परिवार का खर्च चलाने में महिलाएँ माहिर
बेशक महिलाएँ ठाट-बाट और कीमती पोशाक की शौकीन होती हैं लेकिन वह घर का खर्चा पुरुषों से ज्यादा बेहतर ढंग से चला सकती हैं। घर के खर्चा-पानी का प्रबंधन महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकती हैं यह बात एक अध्ययन में सामने आई है।
ब्रिटेन के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि महिलाएँ घर का बजट ठीक ढंग से चलाती हैं, घर के फालतू खर्चों पर रोक लगा सकती हैं। महिलाओं के विपरीत पुरुष फालतू खर्चों पर रोक नहीं लगा सकते। वह आर्थिक उधारी जैसे डेबिट कार्ड या बिल चुकाने में लेट- सवेर करते हैं और कभी-कभी तो उसे पूरी तरह नजरअंदाज ही कर देते हैं।
पुरुष निवेश में विश्वास नहीं करते वह साल में कम से कम भुगतान करना पसंद करते हैं। हालाँकि महिलाओं के बारे में हमेशा से माना जाता है कि वे बहुत खर्चीली होती हैं सजने- सँवरने,कपड़ों व जूतों पर ज्यादा पैसा खर्च करती हैं।
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक इडी बोशर ऑफ लवली मनी डॉट कॉम ने अध्ययन में पाया कि पुरुष हमेशा यह सोचते रहते हैं कि वह घर का खर्चा-पानी चलाने में अपनी प्रतिष्ठा कैसे बचा सकते हैं जबकि महिलाएँ हमेशा यही सोचती रहती हैं कि उन्हें घर का खर्चा सही बजट के हिसाब से चलाना है ।
3,000 ब्रिटेन के लोगों पर अध्ययन किया गया जिसमें आदमियों ने 2176 पाउंड का ऋण देना भूल गए जबकि 1987 पाउंड का ऋण सही समय पर चुका दिया।
त्वचा को रखें तरो ताजा
एक बीस लीटर की बाल्टी में एक कप दूध या एक टेबल स्पून मिल्क पाउडर डालें। उसमें कुछ बूँदें चंदन के तेल की व कुछ बूँदें अपनी पसंद के परफ्यूम की डाल दें। इस पानी को धीरे-धीरे अपनी त्वचा पर डालते हुए नहाएँ।
ताजे व रसीले फलों का नियमित सेवन करें।
फलों का रस पीने के बदले पूरे फल खाएँ। जैसे संतरा, मौसंबी, पाइनेपल, सेव, अंगूर आदि का रस पीने के बजाए फल खाएँ।
सप्ताह में दो बार दो चम्मच शहद, पंद्रह से बीस बूँद नींबू का रस, आधा चम्मच मलाई या घी व एक चम्मच ओट मील डालकर पेस्ट की तरह चेहरे पर लगाएँ। आधे घंटे बाद कुनकुने पानी से चेहरा साफ करके अच्छी विटामिन क्रीम लगाएँ।
यदि आपकी ऑइली स्किन है तो मलाई का प्रयोग न करें व क्रीम के बदले मॉइश्चराइजर या लेक्टो केलेमाइन का प्रयोग करें।
गर्मियों में पंख लगाएँ पैरों को...
अगर आप गर्मी के दिनों में अपने पैरों को थोड़ा हवादार भी बनाना चाहती हैं और एड़ियों को सुरक्षित भी रखना चाहती हैं, तो सैंडल्स आपके लिए एकदम सही विकल्प हैं। ये पैरों को सुरक्षित और आरामदायक बनाए रखते हैं।
खासतौर पर चिलचिलाती धूप में या फिर उमस और नमी में जब आप जूते या बैली पहनने से बचना चाहती हैं और लगता है कि स्लीपर पहनकर ही घर से बाहर भी जाया जाए। अब ऐसा करना संभव है। बाजार में गर्मी के लिहाज से कई तरह के फुटवेयर्स सजे हुए हैं।
इनमें हल्की-फुल्की चप्पलों से लेकर, सिंपल और स्ट्राइप्स वाले ग्लेडियेटर सैंडल्स तथा वॉकर्स शामिल हैं। आप चाहें तो रंग-बिरंगे स्ट्रेप्स वाले सैंडल्स अपनाएँ या फिर सिंगल स्ट्रेप वाली खूबसूरत चप्पलें पहनकर इठलाएँ। आजकल बाजार में फ्लोरल, ज्यॉमेट्रिक और अन्य डिजायनों वाली, स्ट्रेप पर सजे फूलों वाली तथा रंग-बिरंगे स्ट्रेप्स वाली चप्पलें भी काफी मिल रही हैं। ये पैरों को खुला-खुला तो रखती ही हैं, चलने में सहूलियत देती हैं और लगती तो खूबसूरत हैं ही। इन चप्पलों की कीमत 150 रुपए से शुरू होती है।
फुटवेयर्स के मामले में डिजायनर्स भी प्रयोग करते रहते हैं क्योंकि हर मौसम में कुछ नए की चाहत तो लोगों को रहती ही है। हाल ही में एक बड़े ब्राँड 'चाइनीज़ लाँड्री' ने भी 'सुदोकू' नामक सैंडल्स की श्रृंखला जारी की है। एड़ियों को कवर करते बड़े से स्ट्रेप के साथ पैरों पर सामने तक आने वाले फीते इसकों अलग ही लुक देते हैं।
यह सही है कि हर व्यक्ति इतने महँगे और ब्राँडेड फुटवेयर नहीं खरीद सकता लेकिन आप चाहें तो 450 रुपए तक में इन्हीं जैसा लोकल ब्राँड भी खरीद सकते हैं। यही नहीं इस रेंज में आपको अच्छी क्वॉलिटीज वाली चीज़ भी मिलेगी। तो इस गर्मी पैरों को पंख लगाने दीजिए और उड़ने दीजिए आसमान में।
मे दैनिक राष्ट्रीय हिंदी मेल का सम्पादक हूँ.खुल्लम खुल्ला मेरी अभिव्यक्ति है .अपना विचार खुलेआम दुनिया के सामने व्यक्त करने का यह सशक्त माध्यम है.अरुण बंछोर-मोबाइल -9074275249 ,7974299792 सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे, कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
शनिवार, 20 मार्च 2010
शुक्रवार, 19 मार्च 2010
सामयिक
क्यों तुम जाती हो!
सरकती है सिरहाने से धूप
कि तुम जाती हो
ये राह सिहरी-सी खड़ी
देखती है तुम्हें
कि तुम जाती हो
यह पल अकेला है
बहुत अकेला
कि उतार दिया है तुमने पुतलियों से उसे
यह साँझ जो जाने को है अभी
ठिठकी खड़ी है पीपल की पत्तियों के बीच
देखती-सी
कि तुम जाती हो
ये आ रही आवाज विकल-सी किसी मोर की
उठ रही बीच जंगल से
या मेरे भीतर से ही कहीं
कि तुम जाती हो
पलट कर देखती तो देख पाती
जिसको सँभाला तुमने जतन से
हिल रहा वही मन पात ऐसे
जैसे डोलता है शिशु कोई
धरती पर कदम धरते
देखो तो सही
देखो न
ओ प्राण मेरी
कि रात आती है
कि तुम जाती हो।
आलिंगन का विश्व रिकॉर्ड
अमेरिका के शहर ग्रेटर मैनचेस्टर में लड़कों के एक जोड़े ने सबसे लंबे समय तक के आलिंगन का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है।
फैसल मोहिऊद्दीन और मोहम्मद अजीम नामक दो छात्र 24 घंटे और 17 मिनट तक लगातार एक दूसरे से लिपटे रहे। इससे पहले ये रिकॉर्ड 24 घंटे और एक मिनट का था।
इन छात्रों ने ये काम ऑल्डहम में खोले जा रहे क्रिस्टी कैंसर यूनिट के लिए पैसे जुटाने के लिए किया है। 17 मिलियन डॉलर की लागत से बना यह अस्पताल इस हफ्ते के अंत में खोला जा रहा है।
ये दोनों लड़के सेलफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र हैं और उनका कहना है कि उन्होंने ये काम इसलिए किया क्योंकि हर व्यक्ति पर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का खतरा है।
आलिंगन है प्रतीक चिन्ह : आलिंगन के समय दोनों पर हर समय निगरानी रखी जा रही थी और इन्हें हर समय जागते रहना था। फैसल मोहिऊद्दीन एक प्रतिभाशाली धावक हैं और 2012 के ओलिम्पिक प्रतियोगिता में शामिल होना चाहते हैं।
आलिंगन के बारे में वो कहते हैं, 'निश्चित तौर पर ये एक बड़ा मुकाबला था।'
फैसल मोहिऊद्दीन कहते हैं, 'मुझे इसके लिए सभी संरक्षित ऊर्जा की जरूरत थी, लेकिन मैं आशान्वित था कि रिकॉर्ड तोड़ दूँगा।'
इस बारे में क्रिस्टी अस्पताल की एलिसिया कस्टिस ने कहा, 'मेरी तरफ से फैसल मोहिऊद्दीन और मोह्म्मद अजीम को विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ, इन लोगों ने बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया। दोनों ने नींद और थकावट के खिलाफ लडा़ई लड़ी।'
उनका कहना था, 'मैं जानती हूँ ये एक बहुत ही कठिन काम था और अस्पताल के लिए ऐसा करने के लिए मैं उनका बहुत ही आभारी हूँ। ये आलिंगन हमारे कैंसर मरीजों के लिए था।'
दिलचस्प बात यह है कि क्रिस्टी अस्पताल की ओर से दान की जो अपील की जाती है उसका प्रतीक चिन्ह आलिंगन ही है।
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना
खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,
और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।
सनी देओल का गणित
सनी देओल का फिल्म बनाने का गणित इन दिनों डायरेक्टर नीरज पाठक के इर्दगिर्द घूम रहा है। पिछले वीक दोनों की ‘राइट या रांग’ प्रदर्शित हुई। फिल्म तो राइट है, मगर रिलीज का टाइम रांग चुन लिया गया। परीक्षा और आईपीएल का इस समय जोर है। पब्लिसिटी के पैसे इस कदर बचाए गए कि लोगों को पता ही नहीं चला कि इस नाम की कोई फिल्म रिलीज हुई है। नतीजा यह निकला कि फिल्म को वो सफलता नहीं मिली जितने कि वो हकदार थी। लेकिन सनी की नजर में नीरज जँच गए।
दोनों साथ मिलकर सनी की होम प्रोडक्शन ‘द मैन’ अरसे से बना रहे हैं और संभव है कि इसके निर्माण में अब तेजी आए। इसके अलावा सनी और नीरज मिलकर ‘गणित’ नामक एक और फिल्म शुरू करने जा रहे हैं। यह एक पॉलिटिकल थ्रिलर होगी।
नीरज के मुताबिक स्क्रिप्ट लगभग तैयार है और फिल्म की शूटिंग कुछ महीनों बाद शुरू की जाएगी। तब तक सनी ‘यमला पगला दीवाना’ से फ्री भी हो जाएँगे। फिल्म में दो हीरो और लिए जाएँगे। ये कौन होंगे, यह अब तक फाइनल नहीं किया गया है।
‘राइट या रांग’ को मिली प्रशंसा ने सनी को उत्साह से भर दिया है और वे एक बार फिर जोर-शोर से अपने काम में जुट गए हैं।
फिल्म समीक्षा
लव सेक्स और धोखा :
बैनर : बालाजी टेलीफिल्म्स, एएलटी एंटरटेनमेंट, बालाजी मोशन पिक्चर्स
निर्माता : एकता कपूर, शोभा कपूर, प्रिया श्रीधरन
निर्देशक : दिबाकर बैनर्जी
संगीत : स्नेहा खानविलकर
कलाकार : अंशुमन झा, श्रुति, राजकुमार यादव, नेहा चौहान, आर्या देवदत्ता, अमित सियाल
ए सर्टिफिकेट * एक घंटा 43 मिनट
रेटिंग : 3/5
‘लव सेक्स और धोखा’ एक एक्सपरिमेंटल फिल्म है, जो कैमरे और टेक्नालॉजी की पर्सनल लाइफ में दखल को दिखाती है। हर आदमी के पास इन दिनों कैमरा है और जब चाहे वो इसका उपयोग/दुरुपयोग कर रहा है।
कैमरे की आँख हम पर लगातार नजर रखे हुए है। मीडिया इसके जरिये स्टिंग ऑपरेशन कर रहा है। लेकिन उसका उद्देश्य सच्चाई को समाने लाने की बजाय सनसनी फैलाना और प्राइम टाइम में मनोरंजन देना है।
अश्लील एमएमएस की इन दिनों डिमांड है क्योंकि दूसरों के निजी क्षणों को देखना बड़ा अच्छा लगता है। हर कोई रियलिटी देखना चाहता है। कई बार लोगों को पता ही नहीं चलता और ये वेबसाइट पर अपलोड कर दिए जाते हैं।
निर्देशक दिबाकर बैनर्जी ने अपनी फिल्म को तीन कहानियों में बाँटा है। पहली स्टोरी में लव दिखाया गया है। फिल्म इंस्टीट्यूट का स्टुडेंट डिप्लोमा फिल्म बनाते हुए हीरोइन से प्यार कर बैठता है।
टीनएज में प्यार को लेकर तरह-तरह की कल्पनाएँ होती हैं। ‘डीडीएलजे’ जैसी फिल्मों का नशा दिमाग पर छाया रहता है। इस कहानी के किरदार भी राज और सिमरन की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन उनकी लव स्टोरी का ‘द एंड’ राज और सिमरन की तरह नहीं होता है क्योंकि रियलिटी और कल्पना में बहुत डिफरेंस है। तीनों कहानी में ये वीक है क्योंकि इसमें नाटकीयता कुछ ज्यादा हो गई है। इस स्टोरी को हाथ में कैमरा लेकर फिल्माया गया है।
दूसरी कहानी डिपार्टमेंटल स्टोर में लगे सिक्यूरिटी कैमरे की नजर से दिखाई गई है। इस कैमरे की मदद से वहाँ काम करने वाला आदर्श एक पोर्न क्लिप बनाना चाहता है। रश्मि नामक सेल्सगर्ल का वह पहले दिल जीतता है और फिर स्टोर में उसके साथ सेक्स कर वह क्लिप को महँगे दामों में बेच देता है। यहाँ बताने की कोशिश की गई है कि हर ऊँची दुकान या मॉल्स में आप पर कड़ी नजर सिक्यूरिटी के बहाने रखी जा रही है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।
तीसरी कहानी को स्पाय कैमरे के जरिये दिखाया गया है। एक डांसर को म्यूजिक वीडियो में मौका देने के बहाने एक प्रसिद्ध पॉप सिंगर उसका शारीरिक शोषण करता है। डांसर की मुलाकात एक जर्नलिस्ट से होती है, जिसकी मदद से वे सिंगर का स्टिंग ऑपरेशन करते हैं।
यहाँ मीडिया को आड़े हाथों लिया गया है, जो इस फुटेज के जरिये सच्चाई को सामने लाने के बजाय अपनी टीआरपी को ध्यान रखता है। वे इस कहानी को सीरियल की तरह खींचकर पैसा बनाना चाहते हैं।
तीनों कहानियों को बेहतरीन तरीके से जोड़ा गया है और आपको अलर्ट रहना पड़ता है कि कौन-सा कैरेक्टर किस स्टोरी का है और इस स्टोरी में कैसे आ गया है।
फिल्म के सारे कलाकार अपरिचित हैं, लेकिन उनकी एक्टिंग सराहनीय है। कभी नहीं लगता कि वे एक्टिंग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे हमारे आसपास मौजूद हैं और हम कैमरे के माध्यम से उन पर नजर रखे हुए हैं।
