राखी-इश्क ने सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीती
आखिरकार राखी सावंत और इश्क बैक्टर सेंसर के खिलाफ लड़ाई जीतने में सफल रहे। यह झगड़ा उस समय खत्म हुआ जब सेंसर की रिवाइजिंग कमेटी ने उनके म्यूजिक वीडियो ‘भूत’ में आए ‘कमीने’ शब्द पर से बैन हटा लिया। यह ‘झगड़े’ नामक एलबम का गाना है।
गौरतलब है कि बोर्ड ने ‘कमीने’ शब्द को इस म्यूजिक वीडियो में से हटाने के लिए कहा था और इसके खिलाफ इश्क और राखी ने लड़ाई लड़ी।
बैन हटने के बावजूद इश्क का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ। उबलते हुए वे कहते हैं ‘सेंसर बोर्ड में सनकी और पुरानी सोच वाले लोग बैठे हुए हैं। वे ‘कमीने’ नामक पूरी फिल्म पास कर सकते हैं। ऐसे लाखों संवाद पास कर देते हैं जिनमें ‘कमीने’ शब्द आया है, लेकिन मेरे गीत में आए 'कमीने' शब्द पर उन्होंने पाबंदी लगा दी थी।
शाहिद से लंबी सोनम
कई नामों पर विचार करने के बाद पंकज कपूर ने अपनी फिल्म ‘मौसम’ के लिए सोनम कपूर को चुना। वे उनके बेटे शाहिद की हीरोइन बनेंगी। लेकिन पिछले दिनों एक ऐसी बात सामने आई, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था।
‘मौसम’ की यूनिट इस बात पर हैरान रह गई कि सोनम कपूर की ऊँचाई शाहिद कपूर से ज्यादा है। लेकिन इससे फिल्म पर कोई असर नहीं पड़ेगा। शूटिंग इस तरह से की जाएगी कि फिल्म में यह बात दर्शक पकड़ नहीं पाएँगे। लेकिन यूनिट के लोगों को शाहिद को चिढ़ाने का एक कारण मिल गया है।
‘मौसम’ एक रोमांटिक फिल्म है और इसमें सोनम कश्मीरी लड़की का रोल निभाएँगी। इस फिल्म की शूटिंग जल्दी ही आरंभ होने वाली है।
जब चौंक पड़ी नीतू
’अपार्टमेंट’ के एक सीन में नीतू को बेडरुम की लाइट चालू कर चौंकना था। निर्देशक जगमोहन मूँदड़ा ने नीतू को सच में चौंकाने का फैसला किया। नीतू ने स्विच दबाया और सचमुच में चौंक पड़ीं क्योंकि सामने उनकी माँ खड़ी थीं। नीतू की माँ मुंबई में नहीं रहती हैं और उन्हें पता भी नहीं था कि कब वे हाँ आ गईं। यह मूँदड़ा का प्लान था और उन्हें नीतू का स्वाभाविक शॉट मिल गया।
ट्रैफिक सिग्नल, 13 बी और रण जैसी फिल्म कर चुकीं नीतू फिल्म ‘अपार्टमेंट’ को लेकर काफी आशान्वित हैं। इस फिल्म में वे ऐसी लड़की की भूमिका निभा रही हैं जो मानसिक रूप से परेशान है। वह मुंबई जैसे बड़े शहर से तालमेल बैठाने की कोशिश करती है।
नीतू का कहना है कि उन्होंने इस रोल के लिए काफी मेहनत की है और आवश्यक तैयारी कैमरे के सामने आने के पहले की। उन्हें यह कैरेक्टर अपने जैसे लगता है क्योंकि वे भी पटना से मुंबई आईं और इस शहर को उन्होंने नजदीक से जाना।
मे दैनिक राष्ट्रीय हिंदी मेल का सम्पादक हूँ.खुल्लम खुल्ला मेरी अभिव्यक्ति है .अपना विचार खुलेआम दुनिया के सामने व्यक्त करने का यह सशक्त माध्यम है.अरुण बंछोर-मोबाइल -9074275249 ,7974299792 सबको प्यार देने की आदत है हमें, अपनी अलग पहचान बनाने की आदत है हमे, कितना भी गहरा जख्म दे कोई, उतना ही ज्यादा मुस्कराने की आदत है हमें...
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
अप्रैल माह के त्योहार
1 अप्रैल मूर्ख दि. प्रथम वैशाख कृष्ण तृतीया (3)
2 अप्रैल संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा. 9.53) गुड फ्रायडे प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्थी (4)
3 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण पंचमी (5)
4 अप्रैल ईस्टर संडे प्रथम वैशाख कृष्ण षष्ठी (6)
5 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण सप्तमी (7)
6 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण अष्टमी (8)
7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दि. प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
8 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
9 अप्रैल पंचक प्रारंभ (शाम 07.09) प्रथम वैशाख कृष्ण दशमी (10)
10 अप्रैल वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य ज. प्रथम वैशाख कृष्ण एकादशी (11)
11 अप्रैल प्रदोष व्रत संत सेन ज. प्रथम वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)
12 अप्रैल शिव चतुर्दशी प्रथम वैशाख कृष्ण त्रयोदशी (13)
13 अप्रैल जलियाँवाला बाग दि. प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्दशी (14)
14 अप्रैल वैशाखी पर्व, अमावस्या, पंचक, खरमास समाप्त (दिन 4.53) आम्बेडकर ज., अग्नि शामक दि. प्रथम वैशाख कृष्ण अमावस्या (15)
15 अप्रैल चंद्रदर्शन, सौर मास वैशाख प्रा. पुरुषोत्तम मास प्रा. प्रथम वैशाख शुक्ल एकम (1)
16 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल द्वितीया (2)
17 अप्रैल डॉ. राधाकृष्णन दि. प्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया (3)
18 अप्रैल विनायकी चतुर्थी (चं.अ.रा.11.22) तात्या टोपे दि. प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्थी (4)
19 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल पंचमी (5)
20 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल षष्ठी (6)
21 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल सप्तमी (7)
22 अप्रैल पुष्य नक्षत्र प्रथम वैशाख शुक्ल अष्टमी (8)
23 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल नवमी-दशमी (9-10)
24 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल एकादशी (11)
25 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल द्वादशी (12)
26 अप्रैल प्रदोष व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल त्रयोदशी (13)
27 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (14)
28 अप्रैल पूर्णिमा व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल पूर्णिमा (15)
29 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण एकम (1)
30 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)
2 अप्रैल संकष्टी गणेश चतुर्थी (चंद्रो.रा. 9.53) गुड फ्रायडे प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्थी (4)
3 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण पंचमी (5)
4 अप्रैल ईस्टर संडे प्रथम वैशाख कृष्ण षष्ठी (6)
5 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण सप्तमी (7)
6 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण अष्टमी (8)
7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दि. प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
8 अप्रैल प्रथम वैशाख कृष्ण नवमी (9)
9 अप्रैल पंचक प्रारंभ (शाम 07.09) प्रथम वैशाख कृष्ण दशमी (10)
10 अप्रैल वरुथिनी एकादशी वल्लभाचार्य ज. प्रथम वैशाख कृष्ण एकादशी (11)
11 अप्रैल प्रदोष व्रत संत सेन ज. प्रथम वैशाख कृष्ण द्वादशी (12)
12 अप्रैल शिव चतुर्दशी प्रथम वैशाख कृष्ण त्रयोदशी (13)
13 अप्रैल जलियाँवाला बाग दि. प्रथम वैशाख कृष्ण चतुर्दशी (14)
14 अप्रैल वैशाखी पर्व, अमावस्या, पंचक, खरमास समाप्त (दिन 4.53) आम्बेडकर ज., अग्नि शामक दि. प्रथम वैशाख कृष्ण अमावस्या (15)
15 अप्रैल चंद्रदर्शन, सौर मास वैशाख प्रा. पुरुषोत्तम मास प्रा. प्रथम वैशाख शुक्ल एकम (1)
16 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल द्वितीया (2)
17 अप्रैल डॉ. राधाकृष्णन दि. प्रथम वैशाख शुक्ल तृतीया (3)
18 अप्रैल विनायकी चतुर्थी (चं.अ.रा.11.22) तात्या टोपे दि. प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्थी (4)
19 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल पंचमी (5)
20 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल षष्ठी (6)
21 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल सप्तमी (7)
22 अप्रैल पुष्य नक्षत्र प्रथम वैशाख शुक्ल अष्टमी (8)
23 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल नवमी-दशमी (9-10)
24 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल एकादशी (11)
25 अप्रैल पुरुषोत्तमी एकादशी प्रथम वैशाख शुक्ल द्वादशी (12)
26 अप्रैल प्रदोष व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल त्रयोदशी (13)
27 अप्रैल प्रथम वैशाख शुक्ल चतुर्दशी (14)
28 अप्रैल पूर्णिमा व्रत प्रथम वैशाख शुक्ल पूर्णिमा (15)
29 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण एकम (1)
30 अप्रैल द्वितीय वैशाख कृष्ण द्वितीया (2)
लता मंगेशकर
भारत को दुनिया ने देर से पहचाना-लता
‘भारत रत्न’ स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर मानती हैं कि अच्छे काम की तुलना पुरस्कारों से नहीं की जा सकती, लेकिन उनका कहना है कि एआर रहमान ने ऑस्कर के बाद ग्रैमी पुरस्कार हासिल कर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को मिल रही सफलता के बारे में लता ने मुंबई से कहा रहमान ने निश्चित तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बहुत खुशी होती है, जब कोई भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाता है। वे मानती हैं कि देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को सफलता काफी देर से मिली।
रहमान को 52वें ग्रेमी अवॉर्ड में ‘स्लमडॉग’ के संगीत से ‘बेस्ट कंपाइलेशन साउंड ट्रैक फॉर मोशन पिक्चर’ और ‘बेस्ट मोशन पिक्चर सॉन्ग’..‘जय हो’ के लिए दो ट्रॉफियों से नवाजा गया है। पिछले साल रहमान ने बाफ्टा में ‘गोल्डन ग्लोब’ और ऑस्कर में दो पुरस्कार हासिल किए थे।
पुरस्कार से ज्यादा मन की संतुष्टि जरूरी : लता ने कहा भारतीय संगीत को पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाना चाहिए था। भारतीय संगीत की व्यापकता को देखते हुए इसे काफी देर से पुरस्कार से नवाजा गया। हालाँकि वे पुरस्कारों के बजाय काम के प्रति संतुष्टि और अच्छा काम करने को तवज्जो देती हैं।
यह पूछे जाने पर कि भारत की स्वर सम्राज्ञी के तौर पर अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड ‘आस्कर’ और ‘ग्रैमी’ को वे कितनी अहमियत देती हैं, उन्होंने कहा मैं बढ़िया काम करने और अपनी खुशी के लिए काम करने में विश्वास रखती हूँ। अगर खुद को काम में मजा आ रहा है और संतुष्टि हो रही है तो इससे बढ़िया उपलब्धि या अवॉर्ड कुछ नहीं हो सकता। इससे आत्मा को शांति मिलती है।
वे मानती हैं कि भारत में कई बेहतरीन पुरस्कार हैं, जो काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार की अहमियत में कोई फर्क नहीं है।
उन्होंने कहा अगर अच्छा काम करते रहोगे तो पुरस्कार भी अपने आप मिलेंगे। लेकिन पुरस्कार से अच्छे काम की काबिलियत को नहीं तोला जा सकता। भारत में भी काफी प्रतिष्ठित पुरस्कार मौजूद हैं।
गानों में आया पीढ़ियों का फर्क : आधुनिक और पुराने दौर के गानों में लता हालाँकि काफी अंतर मानती हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि पीढ़ियों के फर्क को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने हँसते हुए कहा हमारे जमाने में गाने का अर्थ हुआ करता था, लेकिन आजकल के गानों में यह बात आना जरूरी नहीं है।
मुझे हालाँकि आजकल का संगीत भी पसंद आता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि पुराने या फिर आप कहें हमारे जमाने का संगीत अब भी इतने समय बाद भी वैसी ही मिठास लिए हुए है।
लता ने 20 से ज्यादा भाषाओं में फिल्मी और गैरफिल्मी गीत गाए हैं। वे 30,000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं और अब भी उनके अंदर गाने को लेकर वैसा ही उत्साह भरा हुआ है लेकिन अब उन्होंने गाना पहले की बजाय कम कर दिया है।
संगीत ही जीवन है : उन्होंने कहा मैं मानती हूँ कि काम ही जीवन है, लेकिन मेरे लिए संगीत ही जीवन है। मैंने हालाँकि गाने गाना कम कर दिया है, पहले की तरह व्यस्त नहीं रहती, लेकिन मैं कभी भी संगीत से दूर नहीं रह सकती और मैं काम को ही जीवन मानती हूँ।
‘भारत रत्न’ स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर मानती हैं कि अच्छे काम की तुलना पुरस्कारों से नहीं की जा सकती, लेकिन उनका कहना है कि एआर रहमान ने ऑस्कर के बाद ग्रैमी पुरस्कार हासिल कर भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता दिलाई है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को मिल रही सफलता के बारे में लता ने मुंबई से कहा रहमान ने निश्चित तौर पर भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचाया है। बहुत खुशी होती है, जब कोई भारतीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाता है। वे मानती हैं कि देश में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संगीत को सफलता काफी देर से मिली।
रहमान को 52वें ग्रेमी अवॉर्ड में ‘स्लमडॉग’ के संगीत से ‘बेस्ट कंपाइलेशन साउंड ट्रैक फॉर मोशन पिक्चर’ और ‘बेस्ट मोशन पिक्चर सॉन्ग’..‘जय हो’ के लिए दो ट्रॉफियों से नवाजा गया है। पिछले साल रहमान ने बाफ्टा में ‘गोल्डन ग्लोब’ और ऑस्कर में दो पुरस्कार हासिल किए थे।
पुरस्कार से ज्यादा मन की संतुष्टि जरूरी : लता ने कहा भारतीय संगीत को पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाना चाहिए था। भारतीय संगीत की व्यापकता को देखते हुए इसे काफी देर से पुरस्कार से नवाजा गया। हालाँकि वे पुरस्कारों के बजाय काम के प्रति संतुष्टि और अच्छा काम करने को तवज्जो देती हैं।
यह पूछे जाने पर कि भारत की स्वर सम्राज्ञी के तौर पर अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड ‘आस्कर’ और ‘ग्रैमी’ को वे कितनी अहमियत देती हैं, उन्होंने कहा मैं बढ़िया काम करने और अपनी खुशी के लिए काम करने में विश्वास रखती हूँ। अगर खुद को काम में मजा आ रहा है और संतुष्टि हो रही है तो इससे बढ़िया उपलब्धि या अवॉर्ड कुछ नहीं हो सकता। इससे आत्मा को शांति मिलती है।
वे मानती हैं कि भारत में कई बेहतरीन पुरस्कार हैं, जो काफी प्रतिष्ठित हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार की अहमियत में कोई फर्क नहीं है।
उन्होंने कहा अगर अच्छा काम करते रहोगे तो पुरस्कार भी अपने आप मिलेंगे। लेकिन पुरस्कार से अच्छे काम की काबिलियत को नहीं तोला जा सकता। भारत में भी काफी प्रतिष्ठित पुरस्कार मौजूद हैं।
गानों में आया पीढ़ियों का फर्क : आधुनिक और पुराने दौर के गानों में लता हालाँकि काफी अंतर मानती हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि पीढ़ियों के फर्क को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने हँसते हुए कहा हमारे जमाने में गाने का अर्थ हुआ करता था, लेकिन आजकल के गानों में यह बात आना जरूरी नहीं है।
मुझे हालाँकि आजकल का संगीत भी पसंद आता है, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि पुराने या फिर आप कहें हमारे जमाने का संगीत अब भी इतने समय बाद भी वैसी ही मिठास लिए हुए है।
लता ने 20 से ज्यादा भाषाओं में फिल्मी और गैरफिल्मी गीत गाए हैं। वे 30,000 से ज्यादा गाने गा चुकी हैं और अब भी उनके अंदर गाने को लेकर वैसा ही उत्साह भरा हुआ है लेकिन अब उन्होंने गाना पहले की बजाय कम कर दिया है।
संगीत ही जीवन है : उन्होंने कहा मैं मानती हूँ कि काम ही जीवन है, लेकिन मेरे लिए संगीत ही जीवन है। मैंने हालाँकि गाने गाना कम कर दिया है, पहले की तरह व्यस्त नहीं रहती, लेकिन मैं कभी भी संगीत से दूर नहीं रह सकती और मैं काम को ही जीवन मानती हूँ।
वामा
सुख-दुख दोनों है खास
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।
अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।
ये हैं ...अघोषित सेलिब्रिटीज
यह आलेख समर्पित हैं उन महिलाओं को जो कोई सेलेब्रिटी या सार्वजनिक क्षेत्रों की नामी महिला नहीं हैं। न ही अपने क्षेत्र-विशेष से बाहर उन्हें कोई जानता है। किंतु अपने जैसे परिवेश में रहने वाली महिलाओं के लिए वे किसी रोल मॉडल से कम भी नहीं, जिन सितारा महिलाओं के फोटो और उपलब्धियों से सामान्यतः अखबार के पन्नो भरे रहते हैं, टीवी चैनल पर जो जगमगाती हैं उनसे उन्नीस नहीं हैं ये ग्रामीण 'रोल मॉडल'।
गरीबी और पुरातनवादी, मानसिकता में गले-गले तक धँसी महिलाओं के लिए ये 'रोल मॉडल' यथार्थ के अधिक निकट हैं, क्योंकि इनका निजी जीवन भी संघर्षों, काँटों से भरा हुआ रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अभावों एवं विपरीत परिस्थितियों से जूझकर आगे बढ़ने वाली इन महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, जो समाज के लिए अनुकरणीय हैं व क्रांतिकारी हैं, किसी महिला संगठन, मंच या स्त्री-जगत के पैरोकारों को नजर नहीं आती?
