सोमवार, 3 मई 2010

मिर्च-मसाला


फिर एक हो सकते हैं रणबीर-दीपिका
रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण में भले ही ब्रेक अप हो गया हो, लेकिन वे अभी भी संपर्क में हैं। उन्होंने फिर से एक होने की संभावनाओं को ‍जीवित रखा है।

रणबीर और दीपिका ने जब अलग होने का फैसला किया तो इस बात का ध्यान रखा कि उनके मन में एक-दूसरे के प्रति कड़वाहट ना हो। कहते है कि अलग होने का फैसला रणबीर का था और उनके अचानक लिए इस फैसले से दीपिका भी अन्य लोगों की तरह हतप्रभ रह गई थीं।

राहें जुदा होने के बावजूद रणबीर ने दीपिका से संपर्क बनाए रखा। सूत्रों के मुताबिक एसएमएस के जरिये वे एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं और विशेष मौकों पर बातें भी करते हैं। जब सलाह की जरूरत भी पड़ती हैं तो राय माँगने में भी वे हिचकते नहीं हैं।

पिछले दिनों रणबीर को महसूस हुआ कि दीपिका से अलग होने का उनका फैसला गलत था। दीपिका के साथ उन्होंने गलत किया, ये वे फील करने लगे। वे कोशिश कर रहे हैं कि दीपिका बीती बातों को भूला दें, लेकिन दीपिका शायद थोड़ा वक्त चाहती हैं।

पिछले दिनों प्रदर्शित ‘हाउसफुल’ में दीपिका की महत्वपूर्ण भूमिका है और उस फिल्म को देखने के लिए रणबीर अपने को रोक नहीं सकें। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने दीपिका को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे उनके साथ फिल्म देखें। दोनों ने थिएटर्स में साथ ‘हाउसफुल’ का मजा लिया। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि भविष्य में वे फिर साथ हो सकते हैं।

कश्मीरा शाह : गाँव की गोरी बनकर खुश
सेक्सी कश्मीरा शाह सोचती थीं कि रियलिटी शो ‘देसी गर्ल’ के लिए वे गाँव में जीवन कैसे बीता पाएँगी? लेकिन गाँव की गोरी बनकर उन्हें बेहद खुशी हुईं और उन्होंने ग्रामीण जीवन के अनुरूप अपने आपको ढाल लिया।



कश्मीरा को जब यह शो ऑफर हुआ था तब वे सोच में पड़ गई थीं कि आधुनिक लाइफ स्टाइल और शहर में रहने की आदी वे गाँव में कैसे रह पाएँगी। चुनौती मानकर उन्होंने इस शो को मंजूरी दे दी।

पंजाब के एक गाँव में इसकी शूटिंग चल रही है। शो के नियमों के मुताबिक उन्हें वो सब काम करने पड़ते हैं जो गाँव में रहने वाली लड़की करती है। सुबह जल्दी उठकर गाय का दूध निकालना पड़ता है। खेतों में काम करना पड़ता है। ग्रामीण जीवन जीना पड़ता है। कश्मीरा के साथ फिल्म और टीवी की दुनिया से जुड़ी अन्य लड़कियाँ भी हैं, जिनमें से एक देसी गर्ल बनेंगी।

कश्मीरा का कहना है कि गाँव की गोरी बनकर उन्हें बेहद खुशी मिली और जितना वे डर रही थीं वैसा कुछ नहीं हुआ।

रविवार, 2 मई 2010

मुलाकात


प्यार इम्पॉसिबल फील गुड मूवी है : प्रियंका चोपड़ा
‘प्यार इम्पॉसिबल’ की सफलता जिम्मेदारी प्रियंका चोपड़ा के नाजुक कंधों पर है क्योंकि वे फिल्म की सबसे बड़ी स्टार हैं। प्रियंका इस फिल्म को लेकर बेहद आश्वस्त हैं और उन्हें उम्मीद है कि युवाओं को यह फिल्म पसंद आएगी। पेश है प्रियंका से बातचीत।