डायरेक्टर दिबाकर बैनर्जी की पकड़ पूरी फिल्म पर है। एक्सपरिमेंटल और रियलिटी के करीब होने के बावजूद फिल्म इंट्रस्टिंग लगती है। अपने एक्टर्स से उन्होंने बखूबी काम लिया। सिनेमाटोग्राफर निकोस ने कैमरे को एक कैरेक्टर की तरह यूज़ किया है। नम्रता राव की एडिटिंग तारीफ के काबिल है।
‘लव सेक्स और धोखा’ उन लोगों के लिए नहीं है जो टिपिकल मसाला फिल्म देखना पसंद करते हैं। आप कुछ डिफरेंट की तलाश में हैं तो इसे देखा जा सकता है।
सरकती है सिरहाने से धूप
कि तुम जाती हो
ये राह सिहरी-सी खड़ी
देखती है तुम्हें
कि तुम जाती हो
यह पल अकेला है
बहुत अकेला
कि उतार दिया है तुमने पुतलियों से उसे
यह साँझ जो जाने को है अभी
ठिठकी खड़ी है पीपल की पत्तियों के बीच
देखती-सी
कि तुम जाती हो
ये आ रही आवाज विकल-सी किसी मोर की
उठ रही बीच जंगल से
या मेरे भीतर से ही कहीं
कि तुम जाती हो
पलट कर देखती तो देख पाती
जिसको सँभाला तुमने जतन से
हिल रहा वही मन पात ऐसे
जैसे डोलता है शिशु कोई
धरती पर कदम धरते
देखो तो सही
देखो न
ओ प्राण मेरी
कि रात आती है
कि तुम जाती हो।
आलिंगन का विश्व रिकॉर्ड
अमेरिका के शहर ग्रेटर मैनचेस्टर में लड़कों के एक जोड़े ने सबसे लंबे समय तक के आलिंगन का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया है।
फैसल मोहिऊद्दीन और मोहम्मद अजीम नामक दो छात्र 24 घंटे और 17 मिनट तक लगातार एक दूसरे से लिपटे रहे। इससे पहले ये रिकॉर्ड 24 घंटे और एक मिनट का था।
इन छात्रों ने ये काम ऑल्डहम में खोले जा रहे क्रिस्टी कैंसर यूनिट के लिए पैसे जुटाने के लिए किया है। 17 मिलियन डॉलर की लागत से बना यह अस्पताल इस हफ्ते के अंत में खोला जा रहा है।
ये दोनों लड़के सेलफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र हैं और उनका कहना है कि उन्होंने ये काम इसलिए किया क्योंकि हर व्यक्ति पर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का खतरा है।
आलिंगन है प्रतीक चिन्ह : आलिंगन के समय दोनों पर हर समय निगरानी रखी जा रही थी और इन्हें हर समय जागते रहना था। फैसल मोहिऊद्दीन एक प्रतिभाशाली धावक हैं और 2012 के ओलिम्पिक प्रतियोगिता में शामिल होना चाहते हैं।
आलिंगन के बारे में वो कहते हैं, 'निश्चित तौर पर ये एक बड़ा मुकाबला था।'
फैसल मोहिऊद्दीन कहते हैं, 'मुझे इसके लिए सभी संरक्षित ऊर्जा की जरूरत थी, लेकिन मैं आशान्वित था कि रिकॉर्ड तोड़ दूँगा।'
इस बारे में क्रिस्टी अस्पताल की एलिसिया कस्टिस ने कहा, 'मेरी तरफ से फैसल मोहिऊद्दीन और मोह्म्मद अजीम को विश्व रिकॉर्ड बनाने के लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ, इन लोगों ने बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया। दोनों ने नींद और थकावट के खिलाफ लडा़ई लड़ी।'
उनका कहना था, 'मैं जानती हूँ ये एक बहुत ही कठिन काम था और अस्पताल के लिए ऐसा करने के लिए मैं उनका बहुत ही आभारी हूँ। ये आलिंगन हमारे कैंसर मरीजों के लिए था।'
दिलचस्प बात यह है कि क्रिस्टी अस्पताल की ओर से दान की जो अपील की जाती है उसका प्रतीक चिन्ह आलिंगन ही है।
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना
खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,
और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।
सनी देओल का गणित
सनी देओल का फिल्म बनाने का गणित इन दिनों डायरेक्टर नीरज पाठक के इर्दगिर्द घूम रहा है। पिछले वीक दोनों की ‘राइट या रांग’ प्रदर्शित हुई। फिल्म तो राइट है, मगर रिलीज का टाइम रांग चुन लिया गया। परीक्षा और आईपीएल का इस समय जोर है। पब्लिसिटी के पैसे इस कदर बचाए गए कि लोगों को पता ही नहीं चला कि इस नाम की कोई फिल्म रिलीज हुई है। नतीजा यह निकला कि फिल्म को वो सफलता नहीं मिली जितने कि वो हकदार थी। लेकिन सनी की नजर में नीरज जँच गए।
दोनों साथ मिलकर सनी की होम प्रोडक्शन ‘द मैन’ अरसे से बना रहे हैं और संभव है कि इसके निर्माण में अब तेजी आए। इसके अलावा सनी और नीरज मिलकर ‘गणित’ नामक एक और फिल्म शुरू करने जा रहे हैं। यह एक पॉलिटिकल थ्रिलर होगी।
नीरज के मुताबिक स्क्रिप्ट लगभग तैयार है और फिल्म की शूटिंग कुछ महीनों बाद शुरू की जाएगी। तब तक सनी ‘यमला पगला दीवाना’ से फ्री भी हो जाएँगे। फिल्म में दो हीरो और लिए जाएँगे। ये कौन होंगे, यह अब तक फाइनल नहीं किया गया है।
‘राइट या रांग’ को मिली प्रशंसा ने सनी को उत्साह से भर दिया है और वे एक बार फिर जोर-शोर से अपने काम में जुट गए हैं।
फिल्म समीक्षा
लव सेक्स और धोखा :
बैनर : बालाजी टेलीफिल्म्स, एएलटी एंटरटेनमेंट, बालाजी मोशन पिक्चर्स
निर्माता : एकता कपूर, शोभा कपूर, प्रिया श्रीधरन
निर्देशक : दिबाकर बैनर्जी
संगीत : स्नेहा खानविलकर
कलाकार : अंशुमन झा, श्रुति, राजकुमार यादव, नेहा चौहान, आर्या देवदत्ता, अमित सियाल
ए सर्टिफिकेट * एक घंटा 43 मिनट
रेटिंग : 3/5
‘लव सेक्स और धोखा’ एक एक्सपरिमेंटल फिल्म है, जो कैमरे और टेक्नालॉजी की पर्सनल लाइफ में दखल को दिखाती है। हर आदमी के पास इन दिनों कैमरा है और जब चाहे वो इसका उपयोग/दुरुपयोग कर रहा है।
कैमरे की आँख हम पर लगातार नजर रखे हुए है। मीडिया इसके जरिये स्टिंग ऑपरेशन कर रहा है। लेकिन उसका उद्देश्य सच्चाई को समाने लाने की बजाय सनसनी फैलाना और प्राइम टाइम में मनोरंजन देना है।
अश्लील एमएमएस की इन दिनों डिमांड है क्योंकि दूसरों के निजी क्षणों को देखना बड़ा अच्छा लगता है। हर कोई रियलिटी देखना चाहता है। कई बार लोगों को पता ही नहीं चलता और ये वेबसाइट पर अपलोड कर दिए जाते हैं।
निर्देशक दिबाकर बैनर्जी ने अपनी फिल्म को तीन कहानियों में बाँटा है। पहली स्टोरी में लव दिखाया गया है। फिल्म इंस्टीट्यूट का स्टुडेंट डिप्लोमा फिल्म बनाते हुए हीरोइन से प्यार कर बैठता है।
टीनएज में प्यार को लेकर तरह-तरह की कल्पनाएँ होती हैं। ‘डीडीएलजे’ जैसी फिल्मों का नशा दिमाग पर छाया रहता है। इस कहानी के किरदार भी राज और सिमरन की तरह व्यवहार करते हैं, लेकिन उनकी लव स्टोरी का ‘द एंड’ राज और सिमरन की तरह नहीं होता है क्योंकि रियलिटी और कल्पना में बहुत डिफरेंस है। तीनों कहानी में ये वीक है क्योंकि इसमें नाटकीयता कुछ ज्यादा हो गई है। इस स्टोरी को हाथ में कैमरा लेकर फिल्माया गया है।
दूसरी कहानी डिपार्टमेंटल स्टोर में लगे सिक्यूरिटी कैमरे की नजर से दिखाई गई है। इस कैमरे की मदद से वहाँ काम करने वाला आदर्श एक पोर्न क्लिप बनाना चाहता है। रश्मि नामक सेल्सगर्ल का वह पहले दिल जीतता है और फिर स्टोर में उसके साथ सेक्स कर वह क्लिप को महँगे दामों में बेच देता है। यहाँ बताने की कोशिश की गई है कि हर ऊँची दुकान या मॉल्स में आप पर कड़ी नजर सिक्यूरिटी के बहाने रखी जा रही है, लेकिन इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।
तीसरी कहानी को स्पाय कैमरे के जरिये दिखाया गया है। एक डांसर को म्यूजिक वीडियो में मौका देने के बहाने एक प्रसिद्ध पॉप सिंगर उसका शारीरिक शोषण करता है। डांसर की मुलाकात एक जर्नलिस्ट से होती है, जिसकी मदद से वे सिंगर का स्टिंग ऑपरेशन करते हैं।
यहाँ मीडिया को आड़े हाथों लिया गया है, जो इस फुटेज के जरिये सच्चाई को सामने लाने के बजाय अपनी टीआरपी को ध्यान रखता है। वे इस कहानी को सीरियल की तरह खींचकर पैसा बनाना चाहते हैं।
तीनों कहानियों को बेहतरीन तरीके से जोड़ा गया है और आपको अलर्ट रहना पड़ता है कि कौन-सा कैरेक्टर किस स्टोरी का है और इस स्टोरी में कैसे आ गया है।
फिल्म के सारे कलाकार अपरिचित हैं, लेकिन उनकी एक्टिंग सराहनीय है। कभी नहीं लगता कि वे एक्टिंग कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे हमारे आसपास मौजूद हैं और हम कैमरे के माध्यम से उन पर नजर रखे हुए हैं।
डायरेक्टर दिबाकर बैनर्जी की पकड़ पूरी फिल्म पर है। एक्सपरिमेंटल और रियलिटी के करीब होने के बावजूद फिल्म इंट्रस्टिंग लगती है। अपने एक्टर्स से उन्होंने बखूबी काम लिया। सिनेमाटोग्राफर निकोस ने कैमरे को एक कैरेक्टर की तरह यूज़ किया है। नम्रता राव की एडिटिंग तारीफ के काबिल है।
‘लव सेक्स और धोखा’ उन लोगों के लिए नहीं है जो टिपिकल मसाला फिल्म देखना पसंद करते हैं। आप कुछ डिफरेंट की तलाश में हैं तो इसे देखा जा सकता है।
सोमवार, 15 मार्च 2010
गुड़ी पड़वा विशेष
सृजन का उत्सव गुड़ी पड़वा
फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा हो जाता है और शाम लंबी, सुरमई हो जाती है, रात बहुत उदार... बहुत उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाता है। होली आ धमकती है, चाहे तो इसे धर्म से जोड़े या अर्थ से... सारा मामला तो अंत में मौसम और मन पर आकर टिक जाता है।
इन्हीं दिनों वसंत जैसे आसमान और जमीन के बीच होली के रंगों की दुकान सजाए बैठा रहता है। मन को वसंत का आना भाता है तो पत्तों का गिरना और कोंपलों के फूटने से पुराने के अवसान और नए के आगमन का संदेश अपने गहरे अर्थों में हमें जीवन का दर्शन समझाता है।
एक साथ पतझड़ और बहार के आने से हम इसी वसंत के मौसम में जीवन का उत्सव मनाते हैं, कहीं रंग होता है तो कहीं उमंग होती है। बस, इसी मोड़ पर एक साल और गुजरता है। गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के साथ एक नया साल वसंत के मौसम में नीम पर आईं भूरी-लाल-हरी कोंपलों की तरह बहुत सारी संभावनाओं की पिटारी लेकर हमारे घरों में आ धमकता है। जब वसंत अपने शबाब पर है तो फिर इतिहास और पुराण कैसे इस मधुमौसम से अलग हो सकते हैं।
श्रीखंड, पूरणपोळी और नीम के अजीबो-गरीब संयोग के साथ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हम विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाते हैं। इस तिथि से पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों ही मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। तो इस तरह तो हम सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव मनाते हैं, गुड़ी पड़वा पर।
इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है। लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर युधिष्ठिर का भी राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया।
इस दिन से प्रारंभ चैत्र नवरात्रि का समापन रामनवमी पर भगवान राम का जन्मदिन मनाकर किया जाता है। मध्यप्रदेश में मालवा और निमाड़ में गुड़ी पड़वा पर गुड़ी बनाकर खिड़कियों में लगाई जाती है। नीम की पत्ती या तो सीधे ही या फिर पीसकर रस बनाकर ली जाती है।
मान्यता है कि इस दिन से वर्षभर नित्य नियम से पाँच नीम की पत्तियाँ खाने से व्यक्ति निरोग रहता है। दक्षिण भारत में इसे इगादि, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिन्धी में इसे चेटीचंड के रूप में मनाया जाता है। आखिर वसंत को नवजीवन के आरंभ के अतिरिक्त और किसी तरह से कैसे मनाया जा सकता है? वसंत के संदेश को गुड़ी पड़वा की मान्यता से बेहतर और कोई परिभाषित नहीं कर सकता।
फागुन के गुजरते-गुजरते आसमान साफ हो जाता है, दिन का आँचल सुनहरा हो जाता है और शाम लंबी, सुरमई हो जाती है, रात बहुत उदार... बहुत उदात्त होकर उतरती है तो सिर पर तारों का थाल झिलमिलाता है। होली आ धमकती है, चाहे तो इसे धर्म से जोड़े या अर्थ से... सारा मामला तो अंत में मौसम और मन पर आकर टिक जाता है।
इन्हीं दिनों वसंत जैसे आसमान और जमीन के बीच होली के रंगों की दुकान सजाए बैठा रहता है। मन को वसंत का आना भाता है तो पत्तों का गिरना और कोंपलों के फूटने से पुराने के अवसान और नए के आगमन का संदेश अपने गहरे अर्थों में हमें जीवन का दर्शन समझाता है।