महिला दिवस पर इस बार भी जगह-जगह सम्मान समारोह हुए, कार्यशालाएँ आयोजित हुईं। इन कार्यक्रमों में लगभग वे ही महिलाएँ सहभागिता करतीं व सम्मानित होती नजर आईं जो उच्च शिक्षित तबके से होने के साथ ही ठोस आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित थीं। किसी एक-आध कार्यक्रम में ही ऐसी महिलाएँ दिखाई दीं, जो कठोर परिस्थितियों, आर्थिक अभावों व कुरीतियों की जंजीरें तोड़कर आगे बढ़ी हों।
बाकी तो सम्मान देने वाली व सम्मानित होने वाली ज्यादातर महिलाएँ या तो क्षेत्रीय नेताओं की पत्नियाँ या रिश्तेदार थीं या किसी उच्चाधिकारी की या फिर प्रतिष्ठित व्यापारी की पत्नी या रिश्तेदार। आश्चर्य की बात तो यह है कि सम्मान देने या लेने वाली उक्त कई महिलाएँ स्वयं भी अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों व अंधविश्वासों से घिरी होने व घरेलू हिंसा की कम जानकारी रखने के बावजूद महिला-संगठनों की अग्रणी मानी जाती हैं। तो क्या ये सब ही आम महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण के प्रयोजन हेतु वास्तविक प्रयास हैं?
यदि उक्त संगठन, मंच वाकई महिला हितैषी हैं तो वे महिलाएँ अभी तक उपेक्षा की शिकार क्यों हैं जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर आधारभूत समस्याओं से जूझते हुए अपने परिवार, जाति-समाज की ठेठ परंपराओं की बेड़ियों को लाँघकर सफलता प्राप्त की और समाज की दबी-कुचली महिलाओं के लिए उदाहरण बनीं?
एक और नजारा हमारे देश में आम है। पंचायतीराज व्यवस्था में आरक्षण के कारण पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या में भले ही वृद्धि हो गई हो लेकिन अपने अधिकारों की न तो उन्हें जानकारी होती है और न स्वरुचि से वे कुछ कर पाती हैं। अधिकांश मामलों में वे स्वयं निर्णय नहीं ले पातीं और अपने पति के हाथों रबर-स्टैम्प बनी रहती हैं।
कद्दावर पुरुष नेताओं को स्थानीय व क्षेत्रीय राजनीति में जब अपने लिए कोई स्थान नजर नहीं आता तो वे अपनी पत्नी को ढाल बनाकर अपना हित साधते रहते हैं।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ कई महिलाएँ जिन्हें पारिवारिक व सामाजिक मामलों की भले ही अधिक समझ-बूझ न हो, उन्हें महिला परामर्श केंद्रों में सलाहकार बना दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जो महिलाएँ ग्रामीण व अर्द्धशहरी क्षेत्रों से बहुत निम्न स्तर से उठकर अपने संघर्ष व साहस के दम पर चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ती हैं उनका हौसला अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है।
खेती-बाड़ी और मजदूरी कर अपने बच्चों को पढ़ाने वाली महिलाएँ, दूसरों के घरों में कामकाज कर स्वयं को शिक्षित करने वाली, अपने शराबी-जुआरी पति से मार खाने की बजाय स्वयं के दम पर आगे बढ़ने वाली, अस्वस्थ परंपराओं, कुरीतियों और सड़े-गले रीति-रिवाजों से विद्रोह कर स्वयं की एक अलग पहचान स्थापित करने वाली और अभावग्रस्तता के बावजूद अपने कदमों को पीछे नहीं हटाने वाली, सामान्य ग्रामीण या निचले वर्ग की महिला समाचार-पत्रों की सुर्खी कम क्यों बनती है?
आम महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है अभावों से, स्वयं के परिवार से यहाँ तक कि स्वयं के पति से भी। उनकी छोटी-मोटी उपलब्धियाँ क्या सिर्फ इसलिए मूल्यांकन या सम्मान के योग्य नहीं क्योंकि वे 'सेलिब्रिटी' नहीं हैं और एक क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं? ऐसी महिलाओं के साहस व हौसलों को नमन है जो जूझकर आगे बढ़ी हों। क्या वे सम्मान की हकदार नहीं हैं?
बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में बीरबल का अलग स्थान था। बादशाह कैसा भी प्रश्न पूछते, बीरबल सही व सटीक उत्तर देकर उनकी जिज्ञासा शांत कर देते। एक बार उन्होंने कहा, कुछ ऐसा लिखो जिससे खुशी के वक्त पढ़ें तो गम याद आ जाए और गम के वक्त पढ़ें तो खुशी के पल याद आएँ। बीरबल ने कुछ देर सोचा, फिर कागज पर यह वाक्य लिखकर बादशाह को दिया- यह वक्त गुजर जाएगा। सच! इन चार शब्दों के वाक्य में जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई छुपी है।
सभी जानते हैं कि सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं जिनका क्रमानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। किंतु हम सब कुछ जानते-समझते हुए भी दोनों ही वक्त अपनी भावनाओं-संवेदनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाते। जब खुशियों के पल हमारी झोली में होते हैं तो उस समय हम स्वयं में ही इतने मग्न हो जाते हैं कि क्या अच्छा क्या बुरा, इस पर कभी विचार नहीं करते हैं।
अपनी किस्मत व भाग्य पर इठलाते हुए अन्य की तुलना में श्रेष्ठ समझते हैं और अहंकारवश कुछ ऐसे कार्य तक कर देते हैं जिनसे स्वयं का हित और दूसरे का अहित हो सकता है। इस क्षणिक सुख को स्थायी मानते हुए ही जीने लगते हैं और वास्तव में यही सोच अपना लेते हैं कि अब हमें क्या चाहिए, सब कुछ तो मिल गया। बस! एक इसी भ्रांति के कारण स्वयं को उतने योग्य व सफल साबित नहीं कर पाते जितना कि कर सकते थे।
इसी तरह दुःखद घड़ी में भी अपना आपा खो बेसुध होकर सब भूल जाते हैं। छोटे-से छोटे दुःख तक में धैर्य-संयम नहीं रख पाते। बुद्धि-विवेक व आत्मबल होने के बावजूद स्वयं को इतना दयनीय, असहाय व बेचारा महसूस करते हैं कि आत्मसम्मान, स्वाभिमान तक से समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी उम्रभर अयोग्य-असफल होने लगते हैं।
कहने का सार यह है कि जो भी छोटी-सी जिंदगी हमें मिली है उसमें सुख व दुख दोनों ही से हमारा वास्ता होगा, यही शाश्वत सत्य है। इस सच को हम जितनी जल्दी स्वीकार कर लेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा रहेगा, क्योंकि फिर ऐसा समय आने पर हम अपने संवेगों पर काबू कर उन्हें स्थिर रख सकेंगे।
ये हैं ...अघोषित सेलिब्रिटीज
यह आलेख समर्पित हैं उन महिलाओं को जो कोई सेलेब्रिटी या सार्वजनिक क्षेत्रों की नामी महिला नहीं हैं। न ही अपने क्षेत्र-विशेष से बाहर उन्हें कोई जानता है। किंतु अपने जैसे परिवेश में रहने वाली महिलाओं के लिए वे किसी रोल मॉडल से कम भी नहीं, जिन सितारा महिलाओं के फोटो और उपलब्धियों से सामान्यतः अखबार के पन्नो भरे रहते हैं, टीवी चैनल पर जो जगमगाती हैं उनसे उन्नीस नहीं हैं ये ग्रामीण 'रोल मॉडल'।
गरीबी और पुरातनवादी, मानसिकता में गले-गले तक धँसी महिलाओं के लिए ये 'रोल मॉडल' यथार्थ के अधिक निकट हैं, क्योंकि इनका निजी जीवन भी संघर्षों, काँटों से भरा हुआ रहा है। बड़े आश्चर्य की बात है कि अभावों एवं विपरीत परिस्थितियों से जूझकर आगे बढ़ने वाली इन महिलाओं की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ, जो समाज के लिए अनुकरणीय हैं व क्रांतिकारी हैं, किसी महिला संगठन, मंच या स्त्री-जगत के पैरोकारों को नजर नहीं आती?
महिला दिवस पर इस बार भी जगह-जगह सम्मान समारोह हुए, कार्यशालाएँ आयोजित हुईं। इन कार्यक्रमों में लगभग वे ही महिलाएँ सहभागिता करतीं व सम्मानित होती नजर आईं जो उच्च शिक्षित तबके से होने के साथ ही ठोस आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित थीं। किसी एक-आध कार्यक्रम में ही ऐसी महिलाएँ दिखाई दीं, जो कठोर परिस्थितियों, आर्थिक अभावों व कुरीतियों की जंजीरें तोड़कर आगे बढ़ी हों।
बाकी तो सम्मान देने वाली व सम्मानित होने वाली ज्यादातर महिलाएँ या तो क्षेत्रीय नेताओं की पत्नियाँ या रिश्तेदार थीं या किसी उच्चाधिकारी की या फिर प्रतिष्ठित व्यापारी की पत्नी या रिश्तेदार। आश्चर्य की बात तो यह है कि सम्मान देने या लेने वाली उक्त कई महिलाएँ स्वयं भी अनेक कुरीतियों, रूढ़ियों व अंधविश्वासों से घिरी होने व घरेलू हिंसा की कम जानकारी रखने के बावजूद महिला-संगठनों की अग्रणी मानी जाती हैं। तो क्या ये सब ही आम महिलाओं के उत्थान व सशक्तीकरण के प्रयोजन हेतु वास्तविक प्रयास हैं?
यदि उक्त संगठन, मंच वाकई महिला हितैषी हैं तो वे महिलाएँ अभी तक उपेक्षा की शिकार क्यों हैं जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर आधारभूत समस्याओं से जूझते हुए अपने परिवार, जाति-समाज की ठेठ परंपराओं की बेड़ियों को लाँघकर सफलता प्राप्त की और समाज की दबी-कुचली महिलाओं के लिए उदाहरण बनीं?
एक और नजारा हमारे देश में आम है। पंचायतीराज व्यवस्था में आरक्षण के कारण पंचायतों व स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या में भले ही वृद्धि हो गई हो लेकिन अपने अधिकारों की न तो उन्हें जानकारी होती है और न स्वरुचि से वे कुछ कर पाती हैं। अधिकांश मामलों में वे स्वयं निर्णय नहीं ले पातीं और अपने पति के हाथों रबर-स्टैम्प बनी रहती हैं।
कद्दावर पुरुष नेताओं को स्थानीय व क्षेत्रीय राजनीति में जब अपने लिए कोई स्थान नजर नहीं आता तो वे अपनी पत्नी को ढाल बनाकर अपना हित साधते रहते हैं।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ कई महिलाएँ जिन्हें पारिवारिक व सामाजिक मामलों की भले ही अधिक समझ-बूझ न हो, उन्हें महिला परामर्श केंद्रों में सलाहकार बना दिया जाता है। इन परिस्थितियों में जो महिलाएँ ग्रामीण व अर्द्धशहरी क्षेत्रों से बहुत निम्न स्तर से उठकर अपने संघर्ष व साहस के दम पर चुनौतियों का मुकाबला करते हुए आगे बढ़ती हैं उनका हौसला अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है।
खेती-बाड़ी और मजदूरी कर अपने बच्चों को पढ़ाने वाली महिलाएँ, दूसरों के घरों में कामकाज कर स्वयं को शिक्षित करने वाली, अपने शराबी-जुआरी पति से मार खाने की बजाय स्वयं के दम पर आगे बढ़ने वाली, अस्वस्थ परंपराओं, कुरीतियों और सड़े-गले रीति-रिवाजों से विद्रोह कर स्वयं की एक अलग पहचान स्थापित करने वाली और अभावग्रस्तता के बावजूद अपने कदमों को पीछे नहीं हटाने वाली, सामान्य ग्रामीण या निचले वर्ग की महिला समाचार-पत्रों की सुर्खी कम क्यों बनती है?
आम महिलाओं को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है अभावों से, स्वयं के परिवार से यहाँ तक कि स्वयं के पति से भी। उनकी छोटी-मोटी उपलब्धियाँ क्या सिर्फ इसलिए मूल्यांकन या सम्मान के योग्य नहीं क्योंकि वे 'सेलिब्रिटी' नहीं हैं और एक क्षेत्र विशेष तक सीमित हैं? ऐसी महिलाओं के साहस व हौसलों को नमन है जो जूझकर आगे बढ़ी हों। क्या वे सम्मान की हकदार नहीं हैं?
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा
सरकारी वादे और व्यावहारिक सच्चाई
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में गुरुवार को कहा है कि अब से देश में कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। उनका कहना है कि इस कानून के तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा बच्चों का बुनियादी अधिकार बन जाएगा। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समूचे देश में उन 1 करोड़ बच्चों को भी शिक्षा मिले, जिन्हें अभी तक ऐसी कोई सुविधा नसीब नहीं हुई है।
सरकार राइट टू इन्फॉरमेशन और मनरेगा की तरह शिक्षा के मौलिक अधिकार को अपने एजेंडे के तौर पर पेश कर रही है और अगले पाँच वर्ष के लिए केन्द्र सरकार ने इस मिशन को पूरा करने के लिए करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।
सरकार का कहना है कि गरीब बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए 2011 से निजी स्कूलों में भी पहली कक्षा से 25 फीसदी कोटा लागू होगा और अगले 12 वर्षों में इसे पूरी तरह से लागू करा लिया जाएगा। इस पहल से सरकार यह भी साबित करना चाहती है कि उसकी प्राथमिकता और सरोकारों में आम आदमी का वर्तमान और भविष्य भी है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 को पारित कर सरकार ने बहुत ही अहम और दूरगामी पहल की है लेकिन इस कानून के साथ कुछ खूबियाँ जुड़ी होंगी तो कुछ खामियाँ भी समय-समय पर आम जनता और सरकार के सामने आएँगी, जिनका निराकरण करना होगा। सरकार ने अपने वादों और मंशा को तो स्पष्ट कर दिया है लेकिन यह मंशा कैसे यथार्थ में बदलेगी, इसे देखना होगा।
इस कानून के तहत सरकार के लिए उन सभी बच्चों को शिक्षित करना जरूरी हो जाएगा, जो 6 से 14 आयु वर्ग में आते हैं। लेकिन सरकार उन बच्चों को कैसे अनिवार्य शिक्षा दिला पाएगी, जो अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए दिनभर काम करते हैं।
छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनने का काम करते हैं और ऐसे ही बहुत सारे कामों में लगे होते हैं जिनसे उनके परिवारों को बहुत थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है। ऐसे बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना और उन्हें पढ़ाने के काम में लगाना सबसे मुश्किल काम होगा।
नए कानून के तहत शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की बात कही जा रही है। यह स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के बीच अनुपात को कम करने का दावा करता है। कानून कहता है कि एक शिक्षक पर 40 बच्चों से अधिक नहीं होंगे, लेकिन इसके लिए बड़ी संख्या में शिक्षक, स्कूल तथा अन्य बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था कैसे होगी? सरकार को यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने में कितना समय लग जाएगा?