‘प्यार इम्पॉसिबल’ आपको कैसे मिली?
उदय और जुगल ने एक बार मुलाकात के दौरान मुझे स्क्रिप्ट थमाई। उस दौरान मैं ‘कमीने’ की शूटिंग में व्यस्त थी। एक रात मैंने स्क्रिप्ट पढ़ने का निश्चय किया और सुबह चार बजे तक पढ़कर खत्म की। मुझे स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई और मैंने हाँ कह दिया।

फिल्म की कहानी के बारे आप कुछ बताना चाहेंगी?
यह एक प्रेम कहानी है, जो बड़े मजेदार तरीके से पेश की गई है। अभय शर्मा अपने कॉलेज की सबसे खूबसूरत लड़की अलिशा मर्चेण्ट को बेहद चाहता है, लेकिन कह नहीं पाता है। अलिशा को उसके बारे में कुछ भी नहीं पता रहता है। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के 6-7 वर्षों बाद वे फिर टकराते हैं और उन्हें एक-दूसरे को जानने का अवसर मिलता है।

अपनी भूमिका के लिए आपने क्या तैयारी की?
कुछ भी नहीं। सेट पर पहुँचकर जैसी मैं हूँ वैसा अपने आपको पेश किया। अलिशा के लुक के लिए मैंने अपने बालों को छोटा किया और उसे स्टाइलिश तरीके से पेश किया।

उदय चोपड़ा के बारे में क्या कहना चाहेंगी?
उदय और मैंने मिलकर खूब मस्ती की। उसने मुझे बिगाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। सेट पर उन्होंने हमेशा बेहतरीन भोजन मँगाया। अच्छा भोजन मेरी कमजोरी है, इसलिए मैंने जरूरत से ज्यादा खाया और थोड़ी मोटी हो गई। कई बार हम पूरी रात जागते थे। पैकअप के बाद जुगल, उदय, अहमद और मैं 24 घंटे खुले रहने वाले कॉफी शॉप में जाते थे और सुबह 6 बजे तक हर विषय पर बात करते रहते थे। एक निर्माता, एक लेखक और एक अभिनेता के रूप में उदय बेहतरीन हैं।

निर्देशक के रूप में जुगल हंसराज कैसे लगे?
मुझे तो लगता है कि जुगल में ‘ओवरएक्टिंग मीटर’ लगा है। थोड़ी-सी ओवर एक्टिंग हुई तो वे फौरन पकड़ लेते थे और कहते थे ‘ये थोड़ा सा ज्यादा हो गया।‘ उनके दिमाग में यह बात स्पष्ट रहती है कि वे क्या चाहते हैं। वे आराम से काम करना पसंद करते हैं और जल्दबाजी नहीं करते, जिससे कलाकारों पर भी दबाव कम रहता है। मुझे तो महसूस ही नहीं हुआ कि मैं फिल्म कर रही हूँ।

फिल्म का नाम ‘प्यार इम्पॉसिबल’ आपको कैसा लगा?
बहुत ही प्यारा नाम है और फिल्म के बारे में पूरी जानकारी देता है। अभय सोचता है कि यह प्यार पॉसिबल नहीं है। जब आप दो व्यक्तियों को साथ देखते हैं तो आप कह सकते हैं कि इनमें प्यार संभव नहीं है क्योंकि दोनों एक-दूसरे से बेहद अलग हैं। इससे बेहतरीन नाम फिल्म का हो ही नहीं सकता है।

फिल्म के संगीत के बारे में आपके क्या विचार हैं?
सलीम-सुलेमान प्रतिभाशाली संगीतकार हैं और उन्होंने बेहतरीन संगीत दिया है। ‘प्यार इम्पॉसिबल’ फील गुड मूवी है और वैसा ही उसका संगीत है। हर गाने को सुनने के बाद आप खुशी महसूस करेंगे। पहली बार मैंने ‘अलिशा’ गीत सुना तो मैंने उसे गाने की कोशिश की, लेकिन अनुष्का ने मुझसे बेहतर गया। हर गीत अपने आप में खासियत लिए हुए है।

यशराज फिल्म्स के साथ पहली बार आपने फिल्म की है। कैसा अनुभव रहा?
यह बैनर अब मुझे अपने घर जैसा लगता है। वायआरएफ में इतनी सुविधा मिलती हैं कि सारे एक्टर्स इस बैनर के साथ काम करने के बाद बिगड़ जाते हैं।

