मे दैनिक राष्ट्रीय हिंदी मेल का सम्पादक हूँ.खुल्लम खुल्ला मेरी अभिव्यक्ति है .अपना विचार खुलेआम दुनिया के सामने व्यक्त करने का यह सशक्त माध्यम है.अरुण बंछोर-मोबाइल -9074275249 ,7974299792 सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे, कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
मंगलवार, 3 सितंबर 2013
चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की सधी चालें
कांग्रेस ने चुनावों को दृष्टिगत रखते हुए अपनी चालें बेहद सधे अंदाज में चलनी शुरू कर दी हैं। संसद के मानसून सत्र से पहले जहां तेलंगाना गठन का निर्णय कर एक बड़े विवाद को खत्म करने की दिशा में कदम उठाया गया वहीं सत्र में कांग्रेस 'गेम चेंजर' माने जा रहे अपने दो महत्वपूर्ण विधेयकों खाद्य सुरक्षा विधेयक और भूमि अधिग्रहण विधेयक को पास करवाने में सफल रही। हालांकि अभी इन विधेयकों को राज्यसभा की मंजूरी मिलना बाकी है लेकिन लोकसभा में जिस आसानी से यह विधेयक पास हो गये उसे देखते हुए राज्यसभा में इन्हें किसी प्रकार की मुश्किल पेश आने की उम्मीद नहीं है। अब संसद सत्र के बाद तेलंगाना गठन की प्रक्रिया में तेजी आएगी जिसके तहत गृह मंत्रालय कैबिनेट के समक्ष एक नोट प्रस्तुत करेगा और फिर नए राज्य के गठन को लेकर आंध्र प्रदेश विधानसभा में प्रस्ताव भेजा जाएगा। एकीकृत आंध्र समर्थकों की मांगों पर विचार के भी पार्टी ने संकेत दिये हैं।
कांग्रेस का प्रयास है कि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकपाल विधेयक को पास करा लिया जाए ताकि विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए मुद्दों का अभाव हो जाए। विपक्ष कांग्रेस नीत संप्रग सरकार को मुख्यतः भ्रष्टाचार, आतंकवाद के प्रति कथित नरम रुख और महंगाई के मोर्चे पर घेरता रहा है। भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों के खुलासों ने निश्चित ही सरकार की छवि को ठेस पहुंचाई है लेकिन समय समय पर सरकार की ओर से कार्रवाई के माध्यम से यह संकेत दिया जाता रहा है कि वह भ्रष्टाचारियों को नहीं बख्शेगी। हालांकि कोयला खदान आवंटन संबंधी फाइलें गायब हो जाना सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार को और बड़े नेताओं का नाम आने पर कैसे मामले को दबाने को प्रयास किया जाता है, यह दर्शाता है। आतंकवाद के मोर्चे पर सरकार को जरूर कुछ कामयाबी मिली है। कुछ बड़े आतंकवादियों को सुनाई गई सजा ए मौत के आदेश पर अमल किया गया तथा कुछ भागते फिर रहे बड़े आतंकवादी गिरफ्त में आए, जिससे सरकार को कुछ राहत मिली। जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है तो यह बात खुद प्रधानमंत्री ने मानी है कि यह मुश्किल घड़ी है। विपक्ष जहां इस हालत के लिए सरकारी नीतियों को दोषी ठहरा रहा है तो वहीं सरकार इसके लिए बहुत हद तक वैश्विक हालात को जिम्मेदार मानती है। सरकार ने हाल ही में विभिन्न क्षेत्रों में एफडीआई नियमों में ढील प्रदान की है और इस प्रयास में है कि लोकसभा चुनावों से पहले यह निवेश देश में आए और इसके सकारात्मक प्रभाव दिखने लगें।
सरकार के समक्ष पिछले दो तीन वर्षों में बड़ी चुनौती बन कर उभरे कुछ समाजसेवियों और सामाजिक संगठनों के आंदोलन भी अब ठंडे पड़ चुके हैं। शुरू में सरकार के हठ के चलते ही इन आंदोलनों को गति मिली थी लेकिन बाद में सरकार की कूटनीति के चलते यह आंदोलन खुद ही शांत होते चले गये। संप्रग सरकार के समक्ष इस बार बड़ी चुनौती है क्योंकि दस वर्षों के उसके कार्यकाल में सकारात्मक बातें भी हुईं तो नकारात्मक बातें भी खूब रहीं। जनता के मन के बारे में कई सर्वेक्षणों का कहना है कि वह बदलाव के मूड में है। शायद यह भी एक कारण हो कि संप्रग सरकार अपने वादों को पूरा करने में बेहद जल्दबाजी दिखा रही है। ऐसे समय में जबकि कई आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि अर्थव्यवस्था की खराब हालत के चलते खाद्य सुरक्षा विधेयक लाना सही नहीं है, संप्रग सरकार इसे मजबूती के साथ लेकर आई है। भूमि अधिग्रहण विधेयक को भी वाणिज्यिक संगठनों ने पीछे ले जाने वाला कदम बताया है। लेकिन कांग्रेस जानती है कि उसे अभी कारपोरेट जगत या विशेषज्ञों की सराहना की नहीं बल्कि जनता के उस वर्ग के वोटों की सख्त जरूरत है जोकि मतदान करने जरूर जाता है।
