आखिर यह रफ्तार क्यों
उस दिन गाड़ी चलाते हुए डर लगने लगा था। कम भीड़-भाड़ वाली सड़क पर पीछे से आ रही एक कार लगभ
ग 100 की स्पीड से बहुत सी गाडि़यों को बायीं ओर से क्रॉस करती हुई आगे एक टर्न पर अपना बैलेंस खो बैठी और फुटपाथ से जा टकराई। शुक्र है कि कार चलाने वाले युवक को मामूली चोट आई और पास के अस्पताल से ही उसकी मरहम-पट्टी भी हो गई। लेकिन गाड़ी की जो दशा थी उसके लिए युवक का जवाब था- बीमा कंपनी देख लेगी।
ऐसे दृश्य अक्सर हमें देखने-सुनने को मिल जाते हैं। जिस दुर्घटना की बात मैं कर रहा हूं, उसमें तीन गाडि़यां और भी आपस में टकराई। क्या इसे फिल्मी दृश्य मानकर भूल जाना चाहिए? मैं उन युवकों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रख सकता जो अपने वाहन की, चाहे वह कार हो या बाइक, आवश्यकतानुसार स्पीड पर नियंत्रण नहीं रख सकते। उनसे बात करो तो जवाब मिलता है कि एक लाख की बाइक पर चींटी सी चाल चलने में मजा नहीं आता। ऐसे ही बड़ी और लंबी गाड़ी की शान का अर्थ तेज गति माना जाता है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि दस लाख की गाड़ी चलाने वालों को दस सेकंड रुकना भी भारी क्यों लगता है? वह क्यों अगले दस मिनट के बारे में नहीं सोचते? सड़क पर चलने वाले दस लोगों के बारे में भी वह क्यों नहीं सोचते? लगता है नोएडा, गुड़गांव और दिल्ली में खुली सड़कों और हाई-वे पर स्टंट करने वाले युवकों को न तो अपने जीवन से प्यार है न ही अपने परिवार के सदस्यों की चिंता।
युवावस्था में जोश रहता है, जीवन के प्रति उमंग और उत्साह रहता है। हो सकता है इसकी अभिव्यक्ति युवा तेज गति से गाड़ी चलाकर करते हों। लेकिन इसमें कई बार वे अति कर डालते हैं और जीवन को दांव पर लगा देते हैं। पर क्या इसके लिए हम सब भी जिम्मेदार नहीं हैं? जीवन में इस तेज गति का जो नशा उनमें दिख रहा है, वह समाज की ही देन है। वे अपने घर और परिवार में देख रहे हैं कि किस तरह की आतुरता हर किसी में समाई हुई है। महानगरों में खासतौर से यह बात है। एक तो इन शहरों का स्वरूप ही ऐसा है कि जीवन में अपने आप भागदौड़ आ जाती है। लेकिन हम व्यावहारिक वजहों से ही दौड़धूप नहीं कर रहे, गति हमारे जेहन में समा चुकी है। लोग जल्दी से जल्दी सब कुछ पाना चाहते हैं। किसी को रातोंरात समृद्धि चाहिए किसी को प्रसिद्धि चाहिए। एक युवा यह सब अपने तरीके से ग्रहण कर रहा होता है। वह रफ्तार को ही जीवन का निर्णायक तत्व मान लेता है। धीमा चलना उसके लिए पिछड़ेपन का पर्याय बन जाता है। सड़क पर पिछड़ने को वह जीवन में असफलता के रूप में देखने लग जाता है। दिक्कत यह है कि हम युवाओं से संवाद भी नहीं कर रहे हैं। नई पीढ़ी को हम गंभीरता से समझा नहीं पा रहे कि रफ्तार सफलता की अनिवार्य शर्त नहीं है। तेज चलने से ही सब कुछ नहीं हासिल हो जाता।
मे दैनिक राष्ट्रीय हिंदी मेल का सम्पादक हूँ.खुल्लम खुल्ला मेरी अभिव्यक्ति है .अपना विचार खुलेआम दुनिया के सामने व्यक्त करने का यह सशक्त माध्यम है.अरुण बंछोर-मोबाइल -9074275249 ,7974299792 सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे, कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
शनिवार, 27 नवंबर 2010
बुधवार, 24 नवंबर 2010
आलेख
‘मेरी दुनिया भी बदली है’
सब यही कहते हैं कि लड़की की ज़िंदगी में शादी एक बहुत बड़ा बदलाव ला देती है। लेकिन कभी लड़के से कोई पूछता है कि उसे क्या महसूस होता है? चूंकि उसका घर नहीं बदला, नाम नहीं बदला, परिवेश वही रहा, उसके रहन-सहन में कोई नज़र आने वाला परिवर्तन नहीं दिखा, तो क्या कुछ नहीं बदला? या सिर्फ सिंदूर लगाने से ही परिवर्तन देखे और समझे जा सकते हैं? चलिए, दूल्हे के मन में झांककर देखते हैं कि वहां क्या खलबली मची है। उसका एक अलिखा खत पढ़ते हैं, जिसमें सदियों से अबोली बातों का अच्छा-खासा सिलसिला दिख रहा है। यह बातें लड़की के देखे जाने वाले दिन से ही शुरू हो गई थीं-
‘पिछले हफ्ते जिस लड़की को हमने देखा, उसकी उम्र तो बहुत कम थी। पर सबने मुझे चुप करा दिया, यह कहके कि तुमको यह सब नहीं देखना। जो पूछना हो, वो पूछ लो। मुझे फर्क पड़ता है। हमारी उम्र में बहुत फासला होगा, तो सोच-समझ में भी अंतर आएगा। तब निबाह करने को भी मुझसे ही कहेंगे। खुद के किए का दोष तब मेरे सिर मढ़ दिया जाएगा। लड़की की पढ़ाई का भी ऐसा ही असर है। पर अभी इनकी नज़र सिर्फ खूबसूरती पर जा रही है। खैर, आज जिसे मिला, वह मुझे बातचीत से ठीक लगी। लेकिन उसे ज्यादा सवाल नहीं पूछने दिए गए। क्यों?
