चिड़ा-चिड़िया की कहानी
देवेश सिंगी
एक चिड़िया के जोड़े को अंडे देने के लिए घोंसला बनाना था। उन्होंने एक बूढ़े साधू से पूछकर उसकी लम्बी दाढ़ी में अपना घोंसला बनाया और उसमें दो अंडे दिए। एक शाम को चिड़िया अंडे सेने लगी थी और चिड़ा चिड़िया के लिए खाने की तलाश में गया। एक बड़ा-सा सुंदर कमल का फूल देखकर वह उसपर बैठकर उसका मीठा रस चूसने लगा। तभी आकाश काला होने लगा, रात घिरी और कमल बंद हो गया। चिड़ा भी उसमें बंद हो गया। वह जब घोंसले पर वापस नहीं आया, तो चिड़िया समझी कि वह उसे छोड़कर कहीं ओर चला गया है।
दूसरे दिन सुबह जब कमल फिर से खिला तो चिड़ा हांफता-कांपता हुआ वापस घोंसले में पहुंचा। चिड़िया बहुत नाराज़ थी। चिड़े ने लाख समझाया कि वह किस तरह कमल के अंदर बंद हो गया था। परंतु चिड़िया मानने को तैयार नहीं थी। चिड़ा चतुर था बोला, ‘मैं सौगंध खाकर कहता हूं कि यदि मैं झूठ बोल रहा हूं तो अभी इसी समय इस बूढ़े साधू का सिर कटकर धरती पर गिर जाए।’ साधू ने सुना तो वह गुस्सा हो गया। उसने उन्हें अपनी दाढ़ी में घोंसला बनाने की जगह दी और वह उसी के मरने की बात कह रहा है। उसने उसी समय घोंसला अपनी दाढ़ी में से निकाला और दूर एक घाटी में फेंक दिया। घोंसला घनी लम्बी घास पर जा गिरा। चिड़ा चिड़ी दोनों घबराए। लड़ना भूलकर वे उड़कर अंडों के पास गए। अंडे सुरक्षित देखकर उनकी जान में जान आई।
कुछ समय बाद अंडे फूटे और उसमें से प्यारे से बच्चे निकलकर चीं-चीं करने लगे। वे दोनों खुश थे परंतु एक दिन कुछ लोग घाटी में आए और सफाई करने के लिए घास में आग लगा दी। बच्चे बहुत छोटे-छोटे थे। उनके तो पंख भी नहीं निकले थे। दोनों क्या करें? आग लगातार पास आ रही थी। चिड़िया ने कहा, ‘मैं बच्चों के ऊपर और तुम नीचे रहो। हम अपने बच्चों के साथ ही मरेंगे। मैं पहले मरुंगी।’
परंतु चिड़ा नहीं माना, ‘नहीं, मैं ऊपर रहता हूं, तुम नीचे रहो। पहले मैं मरुंगा।’ अंत में यही तय हुआ कि चिड़ा ऊपर रहेगा। आग के नज़दीक आते ही चिड़ा फुर्ती से उड़ गया। आग ने घोंसले को जला दिया। चिड़िया और बच्चे मर गए। चिड़िया मर कर दूसरे जन्म एक राजा के यहां पैदा हुई परंतु उसे यह याद रहा कि कैसे धोखा देकर चिड़ा उन्हें मरने के लिए छोड़कर उड़ गया था। वह दुनिया के हर आदमी से इतनी नाराज़ थी कि वह किसी से बोलती भी न थी। चिड़ा भी कुछ समय बाद मर कर एक आदमी के रूप में पैदा हुआ। राजा ने घोषणा कर रखी थी, जो राजकुमारी को बात करना सिखा देगा वह उसका विवाह भी उससे कर देगा।
एक नवयुवक ने घोषणा सुनी। वह एक शोवा (बहुत बुद्धिमान व्यक्ति जिसे सभी कुछ मालूम होता है) के पास गया और उसकी मदद मांगी। शोवा चिड़िया के जलने वाली बात जानता था। उसने कहा, ‘तुम्हें याद है कि जब घाटी की बड़ी-बड़ी घास में आग लगी थी तब तुम चिड़िया और बच्चों को जलने के लिए छोड़कर उड़ गए थे। तुम वहां जाओ राजा के समाने तुम उसे चिड़ा-चिड़िया की वही कहानी सुनाना परंतु ध्यान रखना, यह कहने के बजाय कि तुम चिड़िया और बच्चों को जलता छोड़ कर उड़ गए थे, कहना कि चिड़िया घोसले के ऊपर थी और वह तुम्हें व बच्चों को जलने के लिए छोड़कर उड़ गई थी।’
वह नवयुवक राजा को साथ लेकर राजकुमारी के पास गया। और अपनी कहानी सुनाने लगा। बहुत समय पहले एक सुंदर चिड़िया का जोड़ा था। वे एक दूसरे को बहुत चाहते थे। उन्होंने मिलकर एक बूढ़े साधू की लम्बी दाढ़ी में घोंसला बनाया परंतु किसी बात पर गुस्सा होकर साधू ने घोंसला निकालकर घाटी की बड़ी-बड़ी घास पर फेंक दिया। कुछ लोगों ने घाटी की घास में आग लगा दी तो चिड़े ने चिड़िया से कहा मैं ऊपर रहता हूं तुम नीचे रहो। हम बच्चों के साथ ही मरेंगे। परंतु चिड़िया नहीं मानी। और उसने खुद ऊपर रहने की ज़िद की। परंतु जब आग पास आई तो वह फुर्र से उड़ गई। बेचारा चिड़ा बच्चों के साथ जलकर मर गया। राजकुमारी युवक के इस झूठ को सहन न कर सकी। वह गुस्से से लाल होकर चिल्ला पड़ी, ‘झूठ, बिलकुल झूठ। तेरी बात बिलकुल झूठ है। ऊपर चिड़ा था और वह धोखा देकर उड़ गया था।’
‘नहीं राजकुमारी जी, सच्चाई यही है कि चिड़िया ऊपर थी और मरने से डरकर उड़ गई थी।’ युवक ने फिर कहा।
वे दोनों ‘कौन बचा, कौन जला’ पर बहस करने लगे। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। राजा चकित होकर उन्हें देख रहा था। अंत में उसने उन्हें रोककर कहा, ‘नौजवान, तुम्हारी इस चिड़ा-चिड़ी की कहानी का कुछ-कुछ मतलब मैं समझ गया हूं। लगता है तुमने जानबूझकर चिड़िया को धोखा दिया था परंतु तुम राजकुमारी को बुलवाने में सफल रहे हो अत: वादे के अनुसार मैं राजकुमारी का विवाह तुमसे करता हूं। इस बार उसे धोखा मत देना।’
युवक ने मुस्कुराकर राजकुमारी की ओर देखा। फिर दोनों का विवाह हो गया।
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मे दैनिक राष्ट्रीय हिंदी मेल का सम्पादक हूँ.खुल्लम खुल्ला मेरी अभिव्यक्ति है .अपना विचार खुलेआम दुनिया के सामने व्यक्त करने का यह सशक्त माध्यम है.अरुण बंछोर-मोबाइल -9074275249 ,7974299792 सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे, कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
मंगलवार, 17 मई 2011
कहानी
स्वर्ग का चाचा
Bhaskar
बहुत पहले की बात है। धरती पर दो सालों तक बिलकुल वर्षा नहीं हुई। अकाल पड़ गया।
अपने तालाब को सूखता देख कर मेढ़क मेंढक को चिंता हुई। उसने सोचा, अगर ऐसा रहा तो वह भूखा मर जाएगा। उसने सोचा कि इस अकाल के बारे स्वर्ग में जाकर वहां के राजा को बताया जाए।
साहस कर मेंढक अकेला ही स्वर्ग की ओर चल पड़ा। राह में उसे मधुमक्खियों का एक झुंड मिला। मक्खियों के पूछने पर उसने बताया कि भूखे मरने से अच्छा है कि कुछ किया जाए। मक्खियों का हाल भी अच्छा नहीं था। जब फूल ही नहीं रहे तो उन्हें शहद कहां से मिलता। वे भी मेंढक के साथ चल दीं।
आगे जाने पर उन्हें एक मुर्गा मिला। मुर्गा बहुत उदास था। जब फसल ही नहीं हुई, तो उसे दाने कहां से मिलते। उसे खाने को कीड़े भी नहीं मिल रहे थे। इसलिए मुर्गा भी उनके साथ चल दिया।
अभी वे सब थोड़ा ही आगे गए थे कि एक खूंखार शेर मिल गया। वह भी बहुत दुखी था। उसे खाने को जानवर नहीं मिल रहे थे। उनकी बातें सुन शेर भी उनके साथ हो लिया।
कई दिनों तक चलने के बाद वे स्वर्ग में पहुंचे। मेंढक ने अपने सभी साथियों को राजा के महल के बाहर ही रुकने को कहा। उसने कहा कि पहले वह भीतर जाकर देख आए कि राजा कहां है।