नए कानून के मुताबिक राज्य सरकारों को बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालय, कक्षाएँ, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराना होंगी, पर क्या राज्य सरकारें और उनके अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह सब काम करेंगे?
सरकार को 15 लाख नए अध्यापकों की भी भर्ती करना होगी और इन्हें अक्टूबर तक प्रशिक्षित भी करना होगा, पर क्या यह आसानी से संभव हो पाएगा?
यह कानून कहता है कि स्कूल के प्रबंधन, जन्म प्रमाण-पत्र और स्थानान्तरण प्रमाण पत्र के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकेंगे और सत्र के दौरान किसी भी समय पर बच्चे का प्रवेश संभव होगा। पर क्या यह सब व्यवहारिकता में संभव हो पाएगा?
निजी स्कूलों में भी 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन इस बात को सुनिश्चित कराना आसान नहीं होगा।
देश के अन्य कानूनों की तरह से यह नया कानून भी खामियों से अछूता नहीं है। इसमें 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों की बात कही गई है, लेकिन प्रारंभ से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी? जो बच्चे 14 वर्ष से अधिक आयु के और 18 वर्ष तक के होंगे, उनके लिए क्या प्रावधान होंगे?
हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 45 में यह बात कही गई है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के अंदर सरकार 0 से 14 वर्ष आयु तक के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी, लेकिन क्या यह अब तक संभव हो पाया है?
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार देश में 18 वर्ष तक की आयु के किशोरों को बच्चा ही माना जाता है। भारत ने दुनिया के उन 142 देशों के साथ यह समझौता किया है, लेकिन इस कानून में 14 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की कोई बात नहीं की गई है।
जहाँ तक उच्च शिक्षा की बात है तो सरकार हर साल इसके बजट में कमी करती जा रही है। यह दिनोंदिन महँगी होती जा रही है और उच्च शिक्षा संस्थान होशियार छात्रों के लिए अच्छी नौकरियाँ पाने का जरिया भर बनकर रह गए हैं।
मौलिक काम करके दुनिया में नाम कमाने के लिए ऐसे संस्थानों के छात्रों को विदेश ही जाना पड़ता है और वहीं रहकर ही वे कुछ ऐसा काम करपाते हैं जिसके बल पर उनका दुनिया में नाम होता है।
प्राथमिक शिक्षा में भी उच्च शिक्षा की तरह निजीकरण के चलते यह हालत हो गई है कि शहरी क्षेत्रों में केवल वे पालक ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजते हैं, जिनके पास पैसा नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथमिक और उच्च शिक्षा की हालत में फर्क करना ही मुश्किल है।
शिक्षा के साथ मुश्किल यह है कि सरकार ने निजीकरण के नाम पर शिक्षा को व्यवसायियों के हवाले कर दिया है और सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई है कि शिक्षा देना उसका काम है भी या नहीं?
सरकार की तरफ से कह दिया जाता है कि तेल बेचना, बिजली बनाना या कल कारखाने चलाना उसका काम नहीं है, लेकिन शिक्षा के मामले में सरकार ऐसा नहीं कह सकती है कि यह उसका काम नहीं है। वरना एक लोकताँत्रिक समाजवादी देश में (जो ना तो पूरी तरह से ही लोकताँत्रिक है और न ही पूरी तरह से समाजवादी ही) शिक्षा को सड़क पर पड़े जानवर की तरह नहीं समझा जाता कि जिसे जब जिसकी इच्छा हो, इसे लतियाता चला जाता है।
सरकार यह नहीं कह सकती है कि शिक्षा घाटे का सौदा है अगर ऐसा होता तो देश में पूर्व प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षा की इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं होतीं और ज्यादातर राजनेताओं को अपने नाम पर ये दुकानें चलाने की जरूरत ही नहीं होती।
...इसलिए कहा जा सकता है कि शिक्षा जैसे मामले पर अगर सरकार कुछ सार्थक और अहम पहल करना चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में भी सरकार इस कानून का पालन करवा पाने में सफल होगी?
इस कानून के साथ भी सबसे बड़ा प्रश्न भी यही है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने ही बनाए कानून को इतनी पारदर्शी ईमानदारी और सक्षमता के साथ लागू करा सकती हैं। इसी तथ्य से इस कानून की उपयोगिता और औचित्य का निर्धारण किया जा सकेगा।
प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में गुरुवार को कहा है कि अब से देश में कोई भी बच्चा अशिक्षित नहीं रहेगा। उनका कहना है कि इस कानून के तहत 6 वर्ष से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा बच्चों का बुनियादी अधिकार बन जाएगा। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि समूचे देश में उन 1 करोड़ बच्चों को भी शिक्षा मिले, जिन्हें अभी तक ऐसी कोई सुविधा नसीब नहीं हुई है।
सरकार राइट टू इन्फॉरमेशन और मनरेगा की तरह शिक्षा के मौलिक अधिकार को अपने एजेंडे के तौर पर पेश कर रही है और अगले पाँच वर्ष के लिए केन्द्र सरकार ने इस मिशन को पूरा करने के लिए करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है।
सरकार का कहना है कि गरीब बच्चों को बेहतर स्कूलों में शिक्षा दिलाने के लिए 2011 से निजी स्कूलों में भी पहली कक्षा से 25 फीसदी कोटा लागू होगा और अगले 12 वर्षों में इसे पूरी तरह से लागू करा लिया जाएगा। इस पहल से सरकार यह भी साबित करना चाहती है कि उसकी प्राथमिकता और सरोकारों में आम आदमी का वर्तमान और भविष्य भी है।
बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून, 2009 को पारित कर सरकार ने बहुत ही अहम और दूरगामी पहल की है लेकिन इस कानून के साथ कुछ खूबियाँ जुड़ी होंगी तो कुछ खामियाँ भी समय-समय पर आम जनता और सरकार के सामने आएँगी, जिनका निराकरण करना होगा। सरकार ने अपने वादों और मंशा को तो स्पष्ट कर दिया है लेकिन यह मंशा कैसे यथार्थ में बदलेगी, इसे देखना होगा।
इस कानून के तहत सरकार के लिए उन सभी बच्चों को शिक्षित करना जरूरी हो जाएगा, जो 6 से 14 आयु वर्ग में आते हैं। लेकिन सरकार उन बच्चों को कैसे अनिवार्य शिक्षा दिला पाएगी, जो अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए दिनभर काम करते हैं।
छोटे-छोटे बच्चे प्लास्टिक की पन्नियाँ बीनने का काम करते हैं और ऐसे ही बहुत सारे कामों में लगे होते हैं जिनसे उनके परिवारों को बहुत थोड़ी आर्थिक मदद मिलती है। ऐसे बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना और उन्हें पढ़ाने के काम में लगाना सबसे मुश्किल काम होगा।
नए कानून के तहत शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार की बात कही जा रही है। यह स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के बीच अनुपात को कम करने का दावा करता है। कानून कहता है कि एक शिक्षक पर 40 बच्चों से अधिक नहीं होंगे, लेकिन इसके लिए बड़ी संख्या में शिक्षक, स्कूल तथा अन्य बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था कैसे होगी? सरकार को यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने में कितना समय लग जाएगा?
नए कानून के मुताबिक राज्य सरकारों को बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुस्तकालय, कक्षाएँ, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराना होंगी, पर क्या राज्य सरकारें और उनके अधिकारी पूरी ईमानदारी से यह सब काम करेंगे?
सरकार को 15 लाख नए अध्यापकों की भी भर्ती करना होगी और इन्हें अक्टूबर तक प्रशिक्षित भी करना होगा, पर क्या यह आसानी से संभव हो पाएगा?
यह कानून कहता है कि स्कूल के प्रबंधन, जन्म प्रमाण-पत्र और स्थानान्तरण प्रमाण पत्र के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकेंगे और सत्र के दौरान किसी भी समय पर बच्चे का प्रवेश संभव होगा। पर क्या यह सब व्यवहारिकता में संभव हो पाएगा?
निजी स्कूलों में भी 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होंगी, लेकिन इस बात को सुनिश्चित कराना आसान नहीं होगा।
देश के अन्य कानूनों की तरह से यह नया कानून भी खामियों से अछूता नहीं है। इसमें 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के बच्चों की बात कही गई है, लेकिन प्रारंभ से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी? जो बच्चे 14 वर्ष से अधिक आयु के और 18 वर्ष तक के होंगे, उनके लिए क्या प्रावधान होंगे?
हमारे देश के संविधान के अनुच्छेद 45 में यह बात कही गई है कि संविधान के लागू होने के दस वर्ष के अंदर सरकार 0 से 14 वर्ष आयु तक के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी, लेकिन क्या यह अब तक संभव हो पाया है?
अंतरराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार देश में 18 वर्ष तक की आयु के किशोरों को बच्चा ही माना जाता है। भारत ने दुनिया के उन 142 देशों के साथ यह समझौता किया है, लेकिन इस कानून में 14 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा की कोई बात नहीं की गई है।
जहाँ तक उच्च शिक्षा की बात है तो सरकार हर साल इसके बजट में कमी करती जा रही है। यह दिनोंदिन महँगी होती जा रही है और उच्च शिक्षा संस्थान होशियार छात्रों के लिए अच्छी नौकरियाँ पाने का जरिया भर बनकर रह गए हैं।
मौलिक काम करके दुनिया में नाम कमाने के लिए ऐसे संस्थानों के छात्रों को विदेश ही जाना पड़ता है और वहीं रहकर ही वे कुछ ऐसा काम करपाते हैं जिसके बल पर उनका दुनिया में नाम होता है।
प्राथमिक शिक्षा में भी उच्च शिक्षा की तरह निजीकरण के चलते यह हालत हो गई है कि शहरी क्षेत्रों में केवल वे पालक ही अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजते हैं, जिनके पास पैसा नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो प्राथमिक और उच्च शिक्षा की हालत में फर्क करना ही मुश्किल है।
शिक्षा के साथ मुश्किल यह है कि सरकार ने निजीकरण के नाम पर शिक्षा को व्यवसायियों के हवाले कर दिया है और सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर पाई है कि शिक्षा देना उसका काम है भी या नहीं?
सरकार की तरफ से कह दिया जाता है कि तेल बेचना, बिजली बनाना या कल कारखाने चलाना उसका काम नहीं है, लेकिन शिक्षा के मामले में सरकार ऐसा नहीं कह सकती है कि यह उसका काम नहीं है। वरना एक लोकताँत्रिक समाजवादी देश में (जो ना तो पूरी तरह से ही लोकताँत्रिक है और न ही पूरी तरह से समाजवादी ही) शिक्षा को सड़क पर पड़े जानवर की तरह नहीं समझा जाता कि जिसे जब जिसकी इच्छा हो, इसे लतियाता चला जाता है।
सरकार यह नहीं कह सकती है कि शिक्षा घाटे का सौदा है अगर ऐसा होता तो देश में पूर्व प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयीन स्तर पर शिक्षा की इतनी बड़ी-बड़ी दुकानें नहीं होतीं और ज्यादातर राजनेताओं को अपने नाम पर ये दुकानें चलाने की जरूरत ही नहीं होती।
...इसलिए कहा जा सकता है कि शिक्षा जैसे मामले पर अगर सरकार कुछ सार्थक और अहम पहल करना चाहती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस बात की गारंटी नहीं ली जा सकती है कि दिल्ली के नर्सरी स्कूलों में भी सरकार इस कानून का पालन करवा पाने में सफल होगी?
इस कानून के साथ भी सबसे बड़ा प्रश्न भी यही है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने ही बनाए कानून को इतनी पारदर्शी ईमानदारी और सक्षमता के साथ लागू करा सकती हैं। इसी तथ्य से इस कानून की उपयोगिता और औचित्य का निर्धारण किया जा सकेगा।
पर्यटन » मध्यप्रदेश
चलें महेश्वर : माँ नर्मदा के तीर
इतिहास प्रसिद्ध सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन की प्राचीन राजधानी महिष्मति ही आधुनिक महेश्वर है। इसका उल्लेख रामायण तथा महाभारत में भी मिलता है। इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने यहाँ की महिमा को चार चाँद लगाए। महेश्वर के मंदिर तथा दुर्ग परिसर के सौंदर्य में अपार आकर्षण विद्यमान है। महेश्वर की महेश्वरी साड़ियाँ अति प्रसिद्ध हैं।
यहाँ के पेशवा घाट, फणसे घाट और अहिल्या घाट प्रसिद्ध हैं जहाँ तीर्थयात्री शांति से बैठकर ध्यान में डूब सकते हैं। नर्मदा नदी के बालुई किनारे पर बैठकर आप यहाँ ठेठ ग्राम्य जीवन के दर्शन कर सकते हैं। पीतल के बर्तनों में पानी ले जाती महिलाएँ, एक किनारे से दूसरे किनारे तक सामान ले जाते पुरुष और किल्लोल करता बचपन..!
राजगद्दी और राजवाड़ा-
नर्मदा के तीर पर बने किले में स्थित राजगद्दी पर देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा रखी गई है। आज भी यह स्थान सजीव दरबार की तरह लगता है। किले के ऊपर से शांत नीली नर्मदा के जल को निहारने का अपना ही सुख है। किले के अन्य कमरों में करघे लगे हैं जिन पर साड़ी बनते हुए कोई भी देख सकता है। किले में स्थित छोटे से मंदिर से आज भी दशहरे के उत्सव की शुरुआत की जाती है जैसे राजा-महाराजा के समय में की जाती थी। किले से ढलवाँ रास्ते से नीचे जाते ही शहर बसा हुआ है।
मंदिर
महेश्वर के मंदिर दर्शनीय हैं। हर मंदिर के छज्जे, अहाते में खूबसूरत नक्काशी की गई है। कालेश्वर, राजराजेश्वर, विट्ठलेश्वर और अहिल्येश्वर मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
कैसे पहुँचें
वायु सेवा- महेश्वर के लिए निकटतम हवाई अड्डा इंदौर क्रमशः 77 तथा 91 किमी है जो मुंबई, दिल्ली, भोपाल तथा ग्वालियर से सीधी विमान सेवा से जुड़ा है।
रेल सेवा- महेश्वर के लिए बड़वाह (39 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। पश्चिमी रेलवे के बड़वाह, खंडवा, इंदौर से भी यहाँ पहुँच सकते हैं।
सड़क मार्ग- बड़वाह, खंडवा, इंदौर, धार और धामनोद से महेश्वर के लिए बस सेवा उपलब्ध है।
कब जाएँ-
जुलाई से लेकर मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- गेस्ट हाउस, रेस्ट हाउस, तथा धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं।
धुँआ-धुँआ सारा समां - भेड़ाघाट
चमकती संगमरमर की लगभग सौ फीट ऊँची दीवारें... बीच में कल-कल बहती नर्मदा नदी पूरा माहौल बेहद पवित्र, बेहद शांत..पानी में चमकती सूर्य की किरणें... यह दिलकश नजारा है भेड़ाघाट का। पूर्णिमा की चाँदनी रात में यहाँ के सौंदर्य का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। ऐसे में आप नर्मदा में नौका-विहार करें तो रहस्यमय सौंदर्य का अनुभव करेंगे।
कई हिंदी फिल्मकारों ने यहाँ शूटिंग की है। जिसका रोचक वर्णन गाइड अनोखे अंदाज में सुनाते हैं। ये नाव चालक कम गाइड लगातार बोलते रहते हैं। यदि आप खामोशी से इस जगह की खूबसूरती निहारना चाहें तो बस इन्हें एक बार चुप होने का इशारा करना होगा।
दो ऊँचे-ऊँचे संगमरमरी आईनों के बीच बहती नीली शांत नर्मदा आगे चलकर बेहद खूबसूरत धुआँधार जलप्रपात के रूप में गिरती है। चाँदनी रात में इस जैसा खूबसूरत स्थान शायद ही विश्व में कहीं हो। चाँदनी रात में सरकार की ओर से हर साल यहाँ उत्सव का आयोजन करवाया जाता है। जिसके तहत नौकाओँ की राजसी सज्जा की जाती है। साथ ही सारंगी, तबला जैसे पारंपरिक वाद्य-यंत्रों को कुछ नावों में खास तौर पर बजवाया जाता है।
मुख्य आकर्षणः-
संगमरमरी चट्टानें- इस जलप्रपात क दोनों ओर खूबसूरत संगमरमर की चट्टाने हैं। इन उज्जवल-धवल चट्टानों के बीच नौका विहार की सुविधा नवंबर से मई तक उपलब्ध रहती है। चाँदनी रात में इसकी खूबसूरती और नौकाविहार का आनंद दुगना हो जाता है।
धुआँधार जलप्रपात-
शांत नर्मदा चट्टानों के बीच से बहती है और धुँआधार जलप्रपात के रूप में गरजकर गिरती है। इसकी आवाज दूर से ही सुनाई देती है। पानी की तेजी गहरे धुएँ के रूप में दिखाई देती है। प्रकृति की खूबसूरती का एक और रूप!