कांग्रेस ने केंद्रीय स्तर पर और कई प्रदेशों में संगठन में बदलाव कर भी चुनावी तैयारियों को गति प्रदान की है। पार्टी ने आजकल काफी चर्चित हो रहे सोशल मीडिया में अपने पिछड़ने को स्वीकार कर इस दिशा में कई कदम उठाये हैं। पिछले दिनों पार्टी ने 'खिड़की' नाम से ऑनलाइन सामाजिक मंच तैयार किया जहां लोगों को अपने विचार प्रकट करने की और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा आयोजित करने की पूरी आजादी है। पार्टी ने प्रवक्ताओं का एक बहुत बड़ा पैनल भी तैयार किया है जिसको ऑनलाइन सामाजिक मंचों पर पार्टी की उपस्थिति मजबूत करने के लिए हाल ही में कांग्रेस मुख्यालय में गूगल और टि्वटर के भारतीय प्रमुखों ने सुझाव भी दिये।
कांग्रेस जनता को आरटीआई जैसा बड़ा हथियार देने, पारदर्शिता बरतने और चुनाव सुधार के नाम पर बड़े बड़े दावे और वादे तो करती है लेकिन हाल ही में केंद्रीय कैबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दागियों के चुनाव लड़ने पर लगाई गई रोक हटाने को मंजूरी दे दी। इसके अलावा मंत्रिमंडल ने राजनीतिक दलों को सूचना उपलब्ध कराने से सुरक्षा प्रदान करने के लिए आईटीआई कानून में संशोधन को भी मंजूरी प्रदान की। यह सही है कि इन दोनों मामलों में कैबिनेट पर सभी दलों का दबाव था लेकिन सरकार के पास यह एक मौका था जब वह अपनी छवि को सुधार सकती थी।
संप्रग अपने वर्तमान स्वरूप के साथ ही चुनाव में जायेगा यह तो तय हो चुका है और सीटों के बंटवारे पर भी अंदरखाने चर्चा शुरू हो चुकी है। लेकिन कुछ राज्यों के बारे में स्थिति बिलकुल स्पष्ट नहीं है जैसे कि कांग्रेस को अभी यह तय करना है कि वह उत्तर प्रदेश में सिर्फ रालोद के साथ ही सीटों का बंटवारा करे या फिर सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में से किसी के साथ मिलकर चुनाव लड़े। बिहार में भी स्थिति साफ नहीं है। वहां कांग्रेस ने पिछला चुनाव अपने बलबूते लड़ा था इस बार उसे चयन करना है कि संभावित सहयोगी जनता दल यू के साथ मिलकर लड़ें या फिर पुराने सहयोगियों लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान के साथ ही चुनाव मैदान में उतरा जाए। पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में भी ऐसी ही तसवीर है। बंगाल में ममता साथ आने को तैयार नहीं हैं ऐसे में कांग्रेस के समक्ष 'एकला चलो' की मजबूरी है वहां वामपंथी दल चुनाव बाद सरकार को सहयोग कर सकते हैं। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस मानकर चल रही है कि तेलंगाना में तो वह टीआरएस के साथ मिलकर लाभ में रहेगी और आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस का सहयोग लेने पर माथापच्ची जारी है।
बहरहाल, बहुत कुछ राजनीतिक समीकरण टिके हैं इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर। दिल्ली और राजस्थान में जहां कांग्रेस के समक्ष सत्ता में वापसी की चुनौती है तो वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वह दस वर्षों बाद सत्ता में आने के प्रयास में है। यह विधानसभ चुनाव चूंकि नवंबर माह में होने हैं ऐसे में कांग्रेस के पास बेहद कम समय है मतदाताओं को लुभाने के लिए।
गुरुवार, 29 मार्च 2012
आईपीएल के लिए फिट कैसे?