मेंढक उछलता हुआ महल के भीतर चला गया। कई कमरों में से होता हुआ वह राजा तक पहुंच ही गया। राजा अपने कमरे में बैठा परियों के साथ बातें कर रहा था। मेंढक को क्रोध आ गया। उसने लम्बी छलांग लगाई और उनके बीच पहुंच गया। परियां एकदम चुप हो गईं। राजा को एक छोटे से मेंढक की करतूत देख गुस्सा आ गया।
‘पागल जीव! तुमने हमारे बीच आने का साहस कैसे किया?’ राजा चिल्लाया। परंतु मेंढक बिलकुल नहीं डरा। उसे तो धरती पर भी भूख से मरना था। जब मौत साफ दिखाई दे तो हर कोई निडर हो जाता है।
राजा फिर चीखा। पहरेदार भागे आए ताकि मेंढक को पकड़ कर महल से बाहर निकाल दें। मगर इधर-उधर उछलता मेंढक उनकी पकड़ में नहीं आ रहा था। मेंढक ने मधुमक्खियों को आवाज दी। वे सब भी अंदर आ गईं। वे सब पहरेदारों के चेहरों पर डंक मारने लगीं। उनसे बचने के लिए सभी पहरेदार भाग गए।
राजा हैरान था। तब उसने तूफान के देवता को बुलाया। पर मुर्गे ने शोर मचाया और पंख फड़फड़ा कर उसे भी भगा दिया। तब राजा ने अपने कुत्तों को बुलाया। उनके लिए भूखा खूंखार शेर पहले से ही तैयार बैठा था।
अब राजा ने डर कर मेंढक की ओर देखा। मेंढक ने कहा, ‘महाराज! हम तो आपके पास प्रार्थना करने आए थे। धरती पर अकाल पड़ा हुआ है। हमें वर्षा चाहिए।’
राजा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा, ‘अच्छा चाचा! वर्षा को भेज देता हूं।’
जब वे सब साथी धरती पर वापस आए तो वर्षा भी उनके साथ थी। इसलिए वियतनाम में मेंढक को ‘स्वर्ग का चाचा’ कह कर पुकारा जाता है। लोगों को जब मेंढक की आवाज़ सुनाई देती है वे कहते हैं, ‘चाचा आ गया तो वर्षा भी आती होगी।’
Bhaskar
बहुत पहले की बात है। धरती पर दो सालों तक बिलकुल वर्षा नहीं हुई। अकाल पड़ गया।
अपने तालाब को सूखता देख कर मेढ़क मेंढक को चिंता हुई। उसने सोचा, अगर ऐसा रहा तो वह भूखा मर जाएगा। उसने सोचा कि इस अकाल के बारे स्वर्ग में जाकर वहां के राजा को बताया जाए।
साहस कर मेंढक अकेला ही स्वर्ग की ओर चल पड़ा। राह में उसे मधुमक्खियों का एक झुंड मिला। मक्खियों के पूछने पर उसने बताया कि भूखे मरने से अच्छा है कि कुछ किया जाए। मक्खियों का हाल भी अच्छा नहीं था। जब फूल ही नहीं रहे तो उन्हें शहद कहां से मिलता। वे भी मेंढक के साथ चल दीं।
आगे जाने पर उन्हें एक मुर्गा मिला। मुर्गा बहुत उदास था। जब फसल ही नहीं हुई, तो उसे दाने कहां से मिलते। उसे खाने को कीड़े भी नहीं मिल रहे थे। इसलिए मुर्गा भी उनके साथ चल दिया।
अभी वे सब थोड़ा ही आगे गए थे कि एक खूंखार शेर मिल गया। वह भी बहुत दुखी था। उसे खाने को जानवर नहीं मिल रहे थे। उनकी बातें सुन शेर भी उनके साथ हो लिया।
कई दिनों तक चलने के बाद वे स्वर्ग में पहुंचे। मेंढक ने अपने सभी साथियों को राजा के महल के बाहर ही रुकने को कहा। उसने कहा कि पहले वह भीतर जाकर देख आए कि राजा कहां है।
मेंढक उछलता हुआ महल के भीतर चला गया। कई कमरों में से होता हुआ वह राजा तक पहुंच ही गया। राजा अपने कमरे में बैठा परियों के साथ बातें कर रहा था। मेंढक को क्रोध आ गया। उसने लम्बी छलांग लगाई और उनके बीच पहुंच गया। परियां एकदम चुप हो गईं। राजा को एक छोटे से मेंढक की करतूत देख गुस्सा आ गया।
‘पागल जीव! तुमने हमारे बीच आने का साहस कैसे किया?’ राजा चिल्लाया। परंतु मेंढक बिलकुल नहीं डरा। उसे तो धरती पर भी भूख से मरना था। जब मौत साफ दिखाई दे तो हर कोई निडर हो जाता है।
राजा फिर चीखा। पहरेदार भागे आए ताकि मेंढक को पकड़ कर महल से बाहर निकाल दें। मगर इधर-उधर उछलता मेंढक उनकी पकड़ में नहीं आ रहा था। मेंढक ने मधुमक्खियों को आवाज दी। वे सब भी अंदर आ गईं। वे सब पहरेदारों के चेहरों पर डंक मारने लगीं। उनसे बचने के लिए सभी पहरेदार भाग गए।
राजा हैरान था। तब उसने तूफान के देवता को बुलाया। पर मुर्गे ने शोर मचाया और पंख फड़फड़ा कर उसे भी भगा दिया। तब राजा ने अपने कुत्तों को बुलाया। उनके लिए भूखा खूंखार शेर पहले से ही तैयार बैठा था।
अब राजा ने डर कर मेंढक की ओर देखा। मेंढक ने कहा, ‘महाराज! हम तो आपके पास प्रार्थना करने आए थे। धरती पर अकाल पड़ा हुआ है। हमें वर्षा चाहिए।’
राजा ने उससे पीछा छुड़ाने के लिए कहा, ‘अच्छा चाचा! वर्षा को भेज देता हूं।’
जब वे सब साथी धरती पर वापस आए तो वर्षा भी उनके साथ थी। इसलिए वियतनाम में मेंढक को ‘स्वर्ग का चाचा’ कह कर पुकारा जाता है। लोगों को जब मेंढक की आवाज़ सुनाई देती है वे कहते हैं, ‘चाचा आ गया तो वर्षा भी आती होगी।’
गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
ब्लॉग बतंगड़ से
भूषण को हम भगाएंगे कीचड़ उछालकर
रमाशंकर सिंह
भ्रष्टाचार से त्रस्त देश की सामान्य जनता के परित्राण के लिए अन्ना हजारे नामक एक फकीर ने दिल्ली के जंतर-मंतर चौराहे पर बैठ कर जन लोकपाल बिल के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया, जिसे देशव्यापी समर्थन मिला और अनशन के पांचवें दिन ही सरकार को घुटने टेकने पड़े जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने ड्राफ्टिंग कमिटी के गठन की अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना में सरकार की ओर से पांच भीमकाय मंत्रियों-प्रणव मुखर्जी (वित्त मंत्री)-अध्यक्ष, पी. चिदंबरम (गृह मंत्री), वीरप्पा मोइली (विधि मंत्री), कपिल सिब्बल (मानव संसाधन एवं संचार मंत्री) तथा सलमान खुर्शीद (अल्पसंख्यक मंत्री) सदस्य- को कमिटी में नामजद किया गया और सिविल सोसायटी की ओर से जिन पांच कृशकाय लोगों को शामिल किया गया उनमें भूतपूर्व विधि मंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांतिभूषण (सह- अध्यक्ष) उनके पुत्र प्रशांत भूषण, पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़े, अन्ना हजारे और सामाजिक कार्यकर्ता तथा इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट के अगुआ अरविंद केजरीवाल सदस्य हैं।
