपलब्ध करा रही है। मोबाइल के कॉल लॉग और मैसेजेस को डिलीट कर अपने साथी से अपनी कारगुजारियाँ छुपाई जा सकती हैं। &lt;br /&gt;नेट पर अपने परिचितों से बचकर, अपनी पहचान बदलकर चैटिंग की जा सकती है। सोश्यल नेटवर्किंग साइट्स गुमनाम रहकर अफेयर चलाने के लिए खुला मैदान मुहैया कराती हैं। &lt;br /&gt;सौजन्य से - तरंग, नई दुनि‍या&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-5347237245792902817?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/5347237245792902817/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_03.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5347237245792902817'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5347237245792902817'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_03.html' title='बेवफाई हुई हाईटेक'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-1268588499448582923</id><published>2011-01-02T22:43:00.003+05:30</published><updated>2011-01-02T22:53:12.708+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की खास खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;फर्जी हस्ताक्षर कर दी 79 को सरकारी नौकरी&lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;   छत्तीसगढ़ के पंचायत विभाग में नौकरी देने के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। इसमें विभाग के पुराने संचालक के हस्ताक्षर कर 79 लोगों की नियुक्ति और पदस्थापना के आदेश जारी कर दिए गए। महत्वपूर्ण बात यह है कि उक्त संचालक का तबादला 20 सितंबर को हो गया था, जबकि आदेश 8 दिसंबर की तारीख पर जारी किए गए हैं। &lt;br /&gt;इस मामले में शनिवार को रायपुर के गोलबाजार थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है। पंचायत विभाग के पूर्व संचालक जीएस धनंजय के हस्ताक्षर से राज्य के विभिन्न जिलों में सहायक आंतरिक लेखा परीक्षण एवं करारोपण अधिकारी के पद 79 लोगों की नियुक्ति की गई। इससे संबंधित फाइल जब पंचायत मंत्री रामविचार नेताम के पास गई तो उन्हें संदेह हुआ क्योंकि धनंजय का तबादला तो अक्टूबर माह में ही हो गया था। श्री नेताम ने विभाग के अफसरों को पूरे मामले की पड़ताल करने के आदेश दिए। उसके बाद आदेश की जांच की गई तो फर्जीवाड़ा सामने आ गया। &lt;br /&gt;सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश के अनुसार जीएस धनंजय के स्थान पर 20 सितंबर को बीएस अनंत को पंचायत का संचालक बनाया गया था। उसके बाद 26 नवंबर से आलोक अवस्थी विभाग के संचालक हैं। इसकी पूरी जानकारी मंत्री श्री नेताम को दी गई तो उन्होंने इस मामले में दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए। उसके बाद गोलबाजार थाने में लिखित में मामले की शिकायत की गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नौकरी के नाम पर उगाही का शक &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अनुमान है कि इस खेल में लिप्त लोगों ने बेरोजगारों को नौकरी देने के नाम पर उगाही की होगी। जिन लोगों की नियुक्ति और पदस्थापना की गई है, उनमें से कोई भी विभाग का पुराना कर्मचारी नहीं है। इस कारण यह माना जा रहा है कि यह बेरोजगारों से ठगी का बड़ा मामला है। &lt;br /&gt;जीएस धनंजय के नाम से पूर्व में जारी आदेश के उस हिस्से की फोटोकापी की गई जहां उनके हस्ताक्षर हैं। इसमें फोटोकापी में डेट बदलकर फिर नई फोटोकापी की गई जिसमें 8 दिसंबर की तारीख डाली गई। &lt;br /&gt;फर्जी नियुक्ति पत्र के आधार पर किसी को नौकरी पर नहीं रखने के आदेश सभी जिलों में जारी कर दिए गए हैं। इसके अलावा सभी जिलांे में कलेक्टर और एसपी को भी ऐसे लोगों के सामने आने पर सीधे कानूनी कार्रवाई के लिए पत्र लिखा गया है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आलोक अवस्थी, संचालक, पंचायत विभाग &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बेघरों को मिला रैन बसेरा&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;    बिलासपुर शहर में रहने वाले आवासहीन भिखारियों को मूलभूत सुविधाएं मुहैय्या कराने की संवेदनशील पहल करते हुए जिला प्रशासन द्वारा उन्हें रैन बसेरा उपलब्ध कराया गया है। &lt;br /&gt;राज्य कीर स्थापना की दसवीं वर्षगांठ पर जिला प्रशासन द्वारा संवेदनशील पहल करते हुए रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले गरीबों को ठंड, बरसात के मौसम में एक सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराने के लिए अधिकारियों की एक टीम गठित कर सर्वे कराया गया। &lt;br /&gt;टीम ने रात में 10 बजे से 12 बजे तक शहर में भ्रमण कर ऐसे लोगों को चिन्हित किया तथा 18 वर्ष से कम तथा 18 से 50 वर्ष और 50 वर्ष से उपर के निराश्रित लोगों की पृथक-पृथक सूची तैयार की। ऐसे व्यक्तियों में 174 पुरुष और 94 महिलाएं तथा 18 वर्ष तक के 27 बच्चे शामिल किए गए। &lt;br /&gt;इन व्यक्तियों के लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों के सहयोग से अस्थाई रूप से रैन बसेरा की व्यवस्था की गई तथा उन्हें ठंड से बचाने के लिए कंबल वितरित किया गया। रैनबसेरा में रहने वाले लोगों को प्रतिदिन भोजन की व्यवस्था भी इन्ही संगठनों के सहयोग से की जा रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शतरंज खिलाड़ी ने लगाया अनाचार का आरोप&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;    बिलासपुर शादी के मारपीट करने पर अंतरराष्ट्रीय शतरंज खिलाड़ी महिला ने खिलाड़ी पति पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए पुलिस से शिकायत की है। कोनी पुलिस ने खिलाड़ी के खिलाफ जुर्म दर्ज कर लिया है। &lt;br /&gt;कोनी कृष्ण विहार निवासी पीड़ित महिला की शिकायत के मुताबिक 6 माह पूर्व विदेश में अंतरराष्ट्रीय शतरंज स्पर्धा के दौरान झारखंड में रेलवे में पदस्थ शतरंज खिलाड़ी इमरान हुसैन से उसकी मुलाकात हुई। &lt;br /&gt;इस दौरान दोनों के बीच प्रेम संबंध स्थापित हो गया। महिला का कहना है कि दोनों ने मर्जी से शादी भी कर ली। इसके बाद वह वापस आ गई और इमरान झारखंड चला गया। महिला के मुताबिक 28 दिसंबर को इमरान कोनी आया था। &lt;br /&gt;इस दौरान उसके घर के सामने इमरान ने उससे मारपीट की थी। महिला दो माह से गर्भवती है। मारपीट की घटना के बाद महिला ने कोनी थाने में इमरान पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई है। पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अंकों के आधार पर जाने जाते हैं गांव&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;डीएनके प्रोजेक्ट के तहत बंगलादेश से विस्थापित बंग परिवारों को पखांजूर क्षेत्र में बसाया गया। तत्कालिक व्यवस्था के तहत गांवों का नामकरण अंकों के आधार पर कर दिया गया। 1986 में जब प्रोजेक्ट समाप्त कर राज्य शासन को स्थानांतरित किया तो राज्य शासन द्वारा इन गांवों का नामकरण किया गया लेकिन इतने वर्षों बाद भी गांवों का नाम प्रचलन में नहीं आ पाया है। आज भी अधिकांश लोग अपने या दुसरे गांवों को डीएनके के दौरान आबंटित अंकों के आधार पर ही जानते है। &lt;br /&gt;1962 में क्षेत्र में विस्थापित बंग परिवारों को पुर्नवास कराने हेतु डीएनके प्रोजेक्ट की शुरूआत केंद्र शासन द्वारा की गई। 1972 तक डीएनके द्वारा नए गांव बसाए जाते रहे। इस तरह पीवी 1 से पीवी 133 तक कुल 133 गांव बसाए गए और क्रम से इन्हें नंबर दिया जाता रहा। कुछ गांव को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो सारे गांव क्रम से ही बसाए गए जिसकी शुरूआत कापसी क्षेत्र के पीवी 1 परलकोट गांव से 1 से हुई और अंत बांदे क्षेत्र में हुआ। इन अंको का सर्वाधिक फायदा यह है कि इससे उस गांव की भौगोलिक स्थिति जान सकते है कि यह गांव पखांजूर, कापसी या बांदे किस क्षेत्र में है। अंकनुमा गांव का नाम लोगों की जुबान पर कुछ ऐसा चढ़ा की राज्य शासन द्वारा दिए गए नाम प्रचलन में नही आ पा रहे है। प्रशासनिक कार्यों में अब राज्य शासन द्वारा आबंटित गांव का नाम जरूर लिखा जाता है किंतु उसके उस अंक भी लिख दिए जाते है। जब से ग्राम पंचायत व्यवस्था राज्य शासन ने लागू की है तब से पंचायत मुख्यालय का नाम जरूर लोगों द्वारा लिया जाने लगा है लेकिन आश्रित ग्राम आज भी अंकों के आधार पर ही जानेे जाते है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शुरू होने से पहले ही बंद कॉल सेंटर&lt;/strong&gt;      &lt;br /&gt; रायपुर.स्कूल में शिक्षक देर से आते हैं? पढ़ाई नहीं हो रही? कक्षा में बैठने के लिए जगह नहीं है? ऐसी शिकायतें टेलीफोन के माध्यम से सुनने के लिए शिक्षा संचालनालय में खोला जा रहा काल सेंटर खुलने के पहले ही ध्वस्त हो गया।&lt;br /&gt;ऐसी योजना थी कि बच्चों के माता-पिता टोल फ्री नंबर पर फोन करके स्कूल से संबंधित सभी तरह की शिकायतें सीधे मुख्यालय में कर सकें। टोल फ्री नंबर इसलिए रखा गया ताकि कोई भी कहीं से भी फोन करें, उन्हें उसका शुल्क अदा न करना पड़े। &lt;br /&gt;काल सेंटर के लिए मुख्यालय के एक बड़े कक्ष को खाली कराया गया। वहां 20 से ज्यादा कंप्यूटर लगाए गए। बीएसएनल से टोल फ्री नंबर के लिए संपर्क किया गया। साल भर की फीस के रुप में 68 हजार रुपए अदा किए गए। &lt;br /&gt;काल सेंटर संचालित करने के लिए आफिस में स्टाफ नहीं था। अफसरों ने वित्त विभाग से चार आपरेटरों के नए पद मांगे। वित्त में प्रस्ताव भेजने के बाद क्या हुआ यह बात किसी को नहीं मालूम लेकिन विभागीय अधिकारियों की कवायद यहीं तक सीमित रही। नतीजन काल सेंटर का फामरूला अस्तित्व में आने के पहले ही ध्वस्त हो गया। &lt;br /&gt;काल सेंटर के जरिए स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधारने में खासी मदद मिल सकती थी। काल सेंटर अस्तित्व में आने के बाद प्रत्येक स्कूल के बाहर टोल फ्री नंबर बड़े-बड़े बोर्ड पर चस्पा करना तय किया गया। &lt;br /&gt;ताकि स्कूली बच्चों के पालक आसानी से नंबर देख सकें। उसके बाद स्कूल में शिक्षकों के गायब रहने पर या पढ़ाई न होने पर बच्चों के पालक टोल फ्री नंबर के जरिये सीधे मुख्यालय में शिकायत कर सकते थे। &lt;br /&gt;अभी दूर-दराज के इलाकों की शिकायतें महीनों मुख्यालय नहीं पहुंच पाती। यह मुख्यालय से संपर्क करने का सीधा साधन हो सकता था। इसके जरिये आला अफसरों को यह मालूम हो पाता कि कौन से स्कूल में पढ़ाई नहीं हो रही है। ऐसी दशा में उस समस्या का जल्द से जल्द निदान हो सकता था। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक नजर में &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&gt; शासन ने योजना पर खर्च किए 3 लाख 75 हजार। &lt;br /&gt;&gt; कंप्यूटर और इनवर्टर खरीदा गया। &lt;br /&gt;&gt; बीएसएनएल के छह कनेक्शन लिए गए। &lt;br /&gt;&gt; मुख्यालय में कंप्यूटर लगाकर बकायता सिस्टम आन किया गया। &lt;br /&gt;&gt; पूरी तैयारी और रुपयों की हुई बरबारी। &lt;br /&gt;&gt; 2008-09 में बनी थी योजना। &lt;br /&gt;&gt; दिसंबर 2009 में पूरा सेटअप किया था तैयार।&lt;br /&gt;"काल सेंटर क्यों बंद हैं? इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है। जांच करवाई जाएगी। &lt;br /&gt;अगर कोई तकनीकी दिक्कत है तो उसे दूर करने के प्रयास होंगे।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संगीत के बीच होगा इलाज, गूंजेंगे सभी धर्मो के मंत्र&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;    प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में अब मरीजों का इलाज संगीत के बीच किया जाएगा। यहां म्यूजिक सिस्टम लगाया जा रहा है जिससे मंत्र, गुरुबाणी व कुरान की आयतें गूंजेंगी। &lt;br /&gt;पूरे अस्पताल में 350 माइक्रो स्पीकर लगाए जाएंगे। योजना को जनवरी में होने वाली स्वशासी समिति की बैठक में मंजूरी दी जाएगी। म्यूजिक सिस्टम लगने के बाद अपनी बारी का इंतजार कर रहे मरीजों को बोर नहीं होना पड़ेगा। इस पूरे सिस्टम पर पांच लाख लागत आएगी।&lt;br /&gt;मधुर संगीत कई बीमारियों के इलाज में मददगार होता है। इसी बात के मद्देनजर अस्पताल प्रबंधन ने म्यूजिक सिस्टम लगाने का निर्णय लिया है। यह ओपीडी, आईपीडी, अधीक्षक, सहायक अधीक्षक व सीएमओ कार्यालय में लगेगा। ऑपरेशन थिएटर में भी म्यूजिक सिस्टम लगाने की योजना है। &lt;br /&gt;माइक्रो स्पीकर के संचालन के लिए अधीक्षक कार्यालय व ओपीडी गेट के सामने मे आई हेल्प यू काउंटर के पास कंट्रोल रूम बनेगा। दोनों स्थानों से सभी माइक्रो स्पीकर संचालित होंगे।&lt;br /&gt;माइक्रो स्पीकर से किसी भी समय टू वे बात की जा सकेगी। यह सिस्टम 24 घंटे काम करेगा। आपातकाल में माइक्रो स्पीकर काफी मददगार होंगे। उदाहरण के लिए अधीक्षक कार्यालय से एक साथ कैजुअल्टी व दूसरे वार्ड में बात की जा सकेगी।&lt;br /&gt;किसी डॉक्टर को बुलाना हो तो फोन करने के बजाय माइक्रो स्पीकर के माध्यम से बुलाया जा सकता है। कोई मरीज गंभीर है तो संबंधित डॉक्टर को तत्काल बुलाया जा सकेगा। कंट्रोल रूम से जो बात होगी वह सभी माइक्रो स्पीकर में गूंजेगी। &lt;br /&gt;कई बार फोन लाइन इंगेज रहने के कारण संबंधित डॉक्टर या अन्य व्यक्ति से तत्काल बात नहीं हो पाती। ऐसे में माइक्रो स्पीकर की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। प्रबंधन आपातकाल में डॉक्टरों को लाने के लिए चार पहिया वाहन की व्यवस्था पहले ही कर चुका है।&lt;br /&gt;खाली समय में माइक्रो स्पीकर से विभिन्न धर्मो के मंत्र गूंजेंगे। गायत्री मंत्र के अलावा गुरुबाणी व कुरान की आयतें गूंजेंगी। साउंड इतना रहेगा जिससे दूसरों के काम में बाधा न पहुंचे। &lt;br /&gt;प्रबंधन इस बात पर विशेष ध्यान देगा कि म्यूजिक सिस्टम से बहुद्देशीय कार्य लिया जाए। जानकारों के अनुसार मंत्रोच्चर मन को शांति देने वाला होती है। ऐसे में मरीज को दर्द में भी सुकून के दो पल मिलेंगे।&lt;br /&gt;"लगभग पांच लाख रुपए की लागत से अस्पताल में 350 माइक्रो स्पीकर लगाए जाएंगे। दो कंट्रोल रूम के जरिए इसका संचालन होगा। जनवरी में मेडिकल कॉलेज में स्वशासी समिति की होने वाली बैठक में इसे मंजूरी मिलने की संभावना है। म्यूजिक सिस्टम आपातकाल में काफी मददगार होगा।" &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;डॉ. सुनील गुप्ता, सहायक अधीक्षक आंबेडकर अस्पताल&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-1268588499448582923?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/1268588499448582923/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_02.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1268588499448582923'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1268588499448582923'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post_02.html' title='छत्तीसगढ़ की खास खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-6969398744978059303</id><published>2011-01-01T22:58:00.000+05:30</published><updated>2011-01-01T23:00:57.580+05:30</updated><title type='text'>आलेख-1</title><content type='html'>&lt;strong&gt;खुशियाँ ढूँढिए अपने अन्दर!&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;हम चारों ओर खुशियों की तलाश में भटकते हुए सारा समय व्यर्थ कर देते हैं जबकि खुशी तो हमारे मन में ही बसी होती है। बस जरूरत होती है तो उसे बाहर निकालने की व दूसरों के साथ उन्हें बाँटने की।&lt;br /&gt;खुशियाँ आपके दर पर खुद दस्तक नहीं देतीं। यह तो ईश्वर की तरफ से हरेक को दिया गया अनमोल उपहार है। पर अपने भीतर छिपे इस खजाने को स्वयं आपको खोजना होगा और इसे खोजने के लिए आपके पास कई उपाय हैं। स्वयं को हमेशा ऊँची नजर से देखना और अपने भीतर अपनी प्रतिष्ठा स्वयं बनाए रखने का प्रयास करना हमारी जीवन शैली को बेहतर बनाए रखने के लिए सर्वाधिक जरूरी है। &lt;br /&gt;इसका अर्थ यह है कि आप अपने भीतर की शक्ति और अपनी कमजोरियों दोनों को स्वीकारें और स्वयं को हमेशा दूसरों के मुकाबले बराबरी का दर्जा देते हुए भी अपने भीतर उस ऊर्जा के स्रोत को पहचानकर निखारें, जो आपको दूसरों से अलग और विलक्षण बनाती है। शोध बताते हैं कि व्यायाम करने से हमारे शरीर में रक्त संचार नियमित होता है और हमारा शरीर अपने भीतर एक नई ताजगी और चेतना महसूस करता है। शरीर की यह ऊर्जा चमत्कारिक रूप से हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करती है।&lt;br /&gt;जीवन में जो बाँटेंगे, बदले में वही आपको वापस मिलेगा। इसलिए जब कभी आपको अपने भीतर एकाकीपन महसूस हो, अपने खालीपन को दूसरों के बीच भरने का प्रयास करें। इसी क्रम में किसी जरूरतमंद की मदद, किसी अस्पताल में रोगियों को दी गई सांत्वना की हल्की-सी थपकी आपके चेहरे की मुस्कान का कारण बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। चीजों को दार्शनिक अंदाज से देखने और जिंदगी को बहते पानी की तरह मानने वाले लोग अपने जीवन को अधिक आनंदित बना पाने में सफल होते हैं। &lt;br /&gt;एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हममें से प्रत्येक को अपने जीवन को अपनी तरह से जीने की जिम्मेदारी समझनी चाहिए। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि यदि एक बार हम निर्णय ले सकें कि हममें परिस्थितियों को बदलने की क्षमता है तो हमारे आसपास का परिवेश सचमुच बदल सकता है।   &lt;br /&gt;खुश रहने के लिए सबसे अहम पहलू यह है कि हमें सबसे पहले अपने आपसे अपनी पहचान कायम करनी होगी। हमारे पास जितना है, उसे स्वीकार करना हमारी संतुष्टि के लिए जरूरी है। जो नहीं है, उसे लेकर पीड़ा और संताप का अनुभव करते रहना हमें मानसिक रूप से बीमार बनाताहै। ईश्वर का दिया हमारे पास बहुत कुछ है- यह दृष्टिकोण हमारी प्रसन्नता की कुंजी है। &lt;br /&gt;यूँ तो जीवन उतार-चढ़ावों से भरा है, परंतु आपका आपसी साहचर्य आपके जीवन की खुशियों का केंद्रबिंदु है। अपने साथी के साथ भरोसे और प्रेम का व्यवहार और एक-दूसरे के प्रति समझ आपको निराशा के घने अंधकार से बाहर निकाल सकती है। इसलिए अपने और अपने करीबी को समझने का प्रयास अवश्य करें। &lt;br /&gt;प्रशंसा करना हमारे व्यक्तित्व का सबसे खूबसूरत पहलू है। पर यह काम सभी नहीं कर पाते। यह भी एक कला है, जो धीरे-धीरे ही पैदा होती है। दूसरों की तारीफ करने में हम प्रायः कंजूस हो जाते हैं। आप अपने आसपास के हर अच्छे काम की दिल खोलकर प्रशंसा करें। आप पाएँगे कि दूसरों के चेहरे पर आई मुस्कान आपको ताजगी से भर देती है। &lt;br /&gt;याद रखिए कि घर हमारे जीवन का वह कोना है, जहाँ हम स्वर्ग-सा सुख महसूस करते हैं। इसलिए अपने घर को अपनी तरह से आरामदायक बनाएँ। कभी-कभी उसमें किया गया थोड़ा-सा परिवर्तन चाहे वह पलंग का कोई कोना हो, दीवार पर टँगी कोई तस्वीर या ताजे फूलों कागुलदस्ता, आपकी प्रसन्नता का कारण बन सकता है। इसके अलावा रंग भी हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। हर रंग का अपना एक महत्व होता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि नारंगी या केसरिया रंग हमारे विश्वास को बढ़ाता है। हमारी नकारात्मक सोच को अपने भीतर समेटकर हमें प्रफुल्लित और उत्साहित बनाए रखता है। &lt;br /&gt;किसी भी प्रसन्नचित व्यक्ति के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि वह हमेशा अपना दृष्टिकोण आशावादी रखे। मनोचिकित्सकों का मानना है कि प्रसन्नता सिर्फ इस बात पर प्राप्त की जा सकती है, यदि हम अपने भीतर दोहराएँ कि हम प्रसन्न स्वभाव के व्यक्ति हैं और हमें हमेशा खुश रहना है। इस तरह की कल्पना करने पर हमारा मस्तिष्क इस संदेश को और इन्हीं भावों को अपने भीतर ग्रहण कर लेता है और हमारे शरीर के स्नायु तंत्रों को भी इसी तरह के निर्देश देता है, तब कल्पना में की गई आपकी धारणा वास्तविक रूप से आपको आनंदित बनाए रख सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-6969398744978059303?