मिर्च-मसाला


6 लड़कियाँ गोद लेना चाहती हैं शर्लिन
सेक्सी शर्लिन चोपड़ा का कहना है कि वे एक या दो नहीं बल्कि आधा दर्जन लड़कियों को गोद लेकर उन्हें बेटी की तरह पालना चाहती हैं क्योंकि उन्हें बच्चे बेहद अच्छे लगते हैं।
सवाल यह है कि शर्लिन को रोका किसने है। वे वही करती हैं जो उनके दिल और दिमाग को अच्छा लगता है। विचार उनका अच्छा है, लेकिन बात तब बने जब उस पर अमल किया जाए।
खैर, शर्लिन हमेशा उटपटाँग काम ही नहीं करतीं बल्कि कभी-कभी वे अपनी ऊर्जा अच्छे कामों में भी खर्च करती हैं। पिछले दिनों उन्होंने उस संस्था के लिए रेम्प पर चलना मंजूर किया जो कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ काम करती है।

कौन बनेगी देसी गर्ल?


गोबर से उपले बनाएँगी कश्मीरा शाह
सोचिए अगर शहर में रहने वाली आधुनिक और सेक्सी गर्ल्स गाँव जाकर जिन्दगी व्यतीत करें तो कैसा नजारा होगा। इस नजारे को पेश करने जा रहा है इमैजिन एक रियलिटी शो के जरिये। शो का नाम है ‘देसी गर्ल’।
इस शो में मुंबई की आठ खूबसूरत लड़कियाँ पंजाब के एक गाँव में जाकर वहाँ की वास्तविकत जिन्दगी व्यतीत कर ‘देसी गर्ल’ का खिताब अपने नाम करने की कोशिश करेंगी। संभावना सेठ, कश्मीरा शाह, रोशनी चोपड़ा, मोनिका बेदी, अनमोल सिंह, रूचा गुजराती, इशिता अरुण और ऑशिमी साहनी के बीच ये मुकाबला है।
ये लड़कियाँ गाँव में रहने वाले परिवारों के साथ उनके घरों में रहेंगी और उन्हें वो सब काम करना पड़ेंगे जो गाँव की लड़की करती है। जैसे दूध दुहना, गाय के गोबर से उपले बनाना, घर की सफाई करना, खाना बनाना आदि।
इन खूबसूरत लड़कियों को साबित करना होगा कि वे केवल सौन्दर्य की प्रतिमूर्तियाँ नहीं हैं बल्कि उन्हें असली भारत में रहने की कला आती है और वे ‘देसी गर्ल’ का खिताब पाने की हकदार हैं। यह शो इमैजिन पर देखा जा सकेगा।

खुशियों की तलाश


खुशियाँ ढूँढिए अपने अन्दर!
हम चारों ओर खुशियों की तलाश में भटकते हुए सारा समय व्यर्थ कर देते हैं जबकि खुशी तो हमारे मन में ही बसी होती है। बस जरूरत होती है तो उसे बाहर निकालने की व दूसरों के साथ उन्हें बाँटने की।

खुशियाँ आपके दर पर खुद दस्तक नहीं देतीं। यह तो ईश्वर की तरफ से हरेक को दिया गया अनमोल उपहार है। पर अपने भीतर छिपे इस खजाने को स्वयं आपको खोजना होगा और इसे खोजने के लिए आपके पास कई उपाय हैं। स्वयं को हमेशा ऊँची नजर से देखना और अपने भीतर अपनी प्रतिष्ठा स्वयं बनाए रखने का प्रयास करना हमारी जीवन शैली को बेहतर बनाए रखने के लिए सर्वाधिक जरूरी है।

इसका अर्थ यह है कि आप अपने भीतर की शक्ति और अपनी कमजोरियों दोनों को स्वीकारें और स्वयं को हमेशा दूसरों के मुकाबले बराबरी का दर्जा देते हुए भी अपने भीतर उस ऊर्जा के स्रोत को पहचानकर निखारें, जो आपको दूसरों से अलग और विलक्षण बनाती है। शोध बताते हैं कि व्यायाम करने से हमारे शरीर में रक्त संचार नियमित होता है और हमारा शरीर अपने भीतर एक नई ताजगी और चेतना महसूस करता है। शरीर की यह ऊर्जा चमत्कारिक रूप से हमारे मस्तिष्क को प्रभावित करती है।