सेलखड़ी की कलाकृतियाँ-
यहाँ नर्मदा में पाए जाने वाले सेलखड़ी पत्थरों (संगमरमर) पर उकेरी गई कलाकृतियाँ बनाने और बेचने का व्यवसाय यहाँ होता है। यहाँ आपको बच्चे हो, बूढ़े हो या जवान सभी इसी काम में लगे दिखाई देंगे। आप यहाँ से संगमरमर के खूबसूरत सामान ही नहीं खरीद सकते, बल्कि इन्हें कितनी खूबसूरती से बनाया जाता है यह भी निहार सकते हैं।
चौंसठ योगिनी मंदिर-
ऊँची पहाड़ी पर स्थित मंदिर में कई सीढ़ियाँ चढ़कर आप जब ऊपर पहुँचते हैं तो नीचे संगमरमर की चट्टानों के बीच बहती नर्मदा की लहरों का सौंदर्य आपकी सारी थकान हर लेता है। दुर्गा माँ का यह मंदिर दसवीं शताब्दी का है यहाँ कलचुरी काल की अन्य प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर भूमिगत सुरंग के माध्यम से दुर्गावती महल से जुड़ा हुआ है।
कैसे जाएँ-
हवाई मार्ग से- जबलपुर सबसे निकट का हवाई अड्डा है जो यहाँ से 23 किमी. दूर है। भोपाल और दिल्ली के लिए यहाँ से नियमित हवाई सेवा है।
रेल मार्ग से- मुंबई-हावड़ा मुख्य लाइन इलाहबाद से होते हुए जबलपुर रेल मुख्यालय है। सभी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेन यहाँ रुकती हैं।
सड़क मार्ग से जबलपुर से बस, टैम्पो और टैक्सियाँ भेड़ाघाट के लिए चलती हैं।
कब जाएँ- अक्टूबर से जून तक का समय यहाँ जाने के लिए श्रेष्ठ है। मानसून सीजन में आप धुँआधार जलप्रपात का धुँआ-धुँआ रूप नहीं देख पाएँगे।
बजट- यहाँ जाने के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगता है। आप यूँ ही बिना टिकट लिए यहाँ की खूबसूरती निहार सकते हैं। हाँ, नौकायान के लिए आपको शुल्क चुकाना होगा...कितना यह आपकी पसंद पर निर्भर करता है। यदि आप दूसरे लोगों के साथ मिलकर नाव किराए पर लेते हैं तो यह आपको 100 से 150 रूपए के बीच मिल जाएगी।
यदि अपने परिवार के लिए पूरी नाव बुक करना चाहते हैं तो नाव के आकार और रूप-रंग के अनुसार कीमत 350 से लेकर 500 रूपए हो सकती है। चाँदनी रात में विहार करने पर टिकिट शुल्क कुछ बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा जबलपुर में ठहरने के लिए सस्ते और मँहगें दोनो ही होटल आराम से मिल जाते हैं।
टिप्सः-
धुँआधार जलप्रपात देखते समय काफी सावधानी रखें। जोश में आकर रेलिंग पर चढ़ना और रेलिंग क्रास करना काफी खतरनाक साबित हो सकता है।
यहाँ नौकाविहार करते समय नाव का संतुलन न बिगाड़े। यहाँ कई जगह पानी काफी गहरा है।
अपने साथ सनक्रीम लोशन, कैप और चश्मा जरूर रखें। बात यदि चाँदनी रात की हो तो इनकी क्या जरूरत।
यहाँ कुछ सालों पहले मगरमच्छ पाए जाते थे। इसलिए अभी भी सावधानी रखना जरूरी है बच्चों को नौका विहार करते समय पानी में बार-बार हाथ डालने से रोकें।
पहाड़ियों पर नाम कुरेदकर इनकी प्राकृतिक सुंदरता खराब न करें। न ही यहाँ वहाँ कूड़ा खासकर पॉलिथिन फेंके।
चित्रकूट
प्राचीन काल में तपस्या और शांति का स्थल चित्रकूट ब्रह्मा, विष्णु, महेश के बाल अवतार का स्थान माना जाता है। वनवास के समय भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, यहीं के घने जंगलों में रहे थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश महर्षि अत्रि तथा सती अनुसूया के अतिथि बनकर यहाँ रहे थे। इस स्थल का वरदान माना जाता है। भगवान प्राकृतिक सुषमा के बीच चित्रकूट में पर्यटक मानसिक शांति प्राप्त करते हैं।
रामघाट
रामघाट में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित घाट पर विभिन्न धार्मिक क्रियाएँ चलती रहती हैं। कहते हैं यहाँ घाटों पर भीड़ कभी भी कम नहीं होती। पवित्र मंत्रोच्चार और खुशबू के बीच साधुओं को यहाँ तपस्या में लीन बैठे देखा जा सकता है या तीर्थयात्री उनसे उपदेश प्राप्त करते रहते हैं। मंदाकिनी के नीले-हरे पानी में नौकायन का मजा ही कुछ और है।
कामदगिरी
कामदगिरी चित्रकूट का मुख्य धार्मिक स्थल है। यह एक खड़ी पहाड़ी पर स्थित है जिसके आधार पर मंदिरों और पूजा स्थलों की कतारें हैं। यहीं पर भरत मिलाप मंदिर है। यहीं पर भरत ने राम से वापिस लौटने की विनती की थी। लोग यहाँ मनोकामना पूर्ति के लिए पहाड़ी की परिक्रमा भी करते हैं।
सती अनुसूया
यह स्थल कुछ ऊपर जाकर है घने जंगलों के बीच शांत वातावरण में पक्षियों की चहचहाहट गूँजती रहती है। कहते हैं कि यहीं पर अत्रि ऋषि, उनकी पत्नी अनुसूया और तीनों पुत्रों ने तपस्या की थी जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार रूप में थे। मंदाकिनी की धारा को अनुसूया द्वारा अपनी ध्यान-साधना के लिए लाया गया था ऐसा माना जाता है। यह स्थल शहर से 16 किमी. दूर है और घने जंगलों से होकर सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
स्फटिक शिला
मंदाकिनी के किनारे पर जानकी कुंड के कुछ किलोमीटर पीछे यह घने वनों से आच्छादित क्षेत्र है। यहाँ पर भगवान राम के पैरों के निशान हैं और यहीं पर सीता माता को जयंत नामक कौवे ने चोंच मारी थी। यहाँ नदी के स्वच्छ पानी में मछलियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं।
जानकी कुंड
रामघाट से ऊपर जाने पर मंदाकिनी का मनमोहक नजारा दिखाई देता है। नदी के नीले पानी और हरे-भरे पेड़ों से यह स्थान बहुत ही सुरम्य लगता है। जानकी कुंड तक जाने के दो रास्ते हैं एक तो आप यहाँ नाव के जरिए पहुँच सकते हैं और दूसरे आप हरियाली देखते हुए सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं।
हनुमान धारा
यह सैंकड़ों फीट ऊँची जगह पर स्थित धारा है, जिसे राम ने हनुमान के लंका दहन के बाद लौटने पर हनुमान के लिए बनाया था। यहाँ कई मंदिर हैं और साथ ही यहाँ से चित्रकूट का विहगम दृश्य भी देखा जा सकता है। ऊपर पहुँचने पर खुला सा क्षेत्र है जहाँ पीपल के वृक्ष लगे हैं। ऊपर चढ़ने की सारी थकान यहाँ आते ही मिट जाती है।
भरत कूप
यहाँ भरत ने पूरे भारत के तीर्थों से जल एकत्र करके डाला था। यह कस्बे से दूर छोटा सी अलग-थलग जगह है।
गुप्त गोदावरी
कस्बे से 18 किमी. दूर पहाड़ी पर यह प्राकृतिक चमत्कार के रूप में है। यहाँ एक जोड़ा गुफाएँ हैं जिनमें बड़ी मुश्किल से ही प्रवेश किया जा सकता है। दूसरी गुफा और भी सँकरी है जिसमें पतली सी नदी बहती है। कहा जाता है कि यहाँ राम-लक्ष्मण अपना दरबार लगाते थे, यहाँ दो प्राकृतिक सिंहासन बने हुए हैं।
कैसे पहुँचे :-
वायु सेवा- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो (175 किमी) है। दिल्ली, आगरा और वाराणसी से यहाँ के लिए विमान सेवा उपलब्ध है।
रेल सेवा- सबसे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन चित्रकूट धाम या कर्वी (11 किमी) है। यह झाँसी-माणिकपुर मुख्य रेल लाइन पर स्थित है।
सड़क मार्ग- झाँसी, महोबा, चित्रकूट धाम, हरपारपुर, सतना और छतरपुर से चित्रकूट के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध हैं।
कैसे जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- मध्यप्रदेश निगम का बंगला तथा उत्तरप्रदेश पर्यटन निगम का बंगला, साडा के होटल तथा लॉज उपलब्ध हैं।
इतिहास प्रसिद्ध सम्राट कार्तवीर्य अर्जुन की प्राचीन राजधानी महिष्मति ही आधुनिक महेश्वर है। इसका उल्लेख रामायण तथा महाभारत में भी मिलता है। इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने यहाँ की महिमा को चार चाँद लगाए। महेश्वर के मंदिर तथा दुर्ग परिसर के सौंदर्य में अपार आकर्षण विद्यमान है। महेश्वर की महेश्वरी साड़ियाँ अति प्रसिद्ध हैं।
यहाँ के पेशवा घाट, फणसे घाट और अहिल्या घाट प्रसिद्ध हैं जहाँ तीर्थयात्री शांति से बैठकर ध्यान में डूब सकते हैं। नर्मदा नदी के बालुई किनारे पर बैठकर आप यहाँ ठेठ ग्राम्य जीवन के दर्शन कर सकते हैं। पीतल के बर्तनों में पानी ले जाती महिलाएँ, एक किनारे से दूसरे किनारे तक सामान ले जाते पुरुष और किल्लोल करता बचपन..!
राजगद्दी और राजवाड़ा-
नर्मदा के तीर पर बने किले में स्थित राजगद्दी पर देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा रखी गई है। आज भी यह स्थान सजीव दरबार की तरह लगता है। किले के ऊपर से शांत नीली नर्मदा के जल को निहारने का अपना ही सुख है। किले के अन्य कमरों में करघे लगे हैं जिन पर साड़ी बनते हुए कोई भी देख सकता है। किले में स्थित छोटे से मंदिर से आज भी दशहरे के उत्सव की शुरुआत की जाती है जैसे राजा-महाराजा के समय में की जाती थी। किले से ढलवाँ रास्ते से नीचे जाते ही शहर बसा हुआ है।
मंदिर
महेश्वर के मंदिर दर्शनीय हैं। हर मंदिर के छज्जे, अहाते में खूबसूरत नक्काशी की गई है। कालेश्वर, राजराजेश्वर, विट्ठलेश्वर और अहिल्येश्वर मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
कैसे पहुँचें
वायु सेवा- महेश्वर के लिए निकटतम हवाई अड्डा इंदौर क्रमशः 77 तथा 91 किमी है जो मुंबई, दिल्ली, भोपाल तथा ग्वालियर से सीधी विमान सेवा से जुड़ा है।
रेल सेवा- महेश्वर के लिए बड़वाह (39 किमी) निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। पश्चिमी रेलवे के बड़वाह, खंडवा, इंदौर से भी यहाँ पहुँच सकते हैं।
सड़क मार्ग- बड़वाह, खंडवा, इंदौर, धार और धामनोद से महेश्वर के लिए बस सेवा उपलब्ध है।
कब जाएँ-
जुलाई से लेकर मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- गेस्ट हाउस, रेस्ट हाउस, तथा धर्मशालाएँ उपलब्ध हैं।
धुँआ-धुँआ सारा समां - भेड़ाघाट
चमकती संगमरमर की लगभग सौ फीट ऊँची दीवारें... बीच में कल-कल बहती नर्मदा नदी पूरा माहौल बेहद पवित्र, बेहद शांत..पानी में चमकती सूर्य की किरणें... यह दिलकश नजारा है भेड़ाघाट का। पूर्णिमा की चाँदनी रात में यहाँ के सौंदर्य का वर्णन करना शब्दों में संभव नहीं है। ऐसे में आप नर्मदा में नौका-विहार करें तो रहस्यमय सौंदर्य का अनुभव करेंगे।
कई हिंदी फिल्मकारों ने यहाँ शूटिंग की है। जिसका रोचक वर्णन गाइड अनोखे अंदाज में सुनाते हैं। ये नाव चालक कम गाइड लगातार बोलते रहते हैं। यदि आप खामोशी से इस जगह की खूबसूरती निहारना चाहें तो बस इन्हें एक बार चुप होने का इशारा करना होगा।
दो ऊँचे-ऊँचे संगमरमरी आईनों के बीच बहती नीली शांत नर्मदा आगे चलकर बेहद खूबसूरत धुआँधार जलप्रपात के रूप में गिरती है। चाँदनी रात में इस जैसा खूबसूरत स्थान शायद ही विश्व में कहीं हो। चाँदनी रात में सरकार की ओर से हर साल यहाँ उत्सव का आयोजन करवाया जाता है। जिसके तहत नौकाओँ की राजसी सज्जा की जाती है। साथ ही सारंगी, तबला जैसे पारंपरिक वाद्य-यंत्रों को कुछ नावों में खास तौर पर बजवाया जाता है।
मुख्य आकर्षणः-
संगमरमरी चट्टानें- इस जलप्रपात क दोनों ओर खूबसूरत संगमरमर की चट्टाने हैं। इन उज्जवल-धवल चट्टानों के बीच नौका विहार की सुविधा नवंबर से मई तक उपलब्ध रहती है। चाँदनी रात में इसकी खूबसूरती और नौकाविहार का आनंद दुगना हो जाता है।
धुआँधार जलप्रपात-
शांत नर्मदा चट्टानों के बीच से बहती है और धुँआधार जलप्रपात के रूप में गरजकर गिरती है। इसकी आवाज दूर से ही सुनाई देती है। पानी की तेजी गहरे धुएँ के रूप में दिखाई देती है। प्रकृति की खूबसूरती का एक और रूप!