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/6969398744978059303/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/1.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6969398744978059303'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6969398744978059303'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/1.html' title='आलेख-1'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8871250908181952682</id><published>2011-01-01T22:56:00.000+05:30</published><updated>2011-01-01T22:58:45.639+05:30</updated><title type='text'>परंपरा की जान है रस्‍में</title><content type='html'>आज भले ही जमाना बदला, लोगों के विचार बदले, लेकिन नहीं बदला तो वो शादी-विवाह में देवर द्वारा भाभी से चुहलबाजी करना, साली द्वारा जीजा से पैसों के लिए जिद करना, समधी द्वारा समधन से मजाक करना। अनेक रस्मों व रिवाजों के माध्यम से ये वैवाहिक समारोह अंजाम पर पहुँचते हैं, जिसमें वरपक्ष की खुशी व कन्या के अपने बाबुल से विग्रह की पीड़ा अनेक परंपराओं में सिमटती चली आती हैं। यही परंपराएँ दो पक्षों के गंठबंधन को मजबूती प्रदान करती हैं, उन्हें रिश्तों की डोर में बाँधे रखती हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शगुन से शुरुआत &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;शादी तय होते ही नेग और दस्तूरों की शुरुआत हो जाती है। लड़की वाले ल़ड़के वालों के यहाँ फलदान लेकर जाते हैं तो शगुन के रूप में ससुराल वाले अपनी होने वाली बहु की ओली भरते हैं। इन रस्मों से शुरू हुआ दस्तूरों का सिलसिला विवाह पूर्ण होने के बाद भी कई दिनों तक चलता रहता है। &lt;br /&gt;नई दुल्हन के घर आने पर कुछ घरों में भगवान की कथा की जाती है, तो नवविवाहिता को सुहाग की शुभकामनाएँ देने के लिए सुहागलों का आयोजन भी होता है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जरूरी है बड़ों का आशीर्वाद &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारतीय परंपरा रही है कि बिना रिश्तेदारों और समाज के लोगों के आशीर्वाद के कोई शुभ कार्य पूरा नहीं होता। तो जब विवाह के रीति-रिवाज की बात हो तो भला हम अपनों के आशीर्वाद को कैसे भूल सकते हैं। नवयुगल को आशीर्वाद देने के लिए भी शादी में कई रस्में हैं। &lt;br /&gt;जैसे कुछ घरों में फेरों के समय दूल्हा-दुल्हन के पाँव पूजे जाते हैं तो ज्यादातर लोग प्रीतिभोज में अपने करीबियों को न्यौता देकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। इतना ही नहीं नवेली के घर में आते ही बहु की मुँह दिखाई की रस्म भी बड़ों का आशीष लेने का ही एक माध्यम है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;न खले अकेलापन &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जब नई बहू अपने ससुराल आती है तो उसके लिए सभी कुछ नया होता है। नया माहौल, नए लोगों के साथ नये रीति-रिवाज। नई दुल्हन को नई जगह पर अकेलापन न खले इसी उद्देश्य से विवाह पश्चात भी ससुराल में कई छोटी-छोटी रस्में की जाती हैं, जैसे अंगूठी ढूँढना, बहू का नाम रखना और गीत-संगीत होना। जो भी रीति-रिवाज हैं उनका परिवार को जोड़े रखने में बहुत महत्व है। आजकल लोग नहीं मानते तभी घरों में वो अपनापन नहीं रह गया है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शुभ होते हैं रीति-रिवाज &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;सदियों से चले आ रहे विवाह के ये रीति-रिवाज शुभ शगुन माने जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इन रस्मों से गुजरने के बाद ही विवाह संपूर्ण होता है। सविता तिवारी का मानना है कि हमारे बड़े बुजुर्गों ने जो हमारी शादी के वक्त रीति-रिवाज बताए थे, वही हम आज भी निभा रहे हैं। शगुन के रूप में की जाने वाली इन रस्मों के पीछे कई वैज्ञानिक और कई पौराणिक महत्व छिपे हुए हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हल्दी बिना शादी अधूरी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;चाहे कोई भी समाज हो या वर्ग, ज्यादातर लोगों में विवाह के समय हल्दी और तेल की रस्म बहुत महत्वपूर्ण है। कहीं सात सुहागनें दूल्हा-दुल्हन को हल्दी लगाती हैं, तो कहीं सात कुंवरियाँ हल्दी तेल की रस्म को पूरा करती हैं। राधा दुबे के अनुसार स्थान बदल जाते हैं। परिवेश बदल जाता है। &lt;br /&gt;भाषा बोली में भी अंतर हो सकता है, लेकिन विवाह के रीति-रिवाज सभी जगह लगभग समान होते हैं। जैसे सगाई, फलदान, लगुन, हल्दी, तेल, कंगन, मंडप, मातृका पूजन, फेरे और उसके बाद बहू का द्वारचार, ये कुछ ऐसी रस्में हैं जो अमूमन हर घर और समाज में की जाती हैं। हो सकता है तरीकों में कुछ थोड़ा-बहुत अंतर जरूर हो।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आया है थोड़ा बदलाव&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;आजकल लोगों की व्यस्तताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि हर काम की जल्दी रहती है। यही वजह है कि शादी ब्याह जैसे काम भी जल्दी में पूरे कर लिए जाते हैं। इन व्यस्तताओं के चलते विवाह के रीति-रिवाजों में थोड़ा बदलाव आ गया है। लोगों की मानसिकता में भी अंतर आया है। &lt;br /&gt;यही कारण है कि अब शादियों के भी शॉर्ट-कट होने लगे हैं। पहले जहाँ शादियों में सप्ताह भर लगता था अब वह दो-तीन दिनों में ही हो जाती हैं। &lt;br /&gt;सौजन्य से - नईदुनि‍या&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8871250908181952682?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8871250908181952682/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8871250908181952682'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8871250908181952682'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='परंपरा की जान है रस्‍में'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-2711051654145507019</id><published>2010-12-27T22:08:00.000+05:30</published><updated>2010-12-27T22:10:28.112+05:30</updated><title type='text'>संजय नहीं, शकुनी बन गए हैं पत्रकार</title><content type='html'>राजनीति के अपराधीकरण पर किए गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है। मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया। बाद में उन आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यों न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाए। नतीजा, वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गई। अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फॉर्म्युला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है। &lt;br /&gt;हाल तक पत्रकारिता के लिए भी पेड न्यूज़ चिंता का सबब बना हुआ था। लेकिन राडिया प्रकरण के बाद यह तथ्य सामने आया कि कलम को लाठी की तरह भांजने वाले लोगों ने भी यह सोचा कि अगर केवल कलम या कैमरे से ही किसी की छवि बनाई या बिगाड़ी जा सकती हो तो क्यों न ऐसा काम केवल खुद की बेहतरी के लिए किया जाए? कल तक जो कलमकार नेताओं के लिए काम करते थे, अब वे नेता बनाने या पोर्टफोलियो तक डिसाइड करवाने की हैसियत में आ गए। अगर इस पर लगाम न लगाई गई तो कल शायद ये भी खुद ही लोकतंत्र को चलाने या कब्जा करने की स्थिति में आ जाएं। &lt;br /&gt;2 G स्पेक्ट्रम घोटाले के खुलासे ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि पत्रकारिता की सरांध को भी रोकने के लिए समय रहते ही कोशिश करनी होगी। यह सरांध केवल दिल्ली तक ही सिमटा नहीं है बल्कि कालीन के नीचे छुपी यह धुल, टर के ढक्कन के नीचे की बदबू राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों तक बदस्तूर फ़ैली हुई है। &lt;br /&gt;संविधान द्वारा आम जनों को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे ज्यादा उपयोग पत्रकारों को करने देकर समाज ने शायद एक शक्ति संतुलन स्थापित करना चाहा था। अपने हिस्से की आज़ादी की रोटी उसे समर्पित करके समाज ने यह सोचा होगा कि यह ‘ वॉच डॉग ’ का काम करते रहेगा। नई-नई मिली आज़ादी की लड़ाई में योगदान की बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था। लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को नहीं रही होगी कि यह ‘ डॉग ’ भौंकने के बदले अपने मालिक यानी जनता को ही काटना शुरू कर देगा। हाल में उजागर मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है समाज में मीडिया की बढ़ती बेजा दखलंदाजी। &lt;br /&gt;निश्चित ही कुछ हद तक मीडिया की ज़रूरत देश को है। लेकिन लोगों में पैदा की जा रही ख़बरों की बेतहाशा भूख ने अनावश्यक ही ज़रूरत से ज्यादा इस कथित स्तंभ को मज़बूत बना दिया है। यह पालिका आज ‘ बाज़ार ’ की तरह यही फंडा अपनाने लगा है कि पहले उत्पाद बनाओ फ़िर उसकी ज़रूरत पैदा करो। सुधीश पचौरी ने अपनी एक पुस्तक में ‘ ख़बरों के भूख ’ की तुलना उस कहानी ( जिसमें ज़मीन की लालच में बेतहाशा दौड़ते हुए व्यक्ति की जान चली जाती है) के पात्र से कर यह सवाल उठाया है कि आखिर लोगों को कितनी खबर चाहिए? तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ख़बरों की बदहजमी रोकने हेतु उपाय किया जाना समीचीन होगा। &lt;br /&gt;शास्त्रों में खबर देने वाले को मोटे तौर पर ‘ नारद ’ का नकारात्मक रूप देकर उसे सदा झगड़े और फसाद की जड़ बताया गया है। इसी तरह महाभारत के कथानक में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सबसे पहले आंखों देखा हाल सुनाने की बात आती है। लेकिन महाभारत में यह उल्लेखनीय है कि आंखों देखा हाल सुनाने की वह व्यवस्था भी केवल अंधे राजा के लिए की गई थी। इस निमित्त संजय को दिव्यदृष्टि से सज्जित किया गया था। आज के मीडियाकर्मियों के पास भले ही सम्यक दृष्टि का अभाव हो, कुछ भी विकल्प न मिलने पर या अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में ही अधिकांश लोग पत्रकार बन गए हों लेकिन आम जनता को आज का मीडिया धृतराष्ट्र की तरह ही अंधा समझने लगा है। ऐसी मानसिकता के साथ कलम या कैमरे रूपी उस्तरे लेकर समाज को घायल करने की हरकत पर विराम लगाने हेतु प्रयास किया जाना आज की बड़ी ज़रूरत है। &lt;br /&gt;लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘ लोक ’ में समाहित है, अतः यह उचित ही है कि ख़बरों को प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार रहे। लेकिन ‘ घटना ’ और ‘ व्यक्ति ’ के बीच ‘ माध्यम ’ बने पत्रकार अगर बिचौलिये-दलाल का काम करने लगे तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किए जाने की ज़रूरत है। जनता को धृतराष्ट्र की तरह समझने वाले तत्वों के आंख खोल देने हेतु व्यवस्था को कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है। कोई पत्रकार अपने ‘ संजय ’ की भूमिका से अलग होकर अगर ‘ शकुनी ’ बन जाने का प्रयास करे, षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो समाज को चाहिए कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित करें। &lt;br /&gt;अव्वल तो यह किया जाना चाहिए कि हर खबर के लिए एक जिम्मेदारी तय हो। अगर खबर गलत हो और उससे किसी निर्दोष का कोई नुकसान हो जाए तो उसकी भरपाई की व्यवस्था होना चाहिए। इसके लिए करना यह होगा कि ‘ पत्रकार ’ कहाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति का निबंधन कराया जाय। कुछ परिभाषा तय किया जाए, उचित मानक पर खड़े उतडने वाले व्यक्ति को ही ‘ पत्रकार ’ के रूप में मान्यता दी जाए। कुछ गलत बात सामने आने पर उसकी मान्यता समाप्त किए जाने का प्रावधान हो। जिस तरह वकालत या ऐसे अन्य व्यवसाय में एक बार प्रतिबंधित होना के बाद कोई पेशेवर कहीं भी प्रैक्टिस करने की स्थिति में नहीं होता, उसी तरह की व्यवस्था मीडिया के लिए भी किए जाने की ज़रूरत है। &lt;br /&gt;अभी होता यह है कि कोई कदाचरण साबित होना पर अगर किसी पत्रकार की नौकरी चली भी जाती है तो दूसरा प्रेस उसके लिए जगह देने को तत्पर रहता है। राडिया प्रकरण में भी नौकरी से इस्तीफा देने वाले पत्रकार को भी अन्य प्रेस द्वारा अगले ही दिन नयी नौकरी से पुरस्कृत कर दिया गया। जब तक इस तरह के अंकुश की व्यवस्था नहीं हो तब तक निरंकुश हो पत्रकारगण इसी तरह की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे। &lt;br /&gt;जहां हर पेशे में आने से पहले उचित छानबीन करके उसे अधिसूचित करने की व्यवस्था है वहाँ पत्रकार किसको कहा जाए यह मानदंड आज तक लागू नहीं किया गया है। आप देखेंगे कि चाहे वकालत की बात हो, सीए, सीएस या इसी तरह के प्रफेशनल की। हर मामले में कठिन मानदंड को पूरा करने के बाद ही आप अपना पेशा शुरू कर सकते हैं। डॉक्टर-इंजिनियर की तो बात ही छोड़ दें, एक सामान्य दवा की दूकान पर भी एक निबंधित फार्मासिस्ट रखने की बाध्यता है। कंपनियों के लिए यह बाध्यता है कि एक सीमा से ऊपर का टर्नओवर होने पर वो नियत सीमा में पेशेवरों को रखे और उसकी जिम्मेदारी तय करे। लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लेते जा रहे मीडिया संगठनों को ऐसे हर बंधनों से मुक्त रखना अब लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगा है। आज़ादी के बाद, खास कर संविधान बनाते समय पत्रकारों के प्रति एक भरोसे और आदर का भाव था सो संविधान के निर्माताओं ने इस पेशे में में आने वाले इतनी गिरावट की कल्पना भी नहीं की थी। ज़ाहिर है इस तंत्र पर लगाम लगाने हेतु उन्होंने कोई खास व्यवस्था नहीं की। लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि पत्रकारों के परिचय, उसके नियमन के लिए राज्य द्वारा एक निकाय का गठन किया जाए, अन्यथा इसी तरह हर दलाल खुद को पत्रकार कह लोकतंत्र के कलेजे पर ‘ राडिया ’ दलता रहेगा। &lt;br /&gt; पंकज झा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-2711051654145507019?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/2711051654145507019/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_1213.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2711051654145507019'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2711051654145507019'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_1213.html' title='संजय नहीं, शकुनी बन गए हैं पत्रकार'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-3741457257244274901</id><published>2010-12-27T22:07:00.000+05:30</published><updated>2010-12-27T22:08:08.652+05:30</updated><title type='text'>न्यू ईयर एक जनवरी को ही क्यों</title><content type='html'>एक जनवरी नजदीक आ गई है। जगह-जगह हैपी न्यू ईयर के बैनर व होर्डिंग लग गए हैं। जश्न मनाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं। जनवरी से प्रारंभ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका संबंध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया था। &lt;br /&gt;भारत में ईस्वी संवत् का प्रचलन अंग्रेज शासकों ने वर्ष 1752 में शुरू किया। अधिकांश राष्ट्रों के ईसाई होने और अंग्रेजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे अनेक देशों ने अपना लिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नवम्बर 1952 में हमारे देश में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की गई। समिति ने 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रमी संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश की थी। मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर ग्रेगेरियन कैलंडर को ही सरकारी कामकाज के लिए उपयुक्त मानकर 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कैलंडर के रूप में स्वीकार कर लिया गया। &lt;br /&gt;ग्रेगेरियन कैलंडर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के काफी कम समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3579 वर्ष, रोम की 2756 वर्ष, यहूदियों की 5767 वर्ष, मिस्र की 28670 वर्ष, पारसी की 198874 वर्ष चीन की 96002304 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो भारतीय ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 109 वर्ष है। जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गई है। जिस प्रकार ईस्वी संवत् का संबंध ईसाई जगत से है उसी प्रकार हिजरी संवत् का संबंध मुस्लिम जगत से है। लेकिन विक्रमी संवत् का संबंध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रह्मांड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परंपराओं को दर्शाती है। &lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए हमें सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देशप्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे़ हुए हैं। यह वह दिन है, जिससे भारतीय नव वर्ष प्रारंभ होता है। यह सृष्टि रचना का पहला दिन है। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की। विक्रमी संवत् के नाम के पीछे भी एक विशेष विचार है। यह तय किया गया था कि उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होगा जिसके राज्य में न कोई चोर हो न अपराधी हो और न ही कोई भिखारी। साथ ही राजा चक्रवर्ती भी हो। &lt;br /&gt;सम्राट विक्रमादित्य ऐसे ही शासक थे जिन्होंने 2067 वर्ष पहले इसी दिन अपना राज्य स्थापित किया था। प्रभु श्रीराम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में अपने राज्याभिषेक के लिए चुना। युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ था। शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। विक्रमादित्य की तरह शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। &lt;br /&gt;प्राकृतिक दृष्टि से भी यह दिन काफी सुखद है। वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। यह समय उल्लास - उमंग और चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरा होता है। फसल पकने का प्रारंभ अर्थात किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है। नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् नए काम शुरू करने के लिए यह शुभ मुहूर्त होता है। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम का भाव पैदा हो सके या स्वाभिमान तथा श्रेष्ठता का भाव जाग सके ? इसलिए विदेशी को छोड़ कर स्वदेशी को स्वीकार करने की जरूरत है। आइए भारतीय नव वर्ष यानी विक्रमी संवत् को अपनाएं। &lt;br /&gt;विनोद बंसल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-3741457257244274901?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/3741457257244274901/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_27.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3741457257244274901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/3741457257244274901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_27.html' title='न्यू ईयर एक जनवरी को ही क्यों'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8215304823247286186</id><published>2010-12-26T20:29:00.002+05:30</published><updated>2010-12-26T20:52:15.103+05:30</updated><title type='text'>खास खबर</title><content type='html'>&lt;strong&gt;शहरों में हिंसा फैलाना चाहते थे राजद्रोही&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; रायपुर। डा. बिनायक सेन, नारायण सान्याल और पीजूष गुहा पर ढाई साल चले राजद्रोह के मुकदमे के बाद जज एडीजे बीपी वर्मा ने फैसला सुनाया तो उन्होंने साफ लिखा है कि आरोपी नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को बढ़ावा देकर शहरों में हिंसक वारदात करवाना चाहते थे।