जीवन में जो बाँटेंगे, बदले में वही आपको वापस मिलेगा। इसलिए जब कभी आपको अपने भीतर एकाकीपन महसूस हो, अपने खालीपन को दूसरों के बीच भरने का प्रयास करें। इसी क्रम में किसी जरूरतमंद की मदद, किसी अस्पताल में रोगियों को दी गई सांत्वना की हल्की-सी थपकी आपके चेहरे की मुस्कान का कारण बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। चीजों को दार्शनिक अंदाज से देखने और जिंदगी को बहते पानी की तरह मानने वाले लोग अपने जीवन को अधिक आनंदित बना पाने में सफल होते हैं।

एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हममें से प्रत्येक को अपने जीवन को अपनी तरह से जीने की जिम्मेदारी समझनी चाहिए। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि यदि एक बार हम निर्णय ले सकें कि हममें परिस्थितियों को बदलने की क्षमता है तो हमारे आसपास का परिवेश सचमुच बदल सकता है।
खुश रहने के लिए सबसे अहम पहलू यह है कि हमें सबसे पहले अपने आपसे अपनी पहचान कायम करनी होगी। हमारे पास जितना है, उसे स्वीकार करना हमारी संतुष्टि के लिए जरूरी है। जो नहीं है, उसे लेकर पीड़ा और संताप का अनुभव करते रहना हमें मानसिक रूप से बीमार बनाताहै। ईश्वर का दिया हमारे पास बहुत कुछ है- यह दृष्टिकोण हमारी प्रसन्नता की कुंजी है।

यूँ तो जीवन उतार-चढ़ावों से भरा है, परंतु आपका आपसी साहचर्य आपके जीवन की खुशियों का केंद्रबिंदु है। अपने साथी के साथ भरोसे और प्रेम का व्यवहार और एक-दूसरे के प्रति समझ आपको निराशा के घने अंधकार से बाहर निकाल सकती है। इसलिए अपने और अपने करीबी को समझने का प्रयास अवश्य करें।

प्रशंसा करना हमारे व्यक्तित्व का सबसे खूबसूरत पहलू है। पर यह काम सभी नहीं कर पाते। यह भी एक कला है, जो धीरे-धीरे ही पैदा होती है। दूसरों की तारीफ करने में हम प्रायः कंजूस हो जाते हैं। आप अपने आसपास के हर अच्छे काम की दिल खोलकर प्रशंसा करें। आप पाएँगे कि दूसरों के चेहरे पर आई मुस्कान आपको ताजगी से भर देती है।

याद रखिए कि घर हमारे जीवन का वह कोना है, जहाँ हम स्वर्ग-सा सुख महसूस करते हैं। इसलिए अपने घर को अपनी तरह से आरामदायक बनाएँ। कभी-कभी उसमें किया गया थोड़ा-सा परिवर्तन चाहे वह पलंग का कोई कोना हो, दीवार पर टँगी कोई तस्वीर या ताजे फूलों कागुलदस्ता, आपकी प्रसन्नता का कारण बन सकता है। इसके अलावा रंग भी हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। हर रंग का अपना एक महत्व होता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि नारंगी या केसरिया रंग हमारे विश्वास को बढ़ाता है। हमारी नकारात्मक सोच को अपने भीतर समेटकर हमें प्रफुल्लित और उत्साहित बनाए रखता है।

किसी भी प्रसन्नचित व्यक्ति के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि वह हमेशा अपना दृष्टिकोण आशावादी रखे। मनोचिकित्सकों का मानना है कि प्रसन्नता सिर्फ इस बात पर प्राप्त की जा सकती है, यदि हम अपने भीतर दोहराएँ कि हम प्रसन्न स्वभाव के व्यक्ति हैं और हमें हमेशा खुश रहना है। इस तरह की कल्पना करने पर हमारा मस्तिष्क इस संदेश को और इन्हीं भावों को अपने भीतर ग्रहण कर लेता है और हमारे शरीर के स्नायु तंत्रों को भी इसी तरह के निर्देश देता है, तब कल्पना में की गई आपकी धारणा वास्तविक रूप से आपको आनंदित बनाए रख सकती है।