टीम इंडिया ट्वेंटी-20 मैच खेलने दक्षिण अफ्रीका पहुंच गई है। गुरुवार को होने जा रहे इस मुकाबले के लिए टीम इंडिया का ऐलान एशिया कप के साथ ही कर दिया गया था। फिटनेस की वजह से पूर्व उप-कप्तान वीरेंद्र सहवाग को टीम के बाहर रखा गया था। लेकिन कुछ दिन बाद ही सहवाग ने खुद को आईपीएल खेलने के लिए फिट घोषित कर दिया। इलाज के लिए लंदन गए सचिन भी इस मैच में नहीं खेल रहे हैं। ये दोनों आईपीएल में खेलेंगे। महेंद्र सिंह धोनी ने भी आईपीएल के मद्देनजर थकान का मुद्दा परे रख दिया है। ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं।
टीम के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज सहवाग दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एक मात्र टी-20 मैच खेलने के लिए तो अनफिट हैं, लेकिन आईपीएल खेलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। चयनकर्ताओं के इस फैसले ने बीसीसीआई को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा है कि बोर्ड को इस बारे में सवालों के जवाब देने चाहिए।
सवाल है कि क्या सहवाग को कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ हुए झगड़े का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, या फिर यह आईपीएल के प्रायोजकों का दबाव है, जो कि सितारा खिलाड़ियों के बाहर होना सहन नहीं कर सकते। सवाल और भी हैं। वक्त-बेवक्त थकान की बात करने वाले धोनी भी कह रहे हैं कि आईपीएल से थकान नहीं होगी।
धोनी नहीं चाहते वीरू का साथ?
चयनकर्ताओं ने एशिया कप की टीम का ऐलान करने के साथ ही इस एकमात्र टी-20 के लिए टीम घोषित कर दी। तब बोर्ड ने यह तर्क दिया था कि सहवाग पीठ की जकड़न से जूझ रहे हैं और थोड़ा आराम चाहते हैं। वनडे मैचों में लगातार फ्लॉप होने के बाद सहवाग को आराम देने के नाम पर टीम से बाहर बैठा दिया गया।
जब बोर्ड के इस फैसले पर सवाल उठाए गए तो खुद सहवाग ने आकर यह सफाई दी कि उन्होंने ही बोर्ड से आराम मांगा है। लेकिन इसके पीछे एक कारण ऑस्ट्रेलिया दौरे पर रोटेशन पॉलिसी को लेकर सहवाग और कप्तान धोनी के बीच विवाद भी रहा।
अब फिट हैं सहवाग, बनेंगे ऑलराउंडर
वीरेंद्र सहवाग अब हर बयान में एक बात कह रहे हैं, वो पूरी तरह फिट हैं और आईपीएल में अपनी टीम को नई बुलंदियों पर ले जाने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। सहवाग ने कहा है, मैं अब फ्रेश महसूस कर रहा हूं। यह कुछ दिनों का आराम मेरे लिए अच्छा रहा। अब मैं बल्ले के साथ-साथ गेंद से भी अपनी टीम की मदद करने को तैयार हूं। इस आईपीएल सीजन में आप मेरी गेंदबाजी का जलवा भी देखेंगे।
31 के लिए अनफिट, 5 तारीख के लिए फिट
हैरत की बात यह है कि बोर्ड ने फिटनेस के आधार पर सहवाग को एशिया कप और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी-20 मुकाबले से बाहर रखा था। यदि सहवाग 30 मार्च को होने वाले मैच के लिए अनफिट हैं, तो वो महज 6 दिन में कैसे पूरी तरह फिट हो जाएंगे? दिल्ली डेयरडेविल्स को अपना पहला मुकाबला 5 तारीख को कोलकाता नाइटराइडर्स के खिलाफ खेलना है। और सहवाग आईपीएल के लिए जमकर अभ्यास भी कर रहे हैं। (तस्वीरें देखें)
आईपीएल की माया
आईपीएल क्रिकेट का एक ग्लैमरस रूप है। इसमें स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी जरूरी है। टीम इंडिया के पूर्व बल्लेबाज नवजोत सिंह सिद्धू ने सहवाग के आईपीएल खेलने और अंतर्राष्ट्रीय मैच से दूर रहने के पीछे आईपीएल के प्रायोजकों के दबाव को वजह बताया है।
सिद्धू ने बीसीसीआई पर निशाना साधते हुए कहा, "बीसीसीआई ने अपने खिलाड़ियों का सौदा स्पॉन्सर्स के साथ कर दिया है। मैदान पर सहवाग, सचिन तेंडुलकर जैसे बड़े नामों को दिखाने के लिए प्रायोजकों ने मोटी रकम बीसीसीआई को दी है। अब ऐसे में खिलाड़ी फिट हो या अनफिट, उसे तो खेलना ही होगा। इसलिए सिर्फ क्रिकेटर को दोषी ठहराना सही नहीं। इसके लिए बोर्ड भी जिम्मेदार है।"
सचिन का भी है यही हाल
मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर पर भी आईपीएल का दबाव है। अपने पैर की उंगली का इलाज करवाने लंदन गए सचिन आईपीएल खेलने के लिए फिट बताए जा रहे हैं। सचिन को अपनी इस चोट के इलाज के लिए सर्जरी भी करवानी पड़ सकती है। सर्जरी के बाद एक खिलाड़ी को फिटनेस दोबारा हासिल करने में 2 से 3 हफ्तों का समय लगता है। लेकिन सचिन 4 अप्रैल को होने वाले आईपीएल के उद्घाटन मैच और बाकी दूसरे मैचों में खेलेंगे। यह बयान बीसीसीआई और उनकी टीम मुंबई इंडियंस ने दिया है। मुंबई इंडियंस ने बुधवार को यह घोषित कर दिया कि सचिन पूरे आईपीएल-5 में खेलेंगे।
टीम के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज सहवाग दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ एक मात्र टी-20 मैच खेलने के लिए तो अनफिट हैं, लेकिन आईपीएल खेलने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। चयनकर्ताओं के इस फैसले ने बीसीसीआई को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा है कि बोर्ड को इस बारे में सवालों के जवाब देने चाहिए।
सवाल है कि क्या सहवाग को कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के साथ हुए झगड़े का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, या फिर यह आईपीएल के प्रायोजकों का दबाव है, जो कि सितारा खिलाड़ियों के बाहर होना सहन नहीं कर सकते। सवाल और भी हैं। वक्त-बेवक्त थकान की बात करने वाले धोनी भी कह रहे हैं कि आईपीएल से थकान नहीं होगी।
धोनी नहीं चाहते वीरू का साथ?