वह पूछती, तो हमारे बीच ऐतबार बनता। मुझे लगता कि मेरी खूबियां या कमियां उसके लिए मायने रखती हैं। और अब तो शादी की तारीख भी पक्की हो गई है। मैं अपनी होने वाली पत्नी से बातें करता हूं। उसे जानने लगा हूं, पर हर पल एक अनजानी असुरक्षा बनी रहती है। क्या मैं उसकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊंगा? वह तो बताती है कि उसके लिए काफी तैयारियां शुरू हो गई हैं, कभी-कभी हिचकते हुए पूछ लेती है कि हमारे घर में उसके लिए क्या कुछ किया जा रहा है। दबी ज़ुबान से पसंद-नापसंद भी बता जाती है, मुझे अच्छा ही लगता है। पर मेरे लिए कहां कुछ हो रहा है, नहीं समझ पाता। उल्टे मैं तो कहूंगा कि एक सांस्कृतिक अंतर्विरोध की स्थिति है। मेरे भाई-बहन, माता-पिता, दोस्त तक यही मानकर चल रहे हैं कि मैं बस कुछ ही दिनों में बदल जाऊंगा। उन्हें समय नहीं दूंगा, पैसे नहीं दूंगा, उनका ध्यान नहीं रखूंगा, यहां तक कि उनकी तरफ नज़र डालना भी कम हो जाएगा।
वहीं उसका फोन आता है, तो कहती है ‘शाम तो हमारी होगी न। हफ्ते में एक दिन तो हम साथ में घूमने जा सकते हैं न!!’ संतुलन तो अभी से गड़बड़ाने लगा है। एकाएक मैं महत्वपूर्ण हो उठा हूं या यह परिवर्तन सबको असुरक्षित बना रहा है? मेरे परिवार में तो वंशावली साफ है, पिता-मां बड़े, भाई-बहन छोटे। इनके लिए मेरे दायित्व और स्नेह की अपनी डोरियां हैं। अब एक रिश्ता समानता का बनने वाला है, उससे निबाह का तरीका क्या चुनूं कि इन वंशानुगत रिश्तों पर फर्क न पड़े? अपनी उलझनें किसे बताऊं?
शादी के समय अजीब स्थितियां हुईं। मैं काम करूं, तो कहते कि बड़ा बढ़-चढ़कर अपनी शादी में काम कर रहा है। न करूं, तो कहते, ज़िम्मेदारी कब सीखोगे। घर में रहता, तो कहते कि घर में रहना सीख रहे हो? बाहर जाऊं, तो कहते आज देख लो इन्हें, कल से तो दिखाई ही कम देंगे।
घर से विरासत से जुड़ा हूं और पत्नी से वचनों से। टूटन का डर, दरकने का खतरा मेरे हर कदम को डिगाने पर आमादा है। और मैं अपनी शादी की खुशी में नाच रहा हूं। नाचने को कहा गया है। शादी की रस्मों में भी डर साफ झलक रहा था। ‘जीजाजी को आज घेर लो, बाद में पैसे नहीं देंगे’- जैसी बातें साफ सुनाई देती रहीं। अब घर में आ गए हैं। मुझे खुद झिझक होती है अपने ही कमरे में जाने में। मैं सजग रहता हूं। नापा-तौला जो जा रहा है मुझे। क्या बदल गया मुझमें, सब यही समझने में लगे रहते हैं। पगफेरे के बाद पत्नी को लेने गया, तो भी इसी फिक्र में रहा। वहां सारे लोग मेरे खाने की थाली में क्या है, कितना है, क्या खाया, कैसे खाया, इस सब की नापजोख तक में लगे रहे।
‘क्या मिला, कितना मिला’- यह सवाल भी लाज़िमी से हैं। इनकी प्रतिक्रिया बड़ी आरोपों भरी है। ‘बस, इतना ही दिया नेग में?’ ‘अरे वाह, बहुत सारा मिल गया तुझे तो।’ मानो, किसी और की जेब कतर ली हो मैंने।घर से बाहर कदम निकालता हूं, तो कहा जाता है ‘पत्नी का ख्याल नहीं है क्या?’ न जाऊं, तो कहते हैं कि ‘औरतों की तरह घर में ही घुसा रहता है।’ पत्नी से बातें करना या घरवालों को समय देना, मैं बाज़ीगर की तरह बहुत नाजुक-सी रस्सी पर झूलता रहता हूं।
सब यही कहते हैं कि लड़की की ज़िंदगी में शादी एक बहुत बड़ा बदलाव ला देती है। लेकिन कभी लड़के से कोई पूछता है कि उसे क्या महसूस होता है? चूंकि उसका घर नहीं बदला, नाम नहीं बदला, परिवेश वही रहा, उसके रहन-सहन में कोई नज़र आने वाला परिवर्तन नहीं दिखा, तो क्या कुछ नहीं बदला? या सिर्फ सिंदूर लगाने से ही परिवर्तन देखे और समझे जा सकते हैं? चलिए, दूल्हे के मन में झांककर देखते हैं कि वहां क्या खलबली मची है। उसका एक अलिखा खत पढ़ते हैं, जिसमें सदियों से अबोली बातों का अच्छा-खासा सिलसिला दिख रहा है। यह बातें लड़की के देखे जाने वाले दिन से ही शुरू हो गई थीं-
‘पिछले हफ्ते जिस लड़की को हमने देखा, उसकी उम्र तो बहुत कम थी। पर सबने मुझे चुप करा दिया, यह कहके कि तुमको यह सब नहीं देखना। जो पूछना हो, वो पूछ लो। मुझे फर्क पड़ता है। हमारी उम्र में बहुत फासला होगा, तो सोच-समझ में भी अंतर आएगा। तब निबाह करने को भी मुझसे ही कहेंगे। खुद के किए का दोष तब मेरे सिर मढ़ दिया जाएगा। लड़की की पढ़ाई का भी ऐसा ही असर है। पर अभी इनकी नज़र सिर्फ खूबसूरती पर जा रही है। खैर, आज जिसे मिला, वह मुझे बातचीत से ठीक लगी। लेकिन उसे ज्यादा सवाल नहीं पूछने दिए गए। क्यों?