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRddPcCBhjI/AAAAAAAABtE/JtVaRI02SLc/s1600/dhritrastra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRddPcCBhjI/AAAAAAAABtE/JtVaRI02SLc/s400/dhritrastra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5555011185188898354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;फैसले में इस बात का उल्लेख किया गया है कि नारायण सान्याल नक्सली माओवादियों की सबसे बड़ी संस्था पोलित ब्यूरो का सदस्य है, वह बिनायक सेन व पीजूष गुहा के माध्यम से जेल में रहकर ही शहरी क्षेत्रों में हिंसक वारदातों को अंजाम देने की कोशिश में था। पुलिस को जब यह पता चला तो सबसे पहले शहर में बाहर से आने वाले संदिग्ध व्यक्तियों के बारे में होटल, लाज, धर्मशाला व ढाबों पर दबिश दी गई। दबिश के कारण ही पीजूष गुहा पुलिस के हत्थे चढ़ा।यह भी पाया गया है कि बिनायक सेन नारायण सान्याल के पत्र पीजूष गुहा को गोपनीय कोड के माध्यम से प्रेषित किया करता था। तीनों अभियुक्तों की मंशा नक्सलियों के खिलाफ चल रहे आंदोलन सलवा जुड़ूम को समाप्त करने की भी थी। फैसले में सुनवाई के दौरान गवाह के रूप में आए दंतेवाड़ा व कांकेर में कलेक्टर के पद पर रहे के आर पिस्दा ने नक्सलियों की मंशा की पुष्टि की है। फैसले के अनुसार पूरा दंतेवाड़ा जिला नक्सल प्रभावित क्षेत्र है।कांकेर आंशिक नक्सली प्रभावित क्षेत्र है। नक्सली समस्या इलाके में 30 साल पहले ही अपनी जड़ें जमा चुकी थी। शुरूआत में नक्सलियों ने अपने आपको आम जनता के समक्ष उनके हितचिंतक एवं हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया। इससे उन्हें आम जनता का सहयोग एवं समर्थन भी मिला। जनता के इसी सहयोग के बल पर नक्सलियों ने पूरे क्षेत्र में अपने संगठन का विस्तार किया। नक्सली संगठन जैसे-जैसे मजबूत होते गए, वैसे वैसे आदिवासियों का उनके जीवन में हस्तक्षेप बढ़ता गया। इसके बाद नक्सलियों ने अवैध चंदा उगाही शुरू की। आदिवासियों को संगठन में भर्ती करने लगे। विकास के कामों को रोकने की पूरी कोशिश की। इन गतिविधियों से नक्सलियों के खिलाफ बढ़ रहा आक्रोश भी नजर आने लगा। नक्सलियों की बात नहीं मानने पर गांवों वालों को नक्सली जन अदालत लगाकर सजा दी जाती थी। नक्सलियों का आतंक व प्रताड़ना इतनी अधिक बढ़ गई कि आदिवासियों के बीच जीवन मरण का प्रश्न उत्पन्न हो गया। इन्हीं कारणों से जून 2005 में नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन शुरू किया गया।&lt;br /&gt;डा. बिनायक सेन के मकान की तलाशी में नारायण सान्याल का लिखा पत्र, सेंट्रल जेल बिलासपुर में बंद नक्सली कमांडर मदन बरकड़े का डा. सेन को कामरेड के नाम से संबोधित किया पत्र व 8 सीडी जिसमें सलवा जुडूम की क्लीपिंग व नारायणपुर के गांवों में डा. सेन के द्वारा गांव वासियों व महिलाओं के मध्य बातचीत के अंश मिले हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;6 फ्रंट संगठनों पर लगाया प्रतिबंध&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दंतेवाड़ा में जो नक्सली संगठन काम करता है उसे सीपीआई माओवादी के नाम से जाना जाता है। ये जोनल कमेटी, दलम कमेट, एरिया कमेटी व अन्य संगठन बनाकर नक्सल गतिविधियों का संचालन करते हैं। छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 एक्ट के लागू होने के बाद 12 अप्रैल 2007 को 6 फ्रंट संगठनों को विधि विरूद्ध संगठन घोषित किया गया। &gt; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी &gt; दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संघ &gt; क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ &gt; क्रांतिकारी आदिवासी बालक संघ &gt; क्रांतिकारी किसान कमेटी &gt; महिला मुक्ति मंच।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब तो खोल दीजिए खिड़की&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; बिलासपुर। रेल प्रशासन को आम यात्रियों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। शायद यही वजह है कि सेंट्रल इंक्वायरी के तीनों नंबर बंद करने के बाद भी रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर की दूसरी खिड़की नहीं खोली जा रही है। पूछताछ करने वालों की संख्या दोगुनी हो गई है और यात्रियों को जानकारी के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ रही है।&lt;br /&gt;बिलासपुर रेल मंडल में मेनुअल इंक्वायरी सिस्टम के बंद होने से रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर में भीड़ बढ़ने लगी है। औसतन हर दिन 5 हजार यात्रियों को जानकारी देने वाले पूछताछ काउंटर में अब 7 हजार यात्री जानकारी लेने पहुंच रहे हैं। यह संख्या आगे और भी बढ़ेगी। भीड़ के अनुरूप रेलवे स्टेशन में जानकारी देने की समुचित व्यवस्था नहीं है। प्लेटफार्म नंबर एक पर खुले पूछताछ काउंटर में दो खिड़की है। पहली खिड़की प्लेटफार्म की ओर तो दूसरी प्लेटफार्म के बाहर की ओर है। इंक्वायरी काउंटर में दो खिड़की देने के पीछे रेल प्रशासन की मंशा यही रही कि यात्रियों को जानकारी लेने के लिए लंबी लाइन न लगानी पड़े। यह व्यवस्था चंद दिनों में ही दम तोड़ गई। दरअसल इंक्वायरी काउंटर पर इतना स्टाफ ही नहीं होता कि दोनों खिड़कियों से यात्रियों को जानकारी दी जा सके। यहां दो-दो कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाती है, जिनके जिम्मे यात्रियों को जानकारी देने के अलावा अनाउंसमेंट, कंप्यूटर में कोच की स्थिति दर्ज करना, ट्रेनों के आने-जाने का समय रजिस्टर में दर्ज करने से लेकर दर्जनों कागजी कार्रवाई करना होता है। इंक्वायरी काउंटर की स्थिति ऐसी रहती है कि एक कर्मचारी कागजी कार्रवाई में तो दूसरा जानकारी देने में जुटा रहता है। इन कर्मचारियों ने रेल प्रशासन से स्टाफ बढ़ाने की मांग की है, ताकि दोनों ओर की खिड़कियों को खोला जा सके। रेल प्रशासन ने इंक्वायरी काउंटर को दो से ज्यादा कर्मचारी देने से मना कर दिया है। बहरहाल आम यात्री को ट्रेन संबंधी छोटी-छोटी जानकारियों के लिए परेशान होते देखा जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समस्या क्यों&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बिलासपुर रेल मंडल ने मेनुअल इंक्वायरी की सुविधा 18 दिसंबर को बंद कर दी है। पूछताछ के लिए लगाए गए फोन नंबर 411183, 411184 और 411185 बंद कर दिए गए हैं। रेल प्रशासन का कहना है कि इंक्वायरी सिस्टम को हाईटेक किया जा रहा है, इसके लिए यात्रियों को 139 की सुविधा दी गई है। रेल प्रशासन इस बात को मानने से इंकार करता है कि सेंट्रल इंक्वायरी नंबर बंद करने से यात्रियों की परेशानी बढ़ेगी। इधर मेनुअल इंक्वायरी बंद होने से रेलवे स्टेशन के पूछताछ काउंटर में भीड़ दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8215304823247286186?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8215304823247286186/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8215304823247286186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8215304823247286186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_26.html' title='खास खबर'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRddPcCBhjI/AAAAAAAABtE/JtVaRI02SLc/s72-c/dhritrastra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7925806352944674354</id><published>2010-12-23T23:24:00.001+05:30</published><updated>2010-12-23T23:28:32.232+05:30</updated><title type='text'>बीरगांव चुनाव में छलका उत्साह</title><content type='html'>रायपुर। बीरगांव नगर पालिका चुनाव में 35 वार्ड पार्षद के 166 और अध्यक्ष के पांच प्रत्याशियों की किस्मत मतपेटियों में बंद हो गई। मंगलवार को सभी 73 मतदान केंद्रों में कुछेक विरोध को छोड़कर चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गए। शांतिपूर्ण मतदान के लिए पुलिस की तगड़ी व्यवस्था की गई थी। सुबह 8 बजे मतदान शुरू होते ही मतदाताओं की लंबी लाइन लग गई। दोपहर 12 बजे तक 27 फीसदी से ज्यादा मतदान हो गया। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRONsDoPcGI/AAAAAAAABr8/gv9EVt7Y1Rc/s1600/dhritrastra.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRONsDoPcGI/AAAAAAAABr8/gv9EVt7Y1Rc/s320/dhritrastra.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553938553505804386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कई मतदान केंद्रों में धीमे मतदान की वजह से लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ा। इस बात पर प्रत्याशियों और उनके समर्थकों ने शोर भी मचाया। देर शाम तक मिली जानकारी के अनुसार नगर पालिका में 58 फीसदी लोगों ने अपने वोट का उपयोग किया। बीरगांव नगर पालिका के हर क्षेत्र में उत्साह का माहौल दिखाई दिया। लोग टोलियों में वोट देने के लिए घरों से निकले। मतदाताओं की सुविधा के लिए प्रत्याशियों की ओर से मतदान केंद्रों के बाहर पंडाल लगाए गए थे। यहां मतदाता पर्ची ढूंढने का काम अंतिम समय तक चलता रहा।&lt;br /&gt;मतपेटियां पहुंचीं स्ट्रांग रूम : शाम 5 बजे मतदान खत्म होने के बाद मतपेटियों को सील किया गया। पीठासीन अधिकारियों ने सभी मतपेटियों को आडवाणी आर्लिकान स्कूल बीरगांव में बने स्ट्रांग रूम में पहुंचाया। स्कूल के तीन कमरों को विशेष पुलिस सुरक्षा व्यवस्था में स्ट्रांग रूम बनाया गया है। यहां चौबीसों घंटों पुलिस की सुरक्षा रहेगी।&lt;br /&gt;फर्जी मतदान को लेकर हंगामा : आडवाणी आर्लिंकान स्कूल के मतदान केंद्र क्रमांक 47 में निर्दलीय प्रत्याशी सत्यप्रकाश सिन्हा के समर्थकों ने फर्जी मतदान का आरोप लगाया। इस बात को लेकर कुछ देर तक अन्य प्रत्याशियों के साथ उनकी बहस भी हुई। समर्थकों का आरोप था कि कोई भी परिचय पत्र नहीं दिखाने के बावजूद लोगों को वोट डालने दिया जा रहा है। टीआई शमशेर खान को मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा।&lt;br /&gt;कोई और वोट डाल गया&lt;br /&gt;मतदान केंद्र 46 की वोटर लिस्ट में 709 नंबर में नीतू राजपूत का नाम था। वो जब वोट डालने पहुंचीं तो अधिकारियों ने बताया कि उनका वोट हो चुका है। उन्होंने बताया कि उन्होंने अभी तक अपना वोट नहीं डाला है। इस पर देर तक उनके घरवालों की अधिकारियों के साथ बहस भी होती रही।&lt;br /&gt;धीमे मतदान से लोग नाराज : आडवाणी स्कूल में बने मतदान केंद्र 44, 45 और प्राथमिक स्कूल रावांभाटा में बने मतदान केंद्रों में धीमे मतदान की वजह से लोग नाराज दिखाई दिए। धीमे मतदान की वजह से यह लोगों की लंबी लाइन लगी रही। कई मतदाता इन केंद्रों से बिना वोट डाले भी लौटे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आउटर में सुरक्षा व्यवस्था कम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मतदान केंद्रों में पुलिस की सबसे तगड़ी व्यवस्था आडवाणी स्कूल के मतदान केंद्रों में की गई। यहां चार मे से तीन अतिसंवेदनशील मतदान केंद्र बनाए गए थे। एसपी दीपांशु काबरा भी निरीक्षण के लिए इसी मतदान केंद्र पहुंचे। आउटर के मतदान केंद्रों में कम पुलिस सुरक्षा की वजह से कई जगह अव्यवस्था का आलम रहा। कई मतदान केंद्रों में प्रत्याशियों के समर्थक मतदान केंद्रों में प्रचार करते भी नजर आए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;24 को मतगणना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बीरगांव चुनाव की मतगणना 24 दिसंबर को सुबह 8 बजे से आडवाणी आर्लिकान स्कूल में होगी। इसके लिए सभी तरह की व्यवस्था कर ली गई है। अलग-अलग टेबलों में 35 वार्डो के लिए डाले गए वोटों की गिनती होगी। इसके साथ ही अध्यक्ष पद के लिए डाले गए वोटों की भी गिनती होगी। मतपत्रों का उपयोग होने की वजह से नतीजे शाम से ही आने शुरू होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7925806352944674354?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7925806352944674354/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_9271.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7925806352944674354'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7925806352944674354'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_9271.html' title='बीरगांव चुनाव में छलका उत्साह'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRONsDoPcGI/AAAAAAAABr8/gv9EVt7Y1Rc/s72-c/dhritrastra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-2434490603089227984</id><published>2010-12-23T23:23:00.001+05:30</published><updated>2010-12-23T23:24:40.713+05:30</updated><title type='text'>प्रधानमंत्री लाचार, पवार मजबूर</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TROMzCpsNNI/AAAAAAAABr0/1C6r1CtY97U/s1600/balaramadasavatara_310_f.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TROMzCpsNNI/AAAAAAAABr0/1C6r1CtY97U/s320/balaramadasavatara_310_f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553937573990905042" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सरोज पांडेय&lt;br /&gt; रायपुर.भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय मंत्री एवं सांसद सरोज पाण्डेय ने प्याज के बढ़ते दाम को लेकर केन्द्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि महंगाई बढ़ने के लिए कांग्रेस गठबंधन यूपीए सरकार ही जिम्मेदार है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने यूपीए सरकार की नीतियों को जनविरोधी नीति करार देते हुए महंगाई को गलत आर्थिक नीतियों का परिणाम बताया। दुर्भाग्य की बात है कि कोई कदम उठाने की बजाए हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लाचार और भविष्यवाणी करने वाले केन्द्रीय मंत्री शरद पवार मजबूर साबित हुए हैं। &lt;br /&gt;सरोज पांडेय ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यूपीए की अध्यक्षा होने के नाते श्रीमती सोनिया गांधी को भीषण महंगाई की बिल्कुल भी चिंता नहीं है। यह कांग्रेस गठबंधन सरकार का असली चेहरा है। खुद कांग्रेसी और उनके बड़बोले महासचिव राहुल गांधी महंगाई मुद्दा नहीं मानते हैं। &lt;br /&gt;इन गलत नीतियों के परिणाम रूवरूप देश की आंतरिक स्थिति और भी खतरनाक हो सकती है। पेट्रोलियम पदार्थो से लेकर रसोई गैस के दाम अचानक बढ़ जाते हैं और देश की जनता को यह सब विवश होकर झेलना पड़ता है। &lt;br /&gt;सामान्य उपयोग और खाने पीने की चीजों का लगातार महंगा होना वाकई शर्मनाक है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री का मूल्यवृद्धि और महंगाई को लेकर कोई नियंत्रण नहीं है, जिससे अचानक कभी भी देश का वातावरण बिगड़ जाता है। यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित यूपीए सरकार ने सत्ता में रहने क अधिकार बिल्कुल खो दिया है।&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि वास्तव में कांग्रेस को आम आदमी की चिंता नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी का डर समा गया है। बिहार चुनाव में राहुल गांधी नाकाम साबित हुए, जबरदस्त शिकस्त के बाद कांग्रेस को भाजपा के बढ़ते जनाधार का भय सता रहा है। &lt;br /&gt;इसलिए उन्होंने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को कोसने का काम किया है। एक ओर पूरे देश में महंगाई ने हाहाकार मचा दिया है और कांग्रेस सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-2434490603089227984?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/2434490603089227984/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_23.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2434490603089227984'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2434490603089227984'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_23.html' title='प्रधानमंत्री लाचार, पवार मजबूर'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TROMzCpsNNI/AAAAAAAABr0/1C6r1CtY97U/s72-c/balaramadasavatara_310_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-6618521686332093026</id><published>2010-12-21T23:21:00.001+05:30</published><updated>2010-12-21T23:25:18.207+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़  की खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;विकास से उखाड़ेंगे नक्सलियों के पैर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;केंद्रीय योजना आयोग ने इंटीग्रेटेड वर्कप्लान के तहत छत्तीसगढ़ के 10 जिलों के लिए 550 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की है। यह जिले धुर नक्सल प्रभावित हैं। वहां नक्सलियों की पैर उखाड़ने के लिए विकास पर जोर दिया जा रहा है। इस वर्कप्लान के लिए कलेक्टर की अध्यक्षता में एक समिति गठित होगी। इसमें एसपी और डीएफओ भी शामिल रहेंगे। अपर मुख्यसचिव सरजियस मिंज ने सोमवार को विकास भवन में इसके क्रियान्वयन के लिए बैठक ली।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRDp75Niq9I/AAAAAAAABqs/n-tIgvYYC2E/s1600/balaramadasavatara_310_f.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRDp75Niq9I/AAAAAAAABqs/n-tIgvYYC2E/s400/balaramadasavatara_310_f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553195555726994386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;बैठक में 10 जिलों के सीईओ सहित अन्य अधिकारी शामिल हुए। नक्सल प्रभावित जिला बस्तर, बीजापुर, दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा), जशपुर, उत्तर बस्तर (कांकेर), कबीरधाम, कोरिया, नारायणपुर, राजनांदगांव और सरगुजा का चयन किया गया है। चालू वित्तीय वर्ष 2010-11 के लिए प्रत्येक जिले को 25 करोड़ मिलेंगे। अगले वित्तीय वर्ष 2011-12 के लिए हर जिले को 30 करोड़ की राशि प्रदान की जाएगी। &lt;br /&gt;श्री मिंज ने कहा कि एकीकृत कार्य योजना के तहत कार्यो का अनुमोदन जिला स्तर पर गठित समिति से कराने के बाद ही शुरू किया जाए। योजना के तहत सार्वजनिक अधोसंरचना और सेवा संबंधी कार्यो में तात्कालिक आवश्यकता अनुसार स्कूल भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल, ग्रामीण सड़क तथा सार्वजनिक स्थल जैसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और स्कूलों आदि में विद्युतीकरण के कार्य कराए जाएं। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य योजना मंडल द्वारा वामपंथ उग्रवाद से प्रभावित सात जिलों के लिए चार हजार 652 करोड़ रूपए की एकीकृत कार्य योजना प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-6618521686332093026?