चयनकर्ताओं ने एशिया कप की टीम का ऐलान करने के साथ ही इस एकमात्र टी-20 के लिए टीम घोषित कर दी। तब बोर्ड ने यह तर्क दिया था कि सहवाग पीठ की जकड़न से जूझ रहे हैं और थोड़ा आराम चाहते हैं। वनडे मैचों में लगातार फ्लॉप होने के बाद सहवाग को आराम देने के नाम पर टीम से बाहर बैठा दिया गया।
जब बोर्ड के इस फैसले पर सवाल उठाए गए तो खुद सहवाग ने आकर यह सफाई दी कि उन्होंने ही बोर्ड से आराम मांगा है। लेकिन इसके पीछे एक कारण ऑस्ट्रेलिया दौरे पर रोटेशन पॉलिसी को लेकर सहवाग और कप्तान धोनी के बीच विवाद भी रहा।
अब फिट हैं सहवाग, बनेंगे ऑलराउंडर
वीरेंद्र सहवाग अब हर बयान में एक बात कह रहे हैं, वो पूरी तरह फिट हैं और आईपीएल में अपनी टीम को नई बुलंदियों पर ले जाने के लिए मशक्कत कर रहे हैं। सहवाग ने कहा है, मैं अब फ्रेश महसूस कर रहा हूं। यह कुछ दिनों का आराम मेरे लिए अच्छा रहा। अब मैं बल्ले के साथ-साथ गेंद से भी अपनी टीम की मदद करने को तैयार हूं। इस आईपीएल सीजन में आप मेरी गेंदबाजी का जलवा भी देखेंगे।
31 के लिए अनफिट, 5 तारीख के लिए फिट
हैरत की बात यह है कि बोर्ड ने फिटनेस के आधार पर सहवाग को एशिया कप और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी-20 मुकाबले से बाहर रखा था। यदि सहवाग 30 मार्च को होने वाले मैच के लिए अनफिट हैं, तो वो महज 6 दिन में कैसे पूरी तरह फिट हो जाएंगे? दिल्ली डेयरडेविल्स को अपना पहला मुकाबला 5 तारीख को कोलकाता नाइटराइडर्स के खिलाफ खेलना है। और सहवाग आईपीएल के लिए जमकर अभ्यास भी कर रहे हैं। (तस्वीरें देखें)
आईपीएल की माया
आईपीएल क्रिकेट का एक ग्लैमरस रूप है। इसमें स्टार खिलाड़ियों की मौजूदगी जरूरी है। टीम इंडिया के पूर्व बल्लेबाज नवजोत सिंह सिद्धू ने सहवाग के आईपीएल खेलने और अंतर्राष्ट्रीय मैच से दूर रहने के पीछे आईपीएल के प्रायोजकों के दबाव को वजह बताया है।
सिद्धू ने बीसीसीआई पर निशाना साधते हुए कहा, "बीसीसीआई ने अपने खिलाड़ियों का सौदा स्पॉन्सर्स के साथ कर दिया है। मैदान पर सहवाग, सचिन तेंडुलकर जैसे बड़े नामों को दिखाने के लिए प्रायोजकों ने मोटी रकम बीसीसीआई को दी है। अब ऐसे में खिलाड़ी फिट हो या अनफिट, उसे तो खेलना ही होगा। इसलिए सिर्फ क्रिकेटर को दोषी ठहराना सही नहीं। इसके लिए बोर्ड भी जिम्मेदार है।"
सचिन का भी है यही हाल
मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर पर भी आईपीएल का दबाव है। अपने पैर की उंगली का इलाज करवाने लंदन गए सचिन आईपीएल खेलने के लिए फिट बताए जा रहे हैं। सचिन को अपनी इस चोट के इलाज के लिए सर्जरी भी करवानी पड़ सकती है। सर्जरी के बाद एक खिलाड़ी को फिटनेस दोबारा हासिल करने में 2 से 3 हफ्तों का समय लगता है। लेकिन सचिन 4 अप्रैल को होने वाले आईपीएल के उद्घाटन मैच और बाकी दूसरे मैचों में खेलेंगे। यह बयान बीसीसीआई और उनकी टीम मुंबई इंडियंस ने दिया है। मुंबई इंडियंस ने बुधवार को यह घोषित कर दिया कि सचिन पूरे आईपीएल-5 में खेलेंगे।
बुधवार, 21 मार्च 2012
मंदी के लिए रहिए तैयार,!
