रविवार, 31 अक्तूबर 2010

प्रेम कहानी

हल्की भूरी आँखों का जादू

अमर

अपने ऑफिस के कमरे में बैठा मैं हमेशा की तरह काम में मशगूल था। मुझे खनकती हँसी सुनाई दी, यह हँसी पहले तो इस ऑफिस में कभी भी नहीं सुनाई दी? आखिर किसकी हँसी है यह, छनकते घुँघरुओं सी? मैं अपने आपको रोक नहीं पाया और केबिन खोलकर बाहर झाँकने पर मजबूर हो ही गया। देखा तो केबिन के सामने एक डेस्क छोड़कर ही वह बैठी थी, हल्की भूरी बड़ी-बड़ी आँखें, गोरा रंग, चेहरे पर बच्चों सा भोलापन। वह फोन पर किसी से बात कर रही थी। मुझे इस तरह देखता हुआ पाकर वह सहम गई। वह नई-नई नियुक्त हुई थी, फिर किसी न किसी काम को लेकर बातें होती रहीं।

एक दिन शाम को जाते-जाते उसका स्कूटर खराब हो गया, मैं भी निकल ही रहा था। मैंने मदद करने की बहुत कोशिश की पर स्कूटर ने चालू होना गवारा नहीं किया। मैंने उसे लिफ्ट का प्रस्ताव दिया और वह मान गई। मैं उसे लेकर उड़ चला।

बस उस दिन के बाद से हमारी दोस्ती ने उड़ान भरना शुरु कर दी। मुलाकातें शुरु हुई और फिर प्यार का इजहार हुआ। 21 फरवरी 1994 का वह दिन आज मुझे याद है जब हम दोनों ने पवित्र अग्नि के फेरे लिए। विवाह-बंधन ने हमारे प्रेम को मजबूती दी। मैं अपने आपको इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली पुरुष मान रहा था, और बाद में भी यही हुआ। उसने मुझ पर अपनी सारी खुशियाँ कुर्बान कर दी और बदले में मैंने उसे कभी दुःख न देने का वादा किया। आज इतने वर्ष बीत गए लेकिन हमारा प्यार आज भी वही है, वैसा ही जैसा सालों पहले था।

कुछ समय से मैं काम में बहुत मसरूफ हो गया और समय नहीं निकाल पाया। उसने मुझसे कुछ भी नहीं कहा, कभी कोई शिकायत नहीं की। फिर भी मैं उसके मन के भावों को जान गया। वह कुछ उदास सी रहने लगी थी। मैंने ऑफिस से आठ दिन की छुट्टी के लिए आवेदन दिया और केरल का टूर बुक कराया। केरल की हरी-भरी खूबसूरती उसे बेहद भाती है, यह मुझे पता था। दो दिन पहले जब मैंने उसे यह बात बताई तो वह खुशी से उछल पड़ी। हम यात्रा पर चल पड़े, ट्रेन में खिड़की के पास बैठकर जब वह बाहर का नजारा देख रही थी तो मैं उसे देख रहा था। मैंने देखा उसकी बड़ी-बड़ी भूरी आँखों में बच्चों की सी चमक फिर से जिंदा हो उठी है।

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