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/6618521686332093026/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6618521686332093026'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6618521686332093026'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html' title='छत्तीसगढ़  की खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TRDp75Niq9I/AAAAAAAABqs/n-tIgvYYC2E/s72-c/balaramadasavatara_310_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-6749969350386662361</id><published>2010-12-19T22:45:00.001+05:30</published><updated>2010-12-19T22:45:35.311+05:30</updated><title type='text'>खास खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रधान पाठक बने शिक्षाकर्मियों की नींद उड़ी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt; रायपुर शिक्षाकर्मियों को प्रधानपाठक बनाए जाने की प्रक्रिया पर बिलासपुर हाईकोर्ट के तीखे तेवरों से बलौदाबाजार शिक्षा जिले में नवनियुक्त प्रधान पाठकों के होश उड़े हुए हैं। इस परीक्षा में नियुक्ति के लिए दो करोड़ रुपए से ज्यादा के लेन-देन की खबरें आ रही हैं। &lt;br /&gt;चयन के लिए लोगों ने एक से दो लाख रुपए दिए, ऐसी चर्चा है। पैसे देकर चुने गए शिक्षाकर्मियों को डर है कि चयन प्रक्रिया ही अदालत में रद्द हो गई, तो उनके पैसों का क्या होगा। दूसरी तरफ कोशिश हो रही है कि हाईकोर्ट का आदेश आने के पहले ही ज्यादातर लोगों की ज्वाइनिंग करवा दी जाए। राज्य शासन के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी बलौदाबाजार ने अपने जिले में प्रधान पाठकों के रिक्त पदों के लिए आवेदन मंगवाए थे। दो दिन पहले जनदर्शन में जिला पंचायत के सदस्य सुनील माहेश्वरी और मुरारी मिश्रा ने कई शिक्षाकर्मियों के साथ मुख्यमंत्री से लिखित शिकायत की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परीक्षा में योग्य प्रत्याशियों का नाम काटकर अपात्रों को चुन लिया गया। परीक्षा में ६३ फीसदी अंक पाने वाले गंभीर सिंह ठाकुर, ५७ फीसदी वाले शैलेंद्र कुमार गजभिये, ५७ फीसदी वाली रानी कोसले का चयन नहीं किया गया। इनसे कम अंकों वाले लोग सलेक्ट हो गए। लिखित शिकायत के बावजूद आपत्ति का निराकरण नहीं किया गया। राज्य शासन ने जिला शिक्षा अधिकारी को छत्तीसगढ़ के राजपत्र में प्रकाशित 3 सितंबर 2008 और 13 अगस्त 2008 के भर्ती नियमों के आधार पर प्रधान पाठक बनाने को कहा था। चयन प्रक्रिया में राजपत्र के कई प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।&lt;br /&gt;इसमें सीधी भर्ती और चयन से संबंधित नियमों का विस्तार से जिक्र किया गया है। चयन प्रक्रिया को देखा जाए, तो इसमें राजपत्र में दिए गए कई प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। &lt;br /&gt;ये भी गड़बड़ी &gt;&lt;br /&gt;रामकुमार चंद्राकर नाम के एक परीक्षार्थी को दो स्कूलों में प्रधान पाठक बना दिया गया। &gt; एक ऐसे शिक्षाकर्मी को प्रधान पाठक बनाया गया है, जो निलंबिन के बाद से विकास खंड शिक्षा अधिकारी धरसीवां में अटैच है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने इस शिक्षाकर्मी के आवेदन पत्र में उसके निलंबित होने का साफ जिक्र किया था। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नियम में था यह &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;1. सेवा में अभ्यर्थी का चुनाव चयन समिति द्वारा प्रतियोगी परीक्षा और साक्षात्कार के बाद किया जाना चाहिए थे। &lt;br /&gt;हुआ ये &lt;br /&gt;लिखित परीक्षा में गड़बड़ी हुई। साक्षात्कार के बिना ही प्रधानपाठकों की नियुक्ति और पोस्टिंग के आदेश जारी हो गए।&lt;br /&gt;नियम में था यह &lt;br /&gt;2. उपलब्ध रिक्त पदों में एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रमश: १६, 20 और १४ फीसदी पद रखे जाने थे। महिला के 30 फीसदी पद रखे जाने चाहिए थे।&lt;br /&gt;हुआ ये&lt;br /&gt;अनुसूचित जनजाति के लिए 20 के स्थान पर १९ फीसदी को ही आरक्षण दिया गया। रोस्टर का भी पालन ठीक से नहीं किया गया। &lt;br /&gt;नियम में था यह &lt;br /&gt;३. आयु के बारे में राजपत्र में अलग-अलग वर्ग तय किए हैं, जिसमें अधिकतम सीमा का जिक्र है। अधिकतम आयु किसी भी तरह से ४५ साल होनी चाहिए। &lt;br /&gt;हुआ ये&lt;br /&gt;लवन इलाके की एक ऐसी शिक्षाकर्र्मी को भी प्रधान पाठक बना दिया गया, जो 46 साल आठ महीने की है। नियम विरुद्ध ज्यादा उम्र के कई और शिक्षाकर्मियों को प्रधानपाठक बना दिया गया। &lt;br /&gt;नियम में था यह &lt;br /&gt;४. चयन समिति में जिला शिक्षा अधिकारी उसके अध्यक्ष होते हैं। डाइट के प्राचार्य, ब्लॉक शिक्षा अधिकारी समेत अन्य सदस्यों कौन-कौन होंगे इसका साफ जिक्र नियमों में है।&lt;br /&gt;हुआ ये&lt;br /&gt;समिति को नियमों के हिसाब से नहीं बनाया गया। ऐसे लोग रखे गए, जो विरोध नहीं कर सकते थे। डाइट के प्राचार्य को चयन समिति में लगभग बाहर रखा गया। &lt;br /&gt;नियम में था यह &lt;br /&gt;५. राज्य शासन का साफ निर्देश है कि भर्ती में मध्यप्रदेश के समय जारी जाति प्रमाणपत्रों को मान्य नहीं किया जाएगा। &lt;br /&gt;हुआ ये&lt;br /&gt;20 फीसदी से ज्यादा परीक्षार्थियों ने मध्यप्रदेश सरकार के प्रमाणपत्रों को आवेदन पत्र में लगाया। &lt;br /&gt;नियम में था यह &lt;br /&gt;संविदा शिक्षा कर्मियों को प्रधान पाठक परीक्षा में पात्रता नहीं थी। &lt;br /&gt;हुआ ये&lt;br /&gt;शिक्षा अधिकारी के बेटे समेत कई लोग संविदा शिक्षक होने के बावजूद परीक्षा में न केवल शामिल हुए, बल्कि मेरिट लिस्ट में भी उनका &lt;br /&gt;नाम आया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ठंड से 6 नवजात लकड़बग्घों की मौत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; रायपुर नंदनवन में लाए गए 6 नवजात लकड़बग्घों की अचानक मौत हो गई। उन्हें जगदलपुर जिले के एक गांव से लगे घने जंगलों से लाया गया था। इनके पालन-पोषण की यहां कोशिश की गई, लेकिन मौसम में आए अचानक बदलाव से यह बच नहीं पाए। अधिकारियों ने बताया कि जब इन्हें लाया गया तो ये महज चार दिन के थे। फिर दो हफ्ते तक ये जीवित रह पाए। मौत की खबर उच्च अधिकारियों को दे दी गई है।&lt;br /&gt;नंदनवन के अफसरों ने बताया कि लकड़बग्घों के सभी 6 बच्चे कमजोर थे। छोटे होने की वजह से ये खाना नहीं खा सकते थे। लिहाजा इन्हें गाय का दूध पिलाने की कोशिश की जा रही थी। डाक्टरों का कहना है कि दूध भी ये ठीक से पी नहीं पाते थे, इसलिए इनका शरीर और भी कमजोर होता जा रहा था। हफ्ते भर पहले जब मौसम में अचानक बदलाव आया और पारा गिरा तो इनकी पल्स धीमी पड़ने लगी। 13 दिसंबर को पहले तीन की मौत हो गई, फिर अगले ही दिन बाकी के तीन ने भी दम तोड़ दिया। उन्हें बचाने के लिए सारी कोशिशें बेकार गईं। दवाइयां भी दी गईं, लेकिन वे ठंड सह नहीं पाए। अधिकारियों ने इसकी जानकारी उच्च स्तर पर दे दी है और बाकी जानवरों की देखभाल बढ़ा दी गई है।&lt;br /&gt;ठंड नहीं बढ़ती, तो बच जाते :&lt;br /&gt;नंदनवन के वेटनरी डाक्टर डा. जयकिशोर जड़िया ने कहा कि लकड़बग्घों के नवजात बच्चे महज चार दिन के थे। इन्हें कम से कम महीने भर तक मां के दूध की जरूरत पड़ती है। इसी से उनमें ठंड से लड़ने की क्षमता विकसित करनी होती है। उन्हें गाय का दूध पिलाया जा रहा था। इतनी कम उम्र में वे इसे पचा नहीं पाते। ऐसे में अगर मौसम ने साथ दिया होता तो बच्चे शायद बच जाते। &lt;br /&gt;घायल नर लकड़बग्घा भी नहीं रहा : महासमुंद जिले के बागबहरा रोड के पास सड़क हादसे का शिकार हुआ नर लकड़बग्घा भी नहीं रहा। पांच दिन पहले उसकी भी मौत हो गई। डाक्टरों का कहना है कि उसकी कमर और पैरों की हड्डी हादसे में टूट गई थी। उसका इलाज किया गया और कुछ दिनों बाद वह स्वस्थ भी होने लगा था। ठंड बढ़ने से हड्डियों में दर्द बढ़ता गया और कमजोरी आने की वजह से उसने दम तोड़ दिया। डाक्टरों ने उसका पोस्टमार्टम कर रिपोर्ट विभाग को सौंप दी है।&lt;br /&gt;तेंदुए के शावक अब तंदरुस्त: बागबहरा के जंगलों से लाए गए दो नन्हें तेंदुए के शावक अब स्वस्थ हैं। नंदनवन का अमला रविवार को इन्हें एक बड़े पिंजरे में शिफ्ट करेगा। इसकी तैयारियां की जा चुकी हैं। इनमें से एक नर और एक मादा है।&lt;br /&gt;शुरुआत में दोनों बेहद बीमार थे। इनका बेहतर इलाज किया गया तो ये स्वस्थ्य होते गए। अब ये छोटे मांस के टुकड़े खाने लगे हैं। इन्हें मिलाकर नंदनवन में कुल आठ तेंदुए हो जाएंगे जिनमें से चार नर और बाकी मादा हैं।&lt;br /&gt;लकड़बग्घे के बच्चे सिर्फ गाय का दूध पीते थे। मरने से पहले ऐसा ही एक बीमार बच्च दूध भी नहीं पी पा रहा था।&lt;br /&gt;नवजात लकड़बग्घों को बचाने की बेहद कोशिश की गई, लेकिन वे दूध की फीडिंग नहीं कर पा रहे थे। गाय का दूध वे पचा नहीं पाते थे, जिससे उनका शरीर कमजोर होता गया और उनकी मौत हो गई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-6749969350386662361?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/6749969350386662361/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6749969350386662361'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/6749969350386662361'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_19.html' title='खास खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-1110260244592136401</id><published>2010-12-18T22:24:00.003+05:30</published><updated>2010-12-18T22:39:31.928+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की खास खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;किसको दें सम्मान, नहीं मिला किसान!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; रायपुर.छत्तीसगढ़ कृषि के क्षेत्र में भले नए मुकाम हासिल कर रहा हो पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को अब तक प्रदेश में एक भी किसान नहीं मिला, जिसे वह सम्मानित कर सके। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzoe482kuI/AAAAAAAABoA/PINaxKc9F2k/s1600/jajsahab1_f_2501_f.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzoe482kuI/AAAAAAAABoA/PINaxKc9F2k/s400/jajsahab1_f_2501_f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5552068058022318818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जबकि पं. रविशंकर शुक्ल विवि डॉ. नारायण भाई चावड़ा को खेती-किसानी में उनके बेहतरीन काम के लिए डी-लिट् की मानद उपाधि दे चुका है। 23 साल पहले स्थापित कृषि विवि का पांचवा दीक्षांत समारोह 20 जनवरी को होने जा रहा है। &lt;br /&gt;उत्तरप्रदेश और पंजाब के कृषि वैज्ञानिकों को डी-लिट् की उपाधि दी जाएगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक और केंद्रीय कृषि मंत्रालय के सचिव रहे डॉ. मंगला राय को इसके लिए चुना गया है। &lt;br /&gt;दूसरे वैज्ञानिक फिलीपींस स्थित इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. जीएस खुश हैं। दोनों ही राइस ब्रिडर हैं। कुलपति डॉ. एमपी पांडेय ने दोनों के नामों का प्रस्ताव रखा था। डॉ. मंगला राय मूलत: उत्तरप्रदेश के हैं। &lt;br /&gt;उन्होंने बनारस विवि से पीएचडी की है, जबकि डॉ. जीएस खुश की पढ़ाई पंजाब यूनिवर्सिटी की है। खुश अबतक दो सौ से ज्यादा धान की किस्में तैयार कर चुके हैं। 1967 में वे फिलीपींस चले गए थे। &lt;br /&gt;कम नहीं प्रदेश के किसान &lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में कई ऐसे किसान हैं जिनकी बराबरी किसी वैज्ञानिक से की जा सकती है। प्रदेश के किसानों ने ही अब तक धान की 23 हजार किस्में तैयार की हैं। डॉ. आरएस रिछारिया ने इसे संग्रहित कर रखा है। &lt;br /&gt;पं. रविशंकर शुक्ल विवि ने गोमची के किसान नारायण भाई चावड़ा को मानद उपाधि दी थी। उन्होंने धान सहित सब्जियों की कई किस्में विकसित की। &lt;br /&gt;दुर्ग जिले के कई किसानों को टमाटर, शिमला मिर्च, गोभी, कुंदरू सहित अन्य सब्जिी उत्पादन में दक्षता हासिल है। प्रदेश में और भी कई किसान हैं, जो नई किस्में इजाद करने में जुटे हैं, लेकिन महत्व नहीं मिलने के कारण उनका नाम पिछड़ा हुआ है। &lt;br /&gt;किसानों के नाम खारिज &lt;br /&gt;मानद उपाधि देने के लिए कृषि विवि ने अपने सभी संबंधित कालेजों और रिसर्च स्टेशन से नाम मंगाए थे। मानद उपाधि के लिए गठित समिति की बैठक में एक दर्जन नाम आए थे। इनमें जांजगीर-चांपा के किसान का भी नाम था। &lt;br /&gt;डॉ. नारायण भाई चावड़ा के नाम का भी प्रस्ताव आया, लेकिन उन्हें सिरे से खारिज कर दिया गया। कुछ अधिकारियों ने मुख्यमंत्री तो कुछ ने कृषि मंत्री के नाम आगे बढ़ाए। अंत में समिति ने सात वैज्ञानिकों के नाम प्रबंध मंडल में रखा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केवल अधिकारियों के नाम &lt;br /&gt;कृषि विवि के प्रबंध मंडल की बैठक में मानद उपाधि देने के लिए सात लोगों के नाम का प्रस्ताव अनुशंसा समिति ने रखा। ये सभी शासकीय पदों पर नियुक्त रहे हैं। इनमें दो अधिकारी डा. एसके दत्ता और डा. अरविंद कुमार आईसीएआर में पदस्थ हैं। &lt;br /&gt;आईसीएआर कृषि विश्वविद्यालयों को मानिटरिंग और अनुदान देने वाली संस्था है। बैठक में नेशनल बायोडायवर्सिटी अथारिटी चेन्नई के चेयरमेन डा. पीएल गौतम और नई दिल्ली के एग्रीकल्चरल साइंस रिक्रूटमेंट बोर्ड के चेयरमेन डा. पीडी मई का नाम भी था। &lt;br /&gt;इसमें इंदिरा गांधी कृषि विवि के पूर्व कुलपति डा. कीर्ति सिंह को मानद उपाधि देने का प्रस्ताव था। कुलपति डा. एमपी पांडेय की अध्यक्षता में डा. मंगला राय और डा. जीएस खुश को मानद उपाधि देने का निर्णय लिया गया। &lt;br /&gt;"प्रदेश में उत्कृष्ट कार्य करने वाले किसानों को भी मानद उपाधि दी जा सकती है, लेकिन किसी ने उनके नाम का प्रस्ताव नहीं दिया। "- एसआर रात्रे, कुलसचिव कृषि विवि &lt;br /&gt;"प्रबंध मंडल ने मानद उपाधि के लिए दो नामों का चयन कर लिया है। अभी प्रबंध मंडल में पारित प्रस्ताव मिनिट्स में नहीं आए हैं, इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा। "- डॉ. एमपी पांडेय, कुलपति कृषि विवि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; राज्य में बनेगा एलीफेंट रिजर्व&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; बिलासपुर.प्रदेश में हाथियों के आक्रमण से हो रहे जान-माल के नुकसान को रोकने और हाथियों को सुरक्षित स्थान पर रहने की सुविधा देने के लिए कारीडोर बनाने के साथ ही अचानकमार सहित तीन अभयारण्य को जोड़कर एलीफेंट रिजर्व बनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ राज्य वन्य जीव बोर्ड की बैठक में यह निर्णय लिया गया। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzpU9fpDnI/AAAAAAAABoI/XRyVF_9rlg8/s1600/shiv-108.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzpU9fpDnI/AAAAAAAABoI/XRyVF_9rlg8/s400/shiv-108.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5552068986954911346" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जंगली हाथियों की समस्या से निपटने के लिए वन विभाग ने रणनीति बना ली है। बैठक में वन्य जीव, जैव विविधता, बाघ संरक्षण और अन्य विषयों पर चर्चा की गई। प्रदेश के सरगुजा जिले में हाथियों के हिंसक होने से कुछ सालों में जान-माल की हानि के साथ ही वनग्रामों के रहवासियों का जीना दूभर हो गया है। &lt;br /&gt;इस समस्या से निपटने की दिशा में उपाय किए जा रहे हैं। प्रदेश के तीन ऐसे अभयारण्य जहां हाथियों की संख्या अधिक है, वहां कारीडोर बनाया जाएगा और उन्हें जोड़कर एलीफेंट रिजर्व बनाया जाएगा, जहां हाथी सुरक्षित तरीके से रह सकें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रस्ताव को कैबिनेट की अगली बैठक में रखा जाएगा। बैठक में वन मंत्री विक्रम उसेंडी, डीजीपी विश्वरंजन, मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक रामप्रकाश, वन्य प्राणी विशेषज्ञ डॉ. सुशांत चौधरी, नितिन देसाई, प्राण चड्डा, संदीप पौराणिक, हाथी विशेषज्ञ डा. पीएस ईशा, एसजी चौहान सहित अन्य सदस्य शामिल हुए। &lt;br /&gt;इसी तरह हाथियों की समस्याओं से निपटने के लिए बोर्ड के सदस्यों के सुझाव पर एक उप समिति गठित करने का निर्णय लिया गया। इसमें हाथी विशेषज्ञ, वन विभाग के अधिकारी और संबंधित क्षेत्र के स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। &lt;br /&gt;केरल और कर्नाटक की तर्ज पर यहां ऐसे क्षेत्रों में जहां हाथियों का आवागमन सर्वाधिक होता हैं, वहां लगभग एक सौ किलोमीटर क्षेत्र में सोलर पॉवर फेंसिंग लगाई जाएगी। विशेषज्ञों ने बताया कि इन सोलर पॉवर फेंसिंग से वन्य प्राणियों को केवल हल्का झटका लगता है व विशेष हानि नहीं होती है। &lt;br /&gt;फेंसिंग के समानांतर हाथी अवरोधक खाई बनाई जाएगी, जिससे जन-धन हानि कम की जा सके। बैठक में उपस्थित विशेषज्ञों द्वारा सुझाव दिया गया कि हाथी आवागमन के गलियारे में धान और गन्ने की फसल के स्थान पर मिर्च, अदरक सहित अन्य नगदी फसलें ली जाएं जिसे हाथी नुकसान ना पहुंचा सकें। &lt;br /&gt;बैठक में अचानकमार से होकर गुजरने वाली सड़क को आवागमन के लिए बंद नहीं करने पर भी सदस्यों ने चिंता जताई। बैठक में मांग की गई कि अचानकमार से होकर गुजरने वाली सड़क की जगह रतनपुर, केंदा, मझपानी, केंवची से होकर जाने वाले वैकल्पिक मार्ग को दुरस्त कर चालू किया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगली भैंसे के संरक्षण की बनी योजना&lt;br /&gt;राज्य पशु जंगली भैंसों के संरक्षण के लिए अंजोरा स्थित पशु चिकित्सा महाविद्यालय में उपलब्ध अत्याधुनिक तकनीक की सहायता लेने का निर्णय लिया गया। बैठक में बताया गया कि जंगली भैंसों का जेनेटिक प्रोफाइल विश्लेषण सेन्टर फॉर सेलुलर एवं मॉलीक्यूलर बॉयलाजी हैदराबाद में कराया गया, वहां की रिपोर्ट में वनभैंसे की प्रजाति सर्वाधिक शुध्द नस्ल का बताया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुशल वकीलों का पैनल बनेगा&lt;br /&gt;प्रदेश में वन्य प्राणियों से संबंधित अपराधों पर अंकुश लगाने और वन अपराधियों को कड़ी सजा दिलाने के लिए वन विभाग की ओर से कुशल वकीलों का पैनल तैयार करने का निर्णय लिया गया। &lt;br /&gt;बैठक में बताया गया कि अचानकमार टाइगर रिजर्व के छह गांवों को नजदीक स्थित बसाहटों में व्यवस्थापित किया गया है और प्रति परिवार उनके विकास के लिए दस लाख रुपए खर्च किए गए। वर्ष 2010-11 में इसके लिए 7.24 करोड़ रुपए की राशि दी गई।&lt;br /&gt;बार नवापारा अभयारण्य में स्थित तीन गांवों के व्यवस्थापन की कार्ययोजना भी बना ली गई है। अचानकमार टाइगर रिजर्व और सीतानदी-उदंती अभयारण्य में रिक्त पदों को शीघ्र भरने के निर्देश दिए गए।&lt;br /&gt;कोटमी सोनार में बढ़ी मगरमच्छों की संख्या&lt;br /&gt;राज्य वन्य जीव बोर्ड की बैठक में जानकारी दी गई कि कोटमी सोनार में एक ही तालाब में रखे गए मगरमच्छों की संख्या बढ़ने के कारण उनके हिंसक होने का खतरा बढ़ गया है। &lt;br /&gt;सौ से अधिक मगरमच्छ होने के कारण उनसे आसपास के स्थानों में रहने वाले लोगों पर आक्रमण करने का खतरा बढ़ गया है। इन पर निगरानी रखने के लिए ग्रामीणों का सहयोग लेने का भी निर्णय लिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गिरौदपुरी जैतखाम होगा यूनेस्को की विश्व धरोहरों के समकक्ष&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt; रायपुर.छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 145 किलोमीटर की दूरी पर अठारहवीं सदी के महान समाज सुधारक गुरू बाबा घासीदास की जन्म भूमि और तपोभूमि गिरौदपुरी में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के जरिए बन रहा 243 फीट की ऊंचाई का जैतखाम दुनिया में आधुनिक भारतीय इंजीनियरिंग प्रतिभा का एक शानदार उदाहरण होगा।&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित लगभग आठ सौ वर्ष पुराना 237.8 फीट (72.5 मीटर) ऊंची कुतुब मीनार भारतीय इतिहास और पुरातत्व की बहुमूल्य धरोहर के रूप में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्मारक सूची में शामिल है, जिसकी ऊंचाई छत्तीसगढ़ के गिरौदपुरी में 51 करोड़ रूपए से भी अधिक लागत से बन रहे विशाल जैतखाम से लगभग पांच मीटर कम है। गिरौदपुरी में छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बनवाए जा रहे इस गगन चुम्बी जैतखाम की ऊंचाई 243 फीट (करीब 77 मीटर) होगी।