वह पूछती, तो हमारे बीच ऐतबार बनता। मुझे लगता कि मेरी खूबियां या कमियां उसके लिए मायने रखती हैं। और अब तो शादी की तारीख भी पक्की हो गई है। मैं अपनी होने वाली पत्नी से बातें करता हूं। उसे जानने लगा हूं, पर हर पल एक अनजानी असुरक्षा बनी रहती है। क्या मैं उसकी उम्मीदों पर खरा उतर पाऊंगा? वह तो बताती है कि उसके लिए काफी तैयारियां शुरू हो गई हैं, कभी-कभी हिचकते हुए पूछ लेती है कि हमारे घर में उसके लिए क्या कुछ किया जा रहा है। दबी ज़ुबान से पसंद-नापसंद भी बता जाती है, मुझे अच्छा ही लगता है। पर मेरे लिए कहां कुछ हो रहा है, नहीं समझ पाता। उल्टे मैं तो कहूंगा कि एक सांस्कृतिक अंतर्विरोध की स्थिति है। मेरे भाई-बहन, माता-पिता, दोस्त तक यही मानकर चल रहे हैं कि मैं बस कुछ ही दिनों में बदल जाऊंगा। उन्हें समय नहीं दूंगा, पैसे नहीं दूंगा, उनका ध्यान नहीं रखूंगा, यहां तक कि उनकी तरफ नज़र डालना भी कम हो जाएगा।
वहीं उसका फोन आता है, तो कहती है ‘शाम तो हमारी होगी न। हफ्ते में एक दिन तो हम साथ में घूमने जा सकते हैं न!!’ संतुलन तो अभी से गड़बड़ाने लगा है। एकाएक मैं महत्वपूर्ण हो उठा हूं या यह परिवर्तन सबको असुरक्षित बना रहा है? मेरे परिवार में तो वंशावली साफ है, पिता-मां बड़े, भाई-बहन छोटे। इनके लिए मेरे दायित्व और स्नेह की अपनी डोरियां हैं। अब एक रिश्ता समानता का बनने वाला है, उससे निबाह का तरीका क्या चुनूं कि इन वंशानुगत रिश्तों पर फर्क न पड़े? अपनी उलझनें किसे बताऊं?
शादी के समय अजीब स्थितियां हुईं। मैं काम करूं, तो कहते कि बड़ा बढ़-चढ़कर अपनी शादी में काम कर रहा है। न करूं, तो कहते, ज़िम्मेदारी कब सीखोगे। घर में रहता, तो कहते कि घर में रहना सीख रहे हो? बाहर जाऊं, तो कहते आज देख लो इन्हें, कल से तो दिखाई ही कम देंगे।
घर से विरासत से जुड़ा हूं और पत्नी से वचनों से। टूटन का डर, दरकने का खतरा मेरे हर कदम को डिगाने पर आमादा है। और मैं अपनी शादी की खुशी में नाच रहा हूं। नाचने को कहा गया है। शादी की रस्मों में भी डर साफ झलक रहा था। ‘जीजाजी को आज घेर लो, बाद में पैसे नहीं देंगे’- जैसी बातें साफ सुनाई देती रहीं। अब घर में आ गए हैं। मुझे खुद झिझक होती है अपने ही कमरे में जाने में। मैं सजग रहता हूं। नापा-तौला जो जा रहा है मुझे। क्या बदल गया मुझमें, सब यही समझने में लगे रहते हैं। पगफेरे के बाद पत्नी को लेने गया, तो भी इसी फिक्र में रहा। वहां सारे लोग मेरे खाने की थाली में क्या है, कितना है, क्या खाया, कैसे खाया, इस सब की नापजोख तक में लगे रहे।
‘क्या मिला, कितना मिला’- यह सवाल भी लाज़िमी से हैं। इनकी प्रतिक्रिया बड़ी आरोपों भरी है। ‘बस, इतना ही दिया नेग में?’ ‘अरे वाह, बहुत सारा मिल गया तुझे तो।’ मानो, किसी और की जेब कतर ली हो मैंने।घर से बाहर कदम निकालता हूं, तो कहा जाता है ‘पत्नी का ख्याल नहीं है क्या?’ न जाऊं, तो कहते हैं कि ‘औरतों की तरह घर में ही घुसा रहता है।’ पत्नी से बातें करना या घरवालों को समय देना, मैं बाज़ीगर की तरह बहुत नाजुक-सी रस्सी पर झूलता रहता हूं।
सोमवार, 22 नवंबर 2010
ये कैसा इन्साफ
अगले जनम...बिटिया न कीजौ
उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में एक दलित ने अपनी पत्नी और चार बेटियों के साथ मौत को गले लगा लिया। स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी को लगता है कि चौथी बेटी घर में आने के बाद घर का मुखिया ओमप्रकाश अवसाद में था।

हनुमानगढ़ जिले के रोडावाली गाँव में एक साथ गमगीन माहौल में छह लोगों का अंतिम संस्कार किया गया। उधर राज्य के शेखावाटी अंचल में पिछले तीन माह में नवजात बच्चियों को लावारिस छोड़ने के चौदह मामले सामने आए हैं।
महिला संगठनों को लगता है ये बेटियों के लिए खतरे की घंटी है। रोडावाली गाँव में रविवार को उस समय रुलाई फूट पड़ी जबएक के बाद एक छह शव गिने गए।
पुलिस ने जब 33 वर्षीय ओमप्रकाश नायक के घर का दरवाजा खोला तो वो ओमप्रकाश, उसकी 30 वर्षीय पत्नी चुकली, आठ साल की बेटी पूजा, छह साल की अर्चना, चार साल की नंदिनी एक माह पहले दुनिया में आई मुन्नी मरे हुए पाए गए।
हनुमानगढ़ के पुलिस अधीक्षक का कहना था, ‘इन लोगों ने जहर खा कर अपनी जान दे दी। ऐसा लगता है कि वो चौथी बेटी पैदा होने के बाद से अवसाद में था। परिवार की आर्थिक हालत भी ठीक नहीं थी।’
पुलिस को ओमप्रकाश के भाई ने तब सूचित किया जब दिन निकलने के बाद भी ओमप्रकाश के घर का दरवाजा नहीं खुला और कोई हरकत नहीं दिखाई दी। ये खबर ऐसे समय आई जब राजस्थान की एक बेटी कृष्णा पुनिया कॉमनवेल्थ खेलो में तमगा लेकर आई और लोग बेटियों पर नाज कर रहे थे।
लावारिस बेटियाँ : सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती है, ‘समाज में बेटों को तरजीह देने का रुझान खतरनाक तरीके से उभरा है। इसमें बेटियों की बेकद्री हो रही है। हमें लगता है जनगणना के आँकड़े आएँगे तो हालात की बहुत ही चिंताजनक तस्वीर सामने होगी। बेटियों की चाहत बुरी तरह घटी है।’