एक साथ पतझड़ और बहार के आने से हम इसी वसंत के मौसम में जीवन का उत्सव मनाते हैं, कहीं रंग होता है तो कहीं उमंग होती है। बस, इसी मोड़ पर एक साल और गुजरता है। गुड़ी पड़वा या वर्ष प्रतिपदा के साथ एक नया साल वसंत के मौसम में नीम पर आईं भूरी-लाल-हरी कोंपलों की तरह बहुत सारी संभावनाओं की पिटारी लेकर हमारे घरों में आ धमकता है। जब वसंत अपने शबाब पर है तो फिर इतिहास और पुराण कैसे इस मधुमौसम से अलग हो सकते हैं।
श्रीखंड, पूरणपोळी और नीम के अजीबो-गरीब संयोग के साथ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को हम विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाते हैं। इस तिथि से पौराणिक और ऐतिहासिक दोनों ही मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। ब्रह्मपुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। तो इस तरह तो हम सृष्टि के गर्भाधान का उत्सव मनाते हैं, गुड़ी पड़वा पर।
इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती है। लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर युधिष्ठिर का भी राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया।
इस दिन से प्रारंभ चैत्र नवरात्रि का समापन रामनवमी पर भगवान राम का जन्मदिन मनाकर किया जाता है। मध्यप्रदेश में मालवा और निमाड़ में गुड़ी पड़वा पर गुड़ी बनाकर खिड़कियों में लगाई जाती है। नीम की पत्ती या तो सीधे ही या फिर पीसकर रस बनाकर ली जाती है।
मान्यता है कि इस दिन से वर्षभर नित्य नियम से पाँच नीम की पत्तियाँ खाने से व्यक्ति निरोग रहता है। दक्षिण भारत में इसे इगादि, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में उगादि, कश्मीर में नवरेह और सिन्धी में इसे चेटीचंड के रूप में मनाया जाता है। आखिर वसंत को नवजीवन के आरंभ के अतिरिक्त और किसी तरह से कैसे मनाया जा सकता है? वसंत के संदेश को गुड़ी पड़वा की मान्यता से बेहतर और कोई परिभाषित नहीं कर सकता।
मार्च माह के त्योहार
दिऩांक प्रमुख त्योहार अन्य त्योहार हिंदी माह पक्ष तिथि
1 मार्च होली, धुलेंडी बसंतोत्सव चैत्र कृष्ण एकम (1)
2 मार्च भाई दौज संत तुकाराम ज. चैत्र कृष्ण द्वितीया (2)
3 मार्च संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा.9.07) चैत्र कृष्ण तृतीया (3)
4 मार्च चैत्र कृष्ण चतुर्थी (4)
5 मार्च रंग पंचमी चैत्र कृष्ण पंचमी (5)
6 मार्च चैत्र कृष्ण षष्ठी (6)
7 मार्च गोविंद वल्लभपंत दि. चैत्र कृष्ण सप्तमी (7)
8 मार्च शीतलाष्टमी, बसोरा अंतरराष्ट्रीय महिला दि. चैत्र कृष्ण अष्टमी (8)
9 मार्च भ. ऋषभनाथ ज. चैत्र कृष्ण नवमी (9)
10 मार्च चैत्र कृष्ण दशमी-एकादशी (10-11)
11 मार्च पापमोचनी एकादशी माँ कर्मा जयंती चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)
12 मार्च चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)
13 मार्च वारुणी पर्व, प्रदोष व्रत पंचक प्रारंभ (दिन 12.03 से) चैत्र कृष्ण त्रयोदशी (13)
14 मार्च शिव चतुर्दशी खरमास प्रारंभ चैत्र कृष्ण चतुर्दशी (14)
15 मार्च सोम. अमावस्या, सौर मास चैत्र प्रा. विश्व उपभोक्ता दि. चैत्र शुक्ल अमावस्या (15)
16 मार्च चैत्र नवरात्रारंभ, घटस्थापना गुड़ीपड़वा चैत्र शुक्ल एकम (1)
17 मार्च चेटीचंड, झूलेलाल जन्म. चंद्रदर्शन, सिंधारा दौज चैत्र शुक्ल द्वितीया (2)
18 मार्च गणगौर तीज, सौभाग्य सुंदरी व्रत पंचक समाप्त (दिन 09.27) चैत्र शुक्ल तृतीया (3)
19 मार्च विनायकी चतुर्थी (चंद्र अ.रा. 9.34) चैत्र शुक्ल चतुर्थी (4)
20 मार्च आर्य समाज स्थापना. दि. चैत्र शुक्ल पंचमी (5)
21 मार्च विश्व वानिकी दि. चैत्र शुक्ल षष्ठी (6)
22 मार्च विश्व जल संरक्षण दि. चैत्र शुक्ल सप्तमी (7)
23 मार्च दुर्गाष्टमी व्रत, अशोकाष्टमी भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव दि. चैत्र शुक्ल अष्टमी (8)
24 मार्च राम नवमी, जन्मोत्सव विश्व क्षयरोग दि. चैत्र शुक्ल नवमी (9)
25 मार्च पुष्य नक्षत्र गणेश शंकर विद्यार्थी दि. चैत्र शुक्ल दशमी (10)
26 मार्च कामदा एकादशी चैत्र शुक्ल एकादशी (11)
27 मार्च प्रदोष व्रत चैत्र शुक्ल द्वादशी (12)
28 मार्च भगवान महावीर ज. पाम संडे चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (13)
29 मार्च पूर्णिमा व्रत हाटकेश्वर ज. चैत्र शुक्ल चतुर्दशी (14)
30 मार्च हनुमान जन्मोत्सव स्नानदान पूर्णिमा, वैशाख स्नानदान प्रा. चैत्र शुक्ल पूर्णिमा-एकम (15-1)
31 मार्च आशा द्वितीया वित्तीय वर्ष समाप्त प्रथम वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)
1 मार्च होली, धुलेंडी बसंतोत्सव चैत्र कृष्ण एकम (1)
2 मार्च भाई दौज संत तुकाराम ज. चैत्र कृष्ण द्वितीया (2)
3 मार्च संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा.9.07) चैत्र कृष्ण तृतीया (3)
4 मार्च चैत्र कृष्ण चतुर्थी (4)
5 मार्च रंग पंचमी चैत्र कृष्ण पंचमी (5)
6 मार्च चैत्र कृष्ण षष्ठी (6)
7 मार्च गोविंद वल्लभपंत दि. चैत्र कृष्ण सप्तमी (7)
8 मार्च शीतलाष्टमी, बसोरा अंतरराष्ट्रीय महिला दि. चैत्र कृष्ण अष्टमी (8)
9 मार्च भ. ऋषभनाथ ज. चैत्र कृष्ण नवमी (9)
10 मार्च चैत्र कृष्ण दशमी-एकादशी (10-11)
11 मार्च पापमोचनी एकादशी माँ कर्मा जयंती चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)
12 मार्च चैत्र कृष्ण द्वादशी (12)
13 मार्च वारुणी पर्व, प्रदोष व्रत पंचक प्रारंभ (दिन 12.03 से) चैत्र कृष्ण त्रयोदशी (13)
14 मार्च शिव चतुर्दशी खरमास प्रारंभ चैत्र कृष्ण चतुर्दशी (14)
15 मार्च सोम. अमावस्या, सौर मास चैत्र प्रा. विश्व उपभोक्ता दि. चैत्र शुक्ल अमावस्या (15)
16 मार्च चैत्र नवरात्रारंभ, घटस्थापना गुड़ीपड़वा चैत्र शुक्ल एकम (1)
17 मार्च चेटीचंड, झूलेलाल जन्म. चंद्रदर्शन, सिंधारा दौज चैत्र शुक्ल द्वितीया (2)
18 मार्च गणगौर तीज, सौभाग्य सुंदरी व्रत पंचक समाप्त (दिन 09.27) चैत्र शुक्ल तृतीया (3)
19 मार्च विनायकी चतुर्थी (चंद्र अ.रा. 9.34) चैत्र शुक्ल चतुर्थी (4)
20 मार्च आर्य समाज स्थापना. दि. चैत्र शुक्ल पंचमी (5)
21 मार्च विश्व वानिकी दि. चैत्र शुक्ल षष्ठी (6)
22 मार्च विश्व जल संरक्षण दि. चैत्र शुक्ल सप्तमी (7)
23 मार्च दुर्गाष्टमी व्रत, अशोकाष्टमी भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव दि. चैत्र शुक्ल अष्टमी (8)
24 मार्च राम नवमी, जन्मोत्सव विश्व क्षयरोग दि. चैत्र शुक्ल नवमी (9)
25 मार्च पुष्य नक्षत्र गणेश शंकर विद्यार्थी दि. चैत्र शुक्ल दशमी (10)
26 मार्च कामदा एकादशी चैत्र शुक्ल एकादशी (11)
27 मार्च प्रदोष व्रत चैत्र शुक्ल द्वादशी (12)
28 मार्च भगवान महावीर ज. पाम संडे चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (13)
29 मार्च पूर्णिमा व्रत हाटकेश्वर ज. चैत्र शुक्ल चतुर्दशी (14)
30 मार्च हनुमान जन्मोत्सव स्नानदान पूर्णिमा, वैशाख स्नानदान प्रा. चैत्र शुक्ल पूर्णिमा-एकम (15-1)
31 मार्च आशा द्वितीया वित्तीय वर्ष समाप्त प्रथम वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)
नवरात्रि
भगवती आराधना परम कल्याणकारी
युग-युगांतरों में विश्व के अनेक हिस्सों में उत्पन्न होने वाली मानव सभ्यता ने सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी, पेड़-पौधे, पर्वत व सागर की क्रियाशीलता में परम शक्ति का कहीं न कहीं एहसास किया। उस शक्ति के आश्रय व कृपा से ही देव, दनुज, मनुज, नाग, किंनर, गधर्व, पित्तर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी व कीट आदि चलायमान हैं।
ऐसी परम शक्ति की सत्ता का सतत् अनुभव करने वाली सुसंस्कृत, पवित्र, वेदगर्भा भारतीय भूमि धन्य है। जिसके सद्गृहस्तियों ने धर्म, अर्थ, काम तथा जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को भी प्राप्त किया।
हमारे वेद, पुराण व शास्त्र गवाह हैं कि जब-जब किसी आसुरी शक्ति ने अत्याचार व प्राकृतिक आपदाओं द्वारा मानव जीवन को तबाह करने की कोशिश की तब-तब किसी न किसी दैवीय शक्ति का अवतरण हुआ। इसी प्रकार जब महिषासुरादि दैत्यों के अत्याचार से भू व देव लोक व्याकुल हो उठे तो परम पिता परमेश्वर की प्रेरणा से सभी देव गणों ने एक अद्भुत शक्ति का सृजन किया जो आदि शक्ति माँ जगदंबा के नाम से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हुईं। जिन्होंने महिषासुरादि दैत्यों का वध कर भू व देव लोक में पुनः प्राण शक्ति व रक्षा शक्ति का संचार कर दिया।
देवी भागवत, सूर्य पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, मारकण्डेय आदि पुराणों में शिव व शक्ति की कल्याणकारी कथाओं का अद्वितीय वर्णन है। शक्ति की परम कृपा प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण भारत में नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तथा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को बड़ी श्रद्धा, भक्ति व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जिसे वसंत व शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
इस वर्ष नवरात्रि का पावन पवित्र पर्व 16 मार्च 2010 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ हो रहा है। अन्योआश्रित जीवन की रीढ़ कृषि व जीवन के आधार प्राणों की रक्षा हेतु इन दोनों ही ऋतुओं में लहलहाती हुई फसलें खेतों से खलिहान में आ जाती हैं।
इन फसलों के रख रखाव व कीट पंतगों से रक्षा हेतु, घर-परिवार को सुखी व समृद्ध बनाने तथा भयंकर कष्टों, दुःख-दरिद्रता से छुटकारा पाने हेतु सभी वर्ग के लोग नौ दिनों तक विशेष सफाई तथा पवित्रता को महत्व देते हुए नव देवियों की आराधना करते हुए हवनादि यज्ञ क्रियाएँ करते हैं। यज्ञ क्रियाओं द्वारा पुनः वर्षा होती है जो धन, धान्य से परिपूर्ण करती है तथा अनेक प्रकार की संक्रमित बीमारियों का अंत भी करती है।
नवरात्रि के कुछ सिद्ध मंत्र
श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता हैं। कहा जाता है कि माता दुर्गा शौर्य गाथा, भक्ति व ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। सप्तशती में कुछ ऐसे सिद्ध मंत्र हैं, जिनके द्वारा हम अपनी मनोकामना की पूर्ति कर सकते हैं।
यह देवी महात्म्य हमारे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है।
- ऐश्वर्य प्राप्ति एवं भय मुक्ति मंत्र
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥
- सर्वकल्याण मंत्र
सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके ।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥
- सर्वविघ्ननाशक मंत्र
सर्वबाधा प्रशमनं त्रेलोक्यसयाखिलेशवरी।
एवमेय त्याया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्॥
- बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्र प्राप्ति का मंत्र
सर्वाबाधा वि निर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥
- सौभाग्य प्राप्ति का चमत्कारिक मंत्र
देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥
- विपत्ति नाशक मंत्र
शरणागतर्दनार्त परित्राण पारायणे।
सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥
कैसे करें जाप :- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष, तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पाँच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से वांच्छित मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
उपरोक्त सारे मंत्र विधिनुसार करने पर मनुष्य अपने सारे पापों और कष्टों को दूर करके माता का आशीर्वाद का पात्र बन जाता है। नवरात्रि में संयमपूर्वक की गई प्रार्थना और भक्ति माता स्वीकार करती है और साथ ही अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करते हुए उन्हों मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाती है।
या देवी सर्वभूतेषू...