&lt;br /&gt;इस प्रकार कुतुब मीनार से करीब पांच मीटर ऊंचे इस जैतखाम का निर्माण पूर्ण होने पर इसकी गिनती भी इतिहास और आधुनिक स्थापत्य कला की दृष्टि से दुनिया की एक अनमोल धरोहर के रूप में होने लगेगी और यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्मारकों के समकक्ष आ जाएगा। &lt;br /&gt;सतनाम पंथ के प्रवर्तक बाबा गुरू घासीदास का जन्म गिरौदपुरी में लगभग ढाई सौ साल पहले, 18 दिसम्बर 1756 को हुआ था।&lt;br /&gt;उन्होंने इसी गांव के नजदीक छाता पहाड़ में कठिन तपस्या की और अपने आध्यात्मिक ज्ञान के जरिए देश और दुनिया को सत्य, अहिंसा, दया, करूणा, परोपकार जैसे सर्वश्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की शिक्षा देकर सत्य के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।&lt;br /&gt;इसके फलस्वरूप यह गांव विशेष रूप से छत्तीसगढ़ की जनता की आस्था का प्रमुख केन्द्र बन गया, जहां बाबा घासीदास के महान विचारों के साथ-साथ उनकी यश-कीर्ति को जन-जन तक पहुंचाने और दूर-दूर तक फैलाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में राज्य सरकार के लोक निर्माण विभाग ने गिरौदपुरी में करीब तीन वर्ष पहले कुतुब मीनार से भी ऊंचे इस विशाल जैतखाम का निर्माण शुरू किया था, जो अब तेजी से पूर्णता की ओर अग्रसर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;खेती में राष्ट्रीय औसत से आगे है छत्तीसगढ़ प्रदेश&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देश की औसत रफ्तार से काफी आगे चल रहा है। छत्तीसगढ़ में कृषि पांच प्रतिशत की दर से आगे बढ़ रही है जबकि राष्ट्रीय औसत तीन प्रतिशत है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzqethHScI/AAAAAAAABoQ/DsdiuCyooGk/s1600/bitia.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzqethHScI/AAAAAAAABoQ/DsdiuCyooGk/s400/bitia.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5552070253976439234" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राज्य निर्माण के बाद खेती में जबर्दस्त बदलाव आया है। यही वजह है कि राज्य निर्माण के समय की कुल पैदावार 58 लाख 27 टन अब बढ़कर 80 लाख टन से अधिक हो गई है।&lt;br /&gt;प्रदेश की 80 फीसदी आबादी की अर्थव्यवस्था खेती से ही संचालित होती है। छत्तीसगढ़ में इस समय करीब 44 लाख हेक्टेयर में खेती हो रही है। इसमें धान का रकबा करीब 35 लाख हेक्टेयर है। खेती के क्षेत्र में रमन सरकार के पिछले सात सालों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। &lt;br /&gt;उन्नत तकनीक पर काम हुआ है और किसानों को आधुनिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया गया है। सरकार ने किसानों की मानसून पर निर्भरता कम करने की दिशा में कई अहम निर्णय लिए। &lt;br /&gt;इसको इन आंकड़ों से भी समझा जा सकता है कि जब राज्य बना तब छत्तीसगढ़ मे मात्र 72 हजार सिंचाई पंप कनेक्शन थे लेकिन आज राज्य के 2 लाख 40 हजार से अधिक किसानों के पास सिंचाई पंप हैं। &lt;br /&gt;सिंचाई का रकबा बढ़ाने की दिशा में भी ठोस काम हुआ। इसके चलते सिंचित क्षेत्र 23 से बढ़कर 31 प्रतिशत से अधिक हो गया है। राष्ट्रीय औसत 48 प्रतिशत की ओर यह तेजी से बढ़ रहा है।&lt;br /&gt;सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की ठोस व्यवस्था किए जाने के कारण किसानों के मन में खेती के प्रति उत्साह बढ़ा है। पिछले साल 40 लाख टन खरीदने के बाद इस वर्ष किसानों से 50 लाख टन धान खरीदने का लक्ष्य रखा गया है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सबसे कम ब्याज दर पर ऋण :&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;सरकार ने किसानों को तीन प्रतिशत की किफायती ब्याज दर पर लोन देने की व्यवस्था की है। यह कृषि ऋण खरीफ एवं रबी की विभिन्न फसलों के बीज, खाद, कृषि यंत्र सहित पौध संरक्षण, औषधि आदि के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। &lt;br /&gt;यह सुविधा वित्तीय वर्ष 2008-09 से दी जा रही है। किसानों को इतनी कम ब्याज दर पर खेती के लिए ऋण सुविधा देने वाला छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नदियों के पानी को रोकने के उपाय&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ में नदियों का पानी काफी मात्रा में बह जाता है। इस पानी को रोककर खेतों की प्यास बुझाने की दिशा कदम उठाए गए हैं। बड़ी सिंचाई परियोजनाओं की मंजूरी में समय लगता है, इस कारण नदियांे पर छोटे-छोटे एनीकट बनाकर पानी रोकने का इंतजाम किया जा रहा है। &lt;br /&gt;ऐसे 593 एनीकट बनाने का निर्णय लिया जा चुका है। इनमें से करीब एक तिहाई बन चुके हैं। इनके अलावा लघु सिंचाई योजनाओं को सरकार हाथ में ले रही है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लघु सिंचाई योजनाओं की भागीदारी&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राज्य में सर्वाधिक 70 प्रतिशत सिंचाई नहरों से होती है। वर्षा की अनिश्चितता, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि परिस्थितियों से निपटने और तालाबों और कुंओं से सिंचाई रकबे में बढ़ोतरी के लिए सिंचाई के नये साधनों के रूप में कुंआ, छोटे तालाब, नलकूप सहित सिंचाई की छोटी परियोजनाओं पर भी तेजी से काम हुआ है। &lt;br /&gt;लघु सिंचाई नलकूप योजना के तहत 22 हजार 207 नलकूप खनन कर पम्प स्थापना के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई है।&lt;br /&gt;"कृषि की विकास दर को बनाए रखना बड़ी चुनौती है। इस दर को आगे बढ़ाने के उपाय किए जा रहे हैं। इसके लिए एलायड सेक्टर पर भी काम किया जा रहा है। इसमें पशुधन विकास भी शामिल है।"&lt;br /&gt;चंद्रशेखर साहू,कृषि मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-1110260244592136401?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/1110260244592136401/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_18.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1110260244592136401'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1110260244592136401'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_18.html' title='छत्तीसगढ़ की खास खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQzoe482kuI/AAAAAAAABoA/PINaxKc9F2k/s72-c/jajsahab1_f_2501_f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-1145933190948841146</id><published>2010-12-14T22:43:00.000+05:30</published><updated>2010-12-14T22:48:34.039+05:30</updated><title type='text'>इंटरनेट से मनोरंजन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;इंटरनेट ने बदले मनोरंजन के मायने&lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;- वंदना &lt;br /&gt;आप दुनिया के किसी भी हिस्से में जाएँ सिनेमा ऐसा नशा है जिसका जादू सर चढ़कर बोलता है। इंटरनेट यानी तारों का जाल और इस जाल से मनोरंजन की दुनिया भी बच नहीं पाई हैं। फिल्म और संगीत के रिलीज से लेकर उसके प्रदर्शन और प्रचार तक के कई पहलूओं को इंटरनेट ने बदल कर रख दिया है।&lt;br /&gt;यहाँ तक कि यू ट्यूब से लोगों को हॉलीवुड-बॉलीवुड में ब्रेक मिल रहा है। इंटरनेट विज्ञापनों की भी नई दुनिया बन गई है। आजकल तो फिल्म रिलीज हुई नहीं कि लोग उसकी प्राइरेटिड कॉपी तुरंत ही अवैध तरीके से इंटरनेट के जरिए यू ट्यूब पर डाल देते हैं और घर पर बैठे-बैठे ही फिल्म देख लेते हैं-फर्स्ट डे फर्स्ट शो।&lt;br /&gt;फिल्म पा के रिलीज के दिन हिंदी फिल्मों के शहंशाह अमिताभ बच्चन के साथ क्या हुआ वे खुद बताते हैं, 'पा जिस दिन रिलीज हुई उसी दिन किसी ने ये फिल्म यू ट्यूब पर डाल दी। हमने यू ट्यूब को कई नोटिस भेजे। वे फिल्म इंटरनेट से हटा देते थे, लेकिन तुरंत कोई फिल्म दोबारा अपलोड कर देता था। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करना चाहिए।'&lt;br /&gt;यहाँ मानो अमिताभ भी कहते नजर आए कि इंटरनेट के जाल से निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमिकन-सा है।&lt;br /&gt;वेबसाइट पर देखिए फिल्में और सिरीयल: इंटरनेट तो मानो अब ऐसा पिटारा बन गया हैं जहाँ आप जो चाहें जब चाहें देख सकते हैं। इसी बाजार का फायदा उठाने के लिए कई कंपनियों ने अपनी-अपनी बेबसाइटें खोली हैं। &lt;br /&gt;'मैंने प्यार किया' और 'हम आपके हैं कौन' जैसी सुपरहिट फिल्में बनाने वाले राजश्री बैनर ने भी अब इस दिशा में कदम बढ़ाएँ हैं और राजश्री डॉट कॉम खोला है। इतने बड़े बैनर ने आखिरकार क्या सोचकर इंटरनेट और ऑनलाइन की दुनिया में कदम रखा।&lt;br /&gt;राजश्री मीडिया के मैनेजिंग डाइरेक्टर और सीईओ रजत बड़जात्या कहते हैं, 'हमने देखा कि कई फिल्में लोग अवैध तरीके से इंटरनेट पर डाल रहे थे, पाइरेसी हो रही थी और लोग देख भी रहे थे। तभी हमने सोचा कि क्यों न हम खुद ये काम करें ताकि लोग लीगल या वैध तरीके से ये फिल्में देख पाएँ। बहुत सारी फिल्में मुफ्त में देख सकते हैं। अगर कोई इसे डाउनलोड करना चाहता है तो वो उसे चंद डॉलर की फीस देकर डाउनलोड भी कर सकता है।&lt;br /&gt;रजत बड़जात्या बताते हैं कि कुछ साल पहले राजश्री की फिल्म विवाह इंटरनेट पर रिलीज की गई थी जिसकी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली। इसके बाद राजश्री ने जी, स्टार, यू ट्यूब वगैरह से पार्टरनशिप की जो धारावाहिक भी उनकी वेबसाइट पर डालते हैं। यहाँ तक कि बीबीसी मोशन गैलरी से कुछ वीडियो और रिपोर्टें भी इस बेवसाइट पर हैं जो कहीं- कहीं ही देखने को मिलती है।&lt;br /&gt;वे कहते हैं, 'राजश्री की वेबसाइट खोलने का दूसरा कारण है कि आने वाले कल में लैपटॉप, आईपॉड जैसे उपकरण लोगों के हाथों में जा रहे हैं। इंटरनेट के ज़रिए इन्हीं पर लोग फिल्में देखेंगे। तो हमने डिजिटल वेंचर खोला और यू ट्यूब पर हमारे 11 चैनल हैं अलग-अलग भाषाओं में।'&lt;br /&gt;इरोस इंटरनेशनल ने भी ऐसी ही वेबसाइट शुरू की हुई है। यकीन मानिए ऐसी वेबसाइटें किसी भी फिल्म प्रेमी के लिए किसी खजाने से कम नहीं। देवदास शाहरुख से लेकर दादा मुनी अशोक कुमार तक की फिल्में, सिरीयल आप यहाँ देख सकते हैं।&lt;br /&gt;आप सोचेंगे कि इससे इन वेबसाइटों को क्या फायदा। रजत बड़जात्या बताते हैं, 'मुनाफा हमें विज्ञापनों से मिलता है जो इंटरनेट पर कंपनियाँ हमारी वेबसाइट पर डालती हैं। फिर फिल्में आदि डाउनलोड करने के लिए लोग फीस देते हैं। उससे भी आमदनी होती है। तीसरा जरिया है कि हमारा यूट्यूब, अमेजॉन वगैरह से अनुबंध है जो हमारे फिल्में, सिरीयल लेते हैं। यू ट्यूब पर हमारे 21.5 करोड़ वीडियो डाले हुए हैं। &lt;br /&gt;यू ट्यूब से मिली हॉलीवुड फिल्म: इंटरनेट ने फिल्म रिलीज करने का तरीका भी बदल दिया है। रंग दे बसंती से मशहूर हुए अभिनेता सिद्धार्थ की हिंदी फिल्म स्ट्राइकर पिछले महीने थिएटरों के साथ-साथ पूरी दुनिया में एक साथ इंटरनेट पर रिलीज हुई (भारत को छोड़कर)।&lt;br /&gt;जब भारत में लोग इंटरवल के दौरान पॉपकॉर्न खरीद रहे थे तो उसी दौरान हीरो साहब ऑनलाइन थे और दुनिया भर के उन फैन्स के साथ चैट कर रहे थे जो फिल्म को रिलीज के दिन विभिन्न देशों में ऑनलाइन देख रहे थे और ये इंटरनेट का ही कमाल था।&lt;br /&gt;इंटरनेट ने दुनिया के सामने अपनी सृजनशीलता दिखाने के भी नए दरवाजे खोल दिए हैं। जरा इस किस्से पर गौर कीजिए। उरुग्वे के एक निर्माता फेडे अल्वारोज ने पिछले साल नवंबर में करीब पाँच मिनट की एक लघु फिल्म बना यू ट्यूब पर अपलोड की। और चंद दिन बाद उन्हें हॉलीवुड के लिए फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिल गया।&lt;br /&gt;बीबीबी से बातचीत में अल्वरारोज बताते हैं, 'मेरी इस हॉलीवुड फिल्म को प्रायोजित करेंगे सैम राइमी जो स्पाइरमैन और एवल डेड जैसी फिल्में बान चुके हैं। ये अदभुत था, हम सब चकित थे। अगर कोई निर्देशक यू ट्यूब पर इंटरनेट के जरिए फिल्म डालकर हॉलीवुड की फिल्म हासिल कर सकता है तो फिर ये किसी के लिए भी मुमकिन है।'&lt;br /&gt;वहीं नई अभिनेत्री और शक्ति कपूर की बेटी श्रद्धा को तीन पत्ती में अपना पहला रोल इंटरनेट के जरिए ही मिला। निर्माता ने उनकी तस्वीरें फेसबुक पर देखीं और बुला लिया ऑडिशन के लिए।&lt;br /&gt;संगीत और इंटरनेट: संगीत के क्षेत्र में भी इंटरनेट के कारण नए प्रयोग हो रहे हैं। गायक लकी अली ने अपनी ताजा एल्बम सीडी के जरिए नहीं बल्कि ऑनलाइन बाजार में रिलीज की है।&lt;br /&gt;क्यों, खुद लकी बताते हैं, 'दरअसल जब आप सीडी रिलीज करते हैं तो उसमें रिकॉर्ड कंपनियाँ शामिल हो जाती हैं। लेकिन गायक को पूरा फायदा नहीं मिलता। वो सोचता रह जाता है कि एलबम की बिक्री तो अच्छी है फिर मुझे पैसे क्यों नहीं दे रहे। आपको सिस्टम से लड़ना पड़ता है, हिसाब माँगना पड़ता है। ये कलाकार की फितरत नहीं है कि वो हिसाब माँगे। मैं नाम नहीं लूँगा पर मेरा अनुभव कंपनियों के साथ अच्छा नही रहा। इसिलए मैंने इस बार एलबम ऑनलाइन रिलीज की।' &lt;br /&gt;इस माया जाल का एक बड़ा नुकसान ये जरूर है कि इंटरनेट पर बिना कानूनी अधिकार के लोग अवैध रूप से दूसरों की फिल्में, गाने और दूसरी चीजें डाउनलोड करते हैं, लेकिन हर सिक्के के दो पहलू तो होते ही हैं।&lt;br /&gt;राजश्री के रजत बड़जात्या कहते हैं कि जल्द ही तारों का ये जाल इतना फैल जाएगा कि लोग अपने कंप्यूटर पर ही नहीं अपने मोबाइल, टीवी और यहाँ तक की घड़ियों जैसे उपकरणों पर भी इंटरनेट के जरिए फिल्में देख पाएँगे।&lt;br /&gt;अपनी बात समेटते हुए वे बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं कि मनोरंजन जगत में भविष्य का माध्यम इंटरनेट ही है और इस क्षेत्र में बहुत कुछ नया होना अभी बाकी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-1145933190948841146?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/1145933190948841146/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/%E0%A4%87%E0%A4%9F%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%9F-%E0%A4%B8-%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%A8.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1145933190948841146'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1145933190948841146'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/%E0%A4%87%E0%A4%9F%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%9F-%E0%A4%B8-%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%A8.html' title='इंटरनेट से मनोरंजन'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-7460934310533239484</id><published>2010-12-13T23:05:00.001+05:30</published><updated>2010-12-13T23:07:17.642+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;strong&gt;मुफलिसी के गुबार से निकली हौसलों की उड़ान &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQZZonFG3vI/AAAAAAAABlU/4Rq6Jidr9xg/s1600/Eye.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 332px; height: 237px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQZZonFG3vI/AAAAAAAABlU/4Rq6Jidr9xg/s400/Eye.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5550222145000759026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हाल के खेल आयोजनों में महिला खिलाड़ियों का प्रदर्शन आशा से अधिक कामयाब रहा है। वे किसी बड़े शहर से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे गांवों और कस्बों से निकली हैं। घर में ही नहीं, खेल के मैदान में भी उन्हें दोहरा संघर्ष करना पड़ता है, इस बार पेश है इन जांबाज लड़कियों की दास्तान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घना जंगल, नंगे पैर ही स्कूल जाया करती थी&lt;br /&gt;अश्विनी चिदानंदा अकुंजी (400 मी. बाधा और 4 गुणा 400 मीटर रिले-स्वर्ण)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से तीन किलोमीटर दूर था अश्विनी का स्कूल। पिता किसान हैं। घर कर्नाटक के उडुपी जिले के कुंडापुरा के जानसेल गांव में हैं। घर के चारों ओर घना जंगल है। बेटी रोजाना नंगे पैर ही स्कूल जाया करती थी। ऊबड़-खाबड़ सड़कों से होते हुए मस्ती-मस्ती में रोजाना तीन किलोमीटर स्कूल जाना और वहां से वापस आना अश्विनी की दिनचर्या थी। अश्विनी की इसी दिनचर्या ने उसे इतना मजबूत बना दिया है कि वह एक सफल एथलीट बन कर उभरीं। पिता के साथ गाय चराने के लिए भी जंगल में जाया करती थी अश्विनी। गायों को पकड़ने के लिए दौड़ लगाना भी उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में शुमार था। अचानक एक दिन अश्विनी के पिता के दोस्त ने उसे एथलेटिक्स में करियर बनाने का सुझाव दिया। हां, दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों से पहले तक अश्विनी की कोई पहचान नहीं थी। इसके बाद एशियाई खेलों में तो अश्विनी चिदानंदा सितारे के समान उभर कर सामने आईं। इतना ही नहीं अश्विनी के परिवार वाले तो कॉमनवेल्थ खेलों में उसकी सफलता को टी.वी. पर भी नहीं देख पाए थे। क्योंकि उस समय घर में बिजली नहीं थी। काफी मुफलिसी में जीवन बिताया है अश्विनी ने। खाने के लिए उसे सिर्फ सब्जियां या फिर चावल का पानी ही मिलता था। &lt;br /&gt; प्रस्तुति-संजीव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जूते तक खरीदने को पैसे नहीं थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता राउत&lt;br /&gt;(10 हजार मीटर-रजत पदक)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता की सफलता की कहानी भी काफी रोमांचक है। कविता नासिक के पास के ट्राइबल क्षेत्र से हैं। कविता ने दौड़ना इसलिए शुरू किया था क्योंकि इसके लिए पैसे की जरूरत नहीं थी और बिना जूते पहने दौड़ा जा सकता था। यहां तक कि एक समय उनके पास जूते तक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहावत है कि असली भारत गांवों में ही बसता है। अन्य मामलों में यह कहावत कितनी सच है पता नहीं लेकिन खेलों के मामले में जरूर सोलह आने सच साबित हो रही है। दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेल हों या फिर हाल ही में ग्वांगझू, चीन में सम्पन्न हुए एशियाई खेल। गांवों की पृष्ठभूमि से निकले और मुफलिसी में जीवन गुजारने वाले एथलीटों ने भी खूब तिरंगा लहराया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एशियाई खेलों में भारत की शानदार सफलता में महिला एथलीटों की खास भूमिका रही है। वे किसी बड़े शहर से नहीं थीं बल्कि छोटे-छोटे गांवों और कस्बों से निकली हैं। ट्रैक एंड फील्ड में महिला एथलीटों की सफलता का ग्राफ 1986 से चढ़ना शुरू हुआ। 1986 से पहले के चार एशियाई खेलों में भारतीय पुरुष एथलीटों का ही दबदबा था। पुरुषों ने जहां 56 पदक जीते थे, वहीं महिला एथलीट सिर्फ बारह। 1986 से 2006 दोहा एशियाई खेलों तक जहां पुरुष एथलीटों ने केवल 16 पदक जीते थे, वहीं महिला एथलीटों ने 40 पदक अपने नाम किए। यही सिलसिला 2010 एशियाई खेलों में भी जारी रहा। भारतीय महिला एथलीटों के शानदार प्रदर्शन से खेल की दुनिया के लोग चकित रह गए। एथलेटिक्स में मिले 11 में से 10 पदक महिला एथलीटों के खाते में गए। इतना ही नहीं पांच स्वर्ण पदकों में से 4 स्वर्ण पदक तो हमारी इन छोटे-छोटे कस्बों और गांवों से निकली महिला एथलीटों ने अपने नाम किए। एथलेटिक्स में भारत को स्वर्ण दिलाए प्रीजा श्रीधरन (10 हजार मीटर रेस), सुधा सिंह (3000 मीटर स्टीपलचेज), अश्विनी चिदानंदा अकुंजी (400 मीटर बाधा और 4 गुणा 400 मी रिले) ने। इन तीनों ही एथलीटों की सफलता की कहानी बड़ी ही दिलचस्प और परिस्थितियों के खिलाफ एलान-ए-जंग है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-7460934310533239484?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/7460934310533239484/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/400.