मनमोहन-प्रणव होंगे जिम्मेदार
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के संकेत दे दिए हैं। वित्त मंत्री ने इशारा किया है कि बजट सत्र खत्म होने (31 मार्च) के बाद पेट्रोल-डीजल के साथ ही एलपीजी के दामों में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है।
करीब साल भर पहले राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 58.37 रुपये प्रति लीटर मिलता था। इसके दाम में आखिरी बार बढ़ोतरी पिछले साल एक दिसंबर को की गई थी। अभी यह 65.64 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है। यानी साल भर में पेट्रोल की कीमतें करीब 12 फीसदी बढ़ गई हैं। सरकार ने जून 2010 में पेट्रोल की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म कर दिया था। तब से लगातार तेल कंपनियां पेट्रोल की कीमतें बढ़ाती रही हैं।
हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है। यूएस क्रूड के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतें 107 डॉलर प्रति बैरल तो ब्रेंट क्रूड के मुताबिक यह 125 डॉलर प्रति बैरल को छू गई है। अमेरिका में गैसोलिन की कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। इसका नतीजा बाकी चीजों पर उपभोक्ताओं के खर्च में कमी के रूप में सामने आ रहा है।
गोल्डमैच सैच का कहना है कि तेल की कीमतों में 10 फीसदी का इजाफा होने से देश की विकास दर पर करीब चौथाई फीसदी का नकारात्मक असर पड़ता है। जब लोगों का पेट्रोल पर खर्च बढ़ेगा तो बाकी जरूरी चीजों पर खर्च में कटौती होना भी स्वाभाविक है। यदि लोग कार चलाने के लिए ज्यादा खर्च करने लगेंगे तो उनके पास टीवी सेट खरीदने या छुट्टियों में सैर-सपाटे की इच्छाओं पर ‘ब्रेक’ लगाना पड़ेगा। इससे उपभोक्ताओं की खर्च करने की सीमा में कटौती होगी और विकास दर में रुकावट पैदा होगी। अमेरिका में ऐसा होने लगा है।
भारत में बीते साल भर में पेट्रोल की कीमत करीब 12 फीसदी बढ़ गई है। एचएसबीसी के इकोनॉमिस्ट फ्रेडरिक न्यूमैन ने ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत सहित एशियाई मुल्कों पर पड़ने वाले असर को कुछ इस तरह समझाया है। उनका कहना है कि कीमतें बढ़ने से पश्चिम के देशों को होने वाले निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ेगा। एशियाई मुल्कों से पश्चिम को होने वाला निर्यात कम से कम आज के वक्त में बेहद संवेदनशील है। इसके अलावा इससे कुछ दिनों के बाद एशियाई देशों में मुद्रास्फीति की मार पड़ेगी।
क्या कर सकती है सरकार ?