शेखावाटी में सीकर के पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने बीबीसी से कहा, ‘हाँ पिछले कुछ माह में सीकर और झूंझुनु जिलों में नवजात पुत्रियों को लावारिस छोड़ने के एक दर्ज़न मामले सामने आए हैं।’
नू के सामाजिक कार्यकर्ता राजन चौधरी ने पुत्रियों को लावारिस छोड़े जाने की घटनाओं को दर्ज किया है।
उन्होंने बीबीसी को बताया, 'सितंबर माह से लेकर अब तक दो ज़िलों में चौदह नवजात कन्याओं को कहीं कुएँ में फेंका गया, कहीं सड़क पर लावारिस छोड़ा गया। सीकर में रविवार को भी एक नवजात कन्या ने अपनी किलकारी से लावारिस छोड़े जाने की सूचना दी।'
इन चौदह में से चार नवजात बालिकाएँ जिन्दा रह गई। एक नन्ही जान तो इतनी बलवान निकली कि एक सौ पाँच फुट गहरे कुएँ में गिराए जाने के बाद भी जीवित रह गई। लेकिन उसका हाथ टूट गया।
चौधरी कहते हैं, ‘विडम्बना ये है कि अजन्मी और नवजात बालिकाओं को मारे जाने की घटनाएँ उन परिवारों मे ज्यादा हो रही है जो शिक्षित है। झुंझुनू शिक्षा में बहुत आगे है। हमें लगता है इन तीन जिलों में लड़का-लड़की अनुपात बहुत ही खतरनाक मुकाम पर पहुँच रहा है।ये एक हजार लड़कों के मुकाबिले सात सौ से आठ सौ लड़कियों की इत्तिला दे रहा है।’
नवजात बेटियों को निर्जन स्थान पर बिसरा देने की घटनाएँ ऐसे मौसम और माहौल में आई है जब वो कहीं तमगे ला रही है, अन्तरिक्ष में जा रही है और फलक पर सितारों की मानिंद चमक रही है।
उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में एक दलित ने अपनी पत्नी और चार बेटियों के साथ मौत को गले लगा लिया। स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी को लगता है कि चौथी बेटी घर में आने के बाद घर का मुखिया ओमप्रकाश अवसाद में था।

हनुमानगढ़ जिले के रोडावाली गाँव में एक साथ गमगीन माहौल में छह लोगों का अंतिम संस्कार किया गया। उधर राज्य के शेखावाटी अंचल में पिछले तीन माह में नवजात बच्चियों को लावारिस छोड़ने के चौदह मामले सामने आए हैं।
महिला संगठनों को लगता है ये बेटियों के लिए खतरे की घंटी है। रोडावाली गाँव में रविवार को उस समय रुलाई फूट पड़ी जबएक के बाद एक छह शव गिने गए।
पुलिस ने जब 33 वर्षीय ओमप्रकाश नायक के घर का दरवाजा खोला तो वो ओमप्रकाश, उसकी 30 वर्षीय पत्नी चुकली, आठ साल की बेटी पूजा, छह साल की अर्चना, चार साल की नंदिनी एक माह पहले दुनिया में आई मुन्नी मरे हुए पाए गए।
हनुमानगढ़ के पुलिस अधीक्षक का कहना था, ‘इन लोगों ने जहर खा कर अपनी जान दे दी। ऐसा लगता है कि वो चौथी बेटी पैदा होने के बाद से अवसाद में था। परिवार की आर्थिक हालत भी ठीक नहीं थी।’
पुलिस को ओमप्रकाश के भाई ने तब सूचित किया जब दिन निकलने के बाद भी ओमप्रकाश के घर का दरवाजा नहीं खुला और कोई हरकत नहीं दिखाई दी। ये खबर ऐसे समय आई जब राजस्थान की एक बेटी कृष्णा पुनिया कॉमनवेल्थ खेलो में तमगा लेकर आई और लोग बेटियों पर नाज कर रहे थे।
लावारिस बेटियाँ : सामाजिक कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती है, ‘समाज में बेटों को तरजीह देने का रुझान खतरनाक तरीके से उभरा है। इसमें बेटियों की बेकद्री हो रही है। हमें लगता है जनगणना के आँकड़े आएँगे तो हालात की बहुत ही चिंताजनक तस्वीर सामने होगी। बेटियों की चाहत बुरी तरह घटी है।’
शेखावाटी में सीकर के पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने बीबीसी से कहा, ‘हाँ पिछले कुछ माह में सीकर और झूंझुनु जिलों में नवजात पुत्रियों को लावारिस छोड़ने के एक दर्ज़न मामले सामने आए हैं।’
नू के सामाजिक कार्यकर्ता राजन चौधरी ने पुत्रियों को लावारिस छोड़े जाने की घटनाओं को दर्ज किया है।
उन्होंने बीबीसी को बताया, 'सितंबर माह से लेकर अब तक दो ज़िलों में चौदह नवजात कन्याओं को कहीं कुएँ में फेंका गया, कहीं सड़क पर लावारिस छोड़ा गया। सीकर में रविवार को भी एक नवजात कन्या ने अपनी किलकारी से लावारिस छोड़े जाने की सूचना दी।'
इन चौदह में से चार नवजात बालिकाएँ जिन्दा रह गई। एक नन्ही जान तो इतनी बलवान निकली कि एक सौ पाँच फुट गहरे कुएँ में गिराए जाने के बाद भी जीवित रह गई। लेकिन उसका हाथ टूट गया।
चौधरी कहते हैं, ‘विडम्बना ये है कि अजन्मी और नवजात बालिकाओं को मारे जाने की घटनाएँ उन परिवारों मे ज्यादा हो रही है जो शिक्षित है। झुंझुनू शिक्षा में बहुत आगे है। हमें लगता है इन तीन जिलों में लड़का-लड़की अनुपात बहुत ही खतरनाक मुकाम पर पहुँच रहा है।ये एक हजार लड़कों के मुकाबिले सात सौ से आठ सौ लड़कियों की इत्तिला दे रहा है।’
नवजात बेटियों को निर्जन स्थान पर बिसरा देने की घटनाएँ ऐसे मौसम और माहौल में आई है जब वो कहीं तमगे ला रही है, अन्तरिक्ष में जा रही है और फलक पर सितारों की मानिंद चमक रही है।
रविवार, 21 नवंबर 2010
ज्योतिषीय और वैज्ञानिक लाभ
अंगुठियां क्यों पहनते हैं?