॥ या देवी सर्वभूतेषू शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
कहते हैं कि शक्ति से सृजन होता है और शक्ति से ही विध्वंस। वेद कहते हैं शक्ति से ही यह ब्रह्मांड चलायमान है।...शरीर या मन में यदि शक्ति नहीं है तो शरीर और मन का क्या उपयोग। शक्ति के बल पर ही हम संसार में विद्यमान हैं। शक्ति ही ब्रह्मांड की ऊर्जा है।
माँ पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति कहने से अर्थ वह प्रकृति नहीं हो जाती। हर माँ प्रकृति है। जहाँ भी सृजन की शक्ति है वहाँ प्रकृति ही मानी गई है इसीलिए माँ को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है।
अनादिकाल की परम्परा ने माँ के रूप और उनके जीवन रहस्य को बहुत ही विरोधाभासिक बना दिया है। वेदों में ब्रह्मांड की शक्ति को चिद् या प्रकृति कहा गया है। वेदों में दुर्गा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गीता में इसे परा कहा गया है। इसी तरह प्रत्येक ग्रंथों में इस शक्ति को अलग-अलग नाम दिया गया है, लेकिन इसका शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती से कोई संबंध नहीं। फिर भी पुराणकारों ने सभी का संबंध दुर्गा से जोड़ दिया।
माँ पार्वती का मूल नाम सती है। ये सती शब्द बिगड़कर शक्ति हो गया। शक्ति का अब अर्थ ताकत होता है। पुराणों अनुसार माँ पार्वती के पिता का नाम दक्ष प्रजापति और माता का नाम मेनका है। पति का नाम शिव और पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं।
इन्हें हिमालय की पुत्री अर्थात उमा हैमवती भी कहा जाता है। राजा दक्ष प्रजापति को हिमालय इसीलिए कहा जाता है कि उनका राज्य हिमालय क्षेत्र में ही था। दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करके जनता को कुतंत्र से मुक्त कराया था। उनकी यह पवित्र गाथा मर्केण्डेय पुराण में मिलती है।
इस समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं सिद्धियाँ और शक्तियाँ। स्वयं हमारे भीतर भी कई तरह की शक्तियाँ हैं। ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति, मन:शक्ति और क्रियाशक्ति आदि। अनंत हैं शक्तियाँ। वेद में इसे चित्त शक्ति कहा गया है जिससे ब्रह्मांड का जन्म होता है।
॥ॐ एं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैः विच्चे॥
युग-युगांतरों में विश्व के अनेक हिस्सों में उत्पन्न होने वाली मानव सभ्यता ने सूर्य, चंद्र, ग्रह, नक्षत्र, जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी, पेड़-पौधे, पर्वत व सागर की क्रियाशीलता में परम शक्ति का कहीं न कहीं एहसास किया। उस शक्ति के आश्रय व कृपा से ही देव, दनुज, मनुज, नाग, किंनर, गधर्व, पित्तर, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी व कीट आदि चलायमान हैं।
ऐसी परम शक्ति की सत्ता का सतत् अनुभव करने वाली सुसंस्कृत, पवित्र, वेदगर्भा भारतीय भूमि धन्य है। जिसके सद्गृहस्तियों ने धर्म, अर्थ, काम तथा जीवन के अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को भी प्राप्त किया।
हमारे वेद, पुराण व शास्त्र गवाह हैं कि जब-जब किसी आसुरी शक्ति ने अत्याचार व प्राकृतिक आपदाओं द्वारा मानव जीवन को तबाह करने की कोशिश की तब-तब किसी न किसी दैवीय शक्ति का अवतरण हुआ। इसी प्रकार जब महिषासुरादि दैत्यों के अत्याचार से भू व देव लोक व्याकुल हो उठे तो परम पिता परमेश्वर की प्रेरणा से सभी देव गणों ने एक अद्भुत शक्ति का सृजन किया जो आदि शक्ति माँ जगदंबा के नाम से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हुईं। जिन्होंने महिषासुरादि दैत्यों का वध कर भू व देव लोक में पुनः प्राण शक्ति व रक्षा शक्ति का संचार कर दिया।
देवी भागवत, सूर्य पुराण, शिव पुराण, भागवत पुराण, मारकण्डेय आदि पुराणों में शिव व शक्ति की कल्याणकारी कथाओं का अद्वितीय वर्णन है। शक्ति की परम कृपा प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण भारत में नवरात्रि का पर्व वर्ष में दो बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तथा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को बड़ी श्रद्धा, भक्ति व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जिसे वसंत व शारदीय नवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
इस वर्ष नवरात्रि का पावन पवित्र पर्व 16 मार्च 2010 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ हो रहा है। अन्योआश्रित जीवन की रीढ़ कृषि व जीवन के आधार प्राणों की रक्षा हेतु इन दोनों ही ऋतुओं में लहलहाती हुई फसलें खेतों से खलिहान में आ जाती हैं।
इन फसलों के रख रखाव व कीट पंतगों से रक्षा हेतु, घर-परिवार को सुखी व समृद्ध बनाने तथा भयंकर कष्टों, दुःख-दरिद्रता से छुटकारा पाने हेतु सभी वर्ग के लोग नौ दिनों तक विशेष सफाई तथा पवित्रता को महत्व देते हुए नव देवियों की आराधना करते हुए हवनादि यज्ञ क्रियाएँ करते हैं। यज्ञ क्रियाओं द्वारा पुनः वर्षा होती है जो धन, धान्य से परिपूर्ण करती है तथा अनेक प्रकार की संक्रमित बीमारियों का अंत भी करती है।
नवरात्रि के कुछ सिद्ध मंत्र
श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ मनोरथ सिद्धि के लिए किया जाता हैं। कहा जाता है कि माता दुर्गा शौर्य गाथा, भक्ति व ज्ञान की त्रिवेणी हैं। यह श्री मार्कण्डेय पुराण का अंश है। सप्तशती में कुछ ऐसे सिद्ध मंत्र हैं, जिनके द्वारा हम अपनी मनोकामना की पूर्ति कर सकते हैं।
यह देवी महात्म्य हमारे धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने में सक्षम है।
- ऐश्वर्य प्राप्ति एवं भय मुक्ति मंत्र
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥
- सर्वकल्याण मंत्र
सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके ।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥
- सर्वविघ्ननाशक मंत्र
सर्वबाधा प्रशमनं त्रेलोक्यसयाखिलेशवरी।
एवमेय त्याया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनम्॥
- बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्र प्राप्ति का मंत्र
सर्वाबाधा वि निर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥
- सौभाग्य प्राप्ति का चमत्कारिक मंत्र
देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥
- विपत्ति नाशक मंत्र
शरणागतर्दनार्त परित्राण पारायणे।
सर्व स्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥
कैसे करें जाप :- नवरात्रि के प्रतिपदा के दिन घटस्थापना के बाद संकल्प लेकर प्रातः स्नान करके दुर्गा की मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से गंध, पुष्प, धूप दीपक नैवेद्य निवेदित कर पूजा करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर रुद्राक्ष, तुलसी या चंदन की माला से मंत्र का जाप एक माला से पाँच माला तक पूर्ण कर अपना मनोरथ कहें। पूरी नवरात्रि जाप करने से वांच्छित मनोकामना अवश्य पूरी होती है।
उपरोक्त सारे मंत्र विधिनुसार करने पर मनुष्य अपने सारे पापों और कष्टों को दूर करके माता का आशीर्वाद का पात्र बन जाता है। नवरात्रि में संयमपूर्वक की गई प्रार्थना और भक्ति माता स्वीकार करती है और साथ ही अपने भक्तों के कष्टों का निवारण करते हुए उन्हों मोक्ष प्राप्ति का मार्ग दिखाती है।
या देवी सर्वभूतेषू...
॥ या देवी सर्वभूतेषू शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥
कहते हैं कि शक्ति से सृजन होता है और शक्ति से ही विध्वंस। वेद कहते हैं शक्ति से ही यह ब्रह्मांड चलायमान है।...शरीर या मन में यदि शक्ति नहीं है तो शरीर और मन का क्या उपयोग। शक्ति के बल पर ही हम संसार में विद्यमान हैं। शक्ति ही ब्रह्मांड की ऊर्जा है।
माँ पार्वती को शक्ति भी कहते हैं। वेद, उपनिषद और गीता में शक्ति को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति कहने से अर्थ वह प्रकृति नहीं हो जाती। हर माँ प्रकृति है। जहाँ भी सृजन की शक्ति है वहाँ प्रकृति ही मानी गई है इसीलिए माँ को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति में ही जन्म देने की शक्ति है।
अनादिकाल की परम्परा ने माँ के रूप और उनके जीवन रहस्य को बहुत ही विरोधाभासिक बना दिया है। वेदों में ब्रह्मांड की शक्ति को चिद् या प्रकृति कहा गया है। वेदों में दुर्गा का कोई उल्लेख नहीं मिलता। गीता में इसे परा कहा गया है। इसी तरह प्रत्येक ग्रंथों में इस शक्ति को अलग-अलग नाम दिया गया है, लेकिन इसका शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती से कोई संबंध नहीं। फिर भी पुराणकारों ने सभी का संबंध दुर्गा से जोड़ दिया।
माँ पार्वती का मूल नाम सती है। ये सती शब्द बिगड़कर शक्ति हो गया। शक्ति का अब अर्थ ताकत होता है। पुराणों अनुसार माँ पार्वती के पिता का नाम दक्ष प्रजापति और माता का नाम मेनका है। पति का नाम शिव और पुत्र कार्तिकेय तथा गणेश हैं।
इन्हें हिमालय की पुत्री अर्थात उमा हैमवती भी कहा जाता है। राजा दक्ष प्रजापति को हिमालय इसीलिए कहा जाता है कि उनका राज्य हिमालय क्षेत्र में ही था। दुर्गा ने महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदि राक्षसों का वध करके जनता को कुतंत्र से मुक्त कराया था। उनकी यह पवित्र गाथा मर्केण्डेय पुराण में मिलती है।
इस समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं सिद्धियाँ और शक्तियाँ। स्वयं हमारे भीतर भी कई तरह की शक्तियाँ हैं। ज्ञानशक्ति, इच्छाशक्ति, मन:शक्ति और क्रियाशक्ति आदि। अनंत हैं शक्तियाँ। वेद में इसे चित्त शक्ति कहा गया है जिससे ब्रह्मांड का जन्म होता है।
॥ॐ एं ह्रीं क्लीं चामुण्डायैः विच्चे॥
धर्मयात्रा
उज्जैन का द्वारकाधीश गोपाल मंदिर
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर। गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। शहर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित इस मंदिर की भव्यता आस-पास बेतरतीब तरीके से बने मकान और दुकानों के कारण दब-सी गई है।
गोपाल मंदिर के पुजारी जगदिशचंद्र पुरोहित ने कहा कि इस मंदिर का निर्माण दौलत राव सिंधिया की धर्मपत्नी वायजा बाई ने संवत 1901 में कराया था जिसमें मूर्ति की स्थापना संवत 1909 में की गई। इस मान से ईस्वी सन 1844 में निर्माण 1852 में मूर्ति की स्थापना हुई। मंदिर के चाँदी के द्वार यहाँ का एक अन्य आकर्षण हैं।
मंदिर में दाखिल होते ही गहन शांति का अहससास होता है। इसके विशाल स्तंभ और सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्त या अन्य पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। पर्वों के दौरान ट्रस्ट की तरफ से श्रद्धालुओं तथा तीर्थ यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की जाती है।
कम से कम दो सौ वर्ष पूराना है यह मंदिर। मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वतीऔर गरुढ़ भगवान की मूर्तियाँ है ये मूर्तियाँ अचल है और एक कोने में वायजा बाई की भी मूर्ति है। यहाँ जन्माष्टमी के अलावा हरिहर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है तब यहाँ हरिहर मिलन अर्थात विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहाँ पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है।
कैसे पहुँचे:
सड़क मार्ग: मध्यप्रदेश के इंदौर से लगभग 60 किलोमिटर दूर उज्जैन हिंदुओं का विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं। इंदौर बस स्टेंड से बस द्वारा उज्जैन पहुँचा जा सकता है।
रेल मार्ग: तीर्थ स्थल उज्जैन का रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ से छोटी और बड़ी लाइन की रेलगाड़ियाँ मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता के लिए जाती है।
हवाई मार्ग: उज्जैन का सबसे निकटतम हवाई अड्डा इंदौर है।
जैन सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र का मंदिर
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं नेमावर के जैन सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में जहाँ भव्य मंदिर खड़ा है नर्मदा के तट पर। इस क्षेत्र का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह स्थान प्राचीन काल में जैन संन्यासियों की तपोभूमि हुआ करता था तथा यहाँ कई भव्य मंदिर हुआ करते थे।
रावण के सुत आदि कुमार, मुक्ति गए रेवातट सार।
कोटि पंच अरू लाख पचास, ते बंदों धरि परम हुलास।।
उक्त निर्वाण कांड के श्लोक के अनुसार रावण के पुत्र सहित साढ़े पाँच करोड़ मुनिराज नेमावर के रेवातट से मोक्ष पधारे हैं। रेवा नदी जो कि नर्मदा के नाम से भी जानी जाती है। जैन शास्त्र के अनुसार नेमावर नगरी पर प्रचीन काल में कालसंवर और उनकी रानी कनकमला राज्य करते थे। आगे जाकर यह निमावती और बाद में नेमावर हुआ।
नेमावर नदी के तल से विक्रम संवत 1880 ई.पू. की तीन विशाल जैन प्रतिमाएँ निकली है। पहली 1008 भगवान आदिनाथ की मूर्ति जिन्हें नेमावर जिनालय में, दूसरी 1008 भगवान मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति, जिन्हें खातेगाँव के जिनालय में और 1008 भगवान शांतिनाथ की पद्मासनस्त मूर्ति, जिन्हें हरदा में रखा गया है। इसी कारण इस सिद्धक्षेत्र का महत्व और बढ़ गया है।