ड्राफ्टिंग कमिटी बनाने की प्रक्रिया में अन्ना के प्रतिनिधियों की कपिल सिब्बल के साथ बातचीत के दौरान कुछेक कांग्रेसी शुभचिंतकों, मंत्रियों की ओर से जिस तरह की बयानबाजी की गई उसे मीडिया में देख-सुन कर कोई भी संवेदनशील आदमी यह सोचने पर विवश हो सकता था कि हे राम! इन्हें क्षमा कर देना क्योंकि इन निर्बुद्धों को खुद ही यह मालूम नहीं कि ये क्या और क्यों कह रहे हैं। मस्तिष्क मंथन के बाद अमृत या विषरूपी जो विचार सतह पर आया उसका लब्बोलुआब यह है कि इन भाई लोगों ने खुद को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार का सबसे बड़ा खैरख्वाह साबित करने की कोशिश की। मनु महाराज जो काफी दिनों तक अंतर्धान रहने के बाद राजनीतिक क्षितिज पर अचानक अवतरित हुए थे उन्होंने अपनी क्रोधातुर वाणी में कुतर्क किया कि अन्ना हजारे और उनकी टोली के लोग होते कौन हैं सरकार से अधिसूचना जारी करने की मांग करने वाले? किसने बनाया इन्हें सिविल सोसायटी का प्रतिनिधि? कुछ-कुछ इसी टोन में मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को बोलते सुना। हमेशा गंभीर और कभी-कभी हंसमुख दिखने वाली अम्बिका सोनी का वह तमतमाया चेहरा आज भी मेरी आंखों के सामने नाच-नाच जाता है। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में मनीष तिवारी का तो जोश में होश खो देना समझ में आता है, लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे परिपक्व और संवेदनशील नेता अन्ना और उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को लेकर जिस तरह के बयान दे रहे हैं उससे तो यही लगता है कि 125 साल पुरानी यह राजनीतिक नाव अविश्वसनीयता के भार से दिन-ब-दिन दबती जा रही है और कभी भी डूब सकती है। नीति का एक श्लोक बरबस याद गया है जिसे पाठकों से शेयर करना मैं जरूरी मानता हूं:
परोक्षे कार्यहंतारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्
वर्जयेतादृशं मित्रं विष कुंभं पयोमुखम्
इसका भावार्थ यह है कि पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुंह पर ठकुर सुहाती बोलने वाले मित्र उस मटके के समान हैं जिसके घट में विष और मुख में दूध भरा हुआ है, इनसे बचना चाहिए।
अब जरा भ्रष्टाचार की लड़ाई में अन्ना का साथ देने की सोनिया गांधी और कांग्रेस की सदाशयतारूपी विवशता पर भी एक नजर डालना समीचीन होगा। जिस प्रकार का अभूतपूर्व एवं देशव्यापी जनसमर्थन अन्ना हजारे के अनशन को मिल रहा था उसे देखते हुए कांग्रेस के कर्णधारों के हाथ-पांव फूलने लगे थे। उन्हें लगा कि अगर इस समय अन्ना के आंदोलन को अधिक समय तक चलने दिया गया तो पांच राज्यों में आसन्न चुनावों में कांग्रेस की लुटिया डूब सकती है। सरकार को इस बात की भी खुफिया रिपोर्टें मिल रही थीं कि एक ओर योगी बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को यह समझाने में सफलता प्राप्त कर रहे थे कि उनकी सभी समस्याओं का कारण भ्रष्टाचार और बेईमान नेता हैं, जिन्होंने जनता के खून-पसीने की कमाई को लूट-लूट कर विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है, दूसरी ओर बैरागी बाबा अन्ना हजारे दिल्ली दरबार की छाती पर छोलदारी लगाकर अनशन पर बैठ गए हैं और जान देने पर आमादा हैं। इसलिए उन्होंने तात्कालिक उपाय के तौर पर अनशन को समाप्त कराने और बाद में अन्ना की टोली से तकनीकी तौर पर निपट लेने की रणनीति अपनाई। कपिल सिब्बल (परोक्षत:) दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी प्रत्यक्षत: और द ग्रेट फिक्सर अमर सिंह का सीडी अभियान इसी रणनीति के तहत चलाया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य यह है कि नकटों की टोली के सामने नाक वाले सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को टिकने न दिया जाए। थक-हार कर बेचारे आत्मसमर्पण करते हुए नैतिकता से तौबा कर लेंगे और कमिटी के सरकारी सदस्यों को अपनी पीठ थपथपाते हुए यह कहने का मौका मिल जाएगा कि 'हम तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अन्ना का साथ देने को तैयार थे, लेकिन जब वे खुद ही दुम दबा कर भाग गए तो हम क्या करें?' यानी नतीजा हासिल सिफर। लोकपाल बिल का जिन्न एक बार फिर बोतल में बंद हो जाएगा और बाद में किसी सियासी लाभ के मद्दे नजर उसे दुबारा बाहर निकाला जा सकेगा।
चरित्र हनन अभियान के तहत जिस तरह कांग्रेस के कुछ हलकों से शान्ति भूषण की सम्पत्ति संबंधी बयान आ रहे हैं वे निराधार नहीं हैं। ऐसे बयानों की वजह कमिटी के गैर सरकारी सदस्यों या अन्ना-टोली की वह पहलकदमी है जिसके तहत उन्होंने पहली मीटिंग में जाने से पहले ही अपनी सम्पत्ति की घोषणा कर दी। कांग्रेस के किसी सदस्य ने न तो अब तक अपनी सम्पत्ति की घोषणा की और न ही उनका घोषणा करने का कोई विचार है। बेचारे करें भी तो कैसे, अन्ना ने सम्पत्ति घोषणा रूपी ट्रंप कार्ड इतनी जल्दी चल दिया कि उन्हें हिसाब-किताब लगाने का मौका ही नहीं मिल पाया। कैसे बताएं कि कितनी दौलत सफेद है और कितनी काली। कितनी भारत में है और कितनी की स्विस बैंक करता है रखवाली। इसलिए फिलहाल सबसे कारगर नुस्खा कांग्रेसियों को यही रास आ रहा है कि वे देश के सभी भ्रष्टाचारियों, बेईमानों को यह संदेश दें कि 'ओ बेईमान तू न तनिक भी मलाल कर/भूषण को हम भगाएंगे कीचड़ उछाल कर।'
रमाशंकर सिंह
भ्रष्टाचार से त्रस्त देश की सामान्य जनता के परित्राण के लिए अन्ना हजारे नामक एक फकीर ने दिल्ली के जंतर-मंतर चौराहे पर बैठ कर जन लोकपाल बिल के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया, जिसे देशव्यापी समर्थन मिला और अनशन के पांचवें दिन ही सरकार को घुटने टेकने पड़े जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने ड्राफ्टिंग कमिटी के गठन की अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना में सरकार की ओर से पांच भीमकाय मंत्रियों-प्रणव मुखर्जी (वित्त मंत्री)-अध्यक्ष, पी. चिदंबरम (गृह मंत्री), वीरप्पा मोइली (विधि मंत्री), कपिल सिब्बल (मानव संसाधन एवं संचार मंत्री) तथा सलमान खुर्शीद (अल्पसंख्यक मंत्री) सदस्य- को कमिटी में नामजद किया गया और सिविल सोसायटी की ओर से जिन पांच कृशकाय लोगों को शामिल किया गया उनमें भूतपूर्व विधि मंत्री एवं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांतिभूषण (सह- अध्यक्ष) उनके पुत्र प्रशांत भूषण, पूर्व जस्टिस संतोष हेगड़े, अन्ना हजारे और सामाजिक कार्यकर्ता तथा इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट के अगुआ अरविंद केजरीवाल सदस्य हैं।