सरकार कहती है कि उसके पास वैश्विक बाजार में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का मुकाबला करने के लिए इसकी कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं है। सरकार अगर चाहे तो अपने खर्च में कटौती के अलावा कुछ और विकल्प भी आजमा सकती है।
सीनियर इकोनॉमिस्ट और भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे राव उपेंद्र दास कहते हैं, ‘सरकार अपना घाटा कम करने के लिए इस बजट में सारे विकल्प आजमा चुकी है इस बार बजट में लगभग सभी प्रकार के टैक्स को बढ़ा दिया गया। एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स या सोने के आयात पर टैक्स सरकार ने सभी में इजाफा किया है। सरकार के पास कॉरपोरेट टैक्स को बढ़ाना अंतिम विकल्प हो सकता है।’
हालांकि यह विकल्प आजमाना सरकार के आसान नहीं होगा। उपेंद्र दास के मुताबिक ऐसा करने से सरकार के खिलाफ कॉरपोरेट जगत में विरोध के स्वर उभर सकते हैं। शायद यही वजह है कि सरकार इस बार बजट में इससे बचती दिखी।
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के संकेत दे दिए हैं। वित्त मंत्री ने इशारा किया है कि बजट सत्र खत्म होने (31 मार्च) के बाद पेट्रोल-डीजल के साथ ही एलपीजी के दामों में भी बढ़ोत्तरी हो सकती है।
करीब साल भर पहले राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 58.37 रुपये प्रति लीटर मिलता था। इसके दाम में आखिरी बार बढ़ोतरी पिछले साल एक दिसंबर को की गई थी। अभी यह 65.64 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है। यानी साल भर में पेट्रोल की कीमतें करीब 12 फीसदी बढ़ गई हैं। सरकार ने जून 2010 में पेट्रोल की कीमतों पर से सरकारी नियंत्रण खत्म कर दिया था। तब से लगातार तेल कंपनियां पेट्रोल की कीमतें बढ़ाती रही हैं।
हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है। यूएस क्रूड के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतें 107 डॉलर प्रति बैरल तो ब्रेंट क्रूड के मुताबिक यह 125 डॉलर प्रति बैरल को छू गई है। अमेरिका में गैसोलिन की कीमत 4 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई है। इसका नतीजा बाकी चीजों पर उपभोक्ताओं के खर्च में कमी के रूप में सामने आ रहा है।
गोल्डमैच सैच का कहना है कि तेल की कीमतों में 10 फीसदी का इजाफा होने से देश की विकास दर पर करीब चौथाई फीसदी का नकारात्मक असर पड़ता है। जब लोगों का पेट्रोल पर खर्च बढ़ेगा तो बाकी जरूरी चीजों पर खर्च में कटौती होना भी स्वाभाविक है। यदि लोग कार चलाने के लिए ज्यादा खर्च करने लगेंगे तो उनके पास टीवी सेट खरीदने या छुट्टियों में सैर-सपाटे की इच्छाओं पर ‘ब्रेक’ लगाना पड़ेगा। इससे उपभोक्ताओं की खर्च करने की सीमा में कटौती होगी और विकास दर में रुकावट पैदा होगी। अमेरिका में ऐसा होने लगा है।
भारत में बीते साल भर में पेट्रोल की कीमत करीब 12 फीसदी बढ़ गई है। एचएसबीसी के इकोनॉमिस्ट फ्रेडरिक न्यूमैन ने ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत सहित एशियाई मुल्कों पर पड़ने वाले असर को कुछ इस तरह समझाया है। उनका कहना है कि कीमतें बढ़ने से पश्चिम के देशों को होने वाले निर्यात पर नकारात्मक असर पड़ेगा। एशियाई मुल्कों से पश्चिम को होने वाला निर्यात कम से कम आज के वक्त में बेहद संवेदनशील है। इसके अलावा इससे कुछ दिनों के बाद एशियाई देशों में मुद्रास्फीति की मार पड़ेगी।
क्या कर सकती है सरकार ?
सरकार कहती है कि उसके पास वैश्विक बाजार में पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का मुकाबला करने के लिए इसकी कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हालांकि ऐसा नहीं है। सरकार अगर चाहे तो अपने खर्च में कटौती के अलावा कुछ और विकल्प भी आजमा सकती है।
सीनियर इकोनॉमिस्ट और भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे राव उपेंद्र दास कहते हैं, ‘सरकार अपना घाटा कम करने के लिए इस बजट में सारे विकल्प आजमा चुकी है इस बार बजट में लगभग सभी प्रकार के टैक्स को बढ़ा दिया गया। एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स या सोने के आयात पर टैक्स सरकार ने सभी में इजाफा किया है। सरकार के पास कॉरपोरेट टैक्स को बढ़ाना अंतिम विकल्प हो सकता है।’
हालांकि यह विकल्प आजमाना सरकार के आसान नहीं होगा। उपेंद्र दास के मुताबिक ऐसा करने से सरकार के खिलाफ कॉरपोरेट जगत में विरोध के स्वर उभर सकते हैं। शायद यही वजह है कि सरकार इस बार बजट में इससे बचती दिखी।
गुरुवार, 14 जुलाई 2011
कई महिलाओं का साथ चाहते हैं पुरुष
आमतौर पर पत्नी को चिट करने वाले पतियों के बारे में कहा जाता है कि उन्हें घर में प्यार नहीं मिलता इसलिए वे विवाहेत्तर संबंध बनाते हैं।
लेकिन हाल ही में जेन हेव्लिकेक के नेतृत्व में चार्ल्स विश्वविद्यालय के एक दल द्वारा किए गए अध्ययन में पाया कि पुरुष के भटकाव पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वह अपने संबंधों में खुश और संतुष्ट है या नहीं।
वे सुखी विवाहित जीवन जीते हुए भी विवाहेत्तर संबंध बनाते हैं क्योंकि वे साथी के तौर पर कई महिलाओं का साथ चाहते हैं। जबकि महिलाओं के साथ ऐसा बहुत कम होता है।
महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के संबंध सेक्स से ज्यादा प्रेरित होते हैं। वे संबंधों के मामलों में विभिन्नता चाहते हैं और इसी से प्रेरित होकर ऐसे कदम उठाते हैं।
लेकिन हाल ही में जेन हेव्लिकेक के नेतृत्व में चार्ल्स विश्वविद्यालय के एक दल द्वारा किए गए अध्ययन में पाया कि पुरुष के भटकाव पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वह अपने संबंधों में खुश और संतुष्ट है या नहीं।
वे सुखी विवाहित जीवन जीते हुए भी विवाहेत्तर संबंध बनाते हैं क्योंकि वे साथी के तौर पर कई महिलाओं का साथ चाहते हैं। जबकि महिलाओं के साथ ऐसा बहुत कम होता है।
महिलाओं के मुकाबले पुरुषों के संबंध सेक्स से ज्यादा प्रेरित होते हैं। वे संबंधों के मामलों में विभिन्नता चाहते हैं और इसी से प्रेरित होकर ऐसे कदम उठाते हैं।
पुरुष महिलाओं में क्या ढूंढते हैं ?