जैन-तीर्थ संग्रह में मदनकीर्ति ने लिखा है कि 26 जिन तीर्थों का उल्लेख है उनमें रेवा (नर्मदा) के तीर्थ क्षेत्र का महत्व अधिक है उनका कथन है कि रेवा के जल में शांति जिनेश्वर हैं जिनकी पूजा जल देव करते हैं। इसी कारण इस सिद्ध क्षेत्र को महान तीर्थ माना जाता है।
उक्त सिद्ध क्षेत्र पर भव्य निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहाँ पर निर्माणाधीन है पंचबालवति एवं त्रिकाल चौबीस जिनालय। लगभग डेढ़ अरब की लागत से उक्त तीर्थ स्थल के निर्माण कार्य की योजना है। लगभग 60 प्रतिशत निर्मित हो चुके यहाँ के मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है।
श्रीदिगंबर जैन रेवातट सिद्धोदय ट्रस्ट नेमावर, सिद्धक्षेत्र द्वारा उक्त निर्माण किया जा रहा है। ट्रस्ट के पास 15 एकड़ जमीन हो गई है जिसमें विश्व के अनूठे 'पंचबालयति त्रिकाल चौबीसी' जिनालय का निर्माण अहमदाबाद के शिल्पज्ञ सत्यप्रकाशजी एवं सी.बी. सोमपुरा के निर्देशन में हो हो रहा है। संपूर्ण मंदिर वंशी पहाड़पुर के लाल पत्थर से निर्मित हो रहा है।
पूर्ण मंदिर की लम्बाई 410 फिट, चौड़ाई 325 फिट एवं शिखर की ऊँचाई 121 फिट प्रस्तावित है। जिसमें पंचबालयति जिनालय 55 गुणित 55 लम्बा-चौड़ा है। सभा मंडप 64 गुणित 65 लम्बा-चौड़ा एवं 75 फिट ऊँचा बनना है।
खातेगाँव, नेमावर और हरदा के जैन श्रद्वालुओं के अनुरोध पर श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के इस क्षेत्र में आगमन के बाद से ही इस तीर्थ क्षेत्र के विकास कार्य को प्रगति और दिशा मिली। श्रीजी के सानिध्य में ही उक्त क्षेत्र पर निर्माण कार्य का शिलान्यास किया गया।
इंदौर से मात्र 130 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 कि.मी. तथा उत्तर दिशा में खातेगाँव से 15 कि.मी. दूर पूर्व दिक्षा में स्थित है यह मंदिर। यहाँ नर्मदा नदी के जल स्तर की चौड़ाई करीब 700 मीटर है।
कैसे पहुँचे :-
वायु मार्ग : यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट, इंदौर 130 किमी की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग : इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा में भोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है नेमावर।
सड़क मार्ग : नेमावर पहुँचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।
ॐ शनिदेवाय नमः
शनि का धाम श्रीशनि शिगनापुर मंदिर
धर्मयात्रा में इस बार वेबदुनिया के साथ यात्रा कीजिए सूर्य पुत्र शनिदेव के धाम शनि शिगनापुर मंदिर की। शनिदेव के बारे में माना जाता है कि यदि शनि महाराज प्रसन्न हों तो सब कुछ अच्छा, लेकिन यदि ये कुपित हो गए तो इनकी कोध्राग्नि से बचना बेहद मुश्किल है। इसलिए शनिदेव के भक्त अपने ईष्ट को मनाने के लिए उन्हें तेल चढ़ाते हैं।
शनि शिगनापुर मंदिर की महिमा अपरंपार है। महाराष्ट्र के नासिक शहर के पास स्थित शिगनापुर गाँव में शनिदेव का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में शनिदेव की अत्यंत प्राचीन पाषाण प्रतिमा है। प्रतिमा को स्वयंभू माना जाता है। वास्तव में इस प्रतिमा का कोई आकार नहीं है। मूलतः एक पाषाण को शनि रूप माना जाता है।
शनिधाम शिगनापुर गाँव की भी एक रोचक लेकिन सत्य कथा है। माना जाता है इस गाँव के राजा शनिदेव हैं, इसलिए यहाँ कभी चोरी नहीं होती। इस गाँव के लोग अपने घर में ताला नहीं लगाते हैं, लेकिन उनके घर से कभी एक कील भी चोरी नहीं होती।
यहाँ के लोगों का मानना है कि शनि की इस नगरी की रक्षा खुद शनिदेव का पाश करता है। कोई भी चोर गाँव की सीमारेखा को जीवित अवस्था में पार नहीं कर सकता। गाँव के बड़े-बुजुर्गों को जोर देने पर भी याद नहीं आता कि उनके गाँव में चोरी की कोई छोटी-सी भी घटना हुई हो।
इसके साथ ही लोगों की आस्था है कि शिगनापुर गाँव के अंदर यदि किसी व्यक्ति को जहरीला साँप काट ले तो उसे शनिदेव की प्रतिमा के पास लाना चाहिए। शनिदेव की कृपा से जहरीले से जहरीले साँप का विष भी बेअसर हो जाता है।
शनि शिगनापुर मंदिर में शनिदेव के दर्शन करने, उनकी आराधना करने के कुछ नियम हैं। चूँकि शनिदेव बाल ब्रह्मचारी हैं, इसलिए महिलाएँ दूर से ही उनके दर्शन करती हैं। वहीं पुरुष श्रद्धालु स्नान करके, गीले वस्त्रों में ही शनि भगवान के दर्शन करते हैं।
तिल का तेल चढ़ाकर पाषाण प्रतिमा की प्रदक्षिणा करते हैं। दर्शन करने के बाद श्रद्धालु यहाँ स्थित दुकानों से घोड़े की नाल और काले कपड़ों से बनी शनि भगवान की गुड़िया जरूर खरीदते हैं। लोक मान्यता है कि घोड़े की नाल घर के बाहर लगाने से बुरी नजर से बचाव होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
कैसे जाएँ-
हवाई यात्रा- यहाँ का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पूना में है, जो यहाँ से 160 किमी दूर है।
रेल- यहाँ का निकटतम रेलवे स्टेशन श्रीरामपुर है।
रोड- नासिक से यहाँ के लिए बस, टैक्सी आदि सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मुंबई, पूना अहमदाबाद से यहाँ सड़क मार्ग से आया जा सकता है।
लेटे हुए हनुमान का मंदिर
राजकोट के श्रीबड़े बालाजी हनुमान
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं, गुजरात के राजकोट शहर में स्थित रामभक्त हनुमान के मंदिर। राजकोट के कोठारिया रोड पर स्थित श्रीबड़े बालाजी के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें हनुमानजी की प्रतिमा लेटी हुई स्थिति में विद्यमान है। इस कारण यह मंदिर लेटे हुए हनुमान के नाम से भी पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
आज से तकरीबन चालीस साल पहले इस मंदिर की स्थापना की गई थी। मंदिर के पुजारी कमलदासजी महाराज और गुरु सर्वेश्वरदासजी महाराज कहते हैं कि चालीस साल पहले इसी जगह पर एक अनुष्ठान करते समय उनको हनुमानजी ने सर्पाकृति के रूप में दर्शन दिए, जिसे देखकर वे खड़े हो गए और उनका अनुष्ठान खंडित हो गया।
बाद में एक दिन स्वयं हनुमानजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर निर्माण के लिए प्रेरित किया। चूँकि प्रथम अनुष्ठान के दौरान उन्हें सर्पाकृति में हनुमानजी के दर्शन हुए थे, इसलिए उन्होंने कुछ भक्तजनों की आर्थिक मदद से यहाँ पर लेटे हुए हनुमान की प्रतिमा विराजमान की। पवित्र औषधी और मिश्रित धातु से बनी हुई इस प्रतिमा की उँचाई 21 फिट व चौड़ाई 11 फिट है।
शुरुआत में इस मंदिर के निर्माण में काफी दिक्कते आई, लेकिन धीरे-धीरे यह मंदिर पूरे गुजरात में प्रसिद्ध हो गया। आज यहाँ पर प्रतिदिन हजारों भक्तजन हनुमानजी के दर्शन के लिए आते हैं। रामनवमी और हनुमान जयंति पर तो यहाँ लोगों का यहाँ पर ताँता लगता है। इस दिन यहाँ पर एक विशाल भंडारा आयोजित होता है।
WDभक्तजनों को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही नंदी महाराज और एक बड़ी शिवलिंग के दर्शन होते हैं जिन्हें कमलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर के अंदर बने झरोखे से भक्तजन नीचे लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन करते हैं। लेटे हुए बालाजी हनुमान के पास उनकी रक्षा करते हुए बंदरों और सप्तऋषि की छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी विराजमान है। मंदिर में हनुमानजी की एक छोटी-सी मूर्ति भी है, जो मंदिर की स्थापना के समय से विद्यमान है।
मंदिर की दीवारों पर कई देवी-देवताओं के चित्रों को किसी मंजे हुए चित्रकार ने जीवंत रूप दिया है। जिसमें गुरु सर्वेश्वरदासजी महाराज का भी एक चित्र है। मंदिर के भीतर राम और कृष्ण का छोटा-सा मंदिर है।
इस मंदिर के नाम पर एक ट्रस्ट का निर्माण भी किया गया है जो गौसेवा, अन्नसेवा और गरीब विद्यार्थियों को निशुल्क रहने की सुविधा भी प्रदान करता है। कहते हैं कि यहाँ पर कभी भी दान माँगा नहीं जाता बल्कि स्वयं दाता दान देने के लिए आगे आते हैं। मान्यता है कि यहाँ पर आने वाले प्रत्येक भक्त की माँग को बड़े बालाजी पूरी करते हैं।
कैसे पहुँचे : गुजरात के राजकोट रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से ऑटो या फिर बस के द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है।
चार वटों में से एक सिद्धवट
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के सिद्धवट स्थान पर। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पुराणों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदू मान्यता अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, वंशीवट, बौधवट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता।
*नासिक के पंचववटी क्षेत्र में सीता माता की गुफा के पास पाँच प्राचीन वृक्ष है जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। वनवानस के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहाँ कुछ समय बिताया था। इन वृक्षों का भी धार्मिक महत्व है। उक्त सारे वट वक्षों की रोचक कहानियाँ हैं। मुगल काल में इन वृक्षों को खतम करने के कई प्रयास हुए।
सिद्धवट के पुजारी ने कहा कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध किया था। संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और यहाँ उज्जैन में पवित्र सिद्धवट हैं।
WDयहाँ तीन तरह की सिद्धि होती है संतति, संपत्ति और सद्गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहाँ पूजन किया जाता है। सद्गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वस्विक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।
पंडित नागेश्वर कन्हैन्यालाल ने कहा कि यहाँ पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहाँ पर कालसर्प शांति का विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है।
कालसर्प दोष का निदान कराने आईं पुना की श्वेता उपाध्याय ने कहा कि मेरी जन्मकुंडली में कालसर्प दोष था। हमें पता चला कि यहाँ कालसर्प दोष का निदान होता है तो मैं यहाँ पर दोष का निवारण कराने आई हूँ।
वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है। यह यात्रा आपकों कैसी लगी हमें जरूर बताएँ।
गंगा किनारे विराजे काशी विश्वनाथ
ॐ नमः शिवाय...शिव-शंभु...
'वाराणसीतु भुवनत्रया सारभूत
रम्या नृनाम सुगतिदाखिल सेव्यामना
अत्रगाता विविधा दुष्कृतकारिणोपि
पापाक्ष्ये वृजासहा सुमनाप्रकाशशः'
- नारद पुराण
गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित वाराणसी नगर विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक माना जाता है तथा यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सुशोभित है। इस नगर के हृदय में बसा है भगवान काशी विश्वनाथ का मंदिर जो प्रभु शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। स्त्री हो या पुरुष, युवा हो या प्रौढ़, हर कोई यहाँ पर मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन में एक बार अवश्य आता है। ऐसा मानते हैं कि यहाँ पर आने वाला हर श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ को अपनी ईष्ट इच्छा समर्पित करता है।
धार्मिक महत्व-
ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब प्रकाश की पहली किरण काशी की धरती पर पड़ी थी। तभी से काशी ज्ञान तथा आध्यात्म का केंद्र माना जाता है।
यह भी माना जाता है कि निर्वासन में कई साल बिताने के पश्चात भगवान शिव इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्माजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों के रथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था।
काशी विश्वनाथ मंदिर-
गंगा तट पर सँकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहाँ पर एक कुआँ भी है, जिसे 'ज्ञानवापी' की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह विद्यमान है। गर्भगृह के भीतर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग विद्यमान है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। हालाँकि मंदिर का भीतरी परिसर इतना व्यापक नहीं है, परंतु वातावरण पूरी तरह से शिवमय है।
ऐतिहासिक महत्व-
ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर प्राक्-ऐतिहासिक काल में निर्मित हुआ था। सन् 1776 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर के पुनर्निमाण के लिए काफी धनराशि दान की थी। यह भी माना जाता है कि लाहौर के महाराजा रंजीतसिंह ने इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। 1983 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और पूर्व काशी नरेश विभूति सिंह को इसके ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किया।
पूजा-अर्चना -
यह मंदिर प्रतिदिन 2.30 बजे भोर में मंगल आरती के लिए खोला जाता है जो सुबह 3 से 4 बजे तक होती है। दर्शनार्थी टिकट लेकर इस आरती में भाग ले सकते हैं। तत्पश्चात 4 बजे से सुबह 11 बजे तक सभी के लिए मंदिर के द्वार खुले होते हैं। 11.30 बजे से दोपहर 12 बजे तक भोग आरती का आयोजन होता है। 12 बजे से शाम के 7 बजे तक पुनः इस मंदिर में सार्वजनिक दर्शन की व्यवस्था है।
शाम 7 से 8.30 बजे तक सप्तऋषि आरती के पश्चात रात के 9 बजे तक सभी दर्शनार्थी मंदिर के भीतर दर्शन कर सकते हैं। 9 बजे के पश्चात मंदिर परिसर के बाहर ही दर्शन संभव होते हैं। अंत में 10.30 बजे रात्रि से शयन आरती प्रारंभ होती है, जो 11 बजे तक संपन्न होती है। चढ़ावे में चढ़ा प्रसाद, दूध, कपड़े व अन्य वस्तुएँ गरीबों व जरूरतमंदों में बाँट दी जाती हैं।
कैसे पहुँचें?