ड्राफ्टिंग कमिटी बनाने की प्रक्रिया में अन्ना के प्रतिनिधियों की कपिल सिब्बल के साथ बातचीत के दौरान कुछेक कांग्रेसी शुभचिंतकों, मंत्रियों की ओर से जिस तरह की बयानबाजी की गई उसे मीडिया में देख-सुन कर कोई भी संवेदनशील आदमी यह सोचने पर विवश हो सकता था कि हे राम! इन्हें क्षमा कर देना क्योंकि इन निर्बुद्धों को खुद ही यह मालूम नहीं कि ये क्या और क्यों कह रहे हैं। मस्तिष्क मंथन के बाद अमृत या विषरूपी जो विचार सतह पर आया उसका लब्बोलुआब यह है कि इन भाई लोगों ने खुद को सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की सरकार का सबसे बड़ा खैरख्वाह साबित करने की कोशिश की। मनु महाराज जो काफी दिनों तक अंतर्धान रहने के बाद राजनीतिक क्षितिज पर अचानक अवतरित हुए थे उन्होंने अपनी क्रोधातुर वाणी में कुतर्क किया कि अन्ना हजारे और उनकी टोली के लोग होते कौन हैं सरकार से अधिसूचना जारी करने की मांग करने वाले? किसने बनाया इन्हें सिविल सोसायटी का प्रतिनिधि? कुछ-कुछ इसी टोन में मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को बोलते सुना। हमेशा गंभीर और कभी-कभी हंसमुख दिखने वाली अम्बिका सोनी का वह तमतमाया चेहरा आज भी मेरी आंखों के सामने नाच-नाच जाता है। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में मनीष तिवारी का तो जोश में होश खो देना समझ में आता है, लेकिन दिग्विजय सिंह जैसे परिपक्व और संवेदनशील नेता अन्ना और उनकी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को लेकर जिस तरह के बयान दे रहे हैं उससे तो यही लगता है कि 125 साल पुरानी यह राजनीतिक नाव अविश्वसनीयता के भार से दिन-ब-दिन दबती जा रही है और कभी भी डूब सकती है। नीति का एक श्लोक बरबस याद गया है जिसे पाठकों से शेयर करना मैं जरूरी मानता हूं:
परोक्षे कार्यहंतारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्
वर्जयेतादृशं मित्रं विष कुंभं पयोमुखम्
इसका भावार्थ यह है कि पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले और मुंह पर ठकुर सुहाती बोलने वाले मित्र उस मटके के समान हैं जिसके घट में विष और मुख में दूध भरा हुआ है, इनसे बचना चाहिए।
अब जरा भ्रष्टाचार की लड़ाई में अन्ना का साथ देने की सोनिया गांधी और कांग्रेस की सदाशयतारूपी विवशता पर भी एक नजर डालना समीचीन होगा। जिस प्रकार का अभूतपूर्व एवं देशव्यापी जनसमर्थन अन्ना हजारे के अनशन को मिल रहा था उसे देखते हुए कांग्रेस के कर्णधारों के हाथ-पांव फूलने लगे थे। उन्हें लगा कि अगर इस समय अन्ना के आंदोलन को अधिक समय तक चलने दिया गया तो पांच राज्यों में आसन्न चुनावों में कांग्रेस की लुटिया डूब सकती है। सरकार को इस बात की भी खुफिया रिपोर्टें मिल रही थीं कि एक ओर योगी बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को यह समझाने में सफलता प्राप्त कर रहे थे कि उनकी सभी समस्याओं का कारण भ्रष्टाचार और बेईमान नेता हैं, जिन्होंने जनता के खून-पसीने की कमाई को लूट-लूट कर विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है, दूसरी ओर बैरागी बाबा अन्ना हजारे दिल्ली दरबार की छाती पर छोलदारी लगाकर अनशन पर बैठ गए हैं और जान देने पर आमादा हैं। इसलिए उन्होंने तात्कालिक उपाय के तौर पर अनशन को समाप्त कराने और बाद में अन्ना की टोली से तकनीकी तौर पर निपट लेने की रणनीति अपनाई। कपिल सिब्बल (परोक्षत:) दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी प्रत्यक्षत: और द ग्रेट फिक्सर अमर सिंह का सीडी अभियान इसी रणनीति के तहत चलाया जा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य यह है कि नकटों की टोली के सामने नाक वाले सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों को टिकने न दिया जाए। थक-हार कर बेचारे आत्मसमर्पण करते हुए नैतिकता से तौबा कर लेंगे और कमिटी के सरकारी सदस्यों को अपनी पीठ थपथपाते हुए यह कहने का मौका मिल जाएगा कि 'हम तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अन्ना का साथ देने को तैयार थे, लेकिन जब वे खुद ही दुम दबा कर भाग गए तो हम क्या करें?' यानी नतीजा हासिल सिफर। लोकपाल बिल का जिन्न एक बार फिर बोतल में बंद हो जाएगा और बाद में किसी सियासी लाभ के मद्दे नजर उसे दुबारा बाहर निकाला जा सकेगा।
चरित्र हनन अभियान के तहत जिस तरह कांग्रेस के कुछ हलकों से शान्ति भूषण की सम्पत्ति संबंधी बयान आ रहे हैं वे निराधार नहीं हैं। ऐसे बयानों की वजह कमिटी के गैर सरकारी सदस्यों या अन्ना-टोली की वह पहलकदमी है जिसके तहत उन्होंने पहली मीटिंग में जाने से पहले ही अपनी सम्पत्ति की घोषणा कर दी। कांग्रेस के किसी सदस्य ने न तो अब तक अपनी सम्पत्ति की घोषणा की और न ही उनका घोषणा करने का कोई विचार है। बेचारे करें भी तो कैसे, अन्ना ने सम्पत्ति घोषणा रूपी ट्रंप कार्ड इतनी जल्दी चल दिया कि उन्हें हिसाब-किताब लगाने का मौका ही नहीं मिल पाया। कैसे बताएं कि कितनी दौलत सफेद है और कितनी काली। कितनी भारत में है और कितनी की स्विस बैंक करता है रखवाली। इसलिए फिलहाल सबसे कारगर नुस्खा कांग्रेसियों को यही रास आ रहा है कि वे देश के सभी भ्रष्टाचारियों, बेईमानों को यह संदेश दें कि 'ओ बेईमान तू न तनिक भी मलाल कर/भूषण को हम भगाएंगे कीचड़ उछाल कर।'
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011
भव्य शादी करने से पहले जरा सोचिए!
- विशाखा दत्त
करीबी सहेली ने अपने घर का एक किस्सा सुनायाः उसके मौसाजी बैंक में साधारण-सी नौकरी करते थे। उन्होंने अपनी बेटी को बड़े लाड़-प्यार से पाला। जब उसकी शादी का वक्त आया तो बरसों से मन में संजोए सपने को साकार करने के लिए बड़ी 'धूमधाम' से लोन लेकर शादी की।

कुछ दिनों बाद वे इतने बीमार हो गए कि समय पूर्व रिटायरमेंट लेकर नौकरी छोड़ना पड़ी। पीएफ का आधा पैसा बीमारी के इलाज में लग गया। शादी की धूमधाम के लिए लिया लोन उनके लिए अब तक मुसीबत बना हुआ है। इस किस्से को सुन स्मृतियों में सुप्त एक विवाह समारोह बरबस ही याद आ गया।
6 माह पहले मेरे एक रिश्तेदार के बेटे ने आर्थिक संपन्नता के बावजूद अपनी शादी बहुत ही सादे तरीके से की। शादी में करीबी रिश्तेदारों के बीच फेरे की रस्म हुई। महँगे परिधानों, आभूषणों, रोशनी से जगमगाते मैरिज हॉल के बिना घर पर ही हुए एक सादा समारोह को देखकर मन को बहुत सुकून मिला।
वर निकासी न होने के कारण न तो ट्रैफिक जाम हुआ, न शादियों के आठ दिन पहले से शुरू होने वाले गीत-संगीत से पड़ोसी को परेशानी और न ही रिसेप्शन में भरी की भरी थालियों में छोड़ी गई जूठन से भोजन की बर्बादी हुई। साथ ही यह शादी पर्यावरण हितैषी भी लगी, क्योंकि उसमें डिस्पोजेबल का इस्तेमाल भी सीमित मात्रा में ही हुआ था। मन में पूरे समय यही विचार आता रहा कि काश देश में इस ढंग से शादियाँ करने का चलन बढ़े!