बदलते समय के साथ पुरुषों के पसंद में भी काफी बदलाव आया है। हाल ही में हुए सर्वे में पुरुषों के पसंद के बारे में बड़ा खुलासा हुआ है।
ऑनलाइन हुए सर्वे में पता चला है कि स्क्रीन पर जीरो फिगर भले अच्छा लगता है लेकिन जब निजी जिंदगी की बात आती है तो पुरुषों को मांसल देह वाली महिलाएं ज्यादा भाती हैं।
जब मर्दों के आसपास कोई नहीं होता, तो महिलाओं के बारे में उनकी क्या जिज्ञासाएं होती हैं। यह जानने के लिए रिसर्चर्स ने विभिन्न देशों के 1 अरब से ज्यादा पुरुषों पर शोध किया।
रिसर्चर ने पाया कि पुरुषों को महिलाओं के सेक्सी पैर बहुत पसंद है साथ ही पतली की बजाए भरे बदन वाली महिलाएं ज्यादा पसंद आती हैं।
जबकि महिलाएं पुरुषों में सेक्स अपील से ज्यादा रोमांस पसंद करती हैं। उन्हें रोमांटिक पुरुष काफी पसंद आते हैं।
ऑनलाइन हुए सर्वे में पता चला है कि स्क्रीन पर जीरो फिगर भले अच्छा लगता है लेकिन जब निजी जिंदगी की बात आती है तो पुरुषों को मांसल देह वाली महिलाएं ज्यादा भाती हैं।
जब मर्दों के आसपास कोई नहीं होता, तो महिलाओं के बारे में उनकी क्या जिज्ञासाएं होती हैं। यह जानने के लिए रिसर्चर्स ने विभिन्न देशों के 1 अरब से ज्यादा पुरुषों पर शोध किया।
रिसर्चर ने पाया कि पुरुषों को महिलाओं के सेक्सी पैर बहुत पसंद है साथ ही पतली की बजाए भरे बदन वाली महिलाएं ज्यादा पसंद आती हैं।
जबकि महिलाएं पुरुषों में सेक्स अपील से ज्यादा रोमांस पसंद करती हैं। उन्हें रोमांटिक पुरुष काफी पसंद आते हैं।
आज की लड़कियों को चाहिए कुछ इस तरह के पति
अगर आप एक अच्छी जीवनसाथी की तलाश में हैं तो शायद आपको अपना जॉब बदलना पड़ सकता है क्योंकि हाल ही में एक सर्वे में यह बात सामने आई है कि महिलाएं ऐसे व्यक्ति से शादी करना चाहती हैं। जिसकी न सिर्फ सैलरी ज्यादा हो बल्कि एक अच्छे ओहदे पर भी हो।
ब्रिटिश वेबसाइट मैच डॉट कॉम ने हाल ही में सर्वे कर यह खुलासा किया है कि महिलाएं आज भी पद और पैसे के प्रति आकर्षित होती हैं। शोधकर्ता केट टेलर का कहना है कि जीवनसाथी के रूप में मैनेजर के पद पर कार्यरत पुरुष महिलाओं की पहली पसंद हैं। दूसरे नंबर पर डॉक्टर , तीसरे नंबर पर वकील, शिक्षक और बिजनेस मैन चौथे और पांचवे नंबर पर है।
साथ ही ऐसे लोगों के कुवांरे रह जाने की आशंका है जो लाइब्रेरियन, फूल व्यवसायी, दमकलकर्मी, सेल्समैन या ड्राइवर की नौकरी करते हैं।
महिलाओं का कहना है कि एक मैनेजर पति ज्यादा समझदार, समर्पित और महत्वकांक्षी होता है। इसके साथ ही सप्ताह में 5 दिन 9 से 5 बजे की नौकरी और सप्ताह में दो दिन की छुट्टी भी महिलाओं को ऐसे पुरुषों के प्रति आकर्षित करती है।
मैनेजेर के अलावा महिलाएं डॉक्टर से शादी करना पसंद करती हैं क्योंकि डॉक्टर अपने परिवार का बेहतर ख्याल रख सकता है। महिलाओं को अपने परिवार तथा रिश्तेरदारों के सेहत की चिंता नहीं होती है। इसके साथ ही डॉक्टर अमीर और जिम्मेदार भी होते हैं। वकीलों के तार्किक क्षमता के कारण अपना दिल दे बैठती हैं।