सड़क परिवहन द्वारा- गंगा के मैदान में स्थित होने के कारण वाराणसी के लिए सड़क परिवहन की उत्तम व्यवस्था है। उत्तरप्रदेश के विभिन्न हिस्सों से इस स्थान के लिए निजी व सरकारी बसों की उत्तम व्यवस्था है।
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के प्रसिद्ध द्वारकाधीश गोपाल मंदिर। गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। शहर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित इस मंदिर की भव्यता आस-पास बेतरतीब तरीके से बने मकान और दुकानों के कारण दब-सी गई है।
गोपाल मंदिर के पुजारी जगदिशचंद्र पुरोहित ने कहा कि इस मंदिर का निर्माण दौलत राव सिंधिया की धर्मपत्नी वायजा बाई ने संवत 1901 में कराया था जिसमें मूर्ति की स्थापना संवत 1909 में की गई। इस मान से ईस्वी सन 1844 में निर्माण 1852 में मूर्ति की स्थापना हुई। मंदिर के चाँदी के द्वार यहाँ का एक अन्य आकर्षण हैं।
मंदिर में दाखिल होते ही गहन शांति का अहससास होता है। इसके विशाल स्तंभ और सुंदर नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर के आसपास विशाल प्रांगण में सिंहस्त या अन्य पर्व के दौरान बाहर से आने वाले लोग विश्राम करते हैं। पर्वों के दौरान ट्रस्ट की तरफ से श्रद्धालुओं तथा तीर्थ यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाएँ प्रदान की जाती है।
कम से कम दो सौ वर्ष पूराना है यह मंदिर। मंदिर में भगवान द्वारकाधीश, शंकर, पार्वतीऔर गरुढ़ भगवान की मूर्तियाँ है ये मूर्तियाँ अचल है और एक कोने में वायजा बाई की भी मूर्ति है। यहाँ जन्माष्टमी के अलावा हरिहर का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हरिहर के समय भगवान महाकाल की सवारी रात बारह बजे आती है तब यहाँ हरिहर मिलन अर्थात विष्णु और शिव का मिलन होता है। जहाँ पर उस वक्त डेढ़ दो घंटे पूजन चलता है।
कैसे पहुँचे:
सड़क मार्ग: मध्यप्रदेश के इंदौर से लगभग 60 किलोमिटर दूर उज्जैन हिंदुओं का विश्व प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं। इंदौर बस स्टेंड से बस द्वारा उज्जैन पहुँचा जा सकता है।
रेल मार्ग: तीर्थ स्थल उज्जैन का रेलवे स्टेशन देश के सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है। यहाँ से छोटी और बड़ी लाइन की रेलगाड़ियाँ मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता के लिए जाती है।
हवाई मार्ग: उज्जैन का सबसे निकटतम हवाई अड्डा इंदौर है।
जैन सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र का मंदिर
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं नेमावर के जैन सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में जहाँ भव्य मंदिर खड़ा है नर्मदा के तट पर। इस क्षेत्र का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह स्थान प्राचीन काल में जैन संन्यासियों की तपोभूमि हुआ करता था तथा यहाँ कई भव्य मंदिर हुआ करते थे।
रावण के सुत आदि कुमार, मुक्ति गए रेवातट सार।
कोटि पंच अरू लाख पचास, ते बंदों धरि परम हुलास।।
उक्त निर्वाण कांड के श्लोक के अनुसार रावण के पुत्र सहित साढ़े पाँच करोड़ मुनिराज नेमावर के रेवातट से मोक्ष पधारे हैं। रेवा नदी जो कि नर्मदा के नाम से भी जानी जाती है। जैन शास्त्र के अनुसार नेमावर नगरी पर प्रचीन काल में कालसंवर और उनकी रानी कनकमला राज्य करते थे। आगे जाकर यह निमावती और बाद में नेमावर हुआ।
नेमावर नदी के तल से विक्रम संवत 1880 ई.पू. की तीन विशाल जैन प्रतिमाएँ निकली है। पहली 1008 भगवान आदिनाथ की मूर्ति जिन्हें नेमावर जिनालय में, दूसरी 1008 भगवान मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति, जिन्हें खातेगाँव के जिनालय में और 1008 भगवान शांतिनाथ की पद्मासनस्त मूर्ति, जिन्हें हरदा में रखा गया है। इसी कारण इस सिद्धक्षेत्र का महत्व और बढ़ गया है।
जैन-तीर्थ संग्रह में मदनकीर्ति ने लिखा है कि 26 जिन तीर्थों का उल्लेख है उनमें रेवा (नर्मदा) के तीर्थ क्षेत्र का महत्व अधिक है उनका कथन है कि रेवा के जल में शांति जिनेश्वर हैं जिनकी पूजा जल देव करते हैं। इसी कारण इस सिद्ध क्षेत्र को महान तीर्थ माना जाता है।
उक्त सिद्ध क्षेत्र पर भव्य निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहाँ पर निर्माणाधीन है पंचबालवति एवं त्रिकाल चौबीस जिनालय। लगभग डेढ़ अरब की लागत से उक्त तीर्थ स्थल के निर्माण कार्य की योजना है। लगभग 60 प्रतिशत निर्मित हो चुके यहाँ के मंदिरों की भव्यता देखते ही बनती है।
श्रीदिगंबर जैन रेवातट सिद्धोदय ट्रस्ट नेमावर, सिद्धक्षेत्र द्वारा उक्त निर्माण किया जा रहा है। ट्रस्ट के पास 15 एकड़ जमीन हो गई है जिसमें विश्व के अनूठे 'पंचबालयति त्रिकाल चौबीसी' जिनालय का निर्माण अहमदाबाद के शिल्पज्ञ सत्यप्रकाशजी एवं सी.बी. सोमपुरा के निर्देशन में हो हो रहा है। संपूर्ण मंदिर वंशी पहाड़पुर के लाल पत्थर से निर्मित हो रहा है।
पूर्ण मंदिर की लम्बाई 410 फिट, चौड़ाई 325 फिट एवं शिखर की ऊँचाई 121 फिट प्रस्तावित है। जिसमें पंचबालयति जिनालय 55 गुणित 55 लम्बा-चौड़ा है। सभा मंडप 64 गुणित 65 लम्बा-चौड़ा एवं 75 फिट ऊँचा बनना है।
खातेगाँव, नेमावर और हरदा के जैन श्रद्वालुओं के अनुरोध पर श्री 108 विद्यासागरजी महाराज के इस क्षेत्र में आगमन के बाद से ही इस तीर्थ क्षेत्र के विकास कार्य को प्रगति और दिशा मिली। श्रीजी के सानिध्य में ही उक्त क्षेत्र पर निर्माण कार्य का शिलान्यास किया गया।
इंदौर से मात्र 130 कि.मी. दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 कि.मी. तथा उत्तर दिशा में खातेगाँव से 15 कि.मी. दूर पूर्व दिक्षा में स्थित है यह मंदिर। यहाँ नर्मदा नदी के जल स्तर की चौड़ाई करीब 700 मीटर है।
कैसे पहुँचे :-
वायु मार्ग : यहाँ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या एयरपोर्ट, इंदौर 130 किमी की दूरी पर स्थित है।
रेल मार्ग : इंदौर से मात्र 130 किमी दूर दक्षिण-पूर्व में हरदा रेलवे स्टेशन से 22 किमी तथा उत्तर दिशा में भोपाल से 170 किमी दूर पूर्व दिशा में स्थित है नेमावर।
सड़क मार्ग : नेमावर पहुँचने के लिए इंदौर से बस या टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।
ॐ शनिदेवाय नमः
शनि का धाम श्रीशनि शिगनापुर मंदिर
धर्मयात्रा में इस बार वेबदुनिया के साथ यात्रा कीजिए सूर्य पुत्र शनिदेव के धाम शनि शिगनापुर मंदिर की। शनिदेव के बारे में माना जाता है कि यदि शनि महाराज प्रसन्न हों तो सब कुछ अच्छा, लेकिन यदि ये कुपित हो गए तो इनकी कोध्राग्नि से बचना बेहद मुश्किल है। इसलिए शनिदेव के भक्त अपने ईष्ट को मनाने के लिए उन्हें तेल चढ़ाते हैं।
शनि शिगनापुर मंदिर की महिमा अपरंपार है। महाराष्ट्र के नासिक शहर के पास स्थित शिगनापुर गाँव में शनिदेव का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर में शनिदेव की अत्यंत प्राचीन पाषाण प्रतिमा है। प्रतिमा को स्वयंभू माना जाता है। वास्तव में इस प्रतिमा का कोई आकार नहीं है। मूलतः एक पाषाण को शनि रूप माना जाता है।
शनिधाम शिगनापुर गाँव की भी एक रोचक लेकिन सत्य कथा है। माना जाता है इस गाँव के राजा शनिदेव हैं, इसलिए यहाँ कभी चोरी नहीं होती। इस गाँव के लोग अपने घर में ताला नहीं लगाते हैं, लेकिन उनके घर से कभी एक कील भी चोरी नहीं होती।
यहाँ के लोगों का मानना है कि शनि की इस नगरी की रक्षा खुद शनिदेव का पाश करता है। कोई भी चोर गाँव की सीमारेखा को जीवित अवस्था में पार नहीं कर सकता। गाँव के बड़े-बुजुर्गों को जोर देने पर भी याद नहीं आता कि उनके गाँव में चोरी की कोई छोटी-सी भी घटना हुई हो।
इसके साथ ही लोगों की आस्था है कि शिगनापुर गाँव के अंदर यदि किसी व्यक्ति को जहरीला साँप काट ले तो उसे शनिदेव की प्रतिमा के पास लाना चाहिए। शनिदेव की कृपा से जहरीले से जहरीले साँप का विष भी बेअसर हो जाता है।
शनि शिगनापुर मंदिर में शनिदेव के दर्शन करने, उनकी आराधना करने के कुछ नियम हैं। चूँकि शनिदेव बाल ब्रह्मचारी हैं, इसलिए महिलाएँ दूर से ही उनके दर्शन करती हैं। वहीं पुरुष श्रद्धालु स्नान करके, गीले वस्त्रों में ही शनि भगवान के दर्शन करते हैं।
तिल का तेल चढ़ाकर पाषाण प्रतिमा की प्रदक्षिणा करते हैं। दर्शन करने के बाद श्रद्धालु यहाँ स्थित दुकानों से घोड़े की नाल और काले कपड़ों से बनी शनि भगवान की गुड़िया जरूर खरीदते हैं। लोक मान्यता है कि घोड़े की नाल घर के बाहर लगाने से बुरी नजर से बचाव होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
कैसे जाएँ-
हवाई यात्रा- यहाँ का सबसे निकटतम हवाई अड्डा पूना में है, जो यहाँ से 160 किमी दूर है।
रेल- यहाँ का निकटतम रेलवे स्टेशन श्रीरामपुर है।
रोड- नासिक से यहाँ के लिए बस, टैक्सी आदि सुविधाएँ उपलब्ध हैं। मुंबई, पूना अहमदाबाद से यहाँ सड़क मार्ग से आया जा सकता है।
लेटे हुए हनुमान का मंदिर
राजकोट के श्रीबड़े बालाजी हनुमान
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको ले चलते हैं, गुजरात के राजकोट शहर में स्थित रामभक्त हनुमान के मंदिर। राजकोट के कोठारिया रोड पर स्थित श्रीबड़े बालाजी के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर की खासियत यह है कि इसमें हनुमानजी की प्रतिमा लेटी हुई स्थिति में विद्यमान है। इस कारण यह मंदिर लेटे हुए हनुमान के नाम से भी पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र में प्रसिद्ध है।
आज से तकरीबन चालीस साल पहले इस मंदिर की स्थापना की गई थी। मंदिर के पुजारी कमलदासजी महाराज और गुरु सर्वेश्वरदासजी महाराज कहते हैं कि चालीस साल पहले इसी जगह पर एक अनुष्ठान करते समय उनको हनुमानजी ने सर्पाकृति के रूप में दर्शन दिए, जिसे देखकर वे खड़े हो गए और उनका अनुष्ठान खंडित हो गया।
बाद में एक दिन स्वयं हनुमानजी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर निर्माण के लिए प्रेरित किया। चूँकि प्रथम अनुष्ठान के दौरान उन्हें सर्पाकृति में हनुमानजी के दर्शन हुए थे, इसलिए उन्होंने कुछ भक्तजनों की आर्थिक मदद से यहाँ पर लेटे हुए हनुमान की प्रतिमा विराजमान की। पवित्र औषधी और मिश्रित धातु से बनी हुई इस प्रतिमा की उँचाई 21 फिट व चौड़ाई 11 फिट है।
शुरुआत में इस मंदिर के निर्माण में काफी दिक्कते आई, लेकिन धीरे-धीरे यह मंदिर पूरे गुजरात में प्रसिद्ध हो गया। आज यहाँ पर प्रतिदिन हजारों भक्तजन हनुमानजी के दर्शन के लिए आते हैं। रामनवमी और हनुमान जयंति पर तो यहाँ लोगों का यहाँ पर ताँता लगता है। इस दिन यहाँ पर एक विशाल भंडारा आयोजित होता है।
WDभक्तजनों को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही नंदी महाराज और एक बड़ी शिवलिंग के दर्शन होते हैं जिन्हें कमलेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। मंदिर के अंदर बने झरोखे से भक्तजन नीचे लेटे हुए हनुमान जी के दर्शन करते हैं। लेटे हुए बालाजी हनुमान के पास उनकी रक्षा करते हुए बंदरों और सप्तऋषि की छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी विराजमान है। मंदिर में हनुमानजी की एक छोटी-सी मूर्ति भी है, जो मंदिर की स्थापना के समय से विद्यमान है।
मंदिर की दीवारों पर कई देवी-देवताओं के चित्रों को किसी मंजे हुए चित्रकार ने जीवंत रूप दिया है। जिसमें गुरु सर्वेश्वरदासजी महाराज का भी एक चित्र है। मंदिर के भीतर राम और कृष्ण का छोटा-सा मंदिर है।
इस मंदिर के नाम पर एक ट्रस्ट का निर्माण भी किया गया है जो गौसेवा, अन्नसेवा और गरीब विद्यार्थियों को निशुल्क रहने की सुविधा भी प्रदान करता है। कहते हैं कि यहाँ पर कभी भी दान माँगा नहीं जाता बल्कि स्वयं दाता दान देने के लिए आगे आते हैं। मान्यता है कि यहाँ पर आने वाले प्रत्येक भक्त की माँग को बड़े बालाजी पूरी करते हैं।
कैसे पहुँचे : गुजरात के राजकोट रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन से ऑटो या फिर बस के द्वारा यहाँ पहुँचा जा सकता है।
चार वटों में से एक सिद्धवट
धर्मयात्रा की इस बार की कड़ी में हम आपको लेकर चलते हैं उज्जैन के सिद्धवट स्थान पर। उज्जैन के भैरवगढ़ के पूर्व में शिप्रा के तट पर प्रचीन सिद्धवट का स्थान है। इसे शक्तिभेद तीर्थ के नाम से जाना जाता है। हिंदू पुराणों में इस स्थान की महिमा का वर्णन किया गया है। हिंदू मान्यता अनुसार चार वट वृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, वंशीवट, बौधवट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता।
*नासिक के पंचववटी क्षेत्र में सीता माता की गुफा के पास पाँच प्राचीन वृक्ष है जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। वनवानस के दौरान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहाँ कुछ समय बिताया था। इन वृक्षों का भी धार्मिक महत्व है। उक्त सारे वट वक्षों की रोचक कहानियाँ हैं। मुगल काल में इन वृक्षों को खतम करने के कई प्रयास हुए।
सिद्धवट के पुजारी ने कहा कि स्कंद पुराण अनुसार पार्वती माता द्वारा लगाए गए इस वट की शिव के रूप में पूजा होती है। पार्वती के पुत्र कार्तिक स्वामी को यहीं पर सेनापति नियुक्त किया गया था। यहीं उन्होंने तारकासुर का वध किया था। संसार में केवल चार ही पवित्र वट वृक्ष हैं। प्रयाग (इलाहाबाद) में अक्षयवट, मथुरा-वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट जिसे बौधवट भी कहा जाता है और यहाँ उज्जैन में पवित्र सिद्धवट हैं।
WDयहाँ तीन तरह की सिद्धि होती है संतति, संपत्ति और सद्गति। तीनों की प्राप्ति के लिए यहाँ पूजन किया जाता है। सद्गति अर्थात पितरों के लिए अनुष्ठान किया जाता है। संपत्ति अर्थात लक्ष्मी कार्य के लिए वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधा जाता है और संतति अर्थात पुत्र की प्राप्ति के लिए उल्टा सातिया (स्वस्विक) बनाया जाता है। यह वृक्ष तीनों प्रकार की सिद्धि देता है इसीलिए इसे सिद्धवट कहा जाता है।
पंडित नागेश्वर कन्हैन्यालाल ने कहा कि यहाँ पर नागबलि, नारायण बलि-विधान का विशेष महत्व है। संपत्ति, संतित और सद्गति की सिद्धि के कार्य होते हैं। यहाँ पर कालसर्प शांति का विशेष महत्व है, इसीलिए कालसर्प दोष की भी पूजा होती है।
कालसर्प दोष का निदान कराने आईं पुना की श्वेता उपाध्याय ने कहा कि मेरी जन्मकुंडली में कालसर्प दोष था। हमें पता चला कि यहाँ कालसर्प दोष का निदान होता है तो मैं यहाँ पर दोष का निवारण कराने आई हूँ।
वर्तमान में इस सिद्धवट को कर्मकांड, मोक्षकर्म, पिंडदान, कालसर्प दोष पूजा एवं अंत्येष्टि के लिए प्रमुख स्थान माना जाता है। यह यात्रा आपकों कैसी लगी हमें जरूर बताएँ।
गंगा किनारे विराजे काशी विश्वनाथ
ॐ नमः शिवाय...शिव-शंभु...