कुछ दिनों पूर्व एक राजनेता के बेटे को उपहार में हेलिकॉप्टर मिला और यह भव्य शादी अखबारों की सुर्खियों में छाई रही। भारत में अक्सर उद्योगपतियों, राजनेताओं और प्रसिद्घ व्यक्तियों की शादियाँ चर्चा का विषय बनती हैं। इन भव्य शादियों में करोड़ों रुपए शानो-शौकत और दिखावे पर पानी की तरह बहाए जाते हैं।
शादियों की भव्यता अब संपन्न परिवारों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि यह मध्यमवर्गीय परिवारों तक भी पहँच चुकी है। फिर भले ही इस भव्यता के शामियाने 'लोन' लेकर खड़े किए गए हों या फिर जिंदगीभर मेहनत से की गई गाढ़ी कमाई से।

भारत एक उत्सवप्रिय देश है। लोग दिल खोलकर उत्सवों में पैसा खर्च करते हैं, फिर चाहे वह उत्सव नवरात्रि का हो या शादी। इन भव्य शदियों की भव्यता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। ये उस देश की सचाई है, जहाँ आज भी लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं और कइयों को सिर्फ एक वक्त भोजन करके गुजारा करना पड़ता है, देश का आम आदमी आज भी आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है।
अब देश के युवाओं के लिए यह बात विचारणीय है कि शादियों पर इस तरह की फिजूलखर्ची कितनी जायज है? कुछ लोगों का मत है कि शादी जीवन में एक बार होती है तो कंजूसी क्यों की जाए! धूमधाम से शादी के फेर में ही लड़की के माता-पिता जिन्दगीभर कष्ट उठाते हैं।
सोचिए, गर शादियाँ सादगीपूर्वक होने लगें तो लोग बेटियों को भी बोझ नहीं समझेंगे। जन्म से ही उन्हें बेटी की शादी में होने वाले खर्च की चिंता नहीं सताएगी। इससे कन्या भ्रूण हत्याओं में भी कमी आएगी। युवाओं को चाहिए कि वे अपनी शादियों के भव्य तमाशे में पैसा बहाने की अपेक्षा समझदारी से पैसा खर्च करें। इसके लिए अपने माता-पिता से भी इस बात पर विचार करें। शादी में बेवजह दिखावे पर पैसा बर्बाद करने से तो बेहतर है कि किसी जरूरतमंद की मदद कर दी जाए।
शादी-ब्याह के मामले में लोग सोचते हैं कि अगर साधारण रूप से शादी कर दी तो समाज के लोग बातें बनाएँगे या इससे उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। प्रतिष्ठा की चिंता किए बगैर आप अच्छे कार्य की पहल तो कीजिए, फिर समाज वाले भी आपका अनुकरण करने लगेंगे।
आप चाहें तो शादी के कुछ ऐसे नए रिवाज भी शुरू कर सकते हैं, जैसे संपन्न नवदंपति एक जरूरतमंद को पढ़ाई या प्रोफेशनल कोर्स करवाने में मदद करें, किसी को रोजगार मुहैया करवाएँ।
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करीबी सहेली ने अपने घर का एक किस्सा सुनायाः उसके मौसाजी बैंक में साधारण-सी नौकरी करते थे। उन्होंने अपनी बेटी को बड़े लाड़-प्यार से पाला। जब उसकी शादी का वक्त आया तो बरसों से मन में संजोए सपने को साकार करने के लिए बड़ी 'धूमधाम' से लोन लेकर शादी की।

कुछ दिनों बाद वे इतने बीमार हो गए कि समय पूर्व रिटायरमेंट लेकर नौकरी छोड़ना पड़ी। पीएफ का आधा पैसा बीमारी के इलाज में लग गया। शादी की धूमधाम के लिए लिया लोन उनके लिए अब तक मुसीबत बना हुआ है। इस किस्से को सुन स्मृतियों में सुप्त एक विवाह समारोह बरबस ही याद आ गया।
6 माह पहले मेरे एक रिश्तेदार के बेटे ने आर्थिक संपन्नता के बावजूद अपनी शादी बहुत ही सादे तरीके से की। शादी में करीबी रिश्तेदारों के बीच फेरे की रस्म हुई। महँगे परिधानों, आभूषणों, रोशनी से जगमगाते मैरिज हॉल के बिना घर पर ही हुए एक सादा समारोह को देखकर मन को बहुत सुकून मिला।
वर निकासी न होने के कारण न तो ट्रैफिक जाम हुआ, न शादियों के आठ दिन पहले से शुरू होने वाले गीत-संगीत से पड़ोसी को परेशानी और न ही रिसेप्शन में भरी की भरी थालियों में छोड़ी गई जूठन से भोजन की बर्बादी हुई। साथ ही यह शादी पर्यावरण हितैषी भी लगी, क्योंकि उसमें डिस्पोजेबल का इस्तेमाल भी सीमित मात्रा में ही हुआ था। मन में पूरे समय यही विचार आता रहा कि काश देश में इस ढंग से शादियाँ करने का चलन बढ़े!
कुछ दिनों पूर्व एक राजनेता के बेटे को उपहार में हेलिकॉप्टर मिला और यह भव्य शादी अखबारों की सुर्खियों में छाई रही। भारत में अक्सर उद्योगपतियों, राजनेताओं और प्रसिद्घ व्यक्तियों की शादियाँ चर्चा का विषय बनती हैं। इन भव्य शादियों में करोड़ों रुपए शानो-शौकत और दिखावे पर पानी की तरह बहाए जाते हैं।
शादियों की भव्यता अब संपन्न परिवारों तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि यह मध्यमवर्गीय परिवारों तक भी पहँच चुकी है। फिर भले ही इस भव्यता के शामियाने 'लोन' लेकर खड़े किए गए हों या फिर जिंदगीभर मेहनत से की गई गाढ़ी कमाई से।

भारत एक उत्सवप्रिय देश है। लोग दिल खोलकर उत्सवों में पैसा खर्च करते हैं, फिर चाहे वह उत्सव नवरात्रि का हो या शादी। इन भव्य शदियों की भव्यता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। ये उस देश की सचाई है, जहाँ आज भी लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं और कइयों को सिर्फ एक वक्त भोजन करके गुजारा करना पड़ता है, देश का आम आदमी आज भी आधारभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है।
अब देश के युवाओं के लिए यह बात विचारणीय है कि शादियों पर इस तरह की फिजूलखर्ची कितनी जायज है? कुछ लोगों का मत है कि शादी जीवन में एक बार होती है तो कंजूसी क्यों की जाए! धूमधाम से शादी के फेर में ही लड़की के माता-पिता जिन्दगीभर कष्ट उठाते हैं।
सोचिए, गर शादियाँ सादगीपूर्वक होने लगें तो लोग बेटियों को भी बोझ नहीं समझेंगे। जन्म से ही उन्हें बेटी की शादी में होने वाले खर्च की चिंता नहीं सताएगी। इससे कन्या भ्रूण हत्याओं में भी कमी आएगी। युवाओं को चाहिए कि वे अपनी शादियों के भव्य तमाशे में पैसा बहाने की अपेक्षा समझदारी से पैसा खर्च करें। इसके लिए अपने माता-पिता से भी इस बात पर विचार करें। शादी में बेवजह दिखावे पर पैसा बर्बाद करने से तो बेहतर है कि किसी जरूरतमंद की मदद कर दी जाए।
शादी-ब्याह के मामले में लोग सोचते हैं कि अगर साधारण रूप से शादी कर दी तो समाज के लोग बातें बनाएँगे या इससे उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाएगी। प्रतिष्ठा की चिंता किए बगैर आप अच्छे कार्य की पहल तो कीजिए, फिर समाज वाले भी आपका अनुकरण करने लगेंगे।
आप चाहें तो शादी के कुछ ऐसे नए रिवाज भी शुरू कर सकते हैं, जैसे संपन्न नवदंपति एक जरूरतमंद को पढ़ाई या प्रोफेशनल कोर्स करवाने में मदद करें, किसी को रोजगार मुहैया करवाएँ।
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ऐसे बुलबुलों से बचके रहना...