सेलखड़ी की कलाकृतियाँ-
यहाँ नर्मदा में पाए जाने वाले सेलखड़ी पत्थरों (संगमरमर) पर उकेरी गई कलाकृतियाँ बनाने और बेचने का व्यवसाय यहाँ होता है। यहाँ आपको बच्चे हो, बूढ़े हो या जवान सभी इसी काम में लगे दिखाई देंगे। आप यहाँ से संगमरमर के खूबसूरत सामान ही नहीं खरीद सकते, बल्कि इन्हें कितनी खूबसूरती से बनाया जाता है यह भी निहार सकते हैं।
चौंसठ योगिनी मंदिर-
ऊँची पहाड़ी पर स्थित मंदिर में कई सीढ़ियाँ चढ़कर आप जब ऊपर पहुँचते हैं तो नीचे संगमरमर की चट्टानों के बीच बहती नर्मदा की लहरों का सौंदर्य आपकी सारी थकान हर लेता है। दुर्गा माँ का यह मंदिर दसवीं शताब्दी का है यहाँ कलचुरी काल की अन्य प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर भूमिगत सुरंग के माध्यम से दुर्गावती महल से जुड़ा हुआ है।
कैसे जाएँ-
हवाई मार्ग से- जबलपुर सबसे निकट का हवाई अड्डा है जो यहाँ से 23 किमी. दूर है। भोपाल और दिल्ली के लिए यहाँ से नियमित हवाई सेवा है।
रेल मार्ग से- मुंबई-हावड़ा मुख्य लाइन इलाहबाद से होते हुए जबलपुर रेल मुख्यालय है। सभी एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेन यहाँ रुकती हैं।
सड़क मार्ग से जबलपुर से बस, टैम्पो और टैक्सियाँ भेड़ाघाट के लिए चलती हैं।
कब जाएँ- अक्टूबर से जून तक का समय यहाँ जाने के लिए श्रेष्ठ है। मानसून सीजन में आप धुँआधार जलप्रपात का धुँआ-धुँआ रूप नहीं देख पाएँगे।
बजट- यहाँ जाने के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगता है। आप यूँ ही बिना टिकट लिए यहाँ की खूबसूरती निहार सकते हैं। हाँ, नौकायान के लिए आपको शुल्क चुकाना होगा...कितना यह आपकी पसंद पर निर्भर करता है। यदि आप दूसरे लोगों के साथ मिलकर नाव किराए पर लेते हैं तो यह आपको 100 से 150 रूपए के बीच मिल जाएगी।
यदि अपने परिवार के लिए पूरी नाव बुक करना चाहते हैं तो नाव के आकार और रूप-रंग के अनुसार कीमत 350 से लेकर 500 रूपए हो सकती है। चाँदनी रात में विहार करने पर टिकिट शुल्क कुछ बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा जबलपुर में ठहरने के लिए सस्ते और मँहगें दोनो ही होटल आराम से मिल जाते हैं।
टिप्सः-
धुँआधार जलप्रपात देखते समय काफी सावधानी रखें। जोश में आकर रेलिंग पर चढ़ना और रेलिंग क्रास करना काफी खतरनाक साबित हो सकता है।
यहाँ नौकाविहार करते समय नाव का संतुलन न बिगाड़े। यहाँ कई जगह पानी काफी गहरा है।
अपने साथ सनक्रीम लोशन, कैप और चश्मा जरूर रखें। बात यदि चाँदनी रात की हो तो इनकी क्या जरूरत।
यहाँ कुछ सालों पहले मगरमच्छ पाए जाते थे। इसलिए अभी भी सावधानी रखना जरूरी है बच्चों को नौका विहार करते समय पानी में बार-बार हाथ डालने से रोकें।
पहाड़ियों पर नाम कुरेदकर इनकी प्राकृतिक सुंदरता खराब न करें। न ही यहाँ वहाँ कूड़ा खासकर पॉलिथिन फेंके।
चित्रकूट
प्राचीन काल में तपस्या और शांति का स्थल चित्रकूट ब्रह्मा, विष्णु, महेश के बाल अवतार का स्थान माना जाता है। वनवास के समय भगवान राम, सीता, लक्ष्मण, यहीं के घने जंगलों में रहे थे और ब्रह्मा, विष्णु और महेश महर्षि अत्रि तथा सती अनुसूया के अतिथि बनकर यहाँ रहे थे। इस स्थल का वरदान माना जाता है। भगवान प्राकृतिक सुषमा के बीच चित्रकूट में पर्यटक मानसिक शांति प्राप्त करते हैं।
रामघाट
रामघाट में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित घाट पर विभिन्न धार्मिक क्रियाएँ चलती रहती हैं। कहते हैं यहाँ घाटों पर भीड़ कभी भी कम नहीं होती। पवित्र मंत्रोच्चार और खुशबू के बीच साधुओं को यहाँ तपस्या में लीन बैठे देखा जा सकता है या तीर्थयात्री उनसे उपदेश प्राप्त करते रहते हैं। मंदाकिनी के नीले-हरे पानी में नौकायन का मजा ही कुछ और है।
कामदगिरी
कामदगिरी चित्रकूट का मुख्य धार्मिक स्थल है। यह एक खड़ी पहाड़ी पर स्थित है जिसके आधार पर मंदिरों और पूजा स्थलों की कतारें हैं। यहीं पर भरत मिलाप मंदिर है। यहीं पर भरत ने राम से वापिस लौटने की विनती की थी। लोग यहाँ मनोकामना पूर्ति के लिए पहाड़ी की परिक्रमा भी करते हैं।
सती अनुसूया
यह स्थल कुछ ऊपर जाकर है घने जंगलों के बीच शांत वातावरण में पक्षियों की चहचहाहट गूँजती रहती है। कहते हैं कि यहीं पर अत्रि ऋषि, उनकी पत्नी अनुसूया और तीनों पुत्रों ने तपस्या की थी जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार रूप में थे। मंदाकिनी की धारा को अनुसूया द्वारा अपनी ध्यान-साधना के लिए लाया गया था ऐसा माना जाता है। यह स्थल शहर से 16 किमी. दूर है और घने जंगलों से होकर सड़क मार्ग से यहाँ पहुँचा जा सकता है।
स्फटिक शिला
मंदाकिनी के किनारे पर जानकी कुंड के कुछ किलोमीटर पीछे यह घने वनों से आच्छादित क्षेत्र है। यहाँ पर भगवान राम के पैरों के निशान हैं और यहीं पर सीता माता को जयंत नामक कौवे ने चोंच मारी थी। यहाँ नदी के स्वच्छ पानी में मछलियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं।
जानकी कुंड
रामघाट से ऊपर जाने पर मंदाकिनी का मनमोहक नजारा दिखाई देता है। नदी के नीले पानी और हरे-भरे पेड़ों से यह स्थान बहुत ही सुरम्य लगता है। जानकी कुंड तक जाने के दो रास्ते हैं एक तो आप यहाँ नाव के जरिए पहुँच सकते हैं और दूसरे आप हरियाली देखते हुए सड़क मार्ग से भी जा सकते हैं।
हनुमान धारा
यह सैंकड़ों फीट ऊँची जगह पर स्थित धारा है, जिसे राम ने हनुमान के लंका दहन के बाद लौटने पर हनुमान के लिए बनाया था। यहाँ कई मंदिर हैं और साथ ही यहाँ से चित्रकूट का विहगम दृश्य भी देखा जा सकता है। ऊपर पहुँचने पर खुला सा क्षेत्र है जहाँ पीपल के वृक्ष लगे हैं। ऊपर चढ़ने की सारी थकान यहाँ आते ही मिट जाती है।
भरत कूप
यहाँ भरत ने पूरे भारत के तीर्थों से जल एकत्र करके डाला था। यह कस्बे से दूर छोटा सी अलग-थलग जगह है।
गुप्त गोदावरी
कस्बे से 18 किमी. दूर पहाड़ी पर यह प्राकृतिक चमत्कार के रूप में है। यहाँ एक जोड़ा गुफाएँ हैं जिनमें बड़ी मुश्किल से ही प्रवेश किया जा सकता है। दूसरी गुफा और भी सँकरी है जिसमें पतली सी नदी बहती है। कहा जाता है कि यहाँ राम-लक्ष्मण अपना दरबार लगाते थे, यहाँ दो प्राकृतिक सिंहासन बने हुए हैं।
कैसे पहुँचे :-
वायु सेवा- सबसे नजदीकी हवाई अड्डा खजुराहो (175 किमी) है। दिल्ली, आगरा और वाराणसी से यहाँ के लिए विमान सेवा उपलब्ध है।
रेल सेवा- सबसे निकटवर्ती रेलवे स्टेशन चित्रकूट धाम या कर्वी (11 किमी) है। यह झाँसी-माणिकपुर मुख्य रेल लाइन पर स्थित है।
सड़क मार्ग- झाँसी, महोबा, चित्रकूट धाम, हरपारपुर, सतना और छतरपुर से चित्रकूट के लिए नियमित बस सेवा उपलब्ध हैं।
कैसे जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक का समय यहाँ जाने के लिए उपयुक्त है।
ठहरने के लिए- मध्यप्रदेश निगम का बंगला तथा उत्तरप्रदेश पर्यटन निगम का बंगला, साडा के होटल तथा लॉज उपलब्ध हैं।
पर्यटन मध्यप्रदेश
नर्मदा किनारे बसा ओंकारेश्वर
शिवशंभू का अनूठा धाम
ओंकारेश्वर हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक 'ओम' को प्रतिध्वनित करता है। यह हर उम्र के तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ नर्मदा और कावेरी का संगम है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगाने के बाद पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन को जाते हैं। ओंकारेश्वर का शिवलिंग देश के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मंदिर को ओंकार मांधाता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
मध्यप्रदेश के अन्य मंदिरों की तरह ही यह मंदिर भी प्रकृति से मनुष्य के जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। यहाँ प्रकृति ने स्वयं दो पर्वतों के बीच एक खाई को जोड़कर ओम का आकार ग्रहण किया है।
मंदिर के उत्तर में विंध्य पर्वत और दक्षिण में सतपुड़ा के बीच नर्मदा नदी मूक वाहक की तरह है। पहले नदी में बहुतायत में घड़ियाल थे। अब भी यहाँ बड़ी संख्या में मछलियाँ हैं जिन्हें हाथों से दाना खिलाने का सुख प्राप्त किया जा सकता है। नदी पर स्थित पुल यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
ओंकार मांधाता मंदिर
यह मंदिर नर्मदा द्वारा काटे गए एक मील लंबे और आधा मील चौड़े द्वीप पर स्थित है। इसके नर्म पत्थरों को काटकर बारीक नक्काशी उकेरी गई है और विशेष रूप से इसका ऊपर का भाग देखने लायक है। मंदिर की छत भी बहुत सुंदरता से उकेरी गई है। मंदिर को घेरे हुए बरामदे में बने स्तंभों पर वृत्त, बहुकोणीय आकृतियाँ और वर्ग बने हुए हैं।
सिद्धनाथ मंदिर
यह मध्यकाल की ब्राह्मण कला का बेहतरीन नमूना है। इसकी विशेषता बाहरी दीवारों पर हाथियों की खूबसूरत नक्काशी है।
चौबीस अवतार
यहाँ हिंदुओं और जैन मंदिरों का समूह है। हरेक मंदिर स्थापत्य के लिहाज से बेहतरीन कला का नमूना पेश करता है।
सातमातृका मंदिर
ओंकारेश्वर से छ: किलोमीटर दूर यहाँ दसवीं शताब्दी के मंदिरों का समूह है।
काजल रानी की गुफा
ओंकारेश्वर से नौ किलोमीटर दूर यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थल है। क्षितिज तक फैले चौड़े हरियाले मैदान धरती से अंबर का मेल खाते से लगते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अवर्णनीय है।
कैसे जाएँ
हवाई मार्ग
सबसे निकट का हवाई अड्डा इंदौर 77 किमी. दूर है जो मुंबई, भोपाल और दिल्ली से जुड़ा है।
सड़क मार्ग
यह इंदौर, उज्जैन और खंडवा से सड़क मार्ग से जुड़ा है।
रेल मार्ग
सबसे निकट का रेल मुख्यालय ओंकारेश्वर रोड 12 किमी. दूर है। यह पश्चिम रेलवे के रतलाम-खंडवा सेक्शन से जुड़ा है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक आप कभी भी यहाँ जा सकते हैं। अक्टूबर-नवंबर का महीना आदर्श कहा जा सकता है।
बेजोड़ नमूना : साँची
भारतीय इतिहास की बौद्ध परंपरा के स्वर्ण युग का अमिट दस्तावेज है साँची। प्रदेश की राजधानी भोपाल से 46 किमी पर स्थित साँची के स्मारक भारत में स्थित बौद्ध स्मारकों में सर्वाधिक आकर्षक और अतुलनीय है।
एक खूबसूरत छोटी पहाड़ी पर स्थित इन स्मारकों में विभिन्न स्तूपों के अलावा गुप्तकालीन मंदिर और विहार आदि शामिल है। विश्व धरोहर की सूची में शामिल इन स्मारकों का निर्माण तीसरी सदी ई.पू. से लेकर बारहवीं सदी ई. तक किया गया है।
प्रमुख आकर्षण-
स्तूप -: साँची स्थित इन स्तूपों का निर्माण प्राय: धार्मिक उद्देश्यों को लेकर किया गया था। कहा जाता है कि इन स्तूपों में बुद्ध और उनके शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तूप क्रमांक एक का निर्माण महान मौर्य शासक अशोक ने करवाया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अशोक की पत्नी ‘देवी’ बेसनगर (वर्तमान विदिशा) के एक व्यापारी की बेटी थी। विदिशा साँची से 12 किमी दूर है।
स्तूप क्रमांक एक के चारो और स्थित चार द्वारों पर गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं को चित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। खास बात यह है कि इन चित्रों में बुद्ध को प्रतीकों के रूप में दिखाया गया है। ये प्रतीक घोड़े-हाथी, तोरण, स्तूप आदि के रूप में है।
स्तूप क्रमांक दो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है और यह पत्थर की सुंदर चारदीवारी से घिरा हुआ है। स्तूप क्रमांक तीन, पहले स्तूप के पास स्थित हैं। इस स्तूप के अंदरूनी भाग में बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्र और महामोगल्लेना के अवशेष पाए गए हैं।
अशोक स्तम्भ - यह स्तम्भ, मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार के पास स्थित है। वर्तमान में इसका स्तंभ ही वहाँ है। चार सिंहों वाला इसका प्रमुख शीर्ष नीचे संग्रहालय में देखा जा सकता है। एक दूसरे की ओर पीठ किए हुए ये चार सिंह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। यह स्तम्भ वास्तुकला की ग्रीक बौद्ध शैली का उत्कृषट नमूना है।
गुप्तकालीन मंदिर - अब लगभग खंडहर हो चुका यह मंदिर 5वीं शताब्दी में बना था। यह मंदिर भारतीय मंदिरों की प्राचीन शैली की झलक देता है।
बौद्ध विहार - साँची में प्राचीन बौद्ध विहारो के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं। जहाँ तत्कालीन बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।
बड़ा कटोरा - साँची में एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया एक बड़ा कटोरा है। कहा जाता है कि सभी बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिला अन्न इसमें डाल देते थे, जिसे बाद में सभी को बाँट दिया जाता था।
संग्रहालय - पहाड़ी के ठीक नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संग्रहालय की स्थापना की गई है। इस संग्रहालय में साँची के क्षेत्रों में मिली विभिन्न वस्तुएँ संग्रहित है। संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण है, अशोक स्तम्भ का शीर्ष, बुद्द की विभिन्न मूर्तियाँ तथा विहारों में रहने वाले भिक्षुओं के बरतन आदि।
साँची के नजदीक अन्य आकर्षण-
हेलियोडोरस स्तंभ - साँची से 12 किमी दूरी पर प्राचीन नगरी बेसनगर (विदिशा) स्थित है। यहाँ पाँचवी शताब्दी में ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा बनवाया गया स्तंभ दर्शनीय है।
उदयगिरी - विदिशा से चार किमी और साँची से सोलह किमी की दूरी पर स्थित हैं उदयगिरी की गु्फाएँ। इन गुफाओं में प्राचीन काल में हिंदू एवं जैन साधु-संत रहते थे। ऐतिहासिक महत्व की इन गुफाओं वाले पर्वत के शिखर पर छठी शताब्दी का गुप्तकालीन मंदिर है।