'वाराणसीतु भुवनत्रया सारभूत
रम्या नृनाम सुगतिदाखिल सेव्यामना
अत्रगाता विविधा दुष्कृतकारिणोपि
पापाक्ष्ये वृजासहा सुमनाप्रकाशशः'
- नारद पुराण
गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित वाराणसी नगर विश्व के प्राचीनतम शहरों में से एक माना जाता है तथा यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में सुशोभित है। इस नगर के हृदय में बसा है भगवान काशी विश्वनाथ का मंदिर जो प्रभु शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। स्त्री हो या पुरुष, युवा हो या प्रौढ़, हर कोई यहाँ पर मोक्ष की प्राप्ति के लिए जीवन में एक बार अवश्य आता है। ऐसा मानते हैं कि यहाँ पर आने वाला हर श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ को अपनी ईष्ट इच्छा समर्पित करता है।
धार्मिक महत्व-
ऐसा माना जाता है कि जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था तब प्रकाश की पहली किरण काशी की धरती पर पड़ी थी। तभी से काशी ज्ञान तथा आध्यात्म का केंद्र माना जाता है।
यह भी माना जाता है कि निर्वासन में कई साल बिताने के पश्चात भगवान शिव इस स्थान पर आए थे और कुछ समय तक काशी में निवास किया था। ब्रह्माजी ने उनका स्वागत दस घोड़ों के रथ को दशाश्वमेघ घाट पर भेजकर किया था।
काशी विश्वनाथ मंदिर-
गंगा तट पर सँकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है। यहाँ पर एक कुआँ भी है, जिसे 'ज्ञानवापी' की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह विद्यमान है। गर्भगृह के भीतर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग विद्यमान है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। हालाँकि मंदिर का भीतरी परिसर इतना व्यापक नहीं है, परंतु वातावरण पूरी तरह से शिवमय है।
ऐतिहासिक महत्व-
ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर प्राक्-ऐतिहासिक काल में निर्मित हुआ था। सन् 1776 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने इस मंदिर के पुनर्निमाण के लिए काफी धनराशि दान की थी। यह भी माना जाता है कि लाहौर के महाराजा रंजीतसिंह ने इस मंदिर के शिखर के पुनर्निमाण के लिए एक हजार किलो सोने का दान किया था। 1983 में उत्तरप्रदेश सरकार ने इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया और पूर्व काशी नरेश विभूति सिंह को इसके ट्रस्टी के रूप में नियुक्त किया।
पूजा-अर्चना -
यह मंदिर प्रतिदिन 2.30 बजे भोर में मंगल आरती के लिए खोला जाता है जो सुबह 3 से 4 बजे तक होती है। दर्शनार्थी टिकट लेकर इस आरती में भाग ले सकते हैं। तत्पश्चात 4 बजे से सुबह 11 बजे तक सभी के लिए मंदिर के द्वार खुले होते हैं। 11.30 बजे से दोपहर 12 बजे तक भोग आरती का आयोजन होता है। 12 बजे से शाम के 7 बजे तक पुनः इस मंदिर में सार्वजनिक दर्शन की व्यवस्था है।
शाम 7 से 8.30 बजे तक सप्तऋषि आरती के पश्चात रात के 9 बजे तक सभी दर्शनार्थी मंदिर के भीतर दर्शन कर सकते हैं। 9 बजे के पश्चात मंदिर परिसर के बाहर ही दर्शन संभव होते हैं। अंत में 10.30 बजे रात्रि से शयन आरती प्रारंभ होती है, जो 11 बजे तक संपन्न होती है। चढ़ावे में चढ़ा प्रसाद, दूध, कपड़े व अन्य वस्तुएँ गरीबों व जरूरतमंदों में बाँट दी जाती हैं।
कैसे पहुँचें?
सड़क परिवहन द्वारा- गंगा के मैदान में स्थित होने के कारण वाराणसी के लिए सड़क परिवहन की उत्तम व्यवस्था है। उत्तरप्रदेश के विभिन्न हिस्सों से इस स्थान के लिए निजी व सरकारी बसों की उत्तम व्यवस्था है।
शनिवार, 13 मार्च 2010
पर्यटन » मध्यप्रदेश
कम दिनों में 'दिल' की सैर
नए साल को सेलिब्रेट करने के लिए दिसंबर अंत में सबसे ज्यादा पर्यटक गोवा जाते हैं। लेकिन बुकिंग की परेशानी है फिर जेब का भी सवाल है। अगर आप किफायती बजट और एक सप्ताह से भी कम समय में नए साल का जश्न शहर से कहीं दूर मनाना चाहते हैं तो आप हिन्दुस्तान के दिल के किसी भी कोने में जा सकते हैं। यानी पूरे मध्यप्रदेश में ही ऐसे बीस से भी ज्यादा पर्यटन स्थल हैं जहाँ से आप चंद दिनों में ही अपने शहर लौट सकते हैं और आपकी जेब भी ज्यादा हल्की नहीं होगी। ऐसे करीब 12 पर्यटन स्थलों की जानकारी हम दे रहे हैं-
अमरकंटकविंध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला के केंद्र में स्थित अमरकंटक एक तीर्थ स्थल है और नर्मदा नदी की उद्गम स्थली है। इस पर्यटन स्थल की खासियत यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता है। जबलपुर से अमरकंटक की दूरी 228 किलोमीटर है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पेंड्रा रोड है जो 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से अमरकंटक जबलपुर, बिलासपुर और रीवा से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
नर्मदा उद्गम - यहाँ नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर मंदिर बना है। जगह प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है।
सोनमुडा - सोन नदी का उद्गम स्थल
भृगु कमंडल - यहाँ एक प्राकृतिक पुरातन कमंडल बना हुआ है जो हमेशा पानी से लबरेज रहता है।
धुनी पानी - यहाँ घने जंगल में आप जल प्रपात का मजा ले सकते हैं।
दुग्ध धारा - यहाँ पचास फुट की ऊँचाई से गिरने वाला प्रपात है।
कपिल धारा - वॉटरफॉल होने के कारण यह पिकनिक स्पॉट के रूप में प्रसिद्ध है।
माँ की बगिया - यह एक खूबसूरत बाग है जहाँ एक मंदिर भी है।
बाँधवगढ़ नेशनल पार्क
बाघों का गढ़ बाँधवगढ़ 448 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। शहडोल जिले में स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान में एक मुख्य पहाड़ है जो बाँधवगढ़ कहलाता है। 811 मीटर ऊँचे इस पहाड़ के पास छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं। पार्क में साल और बंबू के वृक्ष प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं। बाँधवगढ़ से सबसे नजदीक विमानतल जबलपुर में है जो 164 किलोमीटर की दूरी पर है। रेल मार्ग से भी बाँधवगढ़ जबलपुर, कटनी और सतना से जुड़ा है। खजुराहो से बाँधवगढ़ के बीच 237 किलोमीटर की दूरी है। दोनों स्थानों के बीच केन नदी के कुछ हिस्सों को क्रोकोडाइल रिजर्व घोषित किया गया है।
देखने के लिए खास
किला - बाँधवगढ़ की पहाड़ी पर 2 हजार वर्ष पुराना किला बना है।
जंगल - बाँधवगढ़ का वन क्षेत्र फ्लोरा और फना की प्रजातियों से भरा हुआ है। जंगल में नीलगाय और चिंकारा सहित हर तरह के वन्यप्राणी और पेड़ हैं।
वन्यप्राणी - इस राष्ट्रीय उद्यान में पशुओं की 22 और पक्षियों की 250 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। हाथी पर सवार होकर या फिर वाहन में बैठकर इन वन्यप्राणियों को देखा जा सकता है।
भेड़ाघाट
नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की सौ फुट तक ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत हैं। यह पर्यटन स्थल भी जबलपुर से महज 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जबलपुर से भेड़ाघाट के लिए बस, टेम्पो और टैक्सी भी उपलब्ध रहती है।
देखने के लिए खास
संगरमर की चट्टानें - चाँद की रोशनी में भेड़ाघाट की सैर एक अलग तरह का अनुभव रहता है।
धुआँधार वॉटर फॉल - भेड़ाघाट के पास नर्मदा का पानी एक बड़े झरने के रूप में गिरता है। यह स्पॉट धुआँधार फॉल्स कहलाता है।
चौंसठ योगिनी मंदिर - भेड़ाघाट के पास ही यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। दसवीं शताब्दी में स्थापित हुए दुर्गा के इस मंदिर से नर्मदा दिखाई देती है।
भीमबेटका
भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस पर्यटन स्थल की खासियत चट्टानों पर हजारों वर्ष पूर्व बनी चित्रकारी है। इस पर्यटन स्थल पर करीब 500 गुफाओं में चित्रकारी की गई है। यहाँ प्राकृतिक लाल और सफेद रंगों से वन्यप्राणियों के शिकार के दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र उकेरे गए हैं। भोपाल नजदीक होने के कारण भीमबेटका में पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था नहीं है।
चित्रकूटचित्रकूट का पौराणिक महत्व इसलिए है, क्योंकि यहाँ भगवान राम ने अपने वनवास के 14 में से 11 वर्ष गुजारे थे। चित्रकूट से सबसे नजदीकी विमानतल खजुराहो में स्थित है। यह रेल और सड़क मार्ग से झाँसी से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
रामघाट - मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित इस घाट पर धार्मिक गतिविधियाँ ज्यादा होती हैं।
कामदगिरी - यहाँ भरत मिलाप मंदिर है, जिसका रामायण में उल्लेख होने के कारण पौराणिक महत्व है।
सती अनुसुया - हिन्दु धर्माववलंबियों के लिए इस स्थल का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह माना जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का यहाँ अत्री मुनी और उनकी पत्नि अनुसुया के तीन पुत्रों के रूप में पुनर्जन्म हुआ था।
स्फटिक शिला - यहाँ चट्टानों पर श्रीराम के चरणों के निशान देखे जा सकते हैं।
गुप्त गोदावरी - चित्रकूट से 18 किलोमीटर दूर स्थित इस स्थल में एक छोटी गुफा के बीच नदी के बहाव को देखा जा सकता है।
खजुराहो
मंदिरों की खूबसूरत स्थापत्य कला का एक नमूना खजुराहो के मंदिरों में देखा जा सकता है। यहाँ चंदेला राजपूतों के साम्राज्य में एक हजार वर्ष पूर्व 85 मंदिर बनाए गए थे। इनमें से वर्तमान में 22 मंदिर ही अच्छी स्थिति में हैं। हवाई मार्ग से खजुराहो दिल्ली और आगरा से जुड़ा है। रेल और सड़क मार्ग से यह महोबा, हरबालपुर, सतना और भोपाल से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
चौंसठ योगिनी, देवी जगदंबे, चित्रगुप्त, विश्वनाथ, नंदी, लक्ष्मण, वराह, मतंगेश्वर, पार्श्वनाथ, आदिनाथ, ब्रह्म, चतुर्भुज आदि मंदिर खजुराहो के आसपास स्थित हैं। सभी मंदिर शताब्दियों पुराने हैं।
कान्हा किसली
कान्हा टाइगर रिजर्व 940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला राष्ट्रीय उद्यान है। इसे देखने के लिए पर्यटक जीप किराए पर ले सकते हैं। टाइगर ट्रेकिंग के लिए हाथी पर सवार होकर भी उद्यान की सैर की जा सकती है। राष्ट्रीय उद्यान के भीतर दो स्थानों खतिया और मुक्की से जाया जा सकता है। कान्हा जबलपुर, बिलासपुर और बालाघाट से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है। नजदीकी विमानतल और रेलवे स्टेशन जबलपुर है।
देखने के लिए खास
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में वन्यप्राणियों की 22 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। पक्षियों की यहाँ 200 प्रजातियाँ हैं।
बामनी दादर - यह एक सनसेट प्वाइंट है। यहाँ से सांभर और हिरण जैसे वन्यप्राणियों को भी देखा जा सकता है। यहाँ लोमड़ी और चिंकारा जैसे वन्यप्राणी काफी कम देखे जाते हैं।
महेश्वरनगर महिष्मती के रूप में महेश्वर का रामायण और महाभारत में भी उल्लेख है। देवी अहिल्याबाई होलकर के कालखंड में बनाए गए यहाँ के घाट सुंदर हैं और इनका प्रतिबिंब नदी में और खूबसूरत दिखाई देता है। महेश्वर इंदौर से ही सबसे नजदीक है। इंदौर विमानतल महेश्वर से 91 किलोमीटर की दूरी पर है।
देखने के लिए खास
राजगद्दी और रजवाड़ा - महेश्वर किले के अंदर रानी अहिल्याबाई की राजगद्दी पर बैठी पर एक प्रतिमा रखी गई है।
मंदिर - महेश्वर में घाट के आसपास कालेश्वर, राजराजेश्वर, विठ्ठलेश्वर और अहिलेश्वर मंदिर हैं।
ओंकारेश्वरओंकारेश्वर भी नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक कस्बा है। ज्योतिर्लिंग होने के कारण इस स्थल का धार्मिक महत्व है। इंदौर या महेश्वर से ओंकारेश्वर सड़क मार्ग से जुड़ा है। इंदौर से ओंकारेश्वर के बीच की दूरी 77 किलोमीटर है।
देखने के लिए खास
ओंकारेश्वर के ज्योतिर्लिंग मंदिर के अलावा सिद्धनाथ मंदिर और 24 अवतार मंदिर भी देखने लायक हैं।
पचमढ़ी-