दीपाली एक पढ़ी-लिखी गृहिणी हैं, लेकिन उसकी हर समय बुराई करने की बहुत खराब आदत है। वह न माहौल देखती है, न ही समय, बस, शुरू हो जाती है। कभी उसका निशाना उसकी सासूजी होती हैं तो कभी देवरानी या ननद। एक बार शुरू होने पर तो उसको रोकना बड़ा मुश्किल हो जाता है।
सामने वाला टॉपिक चेंज भी करे तो थोड़ी देर बाद घूम-फिरके वह वहीं पहुँच जाती है। निंदापुराण उसका पसंदीदा विषय है। इसने इतना दिया, उसने उतना लिया जैसी फिजूल बातों में वह अपना समय तो बर्बाद करती ही है, दूसरों का भी मूड चौपट कर देती है।
आप नजर दौड़ाएँगी तो आसपास ही कई दीपाली मिल जाएँगी आपको। कई लोग सबको केवल टेंशन ही बाँटते रहते हैं। कई लोगों को तो इतना भी होश नहीं रहता कि हम कहाँ बैठे हैं? वे तो बस शुरू हो जाते हैं। ऐसे लोगों से लोग फिर कन्नाी काटने लगते हैं।
चाहे होटल का वेटर हो या वॉचमैन, घर के सेवक हों या आपके अधीन काम करने वाला, आपको सबसे अदब से बात करनी चाहिए, गुरूर से नहीं। आखिर हर इंसान का आत्मसम्मान होता है, अगर आपको सबके दिल में जगह बनानी है तो अपने अंदाजे बयाँ को रोचक बनाइए।
आपकी 'बॉडी लैंग्वेज' तो सलीकेदार हो ही, आपका लहजा भी लाजवाब होना चाहिए। कई लोग शिकायतों का पिटारा लिए घूमते हैं, अगर किसी से शिकायत है भी तो तीसरे आदमी से शिकायत करने से समाधान तो शायद ही निकले, बल्कि समस्या के बढ़ने के पूरे आसार नजर आते हैं। जिससे भी परेशानी हो उसी से बात करके उसे सुलझाया जाए तो बेहतर है। कई लोग सीधी बात करते ही नहीं हैं, वे घुमा-फिराके बात करने में माहिर होते हैं। आइए, कुछ इसी तरह के लोगों के बारे में जानते हैं।
दुःखियारे लोगः ये लोग उदासी की चादर ओढ़े, बिलकुल ठंडे किस्म के होते हैं। उनसे कोई गर्मजोशी से भी मिले तो भी उनके चेहरे पर न मुस्कराहट होती है, न उत्साह। वे किसी को हँसते हुए भी देखते हैं तो घूर-घूर के, मानो वे कोई गुनाह कर रहे हों।
व्यंग्यबाण चलाने वालेः इन लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है। वे एक तीर से दो निशाने साध लेते हैं। ताना मारने में तो ये लोग निपुण होते हैं। वर्षों की इकट्ठी सड़ी-गली बातें भी इनके दिमाग में तरोताजा होती हैं। मजाक की आड़ में ये कुछ भी कह जाते हैं, चाहे सामने वाले को कितना भी दुःख हो।
बहसबाजः बात-बात में बहस करने पे उतारू लोग भी तर्क-कुतर्क देकर सबसे उलझते रहते हैं।
बातूनीः ऐसे लोग सामने वाले को बोलने का मौका नहीं देते। ये लोग भी अपनी बातों का आकर्षण खो देते हैं। उनकी बातों को फिर कोई तवज्जो नहीं देता। इतनी वाचालता भाषा का स्तर भी गिरा देती है।
अपशब्दों का प्रयोग करने वालेः बात-बात पर गालियाँ देना इनका शगल होता है। इस तरह बात करके वे यह जताना चाहते हैं कि हममें बहुत नजदीकी रिश्ता है या घनिष्ठता है, लेकिन ये उनकी गलतफहमी होती है। गलत भाषा इस्तेमाल करने से रिश्ते की घनिष्ठता या आत्मीयता हर्गिज सिद्ध नहीं होती। ध्यान रखिए आपके दिल में सामने वाले के लिए कितना प्यार और सम्मान है, वह तो आपकी बातों से अंदाज लगाया जाएगा। आप किस तहजीब के साथ पेश आते हैं, इसी से आपके संस्कारों का पता चलता है।
स्वार्थी किस्म के लोगः ये भी हमेशा अपना मतलब पूरा करने की फिराक में होते हैं। लच्छेदार बातों का जादू चलाकर वे अपना फायदा उठा लेते हैं।
गॉसिप में डूबे-डूबेः इस किस्म के लोग भी बड़े फुर्सती होते हैं। दूसरों की जिन्दगी में बिना किसी कारण के झाँकना इनका शगल होता है। मुँह पर लच्छेदार व मीठी-मीठी बातें करने में इनका कोई सानी नहीं है। आपके पीछे ये आपका भी मजाक बना सकते हैं।
झूठी शान दिखाने वालेः अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के लिए ऐसे लोग झूठ का सहारा लेते हैं। कहीं से कोई चीज ५०० रु. की लाएँगे तो १००० रु. की बताने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। शुरुआत में तो लोगों पर प्रभाव जमाने में ये माहिर होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लोग उन्हें जान जाते हैं।
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सामने वाला टॉपिक चेंज भी करे तो थोड़ी देर बाद घूम-फिरके वह वहीं पहुँच जाती है। निंदापुराण उसका पसंदीदा विषय है। इसने इतना दिया, उसने उतना लिया जैसी फिजूल बातों में वह अपना समय तो बर्बाद करती ही है, दूसरों का भी मूड चौपट कर देती है।
आप नजर दौड़ाएँगी तो आसपास ही कई दीपाली मिल जाएँगी आपको। कई लोग सबको केवल टेंशन ही बाँटते रहते हैं। कई लोगों को तो इतना भी होश नहीं रहता कि हम कहाँ बैठे हैं? वे तो बस शुरू हो जाते हैं। ऐसे लोगों से लोग फिर कन्नाी काटने लगते हैं।
चाहे होटल का वेटर हो या वॉचमैन, घर के सेवक हों या आपके अधीन काम करने वाला, आपको सबसे अदब से बात करनी चाहिए, गुरूर से नहीं। आखिर हर इंसान का आत्मसम्मान होता है, अगर आपको सबके दिल में जगह बनानी है तो अपने अंदाजे बयाँ को रोचक बनाइए।
आपकी 'बॉडी लैंग्वेज' तो सलीकेदार हो ही, आपका लहजा भी लाजवाब होना चाहिए। कई लोग शिकायतों का पिटारा लिए घूमते हैं, अगर किसी से शिकायत है भी तो तीसरे आदमी से शिकायत करने से समाधान तो शायद ही निकले, बल्कि समस्या के बढ़ने के पूरे आसार नजर आते हैं। जिससे भी परेशानी हो उसी से बात करके उसे सुलझाया जाए तो बेहतर है। कई लोग सीधी बात करते ही नहीं हैं, वे घुमा-फिराके बात करने में माहिर होते हैं। आइए, कुछ इसी तरह के लोगों के बारे में जानते हैं।
दुःखियारे लोगः ये लोग उदासी की चादर ओढ़े, बिलकुल ठंडे किस्म के होते हैं। उनसे कोई गर्मजोशी से भी मिले तो भी उनके चेहरे पर न मुस्कराहट होती है, न उत्साह। वे किसी को हँसते हुए भी देखते हैं तो घूर-घूर के, मानो वे कोई गुनाह कर रहे हों।
व्यंग्यबाण चलाने वालेः इन लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है। वे एक तीर से दो निशाने साध लेते हैं। ताना मारने में तो ये लोग निपुण होते हैं। वर्षों की इकट्ठी सड़ी-गली बातें भी इनके दिमाग में तरोताजा होती हैं। मजाक की आड़ में ये कुछ भी कह जाते हैं, चाहे सामने वाले को कितना भी दुःख हो।
बहसबाजः बात-बात में बहस करने पे उतारू लोग भी तर्क-कुतर्क देकर सबसे उलझते रहते हैं।
बातूनीः ऐसे लोग सामने वाले को बोलने का मौका नहीं देते। ये लोग भी अपनी बातों का आकर्षण खो देते हैं। उनकी बातों को फिर कोई तवज्जो नहीं देता। इतनी वाचालता भाषा का स्तर भी गिरा देती है।