कब जाएँ - यूँ तो वर्षभर में किसी भी समय साँची की यात्रा की जा सकती है। लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च तक का समय साँची जाने के लिए बेहतर होता है। नवंबर में साँची में चैत्यगिरी विहार का उत्सव मनाया जाता है। उस समय बुद्ध के शिष्यों के अवशेष भी लोगों के दर्शन के लिए रखे जाते हैं।
कैसे जाएँ - साँची, झाँसी- इटारसी रेलमार्ग पर स्थित है। यहाँ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, परंतु नजदीकी बड़ा स्टेशन विदिशा 12 किमी दूर है। भोपाल से साँची की दूरी मात्र 46 किमी है। सड़क मार्ग द्वारा एक से डेढ़ घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है। भोपाल से टैक्सियाँ और बसें उपलब्ध है। भोपाल हवाई मार्ग से भी देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा़ हुआ है।
कहाँ ठहरें - साँची में ठहरने के लिए अनेक सुविधाएँ हैं। मप्र पर्यटन की ओर से लॉज एवं टूरिस्ट कैफेटेरिया में रूकने और भोजन की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त अनेक रेस्ट हाउस और लॉज हैं, जहाँ आराम से रूका जा सकता है।
बजट - छोटी जगह होने के कारण साँची बहुत महंगी जगह नहीं है। यहाँ आराम से ठहर कर घूमने के लिए लगभग 5000 रूपए पर्याप्त है।
टिप्स - 1. एक ऐतिहासिक स्थल होने के कारण साँची में पर्यटन का पूरा आनंद लेने के लिए गाइड अवश्य कर लें।
2. नकली गाइडों और दलालों से सावधान रहें।
3. साँची का धार्मिक महत्व होने के कारण वहाँ मर्यादित आचरण करें।
सौंदर्य से परिपूर्ण हैं नर्मदा की संगमरमरी चट्टानें
नर्मदा के घाटों का अलौकिक सौंदर्य
-उद्गम से लेकर सागर समागम तक नर्मदा का जो तेज, जो सौंदर्य, जो अठखेलियाँ और जो अदाएँ दिखाई देती हैं वे जबलपुर के अलावा अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रकृति ने तो इस क्षेत्र में नर्मदा को अतुलित सौंदर्य प्रदान किया ही, स्वयं नर्मदा ने भी अपने हठ और तप से अपने सौंदर्य में वृद्धि इसी क्षेत्र में की है।
यहाँ नर्मदा ने हठ और तप से रास्ता भी बदला है। पहले कभी वह धुआँधार से उत्तर की ओर मुड़कर सपाट चौड़े मैदान की ओर बहती थी। उसकी धार के ठीक सामने का सौंदर्य संभवतः नर्मदा को भी आकर्षित करता होगा।
तभी तो लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं। भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है। कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं।
भेड़ाघाट के नाम को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीन काल में भृगु ऋषि का आश्रम इसी क्षेत्र में था। इस कारण भी इस स्थान को भेड़ाघाट कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी स्थल पर नर्मदा का बावनगंगा के साथ संगम होता है।
लोक भाषा में भेड़ा का अर्थ भिड़ना या मिलना है। इस मत को मानने वालों के अनुसार इसी संगम के कारण इस स्थान का नाम भेड़ाघाट हुआ।
एक अन्य मत के अनुसार यह स्थान 1,700 वर्ष पूर्व शक्ति का केंद्र था। शैव मत वालों के अलावा शक्ति के उपासक भी यहाँ आते थे इसलिए निश्चय ही यह स्थान कभी भैरवीघाट रहा होगा और बाद में अपभ्रंश होकर भेड़ाघाट हो गया। गुप्तोत्तर काल में संभवतः इस मंदिर का विस्तार किया गया और इसमें सप्त मातृकाओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं थीं।
748 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र आज शैव, वैष्णव, जैन तथा अन्य मत-मतांतर मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र है। पर्यटन और सौंदर्य की दृष्टि से तो यह महत्वपूर्ण है ही। इस क्षेत्र में नौका विहार द्वारा भ्रमण करते समय नर्मदा के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। बंदरकूदनी तक पहुँचते-पहुँचते पर्यटक संगमरमरी आभा से अभिभूत होता है और रंग-बिरंगे पत्थर उसे मुग्ध कर देते हैं।
जबलपुर के भेड़ाघाट में जहाँ से नौका विहार शुरू होता है वहाँ स्थित है पचमढ़ा का प्रसिद्ध मंदिर। यहाँ एक ही प्रांगण में चार मंदिर हैं। दो सौ साल पुराने इन मंदिरों का सौंदर्य अद्वितीय है। ये सभी मंदिर शिव को समर्पित हैं। जबलपुर में इसके अलावा भी अनेक ऐसे स्थान हैं जो नर्मदा क्षेत्र के पर्यटन में चार चाँद लगाते हैं। इनमें ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेटाघाट, गोपालपुर, घुघुआ फॉल, चौंसठ योगिनी मंदिर और पंचवटीघाट जैसे सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल हैं।
इन क्षेत्रों में भी सौंदर्य की अपनी छटा है पर भेड़ाघाट के सौंदर्य के आगे सब फीके नजर आते हैं। जबलपुर में नर्मदा की आस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है ग्वारीघाट। शाम होते ही यहाँ का सौंदर्य अद्भुत होता है। घाट पर खड़े होकर नर्मदा की जलराशि में तैरते असंख्य दीप ऐसे लगते हैं मानो पूरा आकाश ही धरती पर उतर आया हो। नर्मदा की मद्धिम लहरों में झिलमिलाते दीपों का प्रकाश मन को प्रसन्न कर देता है।
रोज शाम को दीपदान करने वालों का रेला यहाँ पहुँचता है। नदी के बीच में देवी नर्मदा का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। नाव से वहाँ तक पहुँचकर पूजा करना रोमांचक अनुभव है। इसके अलावा घाट पर अनेक मंदिर हैं, जिनमें कुछ प्राचीन हैं तो कुछ हाल के वर्षों में बने हैं। घाट से दूर जाने पर माँ काली का प्राचीन और सिद्ध मंदिर है।
विभिन्न संतों के आश्रम भी आस-पास होने के कारण यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। कहते हैं नर्मदा के दर्शन से ही सारे पाप नष्ट होते हैं। इसलिए यहाँ दर्शनार्थियों का भी ताँता लगता है। ग्वारीघाट में नौका विहार की भी सुविधा है।
नर्मदा का दूसरा महत्वपूर्ण घाट है तिलवाराघाट। यहाँ लगने वाला मकर संक्रांति का मेला बड़ा प्रसिद्ध है। इस मेले का इतिहास भी प्राचीन है। यहाँ स्थित मंदिर भी बहुत प्राचीन है। पुराने समय से गोपालपुर स्थित मंदिर की बाहरी छटा अत्यंत सुंदर है।
अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ इतिहासबोध
'शब-ए-मालवा' से 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।
क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।
सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।
भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।
बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।
कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।
धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
इन्दौर का प्राणी संग्रहालय
केंद्रीय संग्रहालय, इंदौर एक राज्य स्तरीय संग्रहालय है, जहाँ मालवा से प्राप्त पुरावशेषों को एकत्रित कर शोधाथिर्यों एवं पर्यटकों एवं जनसामान्य को जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। केंद्रीय संग्रहालय भवन में मूर्तियाँ, जो अधिकांश परमार कालीन विशेषता लिए हुए हैं, के अतिरिक्त अभिलेख, मुद्राएँ, इटैलियन कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।
केंद्रीय संग्रहालय इंदौर की स्थापना 29 नवंबर, 1923 में हुई थी। यह तत्कालीन आयुक्त डॉ. अरुण्डले के निर्देशन में नररत्न मंदिर से प्रारम्भ हुआ। इसमें सबसे पहले 60 छायाचित्र तथा इस्लामी पुस्तक तथा 100 ग्रंथ रखे गए। एक अक्टूबर 1929 को इस संस्था को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया और कृष्णपुरा स्थित भवन, जहाँ वर्तमान में देवलालीकर कला वीथिका है, में दर्शकों के लिए प्रारंभ किया गया।
सन् 1930 में दसवीं शती की प्रतिमाएँ और प्रस्तर अभिलेख, उनके छापे, कुछ ताम्रपत्र संग्रहीत किए गए। सन् 1931 में यह संग्रहालय, जो शिक्षा विभाग के अधीन था, पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। स्थानीय लोगों के रुझान को देखते हुए आगरा-बाम्बे मार्ग पर नवीन संग्रहालय भवन की स्थापना कर यहाँ पर संग्रहालय विधा के अनुरूप पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया। इस संग्रहालय का कुल क्षेत्रफल 10804 वर्गफुट है तथा यह दोमंजिला है।
इस संग्रहालय में पुरावशेषों के प्रदर्शन के लिए छः वीथिकाएँ बनाई गई हैं। स्थानीय संग्रहों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में हुए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के प्रदर्शन के साथ-साथ हिंगलाजगढ़ की परमारकालीन विशिष्ट प्रतिमाओं का संग्रह इस संग्रहालय के लिए महत्वपू्र्ण माना जाता है। प्रस्तर अभिलेखों व उनके छापों के साथ-साथ ताम्र पत्रों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मुद्रा प्रणाली को जानने के लिए मुद्रा प्रचलन से लेकर मुगलकालीन सिक्कों तक को प्रदर्शित किया गया है।
पुरावस्तु वीथी
यहाँ से संग्रहालय का वास्तविक प्रदर्शन प्रारंभ होता है। सबसे पहले पुरावस्तु वीथिका है, जिसमें मानव का विकास तथा उसकी संस्कृतियों के विस्तार को क्रमबद्ध रूप में प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त मानव एवं पशुओं के जीवाश्म तथा पाषाण कालीन उपकरण प्रदर्शित हैं। बताया गया है कि इसी दीर्घा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से संबंधित मोहन-जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त अश्मोपकरण, ताम्र उपकरण आदि प्रदर्शित हैं। इनकी तिथि 2350 ईसा पूर्व के लगभग मानी जाती है।
मध्य प्रदेश के संग्रहालय
जीवन में एक बहुत ही अहम भूमिका है इतिहास की। ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है मनुष्य। आइए मध्यप्रदेश के कुछ संग्रहालयों में हम इतिहास को करीब से देखें।
भोपाल के प्रसिद्ध बिड़ला संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रतिमाएँ रखी गई हैं। आदिकाल में जब मनुष्य पत्थर इस्तेमाल करते थे उनके भी अंग यहाँ पर देखे जा सकते हैं।
सातवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक की ऐतिहासिक जगहों के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। पुराने सिक्के, पत्तों पर लिखे गए शब्द चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। टेराकोटा से बनाई गई प्रतिमाएँ यहाँ पर प्रयोग की जाती हैं।
भोपाल में राष्ट्रीय (सेंट्रल) संग्रहालय 1949 में स्थापित किया गया था। चित्रकला, पौराणिक सिक्के जिन पर राजा महाराजाओं एवं अँग्रेज शासकों के चित्र बनाए गए। ऐसे सिक्के यहाँ पर पाए जाते हैं। ताँबे या पीतल से बनाई गई वस्तुएँ मिलती हैं। लकड़ी से बनाई गई वस्तुएँ प्रदर्शित की जाती हैं। हाथ से बनाए गए भिन्न प्रकार की प्रतिमाएँ, कढ़ाई की गई वस्तुएँ देखी जा सकती हैं।
भोपाल में भारत भवन एक अलग प्रकार का संग्रहालय है। रंग महल, अन्हद, शास्त्रीय संगीत के भवन वागर्थ पुस्कालय जहाँ पर कविताओं की पुस्तकें रखी गई हैं। बहारि रंगमंच जहाँ पर नाटक, खेल, हास्य रंग आयोजित किए जाते हैं। मुख्य रूप से रूपांकर चित्रालय में असंख्य प्रकार के चित्र प्रदर्शित करते हैं। रूपांकर में दो प्रकार की चित्रकला देखी जा सकती है।
एक स्थान है जहाँ पर वर्तमान के चित्र एवं नक्काशी की प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। परंतु कुछ विभागों में लोक गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 4000 के करीब वस्तुएँ मध्यप्रदेश से संग्रहित की गई हैं। विभिन्न जाति की संस्कृति एवं कला से चित्र के माध्यम से परिचित किए गए हैं। इस राज्य में विभिन्न प्रकार के चित्र नजर आते हैं। भिन्न क्षेत्रों से वस्तुएँ संग्रहालय में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित कर दिए गए हैं। जीव, पक्षी एवं खिलौने के रूप में वस्तुएँ प्रदर्शित किए गए हैं।
ग्वालियर के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
वर्ष 1922 में इस संग्रहालय को स्थापित किया गया था। ताँबे की वस्तुओं पर सुंदर चित्र अंकित किए गए हैं। पत्थरों के स्तम्भ स्थापित किए गए हैं। टैराकौटा की प्रतिमाएँ वहाँ पर सजाई गई थीं। पद्मावती, बेसावनगर, उज्जयिनी एवं महेश्वर से पौराणिक वस्तुएँ मिली हैं।
साँची के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
राजा अशोक ने यहाँ पर स्तम्भ स्थापित किया था जिस पर शेर की मूर्ति लगाई गई थी। भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ श्रद्धापूवर्क स्थापित की गई थीं। भगवान गणेश की मूर्ति भी वहाँ पर है। साँची में सबसे प्रसिद्ध हैं सम्राट अशोक के बनाए गए स्तूप। मंदिर, मठ एवं स्तूप यहाँ पर स्थापित किए गए हैं।
केंद्रीय संग्रहालय
सन् 1929 में स्थापित संग्रहालय सबसे पुराना संग्रहालय है। मध्यप्रदेश के मालवा जिले में इस केंद्रीय संग्रहालय को स्थापित किया गया था। वहाँ पर विभिन्न प्रकार के चित्र, प्रतिमाएँ भी देखी जा सकती हैं।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।
गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।
इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।
गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।
कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी।
नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।
प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।
शिवशंभू का अनूठा धाम