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7460934310533239484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/7460934310533239484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/400.html' title=''/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQZZonFG3vI/AAAAAAAABlU/4Rq6Jidr9xg/s72-c/Eye.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-2080002997997976414</id><published>2010-12-12T22:03:00.001+05:30</published><updated>2010-12-12T22:11:57.998+05:30</updated><title type='text'>छत्तीसगढ़ की खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;चुनाव में हेलिकॉप्टर का प्रयोग&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;रायपुर। नगरीय निकाय चुनाव ठीक तरह से करवाने के लिए निर्वाचन आयोग तैयारियों में जुटा है। कहीं पर आसानी से चुनाव हो जाएंगे तो कहीं सुरक्षा बलों के साथ ही हेलीकाप्टर का उपयोग भी करना पड़ सकता है। यानी आयोग जमीन से लेकर आसमान तक एहतियाती इंतजाम कर रहा है। निकाय चुनाव में सात लाख वोटरों के लिए 956 बूथों का इंतजाम किया गया है। 13 स्थानों पर वोटिंग 21 व बैकुंठपुर में 23 दिसंबर को होगी।&lt;br /&gt;नक्सल प्रभावित बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर और बीजापुर जिलों में भी चुनाव हो रहे हैं। निर्वाचन आयुक्त पी.सी. दलेई का कहना है कि चुनाव सीमित मैदानी इलाके में है इस वजह से परेशानी की संभावना नहीं है। फिर भी जरूरत पड़ी तो अलग से बल उपलब्ध करा दिया जाएगा। शासन ने बस्तर में पुलिस को हेलीकाप्टर दे रखा है। जरूरी हुआ तो उसका उपयोग किया जा सकेगा। पूर्व में हुए पंचायत चुनावों में कुछ स्थानों के लिए हेलीकाप्टर का उपयोग किया गया था। एक नगर निगम, छह नगर पालिक परिषद, सात नगर पंचायतों में आम निर्वाचन तथा कुछ वार्डो के लिए उपचुनाव हो रहे हैं। &lt;br /&gt;आयोग ने करीब सात लाख वोटरों के लिए 956 बूथों का इंतजाम किया है। 13 स्थानों पर वोटिंग 21 व बैकुंठपुर में 23 दिसंबर को होगी। इसके लिए 1050 मतदान दल बनाए गए हैं। लगभग इतने ही वाहनों का इंतजाम किया जा रहा है । मतगणना 24 व 26 दिसंबर को होगी। इसके लिए अलग से अफसरों व कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जा रही है। महापौर या अध्यक्ष तथा पार्षद के लिए अलग-अलग रंग के मतपत्र छपवाए जा रहे हैं। 1200 से अधिक मतपेटियों से धूल झाड़कर दुरुस्त कर लिया गया है। &lt;br /&gt;वोटिंग से पहले और नतीजों तक निर्वाचन आयोग की कड़ी परीक्षा होती है। तय समय पर चुनाव कराने समूचा अमला विभिन्न प्रकार की तैयारी में लग जाता है। थोड़ी सी भी चूक उसकी विश्वसनीयता पर बट्टा लगा सकती है इस वजह से फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जनता की सड़क भी हुई भू-माफियाओं के हवाले&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt; रायपुर।राजधानी के भाठागांव राजस्व निरीक्षक मंडल क्षेत्र में आने वाले महामाया वार्ड स्थित भैया तालाब से लगी निस्तारी और सरकारी जमीन पर कब्जा किया जा रहा है। रहवासियों का आरोप है कि भू-माफियाओं ने कुछ जमीन तो कब्जा कर बेच भी दी और अब उस पर लोग घर बनाकर रहने लगे हैं। &lt;br /&gt;उनका यह भी कहना है कि निस्तारी की जमीन के अलावा सड़क को भी बेचा जा रहा है। इसके कारण अब यहां की सड़क सिर्फ राजस्व विभाग के नक्शे में ही शेष रह गई है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT4zxZJbhI/AAAAAAAABk8/vlGGIcYQck0/s1600/shiv-108.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT4zxZJbhI/AAAAAAAABk8/vlGGIcYQck0/s400/shiv-108.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5549834209143123474" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; इन्वेस्टीगेशन में यह भी सामने आया कि जब यह क्षेत्र विकसित नहीं हुआ था तब यहां श्मसान घाट हुआ करता था। इसके बाद भी प्रशासन की लापरवाही के कारण यहां की जमीन पर लगातार कब्जे हो रहे हैं। इसकी शिकायत नगर निगम आयुक्त से लेकर जिला प्रशासन के एस.डी.एम. तक की जा चुकी है, लेकिन कार्रवाई के बजाय वे अधिकारी चिट्ठी-पत्री में ही मामले को उलझाए हुए हैं। दो माह बाद भी अब तक जिम्मेदारों ने मौके पर जाकर वस्तुस्थिति का जायजा नहीं लिया है। &lt;br /&gt;भैया तालाब के पास से शुरू होने वाली यह सड़क राजस्व विभाग के नक्शे में 40 फीट चौड़ी है। जबकि हकीकत में सड़क का अता-पता नहीं है। ऐसे में पुरानी बस्ती के लोगों को भैया तालाब क्षेत्र में आने-जाने के लिए बूढ़ा तालाब के पास से घूमकर जाना पड़ता है। इससे पांच कि.मी. का अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;35 लाख के झगड़े में बंद हुई सफाई&lt;/strong&gt;    &lt;br /&gt; रायपुर। रायपुर नगर निगम और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पी.एच.ई.) के बीच उपजा एक विवाद आने वाले दिनों में राजधानी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। जड़ में है ड्रेनेज सिस्टम जिसके मैंटेनेंस का पैसा न मिलने के कारण पी.एच.ई. अफसरों ने हाथ खड़े कर दिए हैं। उन्होंने अब निगम को ही इसका जिम्मा संभालने को कह दिया है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT5NURBmJI/AAAAAAAABlE/eGlkk5hLBeM/s1600/shiv-108.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT5NURBmJI/AAAAAAAABlE/eGlkk5hLBeM/s400/shiv-108.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5549834648001026194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दो विभागों के बीच जारी विवाद इस कदर बढ़ गया है कि चार महीने से रायपुर शहर का अंडरग्राउंड ड्रेनेज सिस्टम ठप है। अब तो खमतराई और टिकरा पारा स्थित उन पंपिंग स्टेशन पर भी ताला जड़ा जा चुका है जहां लगी मशीनों से सीवेज को बाहर पहुंचाया जा रहा था।&lt;br /&gt;हमारे शहर के प्रति अधिकारियों के इस लापरवाह रवैये को देखते हुए डीबी स्टार टीम ने इन्वेस्टीगेशन किया। सामने आया कि पी.एच.ई. ने नगर निगम के सिस्टम को चलाने के लिए इस साल 44 लाख 50 हजार रुपए का प्रस्ताव बनाकर भेजा था। 10 मई को निगम प्रशासन ने इसमें से महज १क् लाख रुपए का चेक जारी किया, यह राशि जुलाई में ही खत्म हो गई। इसके बाद दोनों जिम्मेदार विभागों के अफसरों में बकाया को लेकर विवाद गहरा गया। &lt;br /&gt;मामले ने इतना तूल पकड़ा कि पी.एच.ई. कार्यपालन अभियंता ओंकेश चंद्रवंशी ने नगर निगम कार्यपालन अभियंता ए.के. माल्वे को समूची व्यवस्था ही हस्तांतरण करने को लेकर पत्र भेज दिया। विवाद चरम पर है, ड्रेनेज सिस्टम ठप है, अधिकारी चिट्ठी-पत्री कर रहे हैं और इसकी खबर महापौर किरणमयी नायक तक को नहीं है। जब टीम ने उन्हें इन हालात से रूबरू करवाया तो वे चौंक गईं। पूछने लगीं- क्या शहर का अपना कोई ड्रेनेज सिस्टम भी है।&lt;br /&gt;नगर निगम और पी.एच.ई.अफसरों के बीच ड्रेनेज सिस्टम चलाने को लेकर एक साल से विवाद जारी है। पंपिंग स्टेशन पर ताले जड़े जा चुके हैं, इसके बाद भी जिम्मेदारों ने महापौर को जानकारी तक देना मुनासिब नहीं समझा। डीबी स्टार टीम जब इस मसले पर बात करने के लिए उनसे मिली तो महापौर किरणमयी नायक बोलीं- कौन सी लाइन, कहां है, आप क्या बात कर रहे हैं, मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा। &lt;br /&gt;जब उन्हें दस्तावेज और २२ साल पुराने ड्रेनेज सिस्टम का नक्शा दिखाया गया तो वे भी चौंक गईं। इसके बाद बोलीं- मुझे तो मेरे स्टाफ ने कभी इसके बारे में बताया ही नहीं। फिर निगम में जिस अधिकारी के जिम्मे यह व्यवस्था है को फोन कर वस्तुस्थिति के बारे में पूछा। बोलीं- समस्या को लेकर इसकी फाइलें मंगवाकर बैठक लेती हूं। वस्तुस्थिति जानूंगी कि आखिर कैसे शहर को संकट से उबारा जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राहुल और पार्वती को मिलेगा राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; बिलासपुर.अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों की जान बचाने वाले राहुल और पार्वती को राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिलेगा। गणतंत्र दिवस पर देश की राजधानी दिल्ली में होने वाले समारोह में राष्ट्रपति के हाथों उन्हें यह सम्मान मिलेगा।&lt;br /&gt;साहस का परिचय देने वाले बच्चों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिया जाता है। इसके लिए इस वर्ष जिले के दो बच्चों का चयन किया गया है। इसमें से राहुल र्कुे बिलासपुर के मंगला घाट, छोटी कोनी के रहने वाला है, वहीं पार्वती गौरेला विकासखंड में ग्राम कोटरिया की रहने वाली है। &lt;br /&gt;दोनों को 26 जनवरी 2010 को राजधानी रायपुर में आयोजित समारोह में राज्य वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।भास्कर 24 जनवरी के अंक में इन बच्चों की बहादुरी के साथ-साथ बदहाली को प्रशासन के सामने रखा था। &lt;br /&gt;दोनों बच्चों को उनके अदम्य वीरता के कामों के लिए 26 जनवरी 2010 को राजधानी रायपुर में होने वाले समारोह में राज्य वीरता पुरस्कार दिया गया था। इसके बाद 30 सितंबर 2010 को दोनों बच्चों के नाम राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए भेजा गया था।उल्लेखीय है कि भास्कर ने इस वर्ष की शुरुआत में 24 जनवरी को जिले के बहादुर बच्चों पर विस्तृत खबर प्रकाशित की थी, और उनके रहन-सहन, आर्थिक स्थिति, वीरता पर उनके अभिभावकों के विचार जानने के साथ ही उनकी शिक्षा, लक्ष्य की भी जानकारी दी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जज पति पीता है शराब, पराई लड़की संग करता है अय्याशी&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt; कोरबा/रायपुर.पत्नी पर हत्या का प्रयास का मामला दर्ज कराने वाले जज केपी भदौरिया ने चार दिन बाद मीडिया के सामने खुद का बचाव करने की कोशिश की। उन्होंने पत्नी पर शादी के बाद से ही प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। &lt;br /&gt;पेट्रोल छिड़कने को लेकर अभी भी बयान विरोधाभासी है। जज का कहना है कि पत्नी ने उसे जलाकर मारने की कोशिश की लेकिन बच्चों के बताए अनुसार मामला पेचीदा हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT7JX1bVtI/AAAAAAAABlM/gT7y_X96jJ0/s1600/jajsahab1_f_2501_f.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT7JX1bVtI/AAAAAAAABlM/gT7y_X96jJ0/s400/jajsahab1_f_2501_f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5549836779262793426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक ने जज को खुद पर पेट्रोल डालना बताया जबकि दूसरे ने मां मन्नू भदौरिया द्वारा पेट्रोल डालना बताया। शुक्रवार को अपने सरकारी आवास में जज भदौरिया ने अपनी पत्नी मन्नू पर आरोप लगाते हुए कहा कि शादी के बाद से ही वह उन्हें प्रताड़ित करती आ रही है। &lt;br /&gt;परिवार को बचाने के लिए मैं सब कुछ सहता रहा। जज बनने के बाद तो वह एक तरह से मुझे ब्लैकमेल करने लगी थी। मैं घर की बात बाहर रखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, क्योंकि मैं एक जज हूं। &lt;br /&gt;उसने जब पेट्रोल छिड़ककर मुझे जिंदा जलाने का प्रयास किया, तो मैंने हिम्मत जुटाकर उसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। इसके बाद से मुझे खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है। &lt;br /&gt;अधिवक्ता संघ के विरोध मसले पर उन्होंने कहा कि मैंने हमेशा से पक्षकारों के पक्ष में फैसला दिया, इसलिए वकील मेरे खिलाफ हैं। मेरे फैसलों से नाखुश अधिवक्ता संघ मेरे खिलाफ हैं और मामले को तूल दे रहे हैं। &lt;br /&gt;शिकायत पर हो रही है जांच: &lt;br /&gt;मन्नू भदौरिया द्वारा गुरुवार देर शाम रामपुर चौकी में अपने पति के खिलाफ किए गए लिखित शिकायत के मामले में अभी तक किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई है। इस संबंध में पुलिस अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।&lt;br /&gt;एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मामला न्यायिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति का होने के कारण शिकायत पर जांच की जा रही है।&lt;br /&gt;मन्नू के पक्ष में विधायक और नागरिक:&lt;br /&gt;जज पति और पत्नी के बीच झगड़े ने यहां तूल पकड़ लिया है। अधिवक्ता संघ समेत विधायक जयसिंह अग्रवाल, पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ भाजपा नेता बनवारी लाल अग्रवाल , समाज सेवी केएन सिंह समेत अन्य जनप्रतिनिधि एवं शहरवासी मन्नू भदौरिया के पक्ष में आ गए हैं। &lt;br /&gt;सभी पीड़िता मन्नू भदौरिया को इंसाफ दिलाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। गुरुवार को जमानत मिलने के बाद जेल से छूटते ही मन्नू भदौरिया ने अपने पति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।&lt;br /&gt;पापा अच्छे नहीं &lt;br /&gt;भदौरिया दंपती के दोनों बच्चे पुत्री कुमारी मिली(९) एवं पुत्र हर्ष(5) निर्मला स्कूल में क्रमश: कक्षा तीसरी और केजी-1 में पढ़ते हैं। इन दोनों बच्चों ने अपने पिता द्वारा मम्मी से मारपीट करने की बात कही। &lt;br /&gt;दोनों मासूमों ने पापा को अच्छा नहीं बताया जबकि वे मम्मी के साथ रहने की बात मीडिया के सामने कही। घटना के संबंध में मिली ने जहां पापा द्वारा स्वयं पर पेट्रोल छिड़कना बताया, वहीं हर्ष ने मम्मी द्वारा पापा पर पेट्रोल छिड़कने की बात कही। &lt;br /&gt;इस संबंध में जज भदौरिया ने कहा कि गुरुवार की शाम जब मन्नू भदौरिया बच्चोंे से मिलने पहुंची थी तब खिड़की से बच्ची मिली को उसने बरगला दिया है।&lt;br /&gt;महिलाओं को घर लाते थे जज : मन्नू &lt;br /&gt;जज भदौरिया की पत्नी मन्नू भदौरिया ने बताया कि उसके पति शादी के बाद से उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे थे। आए दिन मारपीट करते थे। शिकायत करने पर दबाव डालकर बयान बदलवाया जाता था। &lt;br /&gt;भूखे रखने के साथ-साथ यातना दी जाती थी। कोरबा में आने के बाद वे (जज पति) शराब पीकर अय्याशी करने लगे। इसके साथ ही अन्य महिलाओं को साथ लेकर घर भी आ जाते थे। विरोध करने पर वे उससे मारपीट कर धमकाते थे। मन्नू ने कहा कि डर और बच्चों के लिए वह सब सहती रही। &lt;br /&gt;बच्चों को प्राप्त करने का प्रयास: &lt;br /&gt;शुक्रवार को मन्नू भदौरिया अपने परिजनों के साथ जिला न्यायालय पहुंची। यहां उसने अधिवक्ता संघ के सहयोग से बच्चों की सुपुर्दगी लेने का प्रयास किया। समाचार लिखे जाने तक बच्चों के सुपुर्दगी के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत नहीं हो पाया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-2080002997997976414?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/2080002997997976414/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_4337.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2080002997997976414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2080002997997976414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_4337.html' title='छत्तीसगढ़ की खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TQT4zxZJbhI/AAAAAAAABk8/vlGGIcYQck0/s72-c/shiv-108.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-8883968891153651421</id><published>2010-12-12T21:47:00.001+05:30</published><updated>2010-12-12T21:50:22.135+05:30</updated><title type='text'>चटपटी खबरें</title><content type='html'>&lt;strong&gt;दो सहेलियों ने की ख़ुशी से एक लड़के से शादी&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;पाकिस्तान डायरी. यह तो आप जानते होंगे कि पाकिस्तान में शराब पर पाबंदी ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने लगवाई। शुरू में यह पाबंदी इस क़दर ‘सख्त’ थी कि शराब की वो बोतल, जो 500 रुपए में मिलती थी, वो एक हज़ार में बिकती थी। उस ज़माने में कुछ लोगों ने सप्लाई का धंधा शुरू कर दिया। &lt;br /&gt;उसमें वो रोज़ाना बहुत रुपए कमा लेते थे। वो अपनी स्कूटर में सब्ज़ी का थैला लटका कर उसके अंदर बोतल रखते थे और ऊपर से हरी-भरी सब्ज़ियां रखकर, अपने ग्राहक के घर तक बोतल पहुंचा देते थे। इस काम के बदले हर बोतल पर सौ-पचास रुपए टिप पाते और सब्ज़ी उनके घर में पकाई जाती थी। फिर शराब के परमिट क्रिश्चियनों और हिंदुओं को मिलने लगे और मुस्लिम उनसे वो परमिट महंगे दामों पर ख़रीदने लगे। आहिस्ता-आहिस्ता सख्तियां कम होती गईं। &lt;br /&gt;अब सुना है कि कराची, लाहौर और इस्लामाबाद के अलावा कई बड़े होटलों के बाहर भी शराब मिलती है और कई बड़े रेस्टोरेंट ऐसे हैं, जहां आने वाले अपना ‘सामान’ साथ लाते हैं और रेस्टोरेंट वाले ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें उनकी लाई हुई विलायती पिलाते हैं और भारी बख्शीश पाते हैं। &lt;br /&gt;इन दिनों एक नया हंगामा मच गया है। हंगामा तो ख़ैर हमारे यहां हर रोज़ और हर बात पर होता है। इस मर्तबा इसकी वजह यह हुई कि हमारी सीनेट (जैसे आपकी राज्य सभा है) में टूरिÊम की एक स्टैंडिंग कमेटी है, जिसकी चेयरपर्सन नीलोफ़र ब़िख्तयार हैं। &lt;br /&gt;वो जनरल मुशर्रफ़ के ज़माने में वज़ीर (मंत्री) थीं। इन दिनों वो यूरोप गईं और वहां उन्होंने पैराशूट जंपिंग के एक मुक़ाबले में पैराशूट से एक एक्सपर्ट के साथ जंप किया, तो वापसी पर उनकी वज़ारत (मंत्री पद) चली गई। पाकिस्तान में उनके विरोधी का कहना था कि उन्होंने एक ग़ैर-मर्द के साथ पैराशूट से कूद कर इस्लामी इमेज को तबाह किया है। &lt;br /&gt;नीलोफ़र बख़्ितयार इस कंट्रोवर्सी की वजह से कई दिनों तक ख़बरों में रही थीं। कुछ मौलवियों का कहना था कि उनकी सीनेट की मेंबरशिप ख़त्म कर देनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। उनके हवाले से इस मर्तबा उठने वाला हंगामा बहुत बड़ा है। &lt;br /&gt;इसकी वजह यह कि टूरिज्म की सीनेट स्टैंडिंग कमेटी में जब इस पर बात चल रही थी कि पाकिस्तान में टूरिज्म का हाल इतना ख़राब क्यों है और टूरिस्ट यहां का रुख़ क्यों नहीं करते। नीलोफ़र बख्तियार ने कमेटी की चेयरपर्सन के तौर पर यह कहा कि पाकिस्तान टूरिÊम डेवलपमेंट कॉपरेरेशन को नुक़सान से निकालने के लिए इस कॉपरेरेशन के तहत चलने वाले होटल्स में ग़ैर-मुल्की पर्यटकों को शराब उपलब्ध कराने की सुविधा होनी चाहिए। &lt;br /&gt;इस ख़बर का छपना था कि अख़बारों में हंगामा मच गया। एक मौलवी साहब ने कहा कि नीलोफ़र ने पहले पैराशूट से एक ग़ैर-मर्द के साथ पैराशूट से कूद कर मुल्क की इज्जत ख़ाक में मिलाई थी और अब वो शराब से पाबंदी हटाने की मांग कर रही हैं। &lt;br /&gt;नीलोफ़र अब अलग-अलग मौलवियों से बात करके यह कह रही हैं कि उनके बयान का ग़लत मतलब लिया गया है। बेचारी नीलोफ़र हमेशा इस क़िस्म के झगड़ों में फंस जाती हैं। बात यह है कि उन्होंने मुल्क से शराब की पाबंदी ख़त्म करने को नहीं कहा था। &lt;br /&gt;उनका कहने का मतलब सिर्फ़ यह था कि जिस तरह फाइव स्टार होटलों को इजाज़त है कि वो ग़ैर-मुस्लिम और ग़ैर-मुल्की मेहमानों को शराब दे सकते हैं, इसी तरह पाकिस्तान टूरिÊम के मोटल्ज में ग़ैर-मुस्लिम पर्यटकों को शराब ख़रीदने की इजाज़त दी जाए। &lt;br /&gt;अब नीलोफ़र की पार्टी से कहा जा रहा है कि वो उनकी सीनेट सीट फ़ौरन कैंसिल कर दें। मेरे ख्याल में उनकी सीनेट की सीट कैंसिल नहीं होगी और वो अपनी मुद्दत पूरी करेंगी। वो एक दिलचस्प ख़ातून हैं और अपने बयानात से पाकिस्तानी सियासत में फुलझड़ियां छोड़ती रहती हैं। &lt;br /&gt;ऐसी ही दिलचस्प ख़बर मुल्तान से आई है। एक साहब हैं, जिनका नाम कसूर हैदरी है। वो मुल्तान और आस-पास के शहरों में थियेटर करते हैं। बैठे-बैठे उन्होंने अपने घर में ड्रामा कर दिया, जिसकी सारे मुल्क में चर्चा है। सुना है कि यह ख़बर हिंदुस्तान वालों को भी मिल गई है। &lt;br /&gt;बात इतनी-सी है कि कसूर हैदरी ने एक रोज़ अपने इक़लौते बेटे अज़हर से कहा कि तुम्हें अपनी दो कज़िंस से शादी करनी है। पहले तो उसकी समझ में कुछ नहीं आया, लेकिन उसके बाप ने कहा कि मैं एक या दो दिन के फ़र्क़ से तुम्हारी दो शादियां करना चाहता हूं, एक तुम्हारे चाचा की बेटी से होगी और दूसरी तुम्हारी ख़ाला (मौसी) की बेटी से होगी।