अपशब्दों का प्रयोग करने वालेः बात-बात पर गालियाँ देना इनका शगल होता है। इस तरह बात करके वे यह जताना चाहते हैं कि हममें बहुत नजदीकी रिश्ता है या घनिष्ठता है, लेकिन ये उनकी गलतफहमी होती है। गलत भाषा इस्तेमाल करने से रिश्ते की घनिष्ठता या आत्मीयता हर्गिज सिद्ध नहीं होती। ध्यान रखिए आपके दिल में सामने वाले के लिए कितना प्यार और सम्मान है, वह तो आपकी बातों से अंदाज लगाया जाएगा। आप किस तहजीब के साथ पेश आते हैं, इसी से आपके संस्कारों का पता चलता है।
स्वार्थी किस्म के लोगः ये भी हमेशा अपना मतलब पूरा करने की फिराक में होते हैं। लच्छेदार बातों का जादू चलाकर वे अपना फायदा उठा लेते हैं।
गॉसिप में डूबे-डूबेः इस किस्म के लोग भी बड़े फुर्सती होते हैं। दूसरों की जिन्दगी में बिना किसी कारण के झाँकना इनका शगल होता है। मुँह पर लच्छेदार व मीठी-मीठी बातें करने में इनका कोई सानी नहीं है। आपके पीछे ये आपका भी मजाक बना सकते हैं।
झूठी शान दिखाने वालेः अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के लिए ऐसे लोग झूठ का सहारा लेते हैं। कहीं से कोई चीज ५०० रु. की लाएँगे तो १००० रु. की बताने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। शुरुआत में तो लोगों पर प्रभाव जमाने में ये माहिर होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लोग उन्हें जान जाते हैं।
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बुधवार, 19 जनवरी 2011
छत्तीसगढ़ की खबरें
वैज्ञानिक फॉर्मूले से बचाएंगे वन भैंसे की नस्ल

रायपुर.छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसा (वाइल्ड बफेलो) की खत्म हो रही नस्ल ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। उदंती अभयारण्य में मौजूद सात वन भैंसों में से सिर्फ एक मादा है और गर्भधारण के दोनों ही बार इसने नर को जन्म दिया है। ऐसे में अब उम्मीदें वैज्ञानिक फॉमरूले पर टिक गई हैं। विभाग ने इनकी वंश वृद्धि के लिए कृत्रिम गर्भाधान की योजना बनाई है।
वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया (डब्लूटीआई) ने कृत्रिम गर्भाधान के सिस्टम का खाका बना लिया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद इसे अमल में लाया जाएगा।
राज्य के रिजर्व फॉरेस्ट उदंती में विचरण करने वाले वन भैंसे देश की इकलौती विशुद्ध नस्ल हैं। दूसरे अभयारण्यों में उनकी नस्ल बिगड़ चुकी है। यही वजह है कि डब्लूटीआई यहां के वन भैंसों की नस्ल को लेकर ज्यादा चिंतित है।
एकमात्र मादा के स्वास्थ्य ने बढ़ाई चिंता
एकमात्र मादा वन भैंसा के स्वास्थ्य की देखभाल के साथ-साथ सुरक्षित गर्भधारण करवाना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है। इसे सुरक्षा देने के लिए उसे पिछले दो साल से बाड़े में रखा गया है। उसके लिए उदंती में पौने दो एकड़ में बाड़ा बनाया गया है। उसी बाड़े में नर भी है।
बाड़े में ही दो बार मां बनने के दौरान मादा वन भैंसा ने नर को जन्म दिया। अफसर इस बात को लेकर आशान्वित नहीं है कि तीसरी बार भी वह मादा वनभैंसा को जन्म देगी। अब उन्हें उसके स्वास्थ्य भी चिंता सताने लगी है। इस कारण भी वंश वृद्धि के लिए वैज्ञानिक तकनीक आजमाने का निर्णय लिया गया है।
शुद्धता पर नहीं पड़ेगा असर
डब्लूटीआई के छत्तीसगढ़ प्रभारी डा. राजेंद्र मिश्रा का कहना है कि वन भैंसों की नस्ल बढ़ाने के लिए यह फॉमरूला अपनाना जरूरी है। इसके जरिये पैदा होने वाली नस्ल बिलकुल शुद्ध होगी।
ऐसे बढ़ाया जाएगा वंश
उदंती में बाड़ के घेरे में बंद मादा वनभैंसा के अंडाणु को नर वनभैंसे के स्पर्म में मिलाया जाएगा। उसे पालतू मादा वन भैंसे में प्रविष्ट करवाकर गर्भधारण कराने के प्रयास होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार 10-12 पालतू मादा वनभैंसों में यही फॉमरूला अपनाने से कोई न कोई मादा वनभैंसा को जन्म देगी। तीन-चार मादा वनभैंसों के जन्म के बाद नस्ल बढ़ाने में दिक्कत नहीं होगी।
उदंती में बाड़ के घेरे में बंद मादा वनभैंसा के अंडाणु को नर वनभैंसे के स्पर्म में मिलाया जाएगा। उसे पालतू मादा वन भैंसे में प्रविष्ट करवाकर गर्भधारण कराने के प्रयास होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार 10-12 पालतू मादा वनभैंसों में यही फॉमरूला अपनाने से कोई न कोई मादा वनभैंसा को जन्म देगी। तीन-चार मादा वनभैंसों के जन्म के बाद नस्ल बढ़ाने में दिक्कत नहीं होगी।
"अभी पूरी योजना प्रारंभिक स्तर पर है। विशेषज्ञों से रायशुमारी के बाद इसका प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। वन मंत्रालय से मंजूरी के बाद ही इस दिशा में आगे कदम उठाया जाएगा।"
-राकेश चतुर्वेदी, फील्ड डायरेक्टर वाइल्ड लाइफ
इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में तलाशे जाएंगे बाघ
जगदलपुर/रायपुर.बीजापुर जिले के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में बाघ के होने के प्रमाण मिले हैं। वहीं इस टाइगर रिजर्व में बड़ी संख्या में चीतल, नीलगाय व कोटरी सहित वनभैंसे के होने की भी जानकारी सामने आई है।

नेशनल पार्क में माओवादी गतिविधियों के चलते बाहरी लोगों की आमदरफ्त न के बराबर होने और घास के मैदान की अधिकता से यहां की परिस्थितियां जंगली जानवरों के रहने के अनुकूल बताई गई है। हाल ही में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के एडीजी राकेश डोगरा और नेशनल बोर्ड आफ वाईल्डलाइफ की सदस्य प्रेरणा बिंद्रा ने भी इस इलाके का दौरा किया। उन्हें बड़ी संख्या में जंगली जानवरों के मल और उनके पैरों के निशान दिखे हैं।
अनुकूल हैं घास के मैदान :
सीएफ वाइल्डलाइफ अरूण पांडे ने बताया कि अभयारण्य में घास के कई जंगल उपस्थित है। अब तक नौ स्थानों पर घास के मैदान मिले हैं, जो कई सौ हेक्टेयर में फैले हैं। इनमें इड़ेपल्ली, ताड़मेंड्री, सालेपल्ली, पिल्लूर, सागमेटा, पिनगुंडा, मुचनेर, गुंडापुरी और नेती काकले शामिल हैं। इन जंगलों में नीलगाय व चीतल के गोबर एक ही स्थान पर पाए गए हैं।
इनकी विशेषता होती है कि ये जानवर एक ही जगह पर आकर मलत्याग करते हैं। जिससे यहां गोबर का ढेर लग जाता है। ये घास के मैदान दरअसल शेर के लिए किचन का काम करते हैं। यहां शेर शिकार करने आता है और भोजन लेकर चला जाता है।
बैलों का शिकार किया, बाघ होने का प्रमाण
अभयारण्य में बाघ की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ताड़मेंड्री इलाके को प्रमुख रूप से चुना गया है। यहां ग्रामीणों ने बाघ द्वारा बैलों को मारने की शिकायत की थी। जिसके बाद इस इलाके में इसके प्रमाण भी मिले हैं। अब ऐसे स्थान पर ऑप्टिकल कैमरे लगाए जा रहे हैं जहां जंगली जानवर पानी पीने के लिए पहुंचते हैं।
इसके अलावा सेंड्रा इलाके के अन्नापुर और मट्टीमारका क्षेत्र में कैमरे लगाए जाने की योजना है। यह कार्य शीघ्र ही पूरा कर लिया जाएगा जिसके बाद जंगली जानवरों की उपस्थिति के साथ ही उनकी गणना में भी आसानी होगी।