प्राकृतिक सुंदरता के कारण हिलस्टेशन पचम़ढ़ी एक मशहूर पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है। पचमड़ी भोपाल और पिपरिया से सड़क मार्ग से जुड़ा है। नजदीकी रेलवे स्टेशन पिपरिया है।
देखने के लिए खास
प्रियदर्शिनी - यह वह स्थल है जहाँ से वर्ष 1857 में पचमढ़ी की खोज की गई थी।
जमुना प्रपात - यह वह वॉटर फॉल जो पचमड़ी की जलापूर्ति करता है।
अप्सरा विहार - यह एक सुरक्षित पिकनिक स्पॉट है जहाँ जलप्रपात भी है।
रजत प्रपात, आयरेन पूल, जलावतरण, सुंदर कुंड, जटाशंकर मंदिर, धूपगढ़, पांडव गुफाएँ भी पर्यटन स्थल हैं।
पेंचटाइगर रिजर्व और मोगली सेंचुरी के कारण पेंच राष्ट्रीय उद्यान जाना जाता है। यह 757 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यहाँ 1200 तरह के पेड़-पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। 285 किस्म के पक्षी यहाँ चहचहाते हैं, इसलिए यह उद्यान बर्ड वॉचिंग के लिए एक उपयुक्त स्थान है। पेंच जबलपुर से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है।
मांडू
परमार शासकों द्वारा बनाए गए इस नगर में जहाज और हिंडोला महल खास हैं। यहाँ के महलों की स्थापत्य कला देखने लायक है। मांडू इंदौर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यह धार से भी जुड़ा हुआ है।
देखने के लिए खास
दरवाजे - मांडू में दाखिल होने के लिए 12 दरवाजे हैं। मुख्य रास्ता दिल्ली दरवाजा कहलाता है। दूसरे दरवाजे रामगोपाल दरवाजा, जहांगीर दरवाजा और तारापुर दरवाजा कहलाते हैं।
जहाज महल - जहाजनुमा आकार में इस महल को दो मानवनिर्मित तालाबों के बीच बनाया गया था।
हिंडोला महल - टेड़ी दीवारों के कारण इस महल को हिंडोला महल कहा जाता है।
होशंग शाह की मस्जिद, जामी मस्जिद, नहर झरोखा, बाज बहादुर महल, रानी रूपमति महल और नीलकंठ महल भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
नए साल को सेलिब्रेट करने के लिए दिसंबर अंत में सबसे ज्यादा पर्यटक गोवा जाते हैं। लेकिन बुकिंग की परेशानी है फिर जेब का भी सवाल है। अगर आप किफायती बजट और एक सप्ताह से भी कम समय में नए साल का जश्न शहर से कहीं दूर मनाना चाहते हैं तो आप हिन्दुस्तान के दिल के किसी भी कोने में जा सकते हैं। यानी पूरे मध्यप्रदेश में ही ऐसे बीस से भी ज्यादा पर्यटन स्थल हैं जहाँ से आप चंद दिनों में ही अपने शहर लौट सकते हैं और आपकी जेब भी ज्यादा हल्की नहीं होगी। ऐसे करीब 12 पर्यटन स्थलों की जानकारी हम दे रहे हैं-
अमरकंटकविंध्य और सतपुड़ा पर्वतमाला के केंद्र में स्थित अमरकंटक एक तीर्थ स्थल है और नर्मदा नदी की उद्गम स्थली है। इस पर्यटन स्थल की खासियत यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता है। जबलपुर से अमरकंटक की दूरी 228 किलोमीटर है। सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पेंड्रा रोड है जो 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से अमरकंटक जबलपुर, बिलासपुर और रीवा से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
नर्मदा उद्गम - यहाँ नर्मदा नदी के उद्गम स्थल पर मंदिर बना है। जगह प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है।
सोनमुडा - सोन नदी का उद्गम स्थल
भृगु कमंडल - यहाँ एक प्राकृतिक पुरातन कमंडल बना हुआ है जो हमेशा पानी से लबरेज रहता है।
धुनी पानी - यहाँ घने जंगल में आप जल प्रपात का मजा ले सकते हैं।
दुग्ध धारा - यहाँ पचास फुट की ऊँचाई से गिरने वाला प्रपात है।
कपिल धारा - वॉटरफॉल होने के कारण यह पिकनिक स्पॉट के रूप में प्रसिद्ध है।
माँ की बगिया - यह एक खूबसूरत बाग है जहाँ एक मंदिर भी है।
बाँधवगढ़ नेशनल पार्क
बाघों का गढ़ बाँधवगढ़ 448 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। शहडोल जिले में स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान में एक मुख्य पहाड़ है जो बाँधवगढ़ कहलाता है। 811 मीटर ऊँचे इस पहाड़ के पास छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हैं। पार्क में साल और बंबू के वृक्ष प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाते हैं। बाँधवगढ़ से सबसे नजदीक विमानतल जबलपुर में है जो 164 किलोमीटर की दूरी पर है। रेल मार्ग से भी बाँधवगढ़ जबलपुर, कटनी और सतना से जुड़ा है। खजुराहो से बाँधवगढ़ के बीच 237 किलोमीटर की दूरी है। दोनों स्थानों के बीच केन नदी के कुछ हिस्सों को क्रोकोडाइल रिजर्व घोषित किया गया है।
देखने के लिए खास
किला - बाँधवगढ़ की पहाड़ी पर 2 हजार वर्ष पुराना किला बना है।
जंगल - बाँधवगढ़ का वन क्षेत्र फ्लोरा और फना की प्रजातियों से भरा हुआ है। जंगल में नीलगाय और चिंकारा सहित हर तरह के वन्यप्राणी और पेड़ हैं।
वन्यप्राणी - इस राष्ट्रीय उद्यान में पशुओं की 22 और पक्षियों की 250 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। हाथी पर सवार होकर या फिर वाहन में बैठकर इन वन्यप्राणियों को देखा जा सकता है।
भेड़ाघाट
नर्मदा नदी के दोनों तटों पर संगमरमर की सौ फुट तक ऊँची चट्टानें भेड़ाघाट की खासियत हैं। यह पर्यटन स्थल भी जबलपुर से महज 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जबलपुर से भेड़ाघाट के लिए बस, टेम्पो और टैक्सी भी उपलब्ध रहती है।
देखने के लिए खास
संगरमर की चट्टानें - चाँद की रोशनी में भेड़ाघाट की सैर एक अलग तरह का अनुभव रहता है।
धुआँधार वॉटर फॉल - भेड़ाघाट के पास नर्मदा का पानी एक बड़े झरने के रूप में गिरता है। यह स्पॉट धुआँधार फॉल्स कहलाता है।
चौंसठ योगिनी मंदिर - भेड़ाघाट के पास ही यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। दसवीं शताब्दी में स्थापित हुए दुर्गा के इस मंदिर से नर्मदा दिखाई देती है।
भीमबेटका
भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस पर्यटन स्थल की खासियत चट्टानों पर हजारों वर्ष पूर्व बनी चित्रकारी है। इस पर्यटन स्थल पर करीब 500 गुफाओं में चित्रकारी की गई है। यहाँ प्राकृतिक लाल और सफेद रंगों से वन्यप्राणियों के शिकार के दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र उकेरे गए हैं। भोपाल नजदीक होने के कारण भीमबेटका में पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था नहीं है।
चित्रकूटचित्रकूट का पौराणिक महत्व इसलिए है, क्योंकि यहाँ भगवान राम ने अपने वनवास के 14 में से 11 वर्ष गुजारे थे। चित्रकूट से सबसे नजदीकी विमानतल खजुराहो में स्थित है। यह रेल और सड़क मार्ग से झाँसी से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
रामघाट - मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित इस घाट पर धार्मिक गतिविधियाँ ज्यादा होती हैं।
कामदगिरी - यहाँ भरत मिलाप मंदिर है, जिसका रामायण में उल्लेख होने के कारण पौराणिक महत्व है।
सती अनुसुया - हिन्दु धर्माववलंबियों के लिए इस स्थल का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह माना जाता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का यहाँ अत्री मुनी और उनकी पत्नि अनुसुया के तीन पुत्रों के रूप में पुनर्जन्म हुआ था।
स्फटिक शिला - यहाँ चट्टानों पर श्रीराम के चरणों के निशान देखे जा सकते हैं।
गुप्त गोदावरी - चित्रकूट से 18 किलोमीटर दूर स्थित इस स्थल में एक छोटी गुफा के बीच नदी के बहाव को देखा जा सकता है।
खजुराहो
मंदिरों की खूबसूरत स्थापत्य कला का एक नमूना खजुराहो के मंदिरों में देखा जा सकता है। यहाँ चंदेला राजपूतों के साम्राज्य में एक हजार वर्ष पूर्व 85 मंदिर बनाए गए थे। इनमें से वर्तमान में 22 मंदिर ही अच्छी स्थिति में हैं। हवाई मार्ग से खजुराहो दिल्ली और आगरा से जुड़ा है। रेल और सड़क मार्ग से यह महोबा, हरबालपुर, सतना और भोपाल से जुड़ा है।
देखने के लिए खास
चौंसठ योगिनी, देवी जगदंबे, चित्रगुप्त, विश्वनाथ, नंदी, लक्ष्मण, वराह, मतंगेश्वर, पार्श्वनाथ, आदिनाथ, ब्रह्म, चतुर्भुज आदि मंदिर खजुराहो के आसपास स्थित हैं। सभी मंदिर शताब्दियों पुराने हैं।
कान्हा किसली
कान्हा टाइगर रिजर्व 940 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला राष्ट्रीय उद्यान है। इसे देखने के लिए पर्यटक जीप किराए पर ले सकते हैं। टाइगर ट्रेकिंग के लिए हाथी पर सवार होकर भी उद्यान की सैर की जा सकती है। राष्ट्रीय उद्यान के भीतर दो स्थानों खतिया और मुक्की से जाया जा सकता है। कान्हा जबलपुर, बिलासपुर और बालाघाट से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है। नजदीकी विमानतल और रेलवे स्टेशन जबलपुर है।
देखने के लिए खास
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में वन्यप्राणियों की 22 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। पक्षियों की यहाँ 200 प्रजातियाँ हैं।
बामनी दादर - यह एक सनसेट प्वाइंट है। यहाँ से सांभर और हिरण जैसे वन्यप्राणियों को भी देखा जा सकता है। यहाँ लोमड़ी और चिंकारा जैसे वन्यप्राणी काफी कम देखे जाते हैं।
महेश्वरनगर महिष्मती के रूप में महेश्वर का रामायण और महाभारत में भी उल्लेख है। देवी अहिल्याबाई होलकर के कालखंड में बनाए गए यहाँ के घाट सुंदर हैं और इनका प्रतिबिंब नदी में और खूबसूरत दिखाई देता है। महेश्वर इंदौर से ही सबसे नजदीक है। इंदौर विमानतल महेश्वर से 91 किलोमीटर की दूरी पर है।
देखने के लिए खास
राजगद्दी और रजवाड़ा - महेश्वर किले के अंदर रानी अहिल्याबाई की राजगद्दी पर बैठी पर एक प्रतिमा रखी गई है।
मंदिर - महेश्वर में घाट के आसपास कालेश्वर, राजराजेश्वर, विठ्ठलेश्वर और अहिलेश्वर मंदिर हैं।
ओंकारेश्वरओंकारेश्वर भी नर्मदा नदी के तट पर स्थित एक कस्बा है। ज्योतिर्लिंग होने के कारण इस स्थल का धार्मिक महत्व है। इंदौर या महेश्वर से ओंकारेश्वर सड़क मार्ग से जुड़ा है। इंदौर से ओंकारेश्वर के बीच की दूरी 77 किलोमीटर है।
देखने के लिए खास
ओंकारेश्वर के ज्योतिर्लिंग मंदिर के अलावा सिद्धनाथ मंदिर और 24 अवतार मंदिर भी देखने लायक हैं।
पचमढ़ी-
प्राकृतिक सुंदरता के कारण हिलस्टेशन पचम़ढ़ी एक मशहूर पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है। पचमड़ी भोपाल और पिपरिया से सड़क मार्ग से जुड़ा है। नजदीकी रेलवे स्टेशन पिपरिया है।
देखने के लिए खास
प्रियदर्शिनी - यह वह स्थल है जहाँ से वर्ष 1857 में पचमढ़ी की खोज की गई थी।
जमुना प्रपात - यह वह वॉटर फॉल जो पचमड़ी की जलापूर्ति करता है।
अप्सरा विहार - यह एक सुरक्षित पिकनिक स्पॉट है जहाँ जलप्रपात भी है।
रजत प्रपात, आयरेन पूल, जलावतरण, सुंदर कुंड, जटाशंकर मंदिर, धूपगढ़, पांडव गुफाएँ भी पर्यटन स्थल हैं।
पेंचटाइगर रिजर्व और मोगली सेंचुरी के कारण पेंच राष्ट्रीय उद्यान जाना जाता है। यह 757 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यहाँ 1200 तरह के पेड़-पौधों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। 285 किस्म के पक्षी यहाँ चहचहाते हैं, इसलिए यह उद्यान बर्ड वॉचिंग के लिए एक उपयुक्त स्थान है। पेंच जबलपुर से सड़क मार्ग के जरिए जुड़ा है।
मांडू
परमार शासकों द्वारा बनाए गए इस नगर में जहाज और हिंडोला महल खास हैं। यहाँ के महलों की स्थापत्य कला देखने लायक है। मांडू इंदौर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यह धार से भी जुड़ा हुआ है।
देखने के लिए खास
दरवाजे - मांडू में दाखिल होने के लिए 12 दरवाजे हैं। मुख्य रास्ता दिल्ली दरवाजा कहलाता है। दूसरे दरवाजे रामगोपाल दरवाजा, जहांगीर दरवाजा और तारापुर दरवाजा कहलाते हैं।
जहाज महल - जहाजनुमा आकार में इस महल को दो मानवनिर्मित तालाबों के बीच बनाया गया था।
हिंडोला महल - टेड़ी दीवारों के कारण इस महल को हिंडोला महल कहा जाता है।
होशंग शाह की मस्जिद, जामी मस्जिद, नहर झरोखा, बाज बहादुर महल, रानी रूपमति महल और नीलकंठ महल भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
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