&lt;br /&gt;इस तरह तुम्हारा ननिहाल भी ख़ुश रहेगा और ददिहाल भी। आप तो जानते हैं कि मुसलमानों में एक या दो नहीं चार शादियां की जा सकती हैं। लीजिए जनाब अज़हर साहब के तो मज़े आ गए। महंगाई के इस दौर में जहां उनके दोस्तों की एक शादी होना मुश्किल है, वहां अज़हर के अब्बा ने उनके लिए दो रिश्ते ढूंढ़ लिए। &lt;br /&gt;अज़हर के अब्बा थियेटर के आदमी हैं। उन्होंने बहुत सोच-समझकर, अपने बेटे की इन दो शादियों की ख़बर अख़बार वालों को दे दी। अख़बार में इस ख़बर का छपना था कि तमाम पाकिस्तानी टीवी चैनल अपने-अपने कैमरे लिए अज़हर के घर की तरफ़ दौड़ पड़े। इसके बाद दोनों लड़कियों की क्या वीडियो फुटेज बनी। दोनों एक-दूसरे के हाथों में मेंहदी लगा रही हैं।&lt;br /&gt;दोनों कैमरे के सामने यह कह रही हैं कि हम तो सहेलियां हैं और एक ही शख़्स से शादी करने के बाद सहेलियां रहेंगी। एक-दूसरे के साथ सौतनों वाला व्यवहार नहीं करेंगे। अलग-अलग सियासी पार्टी वालों ने भी दूल्हा और दुल्हनों को मुबारकबाद दी। &lt;br /&gt;मुल्क भर से उनके लिए तोहफ़े आए। आप ख़ुद ही सोचें कि जब नौ बहनों ने इकलौते भाई की शादी के गीत गाए होंगे और उनके साथ मोहल्ले और शहर की दूसरी लड़कियां भी गा रही होंगी, तो क्या रौनक मेला होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अल्ला जाने क्या होगा आगे.. आमीन!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; अमजद पंजाब के एक छोटे क़स्बे में एक छोटा-सा ढाबा चलाता है। ढाबे के साथ ही एक छप्पर है, जिसके नीचे कुछ चारपाइयां पड़ी हुई हैं। क़स्बे में किसी काम से आने वालों की अगर आख़िरी बस छूट जाए या किसी वजह से उन्हें रात रुकना पड़े, तो वे चंद रुपए देकर इस छप्पर के नीचे बिछी चारपाइयों पर सो जाते हैं। उस रोज़ रात हो गई थी और छप्पर के नीचे कई लोग लेटे हुए थे। उनमें से एक श़ख्स के साथ उसके चार बच्चे भी थे, जो बेख़बर सो रहे थे, छप्पर के बराबर में ढाबे वाला अपना ढाबा बंद कर रहा था। उसे मालूम था कि इतनी रात को अब भला कौन कुछ खाने आएगा। यूं भी देग़चियों में दाल और सब्ज़ी बाक़ी नहीं बची हुई थी, तंदूर भी ठंडा हो गया था। &lt;br /&gt;इतने में एक श़ख्स झूमता हुआ आ पहुंचा, वो शराब के नशे में धुत था। वो ढाबे में दाख़िल हुआ, तो अमजद ने उससे कहा कि ढाबा बंद हो चुका है। यह सुनते ही उसने जेब से पिस्तौल निकाली और अमजद से कहा कि अगर उसे फ़ौरन खाने के लिए कुछ नहीं दिया, तो गोली मार देगा। अमजद की तो जान पर बन आई थी। उसने बेटे को फ़ौरन घर दौड़ाया कि खाने के लिए घर में जो भी हो, ले आए। बेटा दौड़ता घर गया और एक प्लेट में दाल और चार रोटियां ले आया। खाना उस श़ख्स के सामने रख दिया गया। पहले तो उसने दाल को देखकर मुंह बनाया, लेकिन कुछ कहे बग़ैर रोटी का एक निवाला दाल से खाया और इसके साथ ही उसने चीख़-पुकार शुरू कर दी। उसका कहना था कि दाल ठंडी है और उसने ज़िंदगी में ठंडी दाल नहीं खाई। अमजद ने यह कहना चाहा कि वह चूल्हा जलाकर दाल गर्म कर देता है, लेकिन शराबी में इतनी बर्दाश्त नहीं थी कि वो अमजद की बात सुन लेता। उसने पिस्तौल से दनादन फायर शुरू कर दिए। वो लोग जो बराबर के छप्पर के नीचे लेटे हुए थे और सोने की अदाकारी कर रहे थे, फायरिंग शुरू होते ही डर कर भागे। गोलियों की आवाज़ सुनकर क़रीब से गुज़रती हुई एक पुलिस पार्टी वहां पहुंच गई। शराबी साहब के हाथों में हथकड़ियां डालते ही उसका नशा हिरन हो गया। मालूम हुआ कि क़रीब के इलाक़ों में दो क़त्ल करके फ़रार हुए हैं और इलाक़े की पुलिस कई महीनों से उन्हें तलाश रही थी। शायद उस व़क्त उसे यह बात समझ में आई हो कि अगर ख़ामोशी से ठंडी दाल खा लेता और शोर न मचाता, तो पुलिस के हाथ न लगता। अब इलाक़े का थानेदार मूंछों पर ताव देकर कह रहा है कि मैंने एक क़ातिल को पकड़ा। &lt;br /&gt;इस फायरिंग से याद आया कि चंद दिनों पहले उर्दू के शायर हबीब जालिब के बेटों के दरमियान भी गोली चल गई। सुना है कि दोनों बेटों के बीच रुपए-पैसों का कुछ मसला चल रहा था। जालिब की शायरी ने उन्हें क्या हिंदुस्तान, क्या पाकिस्तान और क्या यूरोप, सबकी आंखों का तारा बना रखा था। वो जहां जाते थे, हाथोहाथ लिए जाते थे। पाकिस्तान के सभी मंत्रीगण उनके सामने सर झुकाते थे। वो चाहते, तो हर हुकूमत से प्लाट और परमिट लेते, लेकिन जालिब को न दौलत से मुहब्बत थी और न ही वो किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की तारीफ़ में छंद लिख सकते थे। इसीलिए जालिब ने सारी ज़िंदगी फ़क़ीरी में बसर की और उनके घर में दाल ही पकती रही। जालिब ऐसे शख़्स थे कि बड़े और दौलतमंद लोगों की तारीफ़ मुश्किल से करते थे, लेकिन फ़न के बड़े क़द्रदान थे। मैडम नूरजहां भी जालिब पर बहुत मेहरबान थीं। वो जब बीमार हुए, तो मैडम अक्सर उनकी ख़ैरियत पूछने के लिए जाया करती थीं और उनकी शायरी की बहुत बड़ी क़द्रदान थीं। &lt;br /&gt;इस व़क्त मैडम नूरजहां के ज़िक्र पर एक और नूरजहां याद आ गईं, जो पंजाब की मशहूर रियासत भावलपुर के नवाब सादिक़ की बेटी थीं और मलका नूरजहां कहलाती थीं। नवाब सादिक़ ने अपनी मलका नूर को १८७५ में एक महल तोहफ़े में दिया, जो तीन बरसों में बनाया गया था और जिसे नूरमहल का नाम दिया गया था। नूरमहल की बुनियादों में सिक्के रखने के अलावा रियासत के ऩक्शे भी रखे गए थे। यह महल इटालियन और इस्लामी आर्किटेक्चर का शानदार नमूना है। &lt;br /&gt;नवाब साहब जिस तख़्त पर बैठते थे, वह सोने का बना हुआ था, जबकि सामने रखी हुई कुर्सियां चांदी की थीं। महल में लगे रंग-बिरंगे शीशे इंग्लैंड से आए थे। दीवारों पर लगे आईने इटली से मंगवाए थे। नवाब सादिक़ ने मलका को अपनी मोहब्बत का सुबूत पेश करने के लिए हैंबर्ग (जर्मनी) से एक पियानो मंगवाकर तोहफ़े में दिया। वह पियानो आज भी महल में मौजूद है। पहले ज़माने में क़िलों और महलों में तहख़ाने भी बनाए जाते थे, जिनमें क़ैदियों को रखा जाता था, लेकिन इन तहख़ानों को गर्मी कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इनमें नहर से पानी छोड़ने का इंतज़ाम किया गया था। तहख़ाने को छत की बजाय, तांबे के जाल से ढंका गया था। हवा एक दरवाज़े से आती और दूसरे से बाहर निकलती थी और ऊपर से खुला होने की वजह से ठंडक पूरे महल में फैल जाती थी। &lt;br /&gt;बेशुमार दौलत और हज़ारों मज़दूरों की मेहनत के बाद नूरमहल जब बनकर तैयार हुआ, तो इस महल में नवाब सादिक़ की चहकती बेग़म नूर सिर्फ़ एक रात ठहरी थीं। हुआ यह जब अगली सुबह मलका महल के इर्द-गिर्द लगे हुए बाग़ात का नज़ारा करने के लिए छत पर गईं, तो महल के सामने के इलाक़े में फैले हुए क़ब्रिस्तान को देखकर, उनका मिज़ाज बिगड़ गया। उन्होंने इस बात को सख़्त नापसंद किया कि आख़िर यह महल क़ब्रिस्तान के क़रीब क्यों बनवाया गया है। इस बात पर उन्हें इतना ग़ुस्सा आया कि मलका ने वहां अगला घंटा भी गुज़ारना पसंद नहीं किया। नवाब साहब उनकी मिन्नतें करते रह गए, लेकिन मलका वहां से चली गईं और दोबारा कभी उस महल में नहीं आईं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-8883968891153651421?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/8883968891153651421/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_12.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8883968891153651421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/8883968891153651421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_12.html' title='चटपटी खबरें'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' 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अंजाम तक पहुंचने के पहले ही भटक गए या भटका दिए गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिक्कत यह है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार का मामला सामने आते ही उसे लेकर शोर-शराबा राजनेताओं पर केंद्रित हो जाता है। और प्राय: सरकार या राजनीतिक पार्टियां नेताओं को पद छोड़ने जैसे प्रतीकात्मक दंड देकर लोगों का आक्रोश शांत कर देती हैं। इस तरह मामला ही दब जाता है और उसमें शामिल नौकरशाह भी निशाने पर आने से बच जाते हैं। यह आम धारणा बन गई है कि राजनीतिक नेतृत्व ने अपने हित के लिए ब्यूरोक्रेसी का इस्तेमाल किया और नौकरशाहों को भ्रष्ट बनाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात एक हद तक सही है। लेकिन इससे अफसरों का अपराध कम नहीं हो जाता। सचाई यह है कि जिस तरह पॉलिटिकल लीडरशिप ब्यूरोक्रेट्स का इस्तेमाल करती है, उसी तरह नौकरशाही भी अपने फायदे के लिए राजनीतिक संरक्षण हासिल करती है और अपने संरक्षकों को हर तरह की मदद पहुंचाती है। अगर नौकरशाहों ने एकजुट होकर करप्शन का विरोध किया होता तो शायद यह हालत नहीं होती। कुछ ईमानदार अफसर इसके लिए जरूर आगे आए पर वे अकेले पड़ गए। कॉमनवेल्थ गेम्स में गड़बड़ी का मामला हो या आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला या फिर होम लोन स्कैम- सभी में अफसरों की संदेहास्पद भूमिका रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनेक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों में भारतीय नौकरशाही को लेकर जो निष्कर्ष सामने आए हैं, वे कई सवाल खड़े करते हैं। हांगकांग की पॉलिटिकल एंड इकनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी ने पिछले साल एशिया की 12 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की नौकरशाही को लेकर किए एक सर्वे में भारतीय ब्यूरोक्रेट्स को सबसे निकम्मा बताया था। वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम ने 49 देशों के अफसरों के कामकाज के अपने एक सर्वेक्षण में भारतीय नौकरशाही को एकदम नीचे 44 वां स्थान दिया था। देश का एक प्रबुद्ध तबका मानता है कि भारतीय नौकरशाही अपने मकसद से भटक चुकी है लिहाजा इसका स्वरूप बदला जाना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्फोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायणमूर्ति का तो कहना है कि आईएएस को समाप्त कर देना चाहिए। आज राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही की साख पर सवालिया निशान लगा हुआ है जो भारतीय जनतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं है। इन्हें दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी और अपने भीतर के भ्रष्ट तत्वों को बेनकाब करना होगा, उन्हें सजा दिलानी होगी। सीबीआई और दूसरी जांच एजेंसियों को चाहिए कि वे करप्शन के सभी मामलों को तत्परता से निपटाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-2802787988610868637?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/2802787988610868637/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_11.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2802787988610868637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2802787988610868637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_11.html' title='विचार मंथन'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-5486243509581230373</id><published>2010-12-05T22:31:00.004+05:30</published><updated>2010-12-05T22:39:24.899+05:30</updated><title type='text'>बिग बॉस की नौटंकी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;'मनोज का दर्द, मेरा श्वेता से कोई रिश्ता नहीं है'&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार मनोज तिवारी हाल ही में रिएलिटी शो 'बिग बॉस 4' से बाहर हुए हैं। वह स्वीकार करते हैं कि अभिनेत्री श्वेता तिवारी के साथ सम्बंधों के चलते उनकी पत्नी उनकी निष्ठा पर संदेह करती हैं लेकिन वह स्पष्ट करते हैं वह श्वेता को केवल व्यवसायिक तौर पर जानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPvHErzcsII/AAAAAAAABiM/M3Bu1evcXug/s1600/shiv-108.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPvHErzcsII/AAAAAAAABiM/M3Bu1evcXug/s400/shiv-108.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547246249328816258" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मनोज ने कहा, "मेरे वैवाहिक जीवन में कुछ परेशानियां है। मेरी पत्नी हमेशा श्वेता के साथ मेरे सम्बंधों को लेकर संदेह में रहती हैं लेकिन 'बिग बॉस' में मुलाकात से पहले तक मैंने श्वेता को इस बारे में नहीं बताया था। मुझे उन्हें यह बताने की जरूरत महसूस नहीं हुई क्योंकि हम मुश्किल से ही कभी मिलते हैं। मैं हमेशा से उन्हें व्यवसायिक तौर पर ही जानता हूं।"&lt;br /&gt;मनोज अभिनेता, गायक और निर्देशक भी हैं। वह पिछले कुछ महीनों से अपनी पत्नी व बेटी से अलग रह रहे हैं। वह कहते हैं कि यदि उनके व श्वेता के बीच किसी भी तरह का प्रेम सम्बंध होता तो वह 'बिग बॉस' जैसे शो में छुपा हुआ नहीं रह सकता था।&lt;br /&gt;उन्होंने कहा, "'बिग बॉस' के घर में हम 24 घंटे कैमरे के सामने रहते थे. और हमेशा अपनी भावनाओं को छुपाए रखना सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए यदि हमारे बीच कुछ होता तो वह शो में कभी न कभी सामने आता। श्वेता और मेरे बीच न पहले ही कुछ था और न अब है।" मनोज ने 'ससुरा बड़ा पैसे वाला' और 'दारोगा बाबू आई लव यू' जैसी फिल्मों में अभिनय किया है।&lt;br /&gt;श्वेता को 'कसौटी जिंदगी की' धारावाहिक में अभिनय के बाद ख्याति मिली थी। वह अपने पति राजा चौधरी से अलग हो गई हैं और अब बेटी पलक के साथ रहती हैं। &lt;br /&gt;मनोज इस बात को अब भी पचा नहीं पा रहे हैं कि 'बिग बॉस' से बाहर जाने के लिए वह और अश्मित पटेल साथ में नामांकित हुए और अश्मित को उनसे ज्यादा वोट मिले।&lt;br /&gt;उन्होंने कहा, "मुझे आश्चर्य हुआ कि अश्मित को मुझसे ज्यादा वोट मिले। मैं अब भी इस पर विश्वास नहीं कर सकता लेकिन मुझे लगता है कि अश्मित-वीना मलिक की कहानी के चलते चैनल ने उन्हें अंदर रखने का निर्णय लिया है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt; अफ़सोस है मनोज तिवारी को&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी लगता है अभी तक बिग बॉस के घर से बाहर जाने का गम भूले नहीं भूल रहा है|उन्हें इतनी जल्दी शो से बाहर जाने की उम्मीद बिलकुल नहीं थी|मगर उनका अति आत्मविश्वास उन्हें ले डूबा और अश्मित पटेल के मुकाबले मनोज हार गए और उन्हें शो से बाहर जाना पड़ा|&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPvHLkYI-uI/AAAAAAAABiU/1_QiYjqFguk/s1600/bitia.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 250px; height: 250px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPvHLkYI-uI/AAAAAAAABiU/1_QiYjqFguk/s400/bitia.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547246367594314466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मनोज इस बात को अब भी पचा नहीं पा रहे हैं कि 'बिग बॉस' से बाहर जाने के लिए वह और अश्मित पटेल साथ में नामांकित हुए और अश्मित को उनसे ज्यादा वोट मिले।अब मनोज बिग बॉस के वोटिंग सिस्टम पर ही सवाल उठाने लगे|&lt;br /&gt;उन्होंने कहा, "मुझे आश्चर्य हुआ कि अश्मित को मुझसे ज्यादा वोट मिले। मैं अब भी इस पर विश्वास नहीं कर सकता लेकिन मुझे लगता है कि अश्मित-वीना मलिक की कहानी के चलते चैनल ने उन्हें अंदर रखने का निर्णय लिया है।"उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि उन्हें इस शो में जाने का हमेशा अफ़सोस रहेगा| &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कहीं अपने जाल में खुद ही न फंस जाएं मनोज&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी भले ही बिग बॉस के घर में हुए नॉमिनेशंस में भारी पड़ गए हों मगर अश्मित के प्रवक्ता डेल भाग्वावर का मानना है कि पिछले दो महीनों में मनोज के फैन्स की संख्या काफी कम हो गयी हैं वहीँ अश्मिटी के फैन्स की संख्या काफी बढ़ चुकी है|&lt;br /&gt;डेल इससे पहले शिल्पा शेट्टी की पब्लिसिटी का भी काम देख चुके हैं जो बिग बॉस के मूल वर्जन बिग ब्रदर का हिस्सा रही थीं और शो के दौरान उनपर काफी नस्लीय कमेन्ट हुए थे|डेल ने कहा कि मनोज शो में काफी समय से अश्मित के पीठ पीछे बुराई कर रहे हैं और उनके खिलाफ षड़यंत्र रचते रहते हैं|&lt;br /&gt;अश्मित के खिलाफ उनकी चालें तब और साफ़ हो गयी जब उन्होंने एमएमएस स्केंडल को लेकर अश्मित पर एक बार फिर कमेन्ट करना चाहा|मनोज को अब दर्शक अच्छी तरह से समझ चुके हैं इसलिए वह अब अश्मित का ज्यादा साथ दे रहे हैं|ऐसे में मनोज कि चालें कहीं उलटी न पड़ जाएं और अश्मित के बजाए कहीं खुद ही उन्हें बिग बॉस से बाहर न जाना पड़े | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वीना के लिए अश्मित ने सारा को पीटा!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; अश्मित की शख्सियत का पता लगाना बड़ा ही मुश्किल है। उसके मन में क्या चल रहा है और वो आगे क्या करेगा कोई नहीं जान सकता। ठीक ऐसा ही कुछ हुआ सोमवार की रात 'बिग बॉस' के घर में जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।&lt;br /&gt;दरअसल रात में अश्मित ने वीना मलिक को नॉमिनेट करने के लिए सारा खान को बुरी तरह पीटा जबकि अगर देखा जाए तो घर में अश्मित सबसे करीबी सारा खान के ही माने जाते रहे हैं। पटेल का कहना था कि सारा ने वीना के खिलाफ वोट करके अच्छा नहीं किया क्योंकि वीना हमेशा उसे अपनी छोटी बहन की तरह मानती थी और हमेशा उसकी पक्ष लेकर खड़ी होती थी।&lt;br /&gt;वीना को भी जब यह बात पता चली कि सारा ने उसके खिलाफ वोट किया है तो उसको काफी बुरा लगा। सारा और अश्मित के रिश्ते शो के शुरूआती दिनों से अजीबो-गरीब नजर आए हैं। शुरूआत में तो वो प्रेमी युगल की तरह रहते नजर आते थे। सारा ने भी उसके लिए प्यार का इजहार किया था लेकिन बाद में सारा के पति अली के बिग बॉस में आते ही सबकुछ बदल गया। सारा ने अश्मित को अपना भाई मान लिया तो वहीं पटेल ने भी उसे अपनी छोटी बहन कबूल कर लिया।&lt;br /&gt;अब वीना दुविधा में हैं और अश्मित और ऋशांत में किसी एक को चुन नहीं पा रही हैं। इस बीच हफ्ते के नामांकन प्रक्रिया में घर के लोगों ने अश्मित पटेल और मनोज तिवारी का नाम चुना है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-5486243509581230373?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/5486243509581230373/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_05.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5486243509581230373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/5486243509581230373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_05.html' title='बिग बॉस की नौटंकी'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPvHErzcsII/AAAAAAAABiM/M3Bu1evcXug/s72-c/shiv-108.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-1208061261967813168</id><published>2010-12-03T23:13:00.002+05:30</published><updated>2010-12-03T23:18:47.989+05:30</updated><title type='text'>ख़ास खबर</title><content type='html'>&lt;strong&gt;दाँतों के लिए मारे जा रहे हैं हाथी&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;(अरुण बंछोर)&lt;br /&gt;पिछले दो महीनों में छत्तीसगढ़ के उत्तरी इलाके में दो हाथियों को करंट लगाकर मारा जा चुका है। एक मामले में तो जंगल विभाग के अधिकारियों ने हाथी के शिकार का मामला दर्ज किया है लेकिन दूसरे मामले में उनका कहना है कि वह शिकार का मामला नहीं है और दुर्घटनावश वह हाथी मारा गया।