रायपुर.छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसा (वाइल्ड बफेलो) की खत्म हो रही नस्ल ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। उदंती अभयारण्य में मौजूद सात वन भैंसों में से सिर्फ एक मादा है और गर्भधारण के दोनों ही बार इसने नर को जन्म दिया है। ऐसे में अब उम्मीदें वैज्ञानिक फॉमरूले पर टिक गई हैं। विभाग ने इनकी वंश वृद्धि के लिए कृत्रिम गर्भाधान की योजना बनाई है।
वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया (डब्लूटीआई) ने कृत्रिम गर्भाधान के सिस्टम का खाका बना लिया है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद इसे अमल में लाया जाएगा।
राज्य के रिजर्व फॉरेस्ट उदंती में विचरण करने वाले वन भैंसे देश की इकलौती विशुद्ध नस्ल हैं। दूसरे अभयारण्यों में उनकी नस्ल बिगड़ चुकी है। यही वजह है कि डब्लूटीआई यहां के वन भैंसों की नस्ल को लेकर ज्यादा चिंतित है।
एकमात्र मादा के स्वास्थ्य ने बढ़ाई चिंता
एकमात्र मादा वन भैंसा के स्वास्थ्य की देखभाल के साथ-साथ सुरक्षित गर्भधारण करवाना वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है। इसे सुरक्षा देने के लिए उसे पिछले दो साल से बाड़े में रखा गया है। उसके लिए उदंती में पौने दो एकड़ में बाड़ा बनाया गया है। उसी बाड़े में नर भी है।
बाड़े में ही दो बार मां बनने के दौरान मादा वन भैंसा ने नर को जन्म दिया। अफसर इस बात को लेकर आशान्वित नहीं है कि तीसरी बार भी वह मादा वनभैंसा को जन्म देगी। अब उन्हें उसके स्वास्थ्य भी चिंता सताने लगी है। इस कारण भी वंश वृद्धि के लिए वैज्ञानिक तकनीक आजमाने का निर्णय लिया गया है।
शुद्धता पर नहीं पड़ेगा असर
डब्लूटीआई के छत्तीसगढ़ प्रभारी डा. राजेंद्र मिश्रा का कहना है कि वन भैंसों की नस्ल बढ़ाने के लिए यह फॉमरूला अपनाना जरूरी है। इसके जरिये पैदा होने वाली नस्ल बिलकुल शुद्ध होगी।
ऐसे बढ़ाया जाएगा वंश
उदंती में बाड़ के घेरे में बंद मादा वनभैंसा के अंडाणु को नर वनभैंसे के स्पर्म में मिलाया जाएगा। उसे पालतू मादा वन भैंसे में प्रविष्ट करवाकर गर्भधारण कराने के प्रयास होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार 10-12 पालतू मादा वनभैंसों में यही फॉमरूला अपनाने से कोई न कोई मादा वनभैंसा को जन्म देगी। तीन-चार मादा वनभैंसों के जन्म के बाद नस्ल बढ़ाने में दिक्कत नहीं होगी।
उदंती में बाड़ के घेरे में बंद मादा वनभैंसा के अंडाणु को नर वनभैंसे के स्पर्म में मिलाया जाएगा। उसे पालतू मादा वन भैंसे में प्रविष्ट करवाकर गर्भधारण कराने के प्रयास होंगे। विशेषज्ञों के अनुसार 10-12 पालतू मादा वनभैंसों में यही फॉमरूला अपनाने से कोई न कोई मादा वनभैंसा को जन्म देगी। तीन-चार मादा वनभैंसों के जन्म के बाद नस्ल बढ़ाने में दिक्कत नहीं होगी।
"अभी पूरी योजना प्रारंभिक स्तर पर है। विशेषज्ञों से रायशुमारी के बाद इसका प्रोजेक्ट तैयार किया गया है। वन मंत्रालय से मंजूरी के बाद ही इस दिशा में आगे कदम उठाया जाएगा।"
-राकेश चतुर्वेदी, फील्ड डायरेक्टर वाइल्ड लाइफ
इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में तलाशे जाएंगे बाघ
जगदलपुर/रायपुर.बीजापुर जिले के इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में बाघ के होने के प्रमाण मिले हैं। वहीं इस टाइगर रिजर्व में बड़ी संख्या में चीतल, नीलगाय व कोटरी सहित वनभैंसे के होने की भी जानकारी सामने आई है।

नेशनल पार्क में माओवादी गतिविधियों के चलते बाहरी लोगों की आमदरफ्त न के बराबर होने और घास के मैदान की अधिकता से यहां की परिस्थितियां जंगली जानवरों के रहने के अनुकूल बताई गई है। हाल ही में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के एडीजी राकेश डोगरा और नेशनल बोर्ड आफ वाईल्डलाइफ की सदस्य प्रेरणा बिंद्रा ने भी इस इलाके का दौरा किया। उन्हें बड़ी संख्या में जंगली जानवरों के मल और उनके पैरों के निशान दिखे हैं।
अनुकूल हैं घास के मैदान :
सीएफ वाइल्डलाइफ अरूण पांडे ने बताया कि अभयारण्य में घास के कई जंगल उपस्थित है। अब तक नौ स्थानों पर घास के मैदान मिले हैं, जो कई सौ हेक्टेयर में फैले हैं। इनमें इड़ेपल्ली, ताड़मेंड्री, सालेपल्ली, पिल्लूर, सागमेटा, पिनगुंडा, मुचनेर, गुंडापुरी और नेती काकले शामिल हैं। इन जंगलों में नीलगाय व चीतल के गोबर एक ही स्थान पर पाए गए हैं।
इनकी विशेषता होती है कि ये जानवर एक ही जगह पर आकर मलत्याग करते हैं। जिससे यहां गोबर का ढेर लग जाता है। ये घास के मैदान दरअसल शेर के लिए किचन का काम करते हैं। यहां शेर शिकार करने आता है और भोजन लेकर चला जाता है।
बैलों का शिकार किया, बाघ होने का प्रमाण
अभयारण्य में बाघ की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए ताड़मेंड्री इलाके को प्रमुख रूप से चुना गया है। यहां ग्रामीणों ने बाघ द्वारा बैलों को मारने की शिकायत की थी। जिसके बाद इस इलाके में इसके प्रमाण भी मिले हैं। अब ऐसे स्थान पर ऑप्टिकल कैमरे लगाए जा रहे हैं जहां जंगली जानवर पानी पीने के लिए पहुंचते हैं।
इसके अलावा सेंड्रा इलाके के अन्नापुर और मट्टीमारका क्षेत्र में कैमरे लगाए जाने की योजना है। यह कार्य शीघ्र ही पूरा कर लिया जाएगा जिसके बाद जंगली जानवरों की उपस्थिति के साथ ही उनकी गणना में भी आसानी होगी।
अब खनकेगा 150 रुपए का सिक्का

देश में पहली बार 150 रुपए कीमत का सिक्का जारी किया गया है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 150वीं जयंती वर्ष के मौके पर भारत सरकार ने यह सिक्का जारी किया है।
भारतीय स्टेट बैंक के विपणन कार्यपालक सुरेश शुक्ला ने बताया कोलकाता स्थित टकसाल द्वारा विशेष श्रंखला के तहत जारी 150 रुपए का सिक्का 40 मिलीमीटर व्यास का है और इसका वजन 35 ग्राम है।
चांदी,तांबा,निकेल और जिंक धातुओं के मिश्रण से निर्मित सिक्के में दातें (सिरेशन) की संख्या 200 है। इसी प्रकार 5 रुपए कीमत का टैगोर स्मृति विशेष श्रंखला सिक्का भी जारी किया गया है। इसका वजन 6 ग्राम और व्यास 23 मिलीमीटर है। इसमें 100 दातें हैं। यह सिक्का तांबा, निकेल एवं जिंक धातुओं के मिश्रण से बनाया गया है।
ये सिक्के भी होंगे जारी
इसी वर्ष भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना के 75 वर्ष पूर्ण होने पर 75 रुपए का विशेष सिक्का जारी किया जाएगा। कॉमनवेल्थ गेम्स की स्मृति में भी 100 रुपए का सिक्का जारी किया जा रहा है। इसी तरह इस साल देश में पहली बार 10 रुपए का पॉलीमर नोट लाया जा रहा है।
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