आलेख


जब हो मूड ऑफ...
दुनिया में कोई भी ऐसा इंसान नहीं है जिसका मूड ऑफ न होता हो। फिर चाहे वह जितना भी सभ्य, समझदार और सीधा हो। मूड में होना या मूड ऑफ होना वास्तव में सहज स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रियाएँ हैं।
इसलिए इनसे कभी छुटकारा नहीं पाया जा सकता। हाँ, थोड़ी-सी संवेदनशीलता और समझबूझ में मूड ऑफ होने के दौरान होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। पेश है मूड ऑफ के दौरान होने वाले नुकसान से बचने के कुछ कारगर टिप्स-

* मूड ऑफ होने के दौरान बात-बात पर गुस्सा आता है और हर व्यक्ति, स्थिति व चीज पर झुंझलाहट पैदा होती है। इससे लड़ाइयाँ हो जाती हैं, स्थितियाँ प्रतिकूल हो जाती हैं और चीजों पर गुस्सा उतरने के कारण वे टूट-फूट जाती हैं। इसलिए 'मूड ऑफ' होने के कारण गुस्सा न आए या न बढ़े, इसके लिए जैसे ही लगे कि मूड ऑफ हो रहा है, तेज चहलकदमी शुरू कर दें।

* अगर संभव हो तो पास के किसी पार्क या दूसरी खुली जगह पर निकल जाएँ। पार्क और खुली जगह का अभाव हो तो यूँ ही सड़कों पर निकल जाएँ और तेज-तेज कदमों से लगभग डेढ़-दो किलोमीटर तक चलें। निश्चित रूप से इससे मूड सही होगा।

* अगर घूमने के लिए बाहर जाना संभव न हो पाए तो तेज-तेज कूदना शुरू कर दें। जितनी ऊपर उठकर नीचे कूद सकें, उतना ही आसान होगा मूड सही करना।

* यह भी न करना हो तो दंड-बैठक लगाना शुरू कर दें।

* पर भूल से भी कभी मूड ऑफ के दौरान टीवी देखने, कोई किताब पढ़ने या करियर की प्लानिंग करने न बैठ जाएँ। नहीं तो और ज्यादा 'मूड ऑफ' होगा।

* मूड ऑफ हो तो उसे सही करने का एक तरीका ध्यान यानी मेडिटेशन और योगा भी है। लेकिन ध्यान और योग के जरिए वे ही लोग अपना मूड सही कर पाते हैं, जो इन विधाओं में पहले से ही सचमुच पारंगत हों।

* और यदि आपको ध्यान में जाना आता है तो आँखें बंद कर कुछ देर के लिए ध्यान लगाने बैठ जाएँ। इससे आपका मूड सही हो जाएगा।

* कहते हैं खुद का खुद से बड़ा न तो कोई मित्र होता है और न ही शत्रु। यदि आपका मूड ऑफ है तो बैठें और आँख मूँदकर खुद से ही बातें करने की कोशिश करें। दिल की आवाज को सुनें। तटस्थ होकर उस तूफान के वेग का अहसास करें, जो आपके अंदर इस समय उठ रहा है। निश्चित ही इससे आपको फायदा होगा।

* याद रखें जिस तरह दिन के साथ रात, प्रकाश के साथ अंधकार और सवाल के साथ जवाब का जोड़ा है, उसी तरह हर नकारात्मकता के साथ सकारात्मकता जुड़ी है। इसीलिए सिर्फ एक ही पहलू से किसी संदर्भ में मत सोचें। अगर किसी परेशानी से घिरे हैं और नकारात्मक ख्याल ही बार-बार आ रहे हैं तो सोचें कि इसका एक सकारात्मक हल भी अवश्य होता है।

उखड़े मूड को ठीक करने के कुछ उपाय ये भी हैं मसलन कोई मनपसंद चीज खाएँ, कोई पसंदीदा काम करें जैसे अपनी हॉबी, दिल को अच्छा लगने वाला गीत-संगीत सुनें। इस सबसे भी उखड़ा मूड ठीक होता है। लेकिन मूड ठीक करने के लिए सिगरेट, शराब, कॉफी या चायका इस्तेमाल कतई न करें। इससे और ज्यादा मूड खराब हो सकता है।