ओंकारेश्वर हिंदू धर्म के पवित्र प्रतीक 'ओम' को प्रतिध्वनित करता है। यह हर उम्र के तीर्थ यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ नर्मदा और कावेरी का संगम है जिसमें श्रद्धालु डुबकी लगाने के बाद पवित्र ज्योतिर्लिंग के दर्शन को जाते हैं। ओंकारेश्वर का शिवलिंग देश के बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मंदिर को ओंकार मांधाता मंदिर के नाम से जाना जाता है।
मध्यप्रदेश के अन्य मंदिरों की तरह ही यह मंदिर भी प्रकृति से मनुष्य के जुड़ाव को प्रदर्शित करता है। यहाँ प्रकृति ने स्वयं दो पर्वतों के बीच एक खाई को जोड़कर ओम का आकार ग्रहण किया है।
मंदिर के उत्तर में विंध्य पर्वत और दक्षिण में सतपुड़ा के बीच नर्मदा नदी मूक वाहक की तरह है। पहले नदी में बहुतायत में घड़ियाल थे। अब भी यहाँ बड़ी संख्या में मछलियाँ हैं जिन्हें हाथों से दाना खिलाने का सुख प्राप्त किया जा सकता है। नदी पर स्थित पुल यहाँ की सुंदरता को द्विगुणित करता है।
ओंकार मांधाता मंदिर
यह मंदिर नर्मदा द्वारा काटे गए एक मील लंबे और आधा मील चौड़े द्वीप पर स्थित है। इसके नर्म पत्थरों को काटकर बारीक नक्काशी उकेरी गई है और विशेष रूप से इसका ऊपर का भाग देखने लायक है। मंदिर की छत भी बहुत सुंदरता से उकेरी गई है। मंदिर को घेरे हुए बरामदे में बने स्तंभों पर वृत्त, बहुकोणीय आकृतियाँ और वर्ग बने हुए हैं।
सिद्धनाथ मंदिर
यह मध्यकाल की ब्राह्मण कला का बेहतरीन नमूना है। इसकी विशेषता बाहरी दीवारों पर हाथियों की खूबसूरत नक्काशी है।
चौबीस अवतार
यहाँ हिंदुओं और जैन मंदिरों का समूह है। हरेक मंदिर स्थापत्य के लिहाज से बेहतरीन कला का नमूना पेश करता है।
सातमातृका मंदिर
ओंकारेश्वर से छ: किलोमीटर दूर यहाँ दसवीं शताब्दी के मंदिरों का समूह है।
काजल रानी की गुफा
ओंकारेश्वर से नौ किलोमीटर दूर यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थल है। क्षितिज तक फैले चौड़े हरियाले मैदान धरती से अंबर का मेल खाते से लगते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य अवर्णनीय है।
कैसे जाएँ
हवाई मार्ग
सबसे निकट का हवाई अड्डा इंदौर 77 किमी. दूर है जो मुंबई, भोपाल और दिल्ली से जुड़ा है।
सड़क मार्ग
यह इंदौर, उज्जैन और खंडवा से सड़क मार्ग से जुड़ा है।
रेल मार्ग
सबसे निकट का रेल मुख्यालय ओंकारेश्वर रोड 12 किमी. दूर है। यह पश्चिम रेलवे के रतलाम-खंडवा सेक्शन से जुड़ा है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च तक आप कभी भी यहाँ जा सकते हैं। अक्टूबर-नवंबर का महीना आदर्श कहा जा सकता है।
बेजोड़ नमूना : साँची
भारतीय इतिहास की बौद्ध परंपरा के स्वर्ण युग का अमिट दस्तावेज है साँची। प्रदेश की राजधानी भोपाल से 46 किमी पर स्थित साँची के स्मारक भारत में स्थित बौद्ध स्मारकों में सर्वाधिक आकर्षक और अतुलनीय है।
एक खूबसूरत छोटी पहाड़ी पर स्थित इन स्मारकों में विभिन्न स्तूपों के अलावा गुप्तकालीन मंदिर और विहार आदि शामिल है। विश्व धरोहर की सूची में शामिल इन स्मारकों का निर्माण तीसरी सदी ई.पू. से लेकर बारहवीं सदी ई. तक किया गया है।
प्रमुख आकर्षण-
स्तूप -: साँची स्थित इन स्तूपों का निर्माण प्राय: धार्मिक उद्देश्यों को लेकर किया गया था। कहा जाता है कि इन स्तूपों में बुद्ध और उनके शिष्यों के अवशेष रखे गए हैं। सर्वाधिक प्रसिद्ध स्तूप क्रमांक एक का निर्माण महान मौर्य शासक अशोक ने करवाया था। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि अशोक की पत्नी ‘देवी’ बेसनगर (वर्तमान विदिशा) के एक व्यापारी की बेटी थी। विदिशा साँची से 12 किमी दूर है।
स्तूप क्रमांक एक के चारो और स्थित चार द्वारों पर गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं को चित्रों के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। खास बात यह है कि इन चित्रों में बुद्ध को प्रतीकों के रूप में दिखाया गया है। ये प्रतीक घोड़े-हाथी, तोरण, स्तूप आदि के रूप में है।
स्तूप क्रमांक दो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है और यह पत्थर की सुंदर चारदीवारी से घिरा हुआ है। स्तूप क्रमांक तीन, पहले स्तूप के पास स्थित हैं। इस स्तूप के अंदरूनी भाग में बुद्ध के दो शिष्यों सारिपुत्र और महामोगल्लेना के अवशेष पाए गए हैं।
अशोक स्तम्भ - यह स्तम्भ, मुख्य स्तूप के दक्षिणी द्वार के पास स्थित है। वर्तमान में इसका स्तंभ ही वहाँ है। चार सिंहों वाला इसका प्रमुख शीर्ष नीचे संग्रहालय में देखा जा सकता है। एक दूसरे की ओर पीठ किए हुए ये चार सिंह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक हैं। यह स्तम्भ वास्तुकला की ग्रीक बौद्ध शैली का उत्कृषट नमूना है।
गुप्तकालीन मंदिर - अब लगभग खंडहर हो चुका यह मंदिर 5वीं शताब्दी में बना था। यह मंदिर भारतीय मंदिरों की प्राचीन शैली की झलक देता है।
बौद्ध विहार - साँची में प्राचीन बौद्ध विहारो के भग्नावशेष देखे जा सकते हैं। जहाँ तत्कालीन बौद्ध भिक्षु निवास करते थे।
बड़ा कटोरा - साँची में एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया एक बड़ा कटोरा है। कहा जाता है कि सभी बौद्ध भिक्षु भिक्षा में मिला अन्न इसमें डाल देते थे, जिसे बाद में सभी को बाँट दिया जाता था।
संग्रहालय - पहाड़ी के ठीक नीचे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संग्रहालय की स्थापना की गई है। इस संग्रहालय में साँची के क्षेत्रों में मिली विभिन्न वस्तुएँ संग्रहित है। संग्रहालय का प्रमुख आकर्षण है, अशोक स्तम्भ का शीर्ष, बुद्द की विभिन्न मूर्तियाँ तथा विहारों में रहने वाले भिक्षुओं के बरतन आदि।
साँची के नजदीक अन्य आकर्षण-
हेलियोडोरस स्तंभ - साँची से 12 किमी दूरी पर प्राचीन नगरी बेसनगर (विदिशा) स्थित है। यहाँ पाँचवी शताब्दी में ग्रीक राजदूत हेलियोडोरस द्वारा बनवाया गया स्तंभ दर्शनीय है।
उदयगिरी - विदिशा से चार किमी और साँची से सोलह किमी की दूरी पर स्थित हैं उदयगिरी की गु्फाएँ। इन गुफाओं में प्राचीन काल में हिंदू एवं जैन साधु-संत रहते थे। ऐतिहासिक महत्व की इन गुफाओं वाले पर्वत के शिखर पर छठी शताब्दी का गुप्तकालीन मंदिर है।
कब जाएँ - यूँ तो वर्षभर में किसी भी समय साँची की यात्रा की जा सकती है। लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च तक का समय साँची जाने के लिए बेहतर होता है। नवंबर में साँची में चैत्यगिरी विहार का उत्सव मनाया जाता है। उस समय बुद्ध के शिष्यों के अवशेष भी लोगों के दर्शन के लिए रखे जाते हैं।
कैसे जाएँ - साँची, झाँसी- इटारसी रेलमार्ग पर स्थित है। यहाँ एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, परंतु नजदीकी बड़ा स्टेशन विदिशा 12 किमी दूर है। भोपाल से साँची की दूरी मात्र 46 किमी है। सड़क मार्ग द्वारा एक से डेढ़ घंटे में आसानी से पहुँचा जा सकता है। भोपाल से टैक्सियाँ और बसें उपलब्ध है। भोपाल हवाई मार्ग से भी देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा़ हुआ है।
कहाँ ठहरें - साँची में ठहरने के लिए अनेक सुविधाएँ हैं। मप्र पर्यटन की ओर से लॉज एवं टूरिस्ट कैफेटेरिया में रूकने और भोजन की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त अनेक रेस्ट हाउस और लॉज हैं, जहाँ आराम से रूका जा सकता है।
बजट - छोटी जगह होने के कारण साँची बहुत महंगी जगह नहीं है। यहाँ आराम से ठहर कर घूमने के लिए लगभग 5000 रूपए पर्याप्त है।
टिप्स - 1. एक ऐतिहासिक स्थल होने के कारण साँची में पर्यटन का पूरा आनंद लेने के लिए गाइड अवश्य कर लें।
2. नकली गाइडों और दलालों से सावधान रहें।
3. साँची का धार्मिक महत्व होने के कारण वहाँ मर्यादित आचरण करें।
सौंदर्य से परिपूर्ण हैं नर्मदा की संगमरमरी चट्टानें
नर्मदा के घाटों का अलौकिक सौंदर्य
-उद्गम से लेकर सागर समागम तक नर्मदा का जो तेज, जो सौंदर्य, जो अठखेलियाँ और जो अदाएँ दिखाई देती हैं वे जबलपुर के अलावा अन्यत्र दुर्लभ हैं। प्रकृति ने तो इस क्षेत्र में नर्मदा को अतुलित सौंदर्य प्रदान किया ही, स्वयं नर्मदा ने भी अपने हठ और तप से अपने सौंदर्य में वृद्धि इसी क्षेत्र में की है।
यहाँ नर्मदा ने हठ और तप से रास्ता भी बदला है। पहले कभी वह धुआँधार से उत्तर की ओर मुड़कर सपाट चौड़े मैदान की ओर बहती थी। उसकी धार के ठीक सामने का सौंदर्य संभवतः नर्मदा को भी आकर्षित करता होगा।
तभी तो लगातार जोर मारती लहरों से चट्टानों का सीना चीरकर हजारों वर्ष के कठोर संघर्ष के बाद नर्मदा ने यह सौंदर्य पाया है जिसे निहारने देश ही नहीं, विदेशी पर्यावरण प्रेमी भी खिंचे चले आते हैं। संगमरमरी चट्टानों के बीच बिखरा नर्मदा का अनूठा सौंदर्य देखते न तो मन अघाता है और न आँखें ही थकती हैं। भेड़ाघाट, तिलवाराघाट के आस-पास के क्षेत्र का इतिहास 150 से 180 करोड़ वर्ष पहले प्रारंभ होता है। कुछ वैज्ञानिक इसे 180 से 250 करोड़ वर्ष पुरानी भी मानते हैं।
भेड़ाघाट के नाम को लेकर अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। प्राचीन काल में भृगु ऋषि का आश्रम इसी क्षेत्र में था। इस कारण भी इस स्थान को भेड़ाघाट कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी स्थल पर नर्मदा का बावनगंगा के साथ संगम होता है।
लोक भाषा में भेड़ा का अर्थ भिड़ना या मिलना है। इस मत को मानने वालों के अनुसार इसी संगम के कारण इस स्थान का नाम भेड़ाघाट हुआ।
एक अन्य मत के अनुसार यह स्थान 1,700 वर्ष पूर्व शक्ति का केंद्र था। शैव मत वालों के अलावा शक्ति के उपासक भी यहाँ आते थे इसलिए निश्चय ही यह स्थान कभी भैरवीघाट रहा होगा और बाद में अपभ्रंश होकर भेड़ाघाट हो गया। गुप्तोत्तर काल में संभवतः इस मंदिर का विस्तार किया गया और इसमें सप्त मातृकाओं की प्रतिमाएँ स्थापित की गईं थीं।
748 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र आज शैव, वैष्णव, जैन तथा अन्य मत-मतांतर मानने वालों के लिए आस्था का केंद्र है। पर्यटन और सौंदर्य की दृष्टि से तो यह महत्वपूर्ण है ही। इस क्षेत्र में नौका विहार द्वारा भ्रमण करते समय नर्मदा के अलौकिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं। बंदरकूदनी तक पहुँचते-पहुँचते पर्यटक संगमरमरी आभा से अभिभूत होता है और रंग-बिरंगे पत्थर उसे मुग्ध कर देते हैं।
जबलपुर के भेड़ाघाट में जहाँ से नौका विहार शुरू होता है वहाँ स्थित है पचमढ़ा का प्रसिद्ध मंदिर। यहाँ एक ही प्रांगण में चार मंदिर हैं। दो सौ साल पुराने इन मंदिरों का सौंदर्य अद्वितीय है। ये सभी मंदिर शिव को समर्पित हैं। जबलपुर में इसके अलावा भी अनेक ऐसे स्थान हैं जो नर्मदा क्षेत्र के पर्यटन में चार चाँद लगाते हैं। इनमें ग्वारीघाट, तिलवाराघाट, लम्हेटाघाट, गोपालपुर, घुघुआ फॉल, चौंसठ योगिनी मंदिर और पंचवटीघाट जैसे सौंदर्य से परिपूर्ण स्थल हैं।
इन क्षेत्रों में भी सौंदर्य की अपनी छटा है पर भेड़ाघाट के सौंदर्य के आगे सब फीके नजर आते हैं। जबलपुर में नर्मदा की आस्था का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है ग्वारीघाट। शाम होते ही यहाँ का सौंदर्य अद्भुत होता है। घाट पर खड़े होकर नर्मदा की जलराशि में तैरते असंख्य दीप ऐसे लगते हैं मानो पूरा आकाश ही धरती पर उतर आया हो। नर्मदा की मद्धिम लहरों में झिलमिलाते दीपों का प्रकाश मन को प्रसन्न कर देता है।
रोज शाम को दीपदान करने वालों का रेला यहाँ पहुँचता है। नदी के बीच में देवी नर्मदा का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण है। नाव से वहाँ तक पहुँचकर पूजा करना रोमांचक अनुभव है। इसके अलावा घाट पर अनेक मंदिर हैं, जिनमें कुछ प्राचीन हैं तो कुछ हाल के वर्षों में बने हैं। घाट से दूर जाने पर माँ काली का प्राचीन और सिद्ध मंदिर है।
विभिन्न संतों के आश्रम भी आस-पास होने के कारण यहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। कहते हैं नर्मदा के दर्शन से ही सारे पाप नष्ट होते हैं। इसलिए यहाँ दर्शनार्थियों का भी ताँता लगता है। ग्वारीघाट में नौका विहार की भी सुविधा है।
नर्मदा का दूसरा महत्वपूर्ण घाट है तिलवाराघाट। यहाँ लगने वाला मकर संक्रांति का मेला बड़ा प्रसिद्ध है। इस मेले का इतिहास भी प्राचीन है। यहाँ स्थित मंदिर भी बहुत प्राचीन है। पुराने समय से गोपालपुर स्थित मंदिर की बाहरी छटा अत्यंत सुंदर है।
अपने में इतिहास समेटे बाग की गुफाएँ
प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ इतिहासबोध
'शब-ए-मालवा' से 150 किलोमीटर दूर एक ऐसी एतेहासिक और प्राकृतिक धरोहर स्थित है जिसका ज्यादातर लोगों ने नाम तो सुना है लेकिन देखा कम ही है। दुर्गम स्थल पर स्थित होने के कारण सैर-सपाटा पसंद करने वाले लोग उस तरफ आसानी से रुख नहीं करते लेकिन दूर देश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह धरोहर एक जिज्ञासा का विषय हमेशा से बनी रहती है।
खासतौर से बौद्ध धर्म से जुड़े लोगों के लिए यह किसी तीर्थ से कम नहीं है। यह धार जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध बाग की गुफाएँ हैं जो अपने भित्ति चित्रों की वजह से अजंता के समकक्ष मानी जाती हैं। इन्हें भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व का सुरक्षित पुरा स्मारक घोषित कर रखा है।
क्या है बाग में :
बाग नदी और बाग कस्बे के नाम की वजह से इन गुफाओं को 'बाग की गुफाओं' के नाम से जाना जाता है। गुफाओं के बनाने के लिए खूबसूरत जगह का चुनना यह बताता है कि बाग गुफा मंडप के निर्माता प्राकृतिक सौन्दर्य के उपासक थे। वर्ष 1953 में भारत सरकार द्वारा बाग गुफाओं को 'राष्ट्रीय स्मारक' घोषित किया गया। इसके संरक्षण का जिम्मा पुरातत्व विभाग को सौंपा गया। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला के एक रेतीले पत्थर के पर्वत पर निर्मित इन गुफाओं की संख्या 9 है।