ब्रिटिश वेबसाइट मैच डॉट कॉम ने हाल ही में सर्वे कर यह खुलासा किया है कि महिलाएं आज भी पद और पैसे के प्रति आकर्षित होती हैं। शोधकर्ता केट टेलर का कहना है कि जीवनसाथी के रूप में मैनेजर के पद पर कार्यरत पुरुष महिलाओं की पहली पसंद हैं। दूसरे नंबर पर डॉक्टर , तीसरे नंबर पर वकील, शिक्षक और बिजनेस मैन चौथे और पांचवे नंबर पर है।
साथ ही ऐसे लोगों के कुवांरे रह जाने की आशंका है जो लाइब्रेरियन, फूल व्यवसायी, दमकलकर्मी, सेल्समैन या ड्राइवर की नौकरी करते हैं।
महिलाओं का कहना है कि एक मैनेजर पति ज्यादा समझदार, समर्पित और महत्वकांक्षी होता है। इसके साथ ही सप्ताह में 5 दिन 9 से 5 बजे की नौकरी और सप्ताह में दो दिन की छुट्टी भी महिलाओं को ऐसे पुरुषों के प्रति आकर्षित करती है।
मैनेजेर के अलावा महिलाएं डॉक्टर से शादी करना पसंद करती हैं क्योंकि डॉक्टर अपने परिवार का बेहतर ख्याल रख सकता है। महिलाओं को अपने परिवार तथा रिश्तेरदारों के सेहत की चिंता नहीं होती है। इसके साथ ही डॉक्टर अमीर और जिम्मेदार भी होते हैं। वकीलों के तार्किक क्षमता के कारण अपना दिल दे बैठती हैं।
सिर्फ किस नहीं है महिलाओं की प्राथमिकता
रिश्तों के मामले में पुरुषों को ज्यादा बोल्ड समझा जाता है लेकिन बदले समय के साथ महिलाओं की सोच में भी काफी बदलाव आया है। हाल ही में इंडियाना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने खुलासा किया है कि पुरूष आलिंगन और चुंबन को ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं दूसरी ओर महिलाएं सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं।
शोधकर्ताओं ने पांच देशों के एक हजार से अधिक दंपतियों पर अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि रिश्ते के शुरूआती 15 वर्ष में महिलाएं बच्चों के पालन पोषण में व्यस्त रहने के कारण ज्यादा भावनात्मक होती हैं ।
इस दौर में वे बच्चों की परवरिश और घर की देखभाल में व्यस्त रहती हैं लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उनके ऊपर दबाव कम होता जाता है।
महिलाओं को अपने संबंधों के बारे में सोचने के लिए ज्यादा समय मिलता है। वे अपने पार्टनर के साथ ज्यादा समय बिताती हैं और सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं। उम्र के इस दौर में सेक्स उनकी प्राथमिकता होती है।
www.bhaskar.com
शोधकर्ताओं ने पांच देशों के एक हजार से अधिक दंपतियों पर अध्ययन किया। शोध में पाया गया कि रिश्ते के शुरूआती 15 वर्ष में महिलाएं बच्चों के पालन पोषण में व्यस्त रहने के कारण ज्यादा भावनात्मक होती हैं ।
इस दौर में वे बच्चों की परवरिश और घर की देखभाल में व्यस्त रहती हैं लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाता है उनके ऊपर दबाव कम होता जाता है।
महिलाओं को अपने संबंधों के बारे में सोचने के लिए ज्यादा समय मिलता है। वे अपने पार्टनर के साथ ज्यादा समय बिताती हैं और सेक्स के प्रति ज्यादा उत्सुक रहती हैं। उम्र के इस दौर में सेक्स उनकी प्राथमिकता होती है।
www.bhaskar.com
सदस्यता लें
संदेश (Atom)