हम और हमारे आसपास अधिकांश लोग अपने हाथों में अंगूठी पहनते हैं। वैसे तो आज के समय अंगुठियों को आभूषण के रूप में देखा जाता है लेकिन अंगूठी पहनने के कई ज्योतिषीय और वैज्ञानिक लाभ भी हैं।

पुराने समय से ही अंगूठी पहनने की परंपरा चली आ रही है। लड़के हो या लड़कियां सभी को अंगूठी पहनना काफी पसंद होता है। हाथों में अंगूठी पहनने के पीछे यह ज्योतिषीय कारण हैं कि अंगूठी में नग या रत्न जड़वाकर पहना जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुंडली में यदि कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला है तो उसके निदान के लिए अंगूठी में रत्न लगवाकर पहनाया जाता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार हमारे हाथों की अंगुलियां अलग-अलग ग्रहों का प्रतिनिधित्व करती हैं। हमारी कुंडली में जो ग्रह अशुभ होता है उस ग्रह का प्रतिनिधित्व करने वाली अंगूली में संबंधित रत्न धारण कर लिया जाता है। अंगूठी में रत्न पहनने के बाद अशुभ ग्रह का बुरा प्रभाव कम हो जाता है।
अंगूठी पहनने से उसकी धातू के सभी गुण हमारी त्वचा से शरीर में प्रवेश करते हैं। जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी होते हैं।
अंगुठियों में कीमती रत्न जड़वाकर पहने जाते हैं, इससे हाथों की सुंदरता बढ़ती है। अन्य लोगों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। कोई भी नया व्यक्ति इसके आकर्षण से आपसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। रत्न धारण करने के लिए अंगुठियां पहनने का चलन आज फैशन बन गया है। इन्हीं सब फायदों की वजह से अंगुठियां पहनी जाती हैं।
हम और हमारे आसपास अधिकांश लोग अपने हाथों में अंगूठी पहनते हैं। वैसे तो आज के समय अंगुठियों को आभूषण के रूप में देखा जाता है लेकिन अंगूठी पहनने के कई ज्योतिषीय और वैज्ञानिक लाभ भी हैं।

पुराने समय से ही अंगूठी पहनने की परंपरा चली आ रही है। लड़के हो या लड़कियां सभी को अंगूठी पहनना काफी पसंद होता है। हाथों में अंगूठी पहनने के पीछे यह ज्योतिषीय कारण हैं कि अंगूठी में नग या रत्न जड़वाकर पहना जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुंडली में यदि कोई ग्रह अशुभ फल देने वाला है तो उसके निदान के लिए अंगूठी में रत्न लगवाकर पहनाया जाता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार हमारे हाथों की अंगुलियां अलग-अलग ग्रहों का प्रतिनिधित्व करती हैं। हमारी कुंडली में जो ग्रह अशुभ होता है उस ग्रह का प्रतिनिधित्व करने वाली अंगूली में संबंधित रत्न धारण कर लिया जाता है। अंगूठी में रत्न पहनने के बाद अशुभ ग्रह का बुरा प्रभाव कम हो जाता है।
अंगूठी पहनने से उसकी धातू के सभी गुण हमारी त्वचा से शरीर में प्रवेश करते हैं। जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी होते हैं।
अंगुठियों में कीमती रत्न जड़वाकर पहने जाते हैं, इससे हाथों की सुंदरता बढ़ती है। अन्य लोगों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। कोई भी नया व्यक्ति इसके आकर्षण से आपसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। रत्न धारण करने के लिए अंगुठियां पहनने का चलन आज फैशन बन गया है। इन्हीं सब फायदों की वजह से अंगुठियां पहनी जाती हैं।
शनिवार, 20 नवंबर 2010
पुराने प्यार की याद
पुराने प्यार की उष्मा को ऐसे जलाएं
रोमांटिक गाने अक्सर हमें पुराने प्यार की याद दिलाते हैं। अतीत को यादकर दिल तड़पने लगता है। लेकिन जब एक दिन आपकी मुलाकात अचानक पुराने प्रेमी से होता है तो कुछ कहने के लिए शब्द नहीं होता। प्रसन्नता को आप अंदर ही अंदर महसूस करते हैं। लेकिन जुबान से कुछ कहने से घबराते हैं। बात कैसी हो तक सीमित रह जाती है।

इस दौरान अगर आप किसी रिश्ते में नहीं बंधे हैं तो एक बार फिर पुराने प्यार को पाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन दिक्कत तब आती है जब किसी एक पार्टनर को पुराने प्यार में रूचि नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में पुराने प्यार को अपनाने के लिए ये टिप्स अपनाएं।
पुरानी बातों को भूलकर नए सिरे से दोस्ती की शुरुआत करें। गलती के लिए माफी मांगे।
लंबे अंतराल के बात मिल रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि वह पहले जैसी नहीं होगी। इस दौरान आप दोनों में काफी बदलाव आया होगा। उससे यह कभी न कहें कि तुम पहले जैसी नहीं रही या वो दिन ज्यादा अच्छे थे।
उसे नाश्ता या दोपहर का भोजन करने के बजाय रात के खाने के लिए आमंत्रित करें। दिन में साथ लंच करना रोमांस का संकेत नहीं है। ऐसे में आप दोनों को करीब आने में काफी समय लग सकता है। शुरूआती दौर में लाइट मूड की बातें करें। बॉडिंग बनने में थोड़ा समय लगेगा।