पहली गुफा 'गृह गुफा' कहलाती है। दूसरी गुफा 'पांडव गुफा' के नाम से प्रख्यात है। यह बाकी सब गुफाओं से अधिक बड़ी और अधिक सुरक्षित प्रतीत होती है। तीसरी गुफा का नाम 'हाथीखाना' है। इसमें बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कोठरियाँ बनी हुई हैं। चौथी गुफा को 'रंगमहल' कहा जाता है। पाँचवी गुफा बौद्ध भिक्षुओं के एक स्थान पर बैठकर प्रवचन सुनने के लिए बनाई गई थी। पाँचवी और छठी गुफा आपस में मिली हुई हैं तथा इनके बीच का सभा मंडप 46 फुट वर्गाकार है।
सातवीं, आठवीं और नौवीं गुफाओं की हालत ठीक नहीं है और वे अवशेष मात्र ही नजर आती हैं। इन गुफाओं की एक विशेषता यह भी है कि इनके अंदर जाकर इतनी ठंडक का अहसास होता है जैसे आप किसी एयरकंडीशन कक्ष में आ गए हों। गुफाओं के अंदर कई जगह से पहाड़ों से प्राकृतिक तरीके से पानी भी रिसकर आता रहता है। ये गुफाएँ कई शताब्दी पुरानी हैं।
लेकिन इनका काल निर्धारण आज भी नहीं हो पाया है। इतिहासविद इन्हें अजंता से पुराना तो नहीं मानते लेकिन यह जरूर मानते हैं कि यहाँ के भित्ति चित्रों में अंकित मनुष्यों की वेश-भूषा व अलंकार आदि से इनका समय वही निश्चित होता है जो अजंता की पहली और दूसरी गुफाओं का है। विख्यात इतिहासविद और पुराविद श्री कुमार स्वामी ने इन्हें पाँचवी शताब्दी का माना है।
भित्ति चित्र अब संग्रहालय में :
बाग की गुफाओं के भित्ति चित्र कई शताब्दियों तक प्रकृति ने सहेजकर रखे थे। बाद में जंगलों की कटाई और गुफाओं में बाबाओं-महात्माओं द्वारा आग जलाने और धुँआ करने के बाद इन भित्ति चित्रों पर संकट मंडराने लगा। गुफाओं के अंदर चमगादड़ों ने भी अपने डेरे बना लिए थे। नमी और आर्द्रता की वजह से भी भित्ति चित्र प्रभावित हो रहे थे। तब इन्हें गुफा से हटाने का निर्णय लिया गया।
1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई।
बाद में इन चित्रों को गुफाओं के सामने निर्मित संग्रहालय में रखा गया। इन चित्रों को अब संग्रहालय में ही देखा जा सकता है। गुफाओं के भीतर अब सिर्फ मूर्तियाँ ही बची हैं जिनमें से अधिकांश बुद्ध की हैं या फिर बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं को बयान करती हैं।
कैसे जाएँ, कब जाएँ :
बाग की गुफाएँ बहुत सुंदर स्थान पर स्थित हैं। सामने बाग नदी बहती है और चारों ओर हरियाली तथा जंगल हैं। धार जिले में विंध्य श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर, नर्मदा नदी की एक सहायक नदी बागवती के किनारे उसकी सतह से 150 फुट की ऊँचाई पर यह विश्व प्रसिद्ध गुफाएँ हैं। अगर आप स्वंय के वाहन से बाग जाना चाहते हैं तो उसमें काफी सहूलियत रहेगी। इंदौर से 65 किलोमीटर दूर है धार।
धार से 71 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी क्षेत्र टांडा है। यहाँ पहुँचने के बाद बाग कस्बा सिर्फ 20 किमी दूर रह जाता है। बाग पहुँचने के बाद 7 किमी का रास्ता तय करके इन गुफाओं तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ जाने का सबसे अच्छा मौसम बारिश का है क्योंकि गुफाओं के सामने बहने वाली बाग नदी उस समय बहती है। यह मौसमी नदी है और गर्मियाँ आने तक सूख जाती है। नदी के सूखने से वहाँ का दृश्य थोड़ा अधूरा-अधूरा सा लगने लगता है।
इन्दौर का प्राणी संग्रहालय
केंद्रीय संग्रहालय, इंदौर एक राज्य स्तरीय संग्रहालय है, जहाँ मालवा से प्राप्त पुरावशेषों को एकत्रित कर शोधाथिर्यों एवं पर्यटकों एवं जनसामान्य को जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। केंद्रीय संग्रहालय भवन में मूर्तियाँ, जो अधिकांश परमार कालीन विशेषता लिए हुए हैं, के अतिरिक्त अभिलेख, मुद्राएँ, इटैलियन कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं।
केंद्रीय संग्रहालय इंदौर की स्थापना 29 नवंबर, 1923 में हुई थी। यह तत्कालीन आयुक्त डॉ. अरुण्डले के निर्देशन में नररत्न मंदिर से प्रारम्भ हुआ। इसमें सबसे पहले 60 छायाचित्र तथा इस्लामी पुस्तक तथा 100 ग्रंथ रखे गए। एक अक्टूबर 1929 को इस संस्था को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया और कृष्णपुरा स्थित भवन, जहाँ वर्तमान में देवलालीकर कला वीथिका है, में दर्शकों के लिए प्रारंभ किया गया।
सन् 1930 में दसवीं शती की प्रतिमाएँ और प्रस्तर अभिलेख, उनके छापे, कुछ ताम्रपत्र संग्रहीत किए गए। सन् 1931 में यह संग्रहालय, जो शिक्षा विभाग के अधीन था, पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। स्थानीय लोगों के रुझान को देखते हुए आगरा-बाम्बे मार्ग पर नवीन संग्रहालय भवन की स्थापना कर यहाँ पर संग्रहालय विधा के अनुरूप पुरावशेषों को प्रदर्शित किया गया। इस संग्रहालय का कुल क्षेत्रफल 10804 वर्गफुट है तथा यह दोमंजिला है।
इस संग्रहालय में पुरावशेषों के प्रदर्शन के लिए छः वीथिकाएँ बनाई गई हैं। स्थानीय संग्रहों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में हुए उत्खननों से प्राप्त पुरावशेष, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों के प्रदर्शन के साथ-साथ हिंगलाजगढ़ की परमारकालीन विशिष्ट प्रतिमाओं का संग्रह इस संग्रहालय के लिए महत्वपू्र्ण माना जाता है। प्रस्तर अभिलेखों व उनके छापों के साथ-साथ ताम्र पत्रों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन मुद्रा प्रणाली को जानने के लिए मुद्रा प्रचलन से लेकर मुगलकालीन सिक्कों तक को प्रदर्शित किया गया है।
पुरावस्तु वीथी
यहाँ से संग्रहालय का वास्तविक प्रदर्शन प्रारंभ होता है। सबसे पहले पुरावस्तु वीथिका है, जिसमें मानव का विकास तथा उसकी संस्कृतियों के विस्तार को क्रमबद्ध रूप में प्रदर्शित किया गया है। इनमें प्रदेश के विभिन्न स्थानों से प्राप्त मानव एवं पशुओं के जीवाश्म तथा पाषाण कालीन उपकरण प्रदर्शित हैं। बताया गया है कि इसी दीर्घा में सिंधु-घाटी की सभ्यता से संबंधित मोहन-जोदड़ो के उत्खनन में प्राप्त अश्मोपकरण, ताम्र उपकरण आदि प्रदर्शित हैं। इनकी तिथि 2350 ईसा पूर्व के लगभग मानी जाती है।
मध्य प्रदेश के संग्रहालय
जीवन में एक बहुत ही अहम भूमिका है इतिहास की। ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है मनुष्य। आइए मध्यप्रदेश के कुछ संग्रहालयों में हम इतिहास को करीब से देखें।
भोपाल के प्रसिद्ध बिड़ला संग्रहालय में विभिन्न प्रकार की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक प्रतिमाएँ रखी गई हैं। आदिकाल में जब मनुष्य पत्थर इस्तेमाल करते थे उनके भी अंग यहाँ पर देखे जा सकते हैं।
सातवीं सदी से लेकर तेरहवीं सदी तक की ऐतिहासिक जगहों के चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। पुराने सिक्के, पत्तों पर लिखे गए शब्द चित्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। टेराकोटा से बनाई गई प्रतिमाएँ यहाँ पर प्रयोग की जाती हैं।
भोपाल में राष्ट्रीय (सेंट्रल) संग्रहालय 1949 में स्थापित किया गया था। चित्रकला, पौराणिक सिक्के जिन पर राजा महाराजाओं एवं अँग्रेज शासकों के चित्र बनाए गए। ऐसे सिक्के यहाँ पर पाए जाते हैं। ताँबे या पीतल से बनाई गई वस्तुएँ मिलती हैं। लकड़ी से बनाई गई वस्तुएँ प्रदर्शित की जाती हैं। हाथ से बनाए गए भिन्न प्रकार की प्रतिमाएँ, कढ़ाई की गई वस्तुएँ देखी जा सकती हैं।
भोपाल में भारत भवन एक अलग प्रकार का संग्रहालय है। रंग महल, अन्हद, शास्त्रीय संगीत के भवन वागर्थ पुस्कालय जहाँ पर कविताओं की पुस्तकें रखी गई हैं। बहारि रंगमंच जहाँ पर नाटक, खेल, हास्य रंग आयोजित किए जाते हैं। मुख्य रूप से रूपांकर चित्रालय में असंख्य प्रकार के चित्र प्रदर्शित करते हैं। रूपांकर में दो प्रकार की चित्रकला देखी जा सकती है।
एक स्थान है जहाँ पर वर्तमान के चित्र एवं नक्काशी की प्रतिमाएँ प्रदर्शित की गई हैं। परंतु कुछ विभागों में लोक गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। 4000 के करीब वस्तुएँ मध्यप्रदेश से संग्रहित की गई हैं। विभिन्न जाति की संस्कृति एवं कला से चित्र के माध्यम से परिचित किए गए हैं। इस राज्य में विभिन्न प्रकार के चित्र नजर आते हैं। भिन्न क्षेत्रों से वस्तुएँ संग्रहालय में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित कर दिए गए हैं। जीव, पक्षी एवं खिलौने के रूप में वस्तुएँ प्रदर्शित किए गए हैं।
ग्वालियर के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
वर्ष 1922 में इस संग्रहालय को स्थापित किया गया था। ताँबे की वस्तुओं पर सुंदर चित्र अंकित किए गए हैं। पत्थरों के स्तम्भ स्थापित किए गए हैं। टैराकौटा की प्रतिमाएँ वहाँ पर सजाई गई थीं। पद्मावती, बेसावनगर, उज्जयिनी एवं महेश्वर से पौराणिक वस्तुएँ मिली हैं।
साँची के पुरात्तात्त्विक संग्रहालय
राजा अशोक ने यहाँ पर स्तम्भ स्थापित किया था जिस पर शेर की मूर्ति लगाई गई थी। भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ श्रद्धापूवर्क स्थापित की गई थीं। भगवान गणेश की मूर्ति भी वहाँ पर है। साँची में सबसे प्रसिद्ध हैं सम्राट अशोक के बनाए गए स्तूप। मंदिर, मठ एवं स्तूप यहाँ पर स्थापित किए गए हैं।
केंद्रीय संग्रहालय
सन् 1929 में स्थापित संग्रहालय सबसे पुराना संग्रहालय है। मध्यप्रदेश के मालवा जिले में इस केंद्रीय संग्रहालय को स्थापित किया गया था। वहाँ पर विभिन्न प्रकार के चित्र, प्रतिमाएँ भी देखी जा सकती हैं।
ऐतिहासिक स्थलों की नगरी शिवपुरी
हल्की-हल्की बूँदों की वर्षा हो रही थी। प्रभात ने घने काले बादल की चुनरी ओढ़ रखी थी। सखियों के साथ मैं टाटा सफारी में सवार होकर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रही थी कि हमें एक ढाबा खुला दिखाई दिया। प्रातः पाँच बजे थे, मन कर रहा था कि हमें गरमागरम चाय मिल जाए तो सफर तय करना और भी आसान हो जाएगा।
गाड़ी ढाबे के पास रुकी, हमारी नज़र कोयले की आँच पर बन रही चाय से निकलते धुएँ पर पड़ी एवं उसके साथ-साथ नाश्ते के लिए बाजरे की रोटी तथा सब्जी मिली। ढाबे के चारों ओर हरियाली नज़र आ रही थी, रंग-बिरंगे महुए एवं पलास के फूल खिले हुए थे जिन पर वर्षा की बूँदें मोती की तरह चमक रही थीं।
इंदौर से शिवपुरी तक का सफर हम लगभग तय कर चुके थे। गुना क्षेत्र से हम गुजरते हुए शिवपुरी ज़िले में पहुँचे। हमारी नज़र यहाँ के पहा़डों पर पड़ी, जिन पर हरियाली थी एवं घने जंगल स्थित थे। वादियों के मध्य प्रकृति की गोद से झरने बह रहे थे एवं उठती सूर्य की किरणों के प्रकाश में वे झिलमिलाते, बलखाते हुए नदियों की ओर बह रहे थे।
गुना जिले से हम जब शिवपुरी नगर की ओर गाड़ी में सफर कर रहे थे तब हमने देखा कि सिंध नदी गुना से उत्तर दिशा से बहती हुई भिड़ से चंबल नदी से जा मिलती है। शिवपुरी की चार मुख्य नदियाँ हैं सिंध, कूनो, बेतवा एवं पार्वती।
कहते हैं कि शिवपुरी का माधव नेशनल पार्क, विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों के लिए बहुत ही प्रसिद्ध है। मुख्य रूप से नहार बाघ, तेंदुआ, लक्कड़ बग्घा, तरक्षु, भालू, सांभर आदि जानवर यहाँ पर पाए जाते हैं। वर्षा के आने से मोर अपने रंग-बिरंगे पंख को फैला देते हैं। उपस्थित जनता खूबसूरत दृश्य की प्रशंसा करने लगी तथा कैमरे से छायाचित्र लेने लगी।
नेशनल पार्क में पक्षी एवं जानवरों का हमने जीवंत रूप देखा। माधव विलास महल में सिंधिया राजवंश ग्रीष्म काल के समय निवास करते थे। वन वाटिका के मध्य स्थित यह महल गुलाब के फूल के समान प्रतीत हो रहा था। महल के भीतर कला की सुंदर मूर्तियाँ प्रदर्शित थीं। सुंदर आकृतियों वाले महल की छत से शिवपुरी नगर एवं माधव नेशनल पार्क नजर आते हैं। खूबसूरत चित्रकला से महल के विभिन्न कक्षों को सजाया गया था। अब यह महल भारत सरकार के अधीन है।
शिवपुरी में पर्यटक महाराजा एवं राजकुमारों द्वारा बनाई गई छतरियों को देखने आते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल पर विभिन्न गाथाएँ एवं प्राचीन कहानियाँ सुन सकते हैं। ये छतरियाँ संगमरमर की हैं एवं इन पर सुंदर आकृतियाँ उकेरी गई हैं। सिंधिया राजकुमारों ने इन्हें मुगल वाटिका में स्थापित किया था। इस स्थान पर माधवराव सिंधिया की छतरी स्थित है उसी तरह महारानी सँख्याराजे सिंधिया की सुंदर छतरी भी है। हिंदू एवं इस्लामी के वास्तुशिल्पीय मिश्रित रूप नजर आते हैं। राजपूत एवं मुगल परम्पराओं के वास्तुशिल्पीय को रूपांतर करती कला दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट करती है।
ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करने में काफी देर हो गई थी। सूरज ढलने वाला था कि हमारी दृष्टि जॉर्ज किले की ओर आकर्षित हुई। सँख्या सागर के तट पर स्थित इस किले को जीवाजीराव सिंधिया ने निर्मित किया था। परंतु इस किले की एक विशेषता है जो अक्सर आम किलों के स्थान पर देखी नहीं जाती, वह यह है कि यह महल माधव नेशनल पार्क के अंदर स्थित है। इसलिए महल की सुंदरता और निखर उठती है जब किले के चारों ओर घने जंगल स्थित हैं।
प्राचीन महलों एवं प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के दर्शन कर जब हम वापस लौट रहे थे तब हमने वहाँ के स्थानीय रंगमंच एवं लोकगीत सुने जो आदिवासी लोगों ने पात्रों के माध्यम से दर्शाए थे। कार्यक्रम के अंत में हम होटल वापस लौट आए।
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