सोमवार, 27 दिसंबर 2010

संजय नहीं, शकुनी बन गए हैं पत्रकार

राजनीति के अपराधीकरण पर किए गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है। मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया। बाद में उन आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यों न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाए। नतीजा, वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गई। अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फॉर्म्युला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है।
हाल तक पत्रकारिता के लिए भी पेड न्यूज़ चिंता का सबब बना हुआ था। लेकिन राडिया प्रकरण के बाद यह तथ्य सामने आया कि कलम को लाठी की तरह भांजने वाले लोगों ने भी यह सोचा कि अगर केवल कलम या कैमरे से ही किसी की छवि बनाई या बिगाड़ी जा सकती हो तो क्यों न ऐसा काम केवल खुद की बेहतरी के लिए किया जाए? कल तक जो कलमकार नेताओं के लिए काम करते थे, अब वे नेता बनाने या पोर्टफोलियो तक डिसाइड करवाने की हैसियत में आ गए। अगर इस पर लगाम न लगाई गई तो कल शायद ये भी खुद ही लोकतंत्र को चलाने या कब्जा करने की स्थिति में आ जाएं।
2 G स्पेक्ट्रम घोटाले के खुलासे ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि पत्रकारिता की सरांध को भी रोकने के लिए समय रहते ही कोशिश करनी होगी। यह सरांध केवल दिल्ली तक ही सिमटा नहीं है बल्कि कालीन के नीचे छुपी यह धुल, टर के ढक्कन के नीचे की बदबू राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों तक बदस्तूर फ़ैली हुई है।
संविधान द्वारा आम जनों को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे ज्यादा उपयोग पत्रकारों को करने देकर समाज ने शायद एक शक्ति संतुलन स्थापित करना चाहा था। अपने हिस्से की आज़ादी की रोटी उसे समर्पित करके समाज ने यह सोचा होगा कि यह ‘ वॉच डॉग ’ का काम करते रहेगा। नई-नई मिली आज़ादी की लड़ाई में योगदान की बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था। लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को नहीं रही होगी कि यह ‘ डॉग ’ भौंकने के बदले अपने मालिक यानी जनता को ही काटना शुरू कर देगा। हाल में उजागर मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है समाज में मीडिया की बढ़ती बेजा दखलंदाजी।
निश्चित ही कुछ हद तक मीडिया की ज़रूरत देश को है। लेकिन लोगों में पैदा की जा रही ख़बरों की बेतहाशा भूख ने अनावश्यक ही ज़रूरत से ज्यादा इस कथित स्तंभ को मज़बूत बना दिया है। यह पालिका आज ‘ बाज़ार ’ की तरह यही फंडा अपनाने लगा है कि पहले उत्पाद बनाओ फ़िर उसकी ज़रूरत पैदा करो। सुधीश पचौरी ने अपनी एक पुस्तक में ‘ ख़बरों के भूख ’ की तुलना उस कहानी ( जिसमें ज़मीन की लालच में बेतहाशा दौड़ते हुए व्यक्ति की जान चली जाती है) के पात्र से कर यह सवाल उठाया है कि आखिर लोगों को कितनी खबर चाहिए? तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ख़बरों की बदहजमी रोकने हेतु उपाय किया जाना समीचीन होगा।
शास्त्रों में खबर देने वाले को मोटे तौर पर ‘ नारद ’ का नकारात्मक रूप देकर उसे सदा झगड़े और फसाद की जड़ बताया गया है। इसी तरह महाभारत के कथानक में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सबसे पहले आंखों देखा हाल सुनाने की बात आती है। लेकिन महाभारत में यह उल्लेखनीय है कि आंखों देखा हाल सुनाने की वह व्यवस्था भी केवल अंधे राजा के लिए की गई थी। इस निमित्त संजय को दिव्यदृष्टि से सज्जित किया गया था। आज के मीडियाकर्मियों के पास भले ही सम्यक दृष्टि का अभाव हो, कुछ भी विकल्प न मिलने पर या अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में ही अधिकांश लोग पत्रकार बन गए हों लेकिन आम जनता को आज का मीडिया धृतराष्ट्र की तरह ही अंधा समझने लगा है। ऐसी मानसिकता के साथ कलम या कैमरे रूपी उस्तरे लेकर समाज को घायल करने की हरकत पर विराम लगाने हेतु प्रयास किया जाना आज की बड़ी ज़रूरत है।
लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘ लोक ’ में समाहित है, अतः यह उचित ही है कि ख़बरों को प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार रहे। लेकिन ‘ घटना ’ और ‘ व्यक्ति ’ के बीच ‘ माध्यम ’ बने पत्रकार अगर बिचौलिये-दलाल का काम करने लगे तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किए जाने की ज़रूरत है। जनता को धृतराष्ट्र की तरह समझने वाले तत्वों के आंख खोल देने हेतु व्यवस्था को कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है। कोई पत्रकार अपने ‘ संजय ’ की भूमिका से अलग होकर अगर ‘ शकुनी ’ बन जाने का प्रयास करे, षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो समाज को चाहिए कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित करें।
अव्वल तो यह किया जाना चाहिए कि हर खबर के लिए एक जिम्मेदारी तय हो। अगर खबर गलत हो और उससे किसी निर्दोष का कोई नुकसान हो जाए तो उसकी भरपाई की व्यवस्था होना चाहिए। इसके लिए करना यह होगा कि ‘ पत्रकार ’ कहाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति का निबंधन कराया जाय। कुछ परिभाषा तय किया जाए, उचित मानक पर खड़े उतडने वाले व्यक्ति को ही ‘ पत्रकार ’ के रूप में मान्यता दी जाए। कुछ गलत बात सामने आने पर उसकी मान्यता समाप्त किए जाने का प्रावधान हो। जिस तरह वकालत या ऐसे अन्य व्यवसाय में एक बार प्रतिबंधित होना के बाद कोई पेशेवर कहीं भी प्रैक्टिस करने की स्थिति में नहीं होता, उसी तरह की व्यवस्था मीडिया के लिए भी किए जाने की ज़रूरत है।
अभी होता यह है कि कोई कदाचरण साबित होना पर अगर किसी पत्रकार की नौकरी चली भी जाती है तो दूसरा प्रेस उसके लिए जगह देने को तत्पर रहता है। राडिया प्रकरण में भी नौकरी से इस्तीफा देने वाले पत्रकार को भी अन्य प्रेस द्वारा अगले ही दिन नयी नौकरी से पुरस्कृत कर दिया गया। जब तक इस तरह के अंकुश की व्यवस्था नहीं हो तब तक निरंकुश हो पत्रकारगण इसी तरह की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे।
जहां हर पेशे में आने से पहले उचित छानबीन करके उसे अधिसूचित करने की व्यवस्था है वहाँ पत्रकार किसको कहा जाए यह मानदंड आज तक लागू नहीं किया गया है। आप देखेंगे कि चाहे वकालत की बात हो, सीए, सीएस या इसी तरह के प्रफेशनल की। हर मामले में कठिन मानदंड को पूरा करने के बाद ही आप अपना पेशा शुरू कर सकते हैं। डॉक्टर-इंजिनियर की तो बात ही छोड़ दें, एक सामान्य दवा की दूकान पर भी एक निबंधित फार्मासिस्ट रखने की बाध्यता है। कंपनियों के लिए यह बाध्यता है कि एक सीमा से ऊपर का टर्नओवर होने पर वो नियत सीमा में पेशेवरों को रखे और उसकी जिम्मेदारी तय करे। लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लेते जा रहे मीडिया संगठनों को ऐसे हर बंधनों से मुक्त रखना अब लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगा है। आज़ादी के बाद, खास कर संविधान बनाते समय पत्रकारों के प्रति एक भरोसे और आदर का भाव था सो संविधान के निर्माताओं ने इस पेशे में में आने वाले इतनी गिरावट की कल्पना भी नहीं की थी। ज़ाहिर है इस तंत्र पर लगाम लगाने हेतु उन्होंने कोई खास व्यवस्था नहीं की। लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि पत्रकारों के परिचय, उसके नियमन के लिए राज्य द्वारा एक निकाय का गठन किया जाए, अन्यथा इसी तरह हर दलाल खुद को पत्रकार कह लोकतंत्र के कलेजे पर ‘ राडिया ’ दलता रहेगा।
पंकज झा

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