अब आप दोनों परिपक्व हो गए हैं इसलिए टीन एज जैसा व्यवहार न करें। दोनों साथ साथ समय बिताएं। रोमांटिक गाने सुने और फिल्में देखे। पिछली बार जिस गलती के कारण रिश्ता टूट गया था उसे दोहराने की गलती न करें।
रोमांटिक गाने अक्सर हमें पुराने प्यार की याद दिलाते हैं। अतीत को यादकर दिल तड़पने लगता है। लेकिन जब एक दिन आपकी मुलाकात अचानक पुराने प्रेमी से होता है तो कुछ कहने के लिए शब्द नहीं होता। प्रसन्नता को आप अंदर ही अंदर महसूस करते हैं। लेकिन जुबान से कुछ कहने से घबराते हैं। बात कैसी हो तक सीमित रह जाती है।

इस दौरान अगर आप किसी रिश्ते में नहीं बंधे हैं तो एक बार फिर पुराने प्यार को पाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन दिक्कत तब आती है जब किसी एक पार्टनर को पुराने प्यार में रूचि नहीं रह जाती। ऐसी स्थिति में पुराने प्यार को अपनाने के लिए ये टिप्स अपनाएं।
पुरानी बातों को भूलकर नए सिरे से दोस्ती की शुरुआत करें। गलती के लिए माफी मांगे।
लंबे अंतराल के बात मिल रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि वह पहले जैसी नहीं होगी। इस दौरान आप दोनों में काफी बदलाव आया होगा। उससे यह कभी न कहें कि तुम पहले जैसी नहीं रही या वो दिन ज्यादा अच्छे थे।
उसे नाश्ता या दोपहर का भोजन करने के बजाय रात के खाने के लिए आमंत्रित करें। दिन में साथ लंच करना रोमांस का संकेत नहीं है। ऐसे में आप दोनों को करीब आने में काफी समय लग सकता है। शुरूआती दौर में लाइट मूड की बातें करें। बॉडिंग बनने में थोड़ा समय लगेगा।
अब आप दोनों परिपक्व हो गए हैं इसलिए टीन एज जैसा व्यवहार न करें। दोनों साथ साथ समय बिताएं। रोमांटिक गाने सुने और फिल्में देखे। पिछली बार जिस गलती के कारण रिश्ता टूट गया था उसे दोहराने की गलती न करें।
लाइफ स्टाइल
थोड़ी थोड़ी पीया करो
वाइन पीना लाइफ स्टाइल का एक हिस्सा बन गया है। लेकिन अभी भी महिलाएं इससे परहेज करती हैं। लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने कहा है कि जो महिलाएं सप्ताह में एक-दो गिलास वाइन पीती हैं उन्हें बुढ़ापे में होने वालीं स्वास्थ्यगत परेशानियां कम होती हैं और आघात का खतरा भी कम होता है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 200,000 से ज्यादा महिलाओं पर शोध किया। अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि 1,4999 महिलाएं कैंसर, दिल की समस्या, शारीरिक परेशानी या याददाश्त की समस्या के बिना 70 साल की आयु तक का जीवन जीया।
महिलाओं के जीवन पर विश्लेषण करने पर उन्होंने पाया कि ये महिलाएं यंग एज में सप्ताह में तीन चार दिन एक या दो गिलास वाइन लेती थी। शोधकर्ताओं ने पाया कि उनका जीवन ऐसा न करने वाली महिलाओं की तुलना में 28 प्रतिशत ज्यादा बेहतर था।
वाइन पीना लाइफ स्टाइल का एक हिस्सा बन गया है। लेकिन अभी भी महिलाएं इससे परहेज करती हैं। लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने कहा है कि जो महिलाएं सप्ताह में एक-दो गिलास वाइन पीती हैं उन्हें बुढ़ापे में होने वालीं स्वास्थ्यगत परेशानियां कम होती हैं और आघात का खतरा भी कम होता है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 200,000 से ज्यादा महिलाओं पर शोध किया। अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि 1,4999 महिलाएं कैंसर, दिल की समस्या, शारीरिक परेशानी या याददाश्त की समस्या के बिना 70 साल की आयु तक का जीवन जीया।
महिलाओं के जीवन पर विश्लेषण करने पर उन्होंने पाया कि ये महिलाएं यंग एज में सप्ताह में तीन चार दिन एक या दो गिलास वाइन लेती थी। शोधकर्ताओं ने पाया कि उनका जीवन ऐसा न करने वाली महिलाओं की तुलना में 28 प्रतिशत ज्यादा बेहतर था।
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
रोमांस
बिछुड़े प्यार को भूल जाना बेहतर
- मानसी
NDहेलो दोस्तो! जब आप कोई पाठ याद करना चाहें तो कितनी मुश्किल होती है। बार-बार उसे दुहराना। थोड़ा समय बीतने पर फिर उसे याद करके चेक करना कि कहीं आप उसे भूल तो नहीं गए। याद रखने के लिए कई तरीके ईजाद किए गए हैं। कोई किसी रूखे-सूखे जवाब को तुकबंदी बनाकर याद करने की कोशिश करता है तो कोई बार-बार लिखकर या फिर तारीखों को अपनी निजी तारीखों से जोड़कर याद करता है।
आप किसी को भी थोड़ा-ज्यादा काम बता दें वह कुछ न कुछ भूल ही जाता है। दफ्तरों में भी लोग न जाने कितनी डायरी, कितने प्लैनर इसी काम के लिए भरते रहते हैं। फिर भी अपनों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि याद रखना आसान नहीं लगता है तो मोबाइल में रिमाइंडर लगाते हैं। ये सारे जतन बस इसलिए किए जाते हैं कि आप भूलें न।