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPktZGwaOYI/AAAAAAAABh0/4lSilERx4j4/s1600/shiv-108.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPktZGwaOYI/AAAAAAAABh0/4lSilERx4j4/s400/shiv-108.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5546514325417113986" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लेकिन वन्य संरक्षण में लगे कार्यकर्ताओं का कहना है कि दोनों ही मामले हाथी के शिकार के हैं और दोनों ही हाथियों को उनके दाँतों के लिए मारा गया। ये और बात है कि दोनों ही मामलों में शिकारी दाँत निकालने में सफल नहीं हो सके और इससे पहले ही अधिकारियों को इसका पता चल गया।&lt;br /&gt;उल्लेखनीय है कि हाथी के दाँतों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत कीमत मिलती है। जानकार लोगों का कहना है कि भारत में ही दो दाँतों की कीमत दो से तीन लाख तक मिल जाती है।&lt;br /&gt;करंट : ताजा मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कोई ढाई सौ किलोमीटर दूर स्थित जंगलों का है। यह इलाक़ा कोरबा से कोई पचास किलोमीटर दूर है।&lt;br /&gt;वाइल्ड लाइफ एसओएस की कार्यकर्ता मीतू गुप्ता के अनुसार इस हाथी को करंट लगाकर 29 नवंबर की रात मारा गया था, लेकिन इसका पता 30 नवंबर को लगा। पहली दिसंबर को हुए पोस्टमॉर्टम के अनुसार इस हाथी की मौत करंट लगने से हुई और इस जख्म की वजह करंट लगना ही है।&lt;br /&gt;मीतू गुप्ता का कहना है कि जहाँ हाथी मरा हुआ पाया गया है वहाँ मिले एल्यूमिनियम के तार के टुकड़ों और हाथी के शरीर में लगी चोटों से स्पष्ट है कि उसे मारने के लिए ही शिकारियों ने जाल बिछाया था।&lt;br /&gt;इस इलाके के असिस्टेंट कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (एसीएफ) प्रभात मिश्रा ने बीबीसी से हुई बातचीत में स्वीकार किया कि यह करंट से हाथी मारने का है और 30 नवंबर को यह मामला दर्ज कर लिया गया है।&lt;br /&gt;उन्होंने कहा, 'अभी अंतिम निर्णय पर हम नहीं पहुँचे हैं, लेकिन आरंभिक तौर पर यह करंट लगाकर हाथी को मारने का मामला है और इसमें शिकार का मामला होने से इनकार नहीं किया जा सकता।'&lt;br /&gt;इससे पहले अक्टूबर के पहले सप्ताह में उत्तरी छत्तीसगढ़ के ही धरमजयगढ़ में एक हाथी मरा हुआ पाया गया था। यह हाथी भी दंतैल हाथी था।&lt;br /&gt;उस इलाके के डीएफओ मसीह ने बीबीसी को बताया कि एक हाथी करंट लगने से मारा गया था लेकिन उन्होंने इसे शिकार का मामला मानने से इनकार किया।&lt;br /&gt;उनका कहना था, 'किसानों ने खेत में सूअर आदि से बचने के लिए करंट लगाया होगा और उसमें हाथी दुर्घटनावश मारा गया। उसे सीधे-सीधे शिकार का मामला नहीं कहा जा सकता।'&lt;br /&gt;लेकिन मीतू गुप्ता ने का कहना है कि वह भी शिकार का मामला था क्योंकि उस हाथी के दाँत निकालने के लिए टंगिए से वार किए गए थे जो बाद में स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।&lt;br /&gt;समस्या : छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ बरसों में हाथियों की समस्या बढ़ी है। इसकी वजह वही है जो पूरे देश की है। जंगलों की कटाई और जंगल के इलाकों में खदानों का कार्य होना। इससे हाथियों के प्राकृतिक वास में बाधा आई है।&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ सरकार ने हाथियों के संरक्षण के लिए एक कॉरिडोर के निर्माण का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था और केंद्र सरकार ने इसे मंजूरी भी दे दी थी। लेकिन उसी इलाक़ों में कोयले के भंडार मिलने के बाद राज्य की रमन सिंह सरकार ने उस इलाक़े को हाथियों का कॉरिडोर अधिसूचित नहीं कर रही है।&lt;br /&gt;पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार को कोयला तो लाभ का मामला दिखता है लेकिन हाथी नहीं। दूसरी ओर हाथियों की बढ़ती संख्या की वजह से किसानों को होने वाला फसलों का नुकसान बढा़ है और उनके बीच टकराव भी बढ़ा है।&lt;br /&gt;लेकिन ताजा मामले फसल के नुकसान के नहीं हैं क्योंकि जिस समय इन हाथियों को मारा गया है उस समय खेतों में फसल नहीं थी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-1208061261967813168?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/1208061261967813168/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_03.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1208061261967813168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/1208061261967813168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post_03.html' title='ख़ास खबर'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPktZGwaOYI/AAAAAAAABh0/4lSilERx4j4/s72-c/shiv-108.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-2510159355730045622</id><published>2010-12-01T22:41:00.000+05:30</published><updated>2010-12-01T22:42:31.342+05:30</updated><title type='text'>भोपाल गैस त्रासदी पर विशेष</title><content type='html'>&lt;strong&gt;भोपाल गैस त्रासदी के 26 बरस! &lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt; &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ-TqVnoiI/AAAAAAAABgs/UoXsgOwoJeI/s1600/bitia.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 91px; height: 130px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ-TqVnoiI/AAAAAAAABgs/UoXsgOwoJeI/s320/bitia.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5545758867400925730" /&gt;&lt;/a&gt;      &lt;br /&gt;यूनियन कार्बाइड कारखाने से 2 दिसंबर 1984 की रात जहरीली मिथाइल आइसोनेट गैस के रिसाव की दुर्घटना के बाद भोपाल की हवाएं जैसे थम-सी गईं, जीवन भी जैसे थम-सा गया और जिसने जीने के लिए सांस ली वह मौत के मुंह में समा गया। इस दुर्घटना में तत्काल 3,500 लोगों की मौत हुई थी। दुर्घटना के प्रभाव से हजारों लोग बीमार और विकलांग हुए। स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार दुर्घटना के 72 घंटों के भीतर 10,000 लोगों की मौत हुई और अब तक 25,000 लोगों की मौत हो चुकी है। जो लोग जिंदा बचे उनके बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग पैदा हुए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक जवानी, जो बूढ़ी हो गई!&lt;/strong&gt;          &lt;br /&gt;यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड की स्थापना वर्ष 1969 में हुई थी। इसकी 50.9 प्रतिशत हिस्सेदारी यूनियन कार्बाइड के पास और 49.1 प्रतिशत हिस्सेदारी भारतीय निवेशकों के पास थी। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थान भी शामिल थे। जिस रात गैस रिसाव हुआ तबसे आज तक उसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमेरिकी नागरिक वॉरेन एंडरसन को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। पीड़ितों को आज तक उचित न्याय नहीं मिला है। 25 बरस बीत गए, एक जवान पीढ़ी बूढ़ी हो गई, बूढ़ी पीढ़ी खत्म हो गई, लेकिन इंसाफ किसी को नहीं मिला!  &lt;br /&gt; 01 2009  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;हमारा क्या कसूर था? &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ-xJ2NRDI/AAAAAAAABg0/8f5NBMsvcQ8/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ-xJ2NRDI/AAAAAAAABg0/8f5NBMsvcQ8/s400/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5545759374075315250" /&gt;&lt;/a&gt;         &lt;br /&gt;ये वे बच्चे हैं, जिनके मां-बाप आज से पच्चीस बरस पहले बच्चे हुआ करते थे। जहरीली गैस कुछ इस तरह से उनके खून में घुल गई कि न जाने कितनी पीढ़ियां इस तरह मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर पैदा होंगी? लेकिन जीवन मिला है तो उसका जतन तो करना ही होगा, कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं ऐसे बच्चों को फीजियोथेरैपी करवाती हैं, ताकि कुछ तो राहत मिले इस मुश्किल सफर में। अस्पतालों में 6000 हजार लोग प्रतिदिन पहुंचते हैं। मुआवजे के नाम पर कुछ ज्यादा नहीं मिला है। इतना ही नहीं गैस पीड़ित कई तरह की गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पथरा गई हैं आंखें, सुख के इंतजार में!&lt;/strong&gt;         &lt;br /&gt;भोपाल गैस त्रासदी के 26 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड संयंत्र परिसर में जमा रासायनिक पदार्थों ने भोपाल की जमीन और भू-जल को प्रदूषित कर रखा है। नई दिल्ली के अनुसंधान और आंदोलन संगठन एवं सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि संयंत्र से तीन किलोमीटर दूर तक के भू-जल में भारतीय मानक से 40 गुना अधिक तक कीटनाशक हैं। ये कीटनाशक लोगों के शरीर में धीमा जहर घोलने का काम कर रहे हैं। और लोग जोड़ों के दर्द, सांस लेने में परेशानी और अन्य समस्याओं से दो-चार हैं। पच्चीस बरस से इलाज का यह सिलसिला चल रहा है और राहत का कहीं नाम नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह कैसा बचपन! &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ_XqxPldI/AAAAAAAABg8/vQJZ5jPifDo/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ_XqxPldI/AAAAAAAABg8/vQJZ5jPifDo/s400/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5545760035747894738" /&gt;&lt;/a&gt;        &lt;br /&gt;अपने बच्चों को स्वस्थ व खुश रखने के लिए माता-पिता क्या नहीं करते! लेकिन गैस त्रासदी ने सात साल के इस बच्चे के पैरों में खेलने की तो क्या चलने की शक्ति तक नहीं छोड़ी है। सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच हुए समझौते में पीड़ितों के लिए 47 करोड़ अमेरिकी डॉलर दिए गए। यह समझौता एक लाख पांच हजार पीड़ितों और मृतकों की संख्या तीन हजार मानकर किया गया था, जबकि हकीकत में पीड़ितों की संख्या पांच लाख 70 हजार और मृतकों की संख्या 25 हजार थी। &lt;br /&gt; 01 2009  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रंगों में उतर आया है दर्द! &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ_t0VdYSI/AAAAAAAABhE/MCuc6n5iLGU/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ_t0VdYSI/AAAAAAAABhE/MCuc6n5iLGU/s400/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5545760416272834850" /&gt;&lt;/a&gt;         &lt;br /&gt;यूनियन कार्बाइड संयंत्र के बाहर म्युरल बनाकर अपने दर्द को बयान करती एक कलाकार। भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल होने पर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में तीन दिवसीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया। इस अवसर पर फोटो और कला प्रदर्शनियों के अलावा एक रैली का भी आयोजन किया गया। पीड़ितों की सहायता के लिए काम करनेवाले संगठनों ने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार और राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को इस आशय से संबंधित एक पत्र लिखा है कि दोनों सदनों में पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हक की लड़ाई तो लड़नी ही होगी!&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPaAW8iOMpI/AAAAAAAABhM/_CwFTN8Q7Z4/s1600/untitled.bmp"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPaAW8iOMpI/AAAAAAAABhM/_CwFTN8Q7Z4/s400/untitled.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5545761122848486034" /&gt;&lt;/a&gt;)         &lt;br /&gt;यूनियन कार्बाइड संयंत्र के बाहर खड़ी महिलाएं गुहार कर रही हैं कि 25 बरस हो जाने के बावजूद सरकार ने उन्हें अब तक उचित मुआवजा नहीं दिया है। मुआवजा लेने के लिए और गुनाहगारों को सजा दिलवाने के लिए विभिन्न संगठन अपनी तरह से संघर्ष कर रहे हैं। भोपाल के शाहजहां पार्क में हर शनिवार को पीड़ित मिलते हैं और लड़ाई जारी रखने का संकल्प लेते हैं। ऐसे और भी कई आंदोलन लगातार चल रहे हैं, लेकिन सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब तक कम नहीं हुए जख्म &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैसकांड को हुए 26 बरस हो गए हैं। आधी रात हुए इस हादसे में 15 हजार लोगों की मौत हो गई, जबकि 5 लाख से ज्यादा लोगों का जीवन दूभर कर दिया है। हालात यह हैं कि अब तक गैस के दुष्प्रभाव का सटीक आकलन तक नहीं किया जा सका है। 20 पीड़ित बस्तियाँ जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं और कई लोग इलाज के लिए भटक रहे हैं। 2 और 3 दिसम्बर 1984 की मध्य रात्रि में यूनियन कार्बाइड के टैंक नंबर 610 में से हुआ गैस का रिसाव आज भी भोपालियों को साल रहा है।&lt;br /&gt;हर जख्म समय के साथ भर जाते है, लेकिन गैसकांड की हर बरसी पर भोपाल के जख्म ताजा हो जाते हैं। हजारों लोगों के लिए इलाज और राहत की उम्मीद एक साल पुरानी हो जाती है। आँकड़ों की मानें तो इस हादसे में कुल 5 लाख 74 हजार लोग घायल हुए। मुआवजे को आधार बनाए तो कुल 15 हजार 274 लोगों की जान गई, जबकि मृतकों का सरकारी आंकडा 3000 से अधिक है। &lt;br /&gt;गैर सरकारी संगठनों के अनुसार गैस ने 30 हजार लोगों की जान ली है। मुआवजे के लिए कुल 10 लाख 29 हजार 515 प्रकरण मिले, जिनमें से 5 लाख 75 हजार लोगों को 1536 करोड़ का मुआवजा दिया गया।&lt;br /&gt;25 साल बाद अब हालात यह हैं कि मामले के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। दूसरी तरफ गैस पीड़ित नित नई बीमारियों के शिकार हो रहे है। गाँधी मेडिकल कॉलेज ने इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च को एक दर्जन से ज्यादा शोध प्रस्ताव भेजे हैं, लेकिन एक पर भी अनुमति नहीं मिली है। &lt;br /&gt;अब तक तो गैस के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर घातक असर का पूरा आकलन भी नहीं हो पाया है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद और तय समय सीमा पूरी हो जाने के 5 साल बाद भी गैस पीड़ित बस्तियों में शुद्ध पेयजल पाइप लाइन से नहीं पहुँचाया जा सका है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3857395425335515762-2510159355730045622?l=arunbanchhor.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/feeds/2510159355730045622/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2510159355730045622'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3857395425335515762/posts/default/2510159355730045622'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://arunbanchhor.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='भोपाल गैस त्रासदी पर विशेष'/><author><name>अरुण बंछोर</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12855170553657623179</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='21' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/S9UxLRbJodI/AAAAAAAAAAs/XkAbSpo7e04/S220/banchhor+ji.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_UDflgdaWy-I/TPZ-TqVnoiI/AAAAAAAABgs/UoXsgOwoJeI/s72-c/bitia.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3857395425335515762.post-5020408329423428515</id><published>2010-12-01T22:16:00.001+05:30</published><updated>2010-12-01T22:18:23.249+05:30</updated><title type='text'>विचार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;जगन की चुनौती&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नवभारत टाइम्स  &lt;br /&gt;कांग्रेस कह रही है कि आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी के इस्तीफे से वहां उसकी सरकार की सेहत पर कोई असर नही &lt;br /&gt;ं पड़ेगा, लेकिन पहले से कई मुश्किलों में घिरी कांग्रेस के लिए वहां की स्थितियों को संभाल पाना बहुत आसान भी नहीं होगा। करीब 15 महीने पहले अपने पिता की विमान दुर्घटना के बाद से ही जगन आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने की महत्वाकांक्षा पाले हुए थे। लेकिन राजनीति में अनुभवहीन जगन को इतना बड़ा पद सौंपने में कांग्रेस को दुविधा महसूस हुई। उनकी जगह रोसैय्या को मुख्यमंत्री बना तो दिया गया पर कांग्रेस नेतृत्व जगन की मंशा पर लगाम लगाने में असफल रहा। &lt;br /&gt;वह इतने दिनों तक उनकी पार्टी विरोधी गतिविधियां भी सहन करता रहा। हाल में जगमोहन ने अपने टीवी चैनल के जरिए भी मनमोहन सिंह, राहुल गांधी और सोनिया के खिलाफ मोर्चा खोला था। पर उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की जगह रोसैय्या से यह कहते हुए इस्तीफा ले लिया गया कि वह जगन की हरकतों पर लगाम नहीं लगा पाए। पार्टी ने रोसैय्या की जगह स्पीकर किरण रेड्डी को मुख्यमंत्री बनाया और जगन के चाचा वाई. एस. विवेकानंद रेड्डी को भी कोई शीर्ष पद या मंत्रालय देने की पेशकश कर दी। &lt;br /&gt;इससे जगमोहन ने और आहत महसूस किया और आरोप लगाया कि इस तरह कांग्रेस उनके परिवार में फूट डालने की कोशिश कर रही है। राजनीति में जगन अनुभवहीन हैं, पर अपने पिता के कार्यों की वजह से राज्य में उन्हें कुछ सहानुभूति जरूर हासिल है। उनका दावा है कि 20-25 विधायक उनके साथ हैं। विधानसभा की 294 सीटों में से कांग्रेस के पास अभी 155 सीटें हैं, जबकि बहुमत के लिए 148 सीटें चाहिए। ऐसे में यदि 10 विधायक भी जगन के साथ चले जाते हैं, तो इससे प्रदेश सरकार अस्थिर हो सकती है। &lt;br /&gt;जगन ने यूथ श्रमिक रैयत (वाईएसआर)-कांग्रेस के नाम से जल्द ही एक नई पार्टी बनाने की घोषणा भी की है। इस तरह आंध्र और देश की राजनीति में जगन कोई मुकाम भले ना बना पाएं, लेकिन इस तरह तात्कालिक रूप से वे कुछ हलचल अवश्य पैदा कर सकते हैं। कांग्रेस के लिए इस चुनौती से निपटना आसान नहीं है क्योंकि उसके लिए अकेले आंध्र प्रदेश ही समस्या नहीं है, दिल्ली और महाराष्ट्र में भी उसकी हालत ठीक नहीं है। वहां उसकी सरकारें करप्शन के आरोपों से जूझ रही हैं। बिहार में हाल के चुनावों में उसका जो हाल हुआ है, उससे भी पार्टी की छवि कमजोर हुई है। अगर कांग्रेस आंध्र प्रदेश के हालात संभालने में विफल रही, तो दक्षिण भारत में उसके अस्तित्व के लिए संकट पैदा हो सकता है, क्योंकि दक्षिण में आंध्र अकेला राज्य है जहां उसकी सरकार है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कानून काफी नहीं&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;महिलाओं पर तेजाब फेंकने वालों के खिलाफ सरकार सख्त कदम उठाना चाहती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक उच्च &lt;br /&gt;स्तरीय समिति ने इसके लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में संशोधन का प्रस्ताव रखा है। समिति ने एसिड अटैक करने वालों के लिए दस साल की कैद और दस लाख रुपये जुर्माने की सिफारिश की है। कहना मुश्किल है कि यह प्रस्ताव कब संसद में लाया जाएगा और कब इस पर कानून बन पाएगा। एसिड अटैक को लेकर सख्त कानून लाने की मांग अरसे से की जा रही है, मगर सरकार अन्य दूसरे मामलों की तरह इसे भी अपनी ही गति से निपटा रही है। ठीक है कि कानून बनाने की अपनी निश्चित प्रक्रिया होती है, मगर सरकार इस समस्या से अपने स्तर पर भी कड़ाई से निपट सकती है। &lt;br /&gt;दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। अपराध के तरीके नए हो रहे हैं, उन्हें रोकने वाला कानून बाबा आदम के जमाने का ह