सोलह श्रृंगार


मेहँदी है रचने वाली, हाथों में गहरी लाली
शादी या किसी भी पारंपरिक त्योहारों की बात हो या जाना हो किसी पार्टी में, मेहँदी के बिना मेकअप पूरा नहीं होता। सोलह श्रृंगार में प्रतिष्ठित मेहँदी की रंगत भी समय के साथ काफी बदली है। अब तो मेहँदी लगाने से लेकर उसे तैयार करने के तरीके में खासा बदलाव आ गया है।
बदलाव की इस दौ़ड़ में ग्लिटर और टैटू भी मेहँदी की लिस्ट में शामिल हो गए हैं। मेहँदी परंपरा से अधिक अब फैशन बन गई है और जरूरत, रचाने के लिए मेहँदी उपलब्ध समय, समारोह के प्रकार के हिसाब से अलग- अलग रूपों में लगाई जाने लगी है। मेहँदी के क्षेत्र में हुए सारे परिवर्तन आज की महिलाओं ने न सिर्फ अपना लिए हैं बल्कि अब ये सब फैशन के अंग हो गए हैं।

ग्लिटर मेहँदी का ग्लो
फैशनेबल मेहँदी के रूप में ग्लिटर मशहूर है। यूँ ग्लिटर मेहँदी में मेहँदी का कोई उपयोग नहीं होता। यह शुद्धरूप से केमिकल से बनी होती है, पर तुरन्त लग जाने और ग्लो करने के साथ ही यह हर कलर में उपलब्ध होती है। इसलिए मैचिंग के दीवाने इसका खूब उपयोग करते हैं। जिस कलर की ड्रेस पहनी हो उसी कलर की मेहँदी भी लगानी हो तो ग्लिटर मेहँदी सबसे अधिक उपयुक्त होती है। अब इसके साथ स्टोन का भी चलन है। ग्लिटर के साथ ही मैचिंग स्टोन या कंट्रास्ट स्टोन लगाकर मेहँदी को आकर्षक बनाया जाता है।
टैटू पारंपरिक और अरेबियन दोनों प्रकार के डिजाइनों में उपलब्ध होते हैं। पेड़ से पत्ते तो़ड़कर सिल पर पीसने और हाथों में रचाने का सिलसिला तो पुराना हो ही चुका है अब तो पैक मेहँदी पाउडर की जगह तैयार कोन भी मिलने लगी हैं। बस कोन खरीदें और लगाना शुरू करें।
पारंपरिक का जलवा
वैसे तो फैशन के हिसाब से मेहँदी की डिजाइनों में काफी बदलाव आया है। जब बात त्योहारों और शादियों की हो तो पारंपरिक डिजाइन ही पसंद किए जाते हैं। शादियों में दुल्हन अभी भी पारंपरिक मेहँदी ही प्रयोग में लाती हैं। पारंपरिक मेहँदी भरावट वाली होती है और इससे हाथ या पैर पूरे भरे-भरे दिखते हैं।
रचने के बाद भरावट वाला हिस्सा अधिक सुन्दर दिखता है। इस डिजाइन में आजकल सजावट के लिए ऊपर से ग्लिटर या स्टोन का भी उपयोग होता है, पर बेस-मेहँदी डिजाइन में पारंपरिक डिजाइनें होती हैं।
राजस्थानी का राज
राजस्थानी शैली की मेहँदी एक प्रकार से पारंपरिक मेहँदी डिजाइनों का ही एक भाग है। इसके कुछ प्रतीक काफी लोकप्रिय हैं जो कि अन्य डिजाइनों के साथ भी मर्ज करके रचाए जाते हैं। इन प्रतीकों में मोर सबसे अधिक प्रचलित है। इसके अलावा नगा़ड़े, ढोल, दुल्हन, दूल्हा, तुरही, कलश आदि प्रतीकों के कारण राजस्थानी मेहँदी लोगों की पसंद में शामिल है।
इस डिजाइन की खासियत यह है कि इसे भरे-भरे रूप में और पूरे हाथ में एक सा नहीं लगाया जाता। बल्कि डिजाइन को आकर्षक मो़ड़ देकर एक पतली लकीर के रूप में डिजाइन बनाई जाती है।