पर उस समय आप हैरान रह जाते हैं जब एक मामूली सी, छोटी-सी बात भूलना चाहें और हजार कोशिश के बावजूद आप उसे भूल न पाएँ। उन बातों को जिसे आपको याद करने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ा पर उसे भुला पाना असंभव लग रहा हो। आप के लिए उस पीड़ा को बयान करना मुश्किल हो जाता है जब अनचाही यादें आ-आकर आपको बताती हैं कि आप उन्हें भूल नहीं पाओगे।
ऐसी ही यादों को पूरी तरह भूल जाना चाहते हैं महेश (बदला हुआ नाम)। महेश का प्यार टूटे दो वर्ष हो गए हैं पर अभी तक महेश एक पल के लिए भी अपनी दोस्त को नहीं भूल पाए हैं। महेश से अलग होने के बाद उनकी दोस्त ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा। न कभी मिलने या बात करने की कोशिश की। दोनों के पहचान वालों के सामने भी कोई जिक्र नहीं छेड़ा। अलग होने के बाद ऐसी खामोश हुई मानो उसे जानती ही नहीं।
इधर महेश हैं कि अब भी उसका इंतजार कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके गम से निजात और खुशी की वजह केवल उनकी दोस्त है, जो बस एक बार फिर मिल जाए।
महेश जी, आपको अपने-आप से भी शिकायत है कि वह इतनी बेदर्द है फिर भी आप उसे जी जान से चाहते हैं। दरअसल, यह आपका पहला प्यार था इसलिए आप हजार गिले-शिकवे के बाद भी वहीं अपना सुकून व मंजिल महसूस करते हैं। इस प्यार की तुलना करने के लिए आपके पास दूसरा कोई अनुभव भी नहीं है। आप लोगों के बीच क्यों झगड़ा हुआ, क्यों आप लोग अलग हुए, किस प्रकार का मन-मुटाव या गलतफहमी हुई इसके बारे में आपने कुछ नहीं लिखा है। पर, दो वर्ष तक उसे याद करके उदास होने से यह बात तो तय है कि आप में एक प्रकार का गहरा कमिटमेंट है और साथ ही शिकायतों को नजरअंदाज कर माफ करने की क्षमता भी है।
ऐसा मुमकिन नहीं है कि आपकी ये खूबियाँ आपकी दोस्त की नजरों से ओझल होंगी। आपके एकतरफा चाहत की बात भी उन तक पहुँचती होगी। आपके इंतजार की खबरें भी उन्हें मिलती होंगी। इसके बावजूद वह आपसे कोई संवाद नहीं रखना चाहती हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि वह इस अध्याय को बंद कर देना चाहती है। दो साल का अरसा बहुत बड़ा समय होता है। नाराजगी की बर्फ इस बीच पिघल जानी चाहिए थी।
ऐसा नहीं हुआ है तो इसका एक ही मतलब है कि वह अब कभी नहीं लौटेंगी। इसलिए किसी चमत्कार का इंतजार करना बेकार है। आप में सबसे अच्छी बात यह है कि आप जीवन जीना चाहते हैं, खुश रहना चाहते हैं। आपने लिखा, आपको दूसरा कोई और भाता नहीं है। शायद इसकी वजह यह हो कि आप अपनी दोस्त को गलत न समझते हों।
इसका एक ही मतलब है कि वह अब कभी नहीं लौटेंगी। इसलिए किसी चमत्कार का इंतजार करना बेकार है। आप में सबसे अच्छी बात यह है कि आप जीवन जीना चाहते हैं, खुश रहना चाहते हैं।हो सकता है, इस अलगाव की वजह के पीछे आप हों और उन्होंने आपकी इस भूल को आपकी तमाम खूबियों पर भारी माना। आप नौकरी करते हैं इसलिए आप व्यस्त रह सकते हैं। फिलहाल आप अपनी नौकरी यानी जिम्मेदारियों से प्यार करना शुरू कर दें। यदि आपकी कोई हॉबी हो जिसे आपने अभी तक ज्यादा समय नहीं दिया है तो उसे समय दें।
व्यायाम करें अपनी सेहत के बारे में सोचें। रोज सुबह टहलें और खाने-पीने में सुधार करें। फल-सब्जी, अंकुरित अनाज खाएँ। चाय-कॉफी कम कर दें। अपने पहनावे पर ध्यान दें। अच्छे स्टाइलिश कपड़े खरीदें। खुद को सँवारने-सजाने पर समय लगाएँ। सबसे अहम आप हैं। अपने आप से प्यार करें। दुनिया- जहाँ की खबरें देखें और अपना ज्ञान बढ़ाएँ। अपने कॅरिअर में आगे बढ़ने की सोचें।
यदि आपने ये सब पूरी लगन और गंभीरता से किया तो आपका व्यक्तित्व ही कुछ और हो जाएगा। आपको अपनी दोस्त की यादों से न केवल मुक्ति मिलेगी बल्कि आप अपने दम पर खुश होना सीख जाएँगे। जब आप अपने आपको सराहेंगे और दूसरे भी आपकी तारीफ करेंगे तो आपके खयालों में सोच के केंद्र बिंदु में आप होंगे।
दूसरी छवि गायब होती जाएगी और वह दिन दूर नहीं होगा जब आप फिर किसी और से भी प्यार या शादी की स्थिति में होंगे। आप नए अनुभव से डरते हैं क्योंकि आप हर समय, अपनी दोस्त से उसकी तुलना करते रहते हैं। अभी आप किसी प्रेम-प्रेमिका के बारे में न सोचें। कुछ दिन अकेले रहकर अपने-आप पर ध्यान दें, सब कुछ ठीक हो जाएगा।
- मानसी
NDहेलो दोस्तो! जब आप कोई पाठ याद करना चाहें तो कितनी मुश्किल होती है। बार-बार उसे दुहराना। थोड़ा समय बीतने पर फिर उसे याद करके चेक करना कि कहीं आप उसे भूल तो नहीं गए। याद रखने के लिए कई तरीके ईजाद किए गए हैं। कोई किसी रूखे-सूखे जवाब को तुकबंदी बनाकर याद करने की कोशिश करता है तो कोई बार-बार लिखकर या फिर तारीखों को अपनी निजी तारीखों से जोड़कर याद करता है।
आप किसी को भी थोड़ा-ज्यादा काम बता दें वह कुछ न कुछ भूल ही जाता है। दफ्तरों में भी लोग न जाने कितनी डायरी, कितने प्लैनर इसी काम के लिए भरते रहते हैं। फिर भी अपनों का जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि याद रखना आसान नहीं लगता है तो मोबाइल में रिमाइंडर लगाते हैं। ये सारे जतन बस इसलिए किए जाते हैं कि आप भूलें न।
पर उस समय आप हैरान रह जाते हैं जब एक मामूली सी, छोटी-सी बात भूलना चाहें और हजार कोशिश के बावजूद आप उसे भूल न पाएँ। उन बातों को जिसे आपको याद करने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ा पर उसे भुला पाना असंभव लग रहा हो। आप के लिए उस पीड़ा को बयान करना मुश्किल हो जाता है जब अनचाही यादें आ-आकर आपको बताती हैं कि आप उन्हें भूल नहीं पाओगे।
ऐसी ही यादों को पूरी तरह भूल जाना चाहते हैं महेश (बदला हुआ नाम)। महेश का प्यार टूटे दो वर्ष हो गए हैं पर अभी तक महेश एक पल के लिए भी अपनी दोस्त को नहीं भूल पाए हैं। महेश से अलग होने के बाद उनकी दोस्त ने एक बार भी पलट कर नहीं देखा। न कभी मिलने या बात करने की कोशिश की। दोनों के पहचान वालों के सामने भी कोई जिक्र नहीं छेड़ा। अलग होने के बाद ऐसी खामोश हुई मानो उसे जानती ही नहीं।
इधर महेश हैं कि अब भी उसका इंतजार कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके गम से निजात और खुशी की वजह केवल उनकी दोस्त है, जो बस एक बार फिर मिल जाए।
महेश जी, आपको अपने-आप से भी शिकायत है कि वह इतनी बेदर्द है फिर भी आप उसे जी जान से चाहते हैं। दरअसल, यह आपका पहला प्यार था इसलिए आप हजार गिले-शिकवे के बाद भी वहीं अपना सुकून व मंजिल महसूस करते हैं। इस प्यार की तुलना करने के लिए आपके पास दूसरा कोई अनुभव भी नहीं है। आप लोगों के बीच क्यों झगड़ा हुआ, क्यों आप लोग अलग हुए, किस प्रकार का मन-मुटाव या गलतफहमी हुई इसके बारे में आपने कुछ नहीं लिखा है। पर, दो वर्ष तक उसे याद करके उदास होने से यह बात तो तय है कि आप में एक प्रकार का गहरा कमिटमेंट है और साथ ही शिकायतों को नजरअंदाज कर माफ करने की क्षमता भी है।
ऐसा मुमकिन नहीं है कि आपकी ये खूबियाँ आपकी दोस्त की नजरों से ओझल होंगी। आपके एकतरफा चाहत की बात भी उन तक पहुँचती होगी। आपके इंतजार की खबरें भी उन्हें मिलती होंगी। इसके बावजूद वह आपसे कोई संवाद नहीं रखना चाहती हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि वह इस अध्याय को बंद कर देना चाहती है। दो साल का अरसा बहुत बड़ा समय होता है। नाराजगी की बर्फ इस बीच पिघल जानी चाहिए थी।
ऐसा नहीं हुआ है तो इसका एक ही मतलब है कि वह अब कभी नहीं लौटेंगी। इसलिए किसी चमत्कार का इंतजार करना बेकार है। आप में सबसे अच्छी बात यह है कि आप जीवन जीना चाहते हैं, खुश रहना चाहते हैं। आपने लिखा, आपको दूसरा कोई और भाता नहीं है। शायद इसकी वजह यह हो कि आप अपनी दोस्त को गलत न समझते हों।
इसका एक ही मतलब है कि वह अब कभी नहीं लौटेंगी। इसलिए किसी चमत्कार का इंतजार करना बेकार है। आप में सबसे अच्छी बात यह है कि आप जीवन जीना चाहते हैं, खुश रहना चाहते हैं।हो सकता है, इस अलगाव की वजह के पीछे आप हों और उन्होंने आपकी इस भूल को आपकी तमाम खूबियों पर भारी माना। आप नौकरी करते हैं इसलिए आप व्यस्त रह सकते हैं। फिलहाल आप अपनी नौकरी यानी जिम्मेदारियों से प्यार करना शुरू कर दें। यदि आपकी कोई हॉबी हो जिसे आपने अभी तक ज्यादा समय नहीं दिया है तो उसे समय दें।
व्यायाम करें अपनी सेहत के बारे में सोचें। रोज सुबह टहलें और खाने-पीने में सुधार करें। फल-सब्जी, अंकुरित अनाज खाएँ। चाय-कॉफी कम कर दें। अपने पहनावे पर ध्यान दें। अच्छे स्टाइलिश कपड़े खरीदें। खुद को सँवारने-सजाने पर समय लगाएँ। सबसे अहम आप हैं। अपने आप से प्यार करें। दुनिया- जहाँ की खबरें देखें और अपना ज्ञान बढ़ाएँ। अपने कॅरिअर में आगे बढ़ने की सोचें।
यदि आपने ये सब पूरी लगन और गंभीरता से किया तो आपका व्यक्तित्व ही कुछ और हो जाएगा। आपको अपनी दोस्त की यादों से न केवल मुक्ति मिलेगी बल्कि आप अपने दम पर खुश होना सीख जाएँगे। जब आप अपने आपको सराहेंगे और दूसरे भी आपकी तारीफ करेंगे तो आपके खयालों में सोच के केंद्र बिंदु में आप होंगे।
दूसरी छवि गायब होती जाएगी और वह दिन दूर नहीं होगा जब आप फिर किसी और से भी प्यार या शादी की स्थिति में होंगे। आप नए अनुभव से डरते हैं क्योंकि आप हर समय, अपनी दोस्त से उसकी तुलना करते रहते हैं। अभी आप किसी प्रेम-प्रेमिका के बारे में न सोचें। कुछ दिन अकेले रहकर अपने-आप पर ध्यान दें, सब कुछ ठीक हो जाएगा।
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