शुक्रवार, 7 मई 2010

जागरूकता


डायटीशियन : बेहतर विकल्प
संतुलित और सही आहार हमारे शरीर के लिए बेहद जरूरी है। लिहाजा हमारी शारीरिक जरूरतों के मुताबिक कितने पोषक तत्वों की जरूरत होती है और कौन से खाद्य पदार्थ सेहत को नुकसान पहुँचा सकते हैं, इसका जवाब एक डाइटीशियन ही दे सकता है। जीवनशैली में आ रहे बदलावों और उनके दुष्परिणामों के चलते डाइटीशियन एक बेहतर करियर विकल्प के रूप में उभरा है। अलबत्ता यह पेशा अपनाकर आप अपना ही नहीं, बल्कि दूसरों की सेहत का भी ख्याल बखूबी रख सकते हैं।

बहरहाल अभी भी पोषक तत्वों के मामले में इस जरूरत को लेकर आम लोगों में बहुत ज्यादा जागरूकता नहीं है, फिर भी सेलिब्रिटी व युवा वर्ग इस मामले में काफी सचेत होता जा रहा है। वह खाने-पीने के मामले में डाइटीशियन के मुताबिक बनाए डाइट प्लान को ही फॉलो करता है।

यही वजह कि अब युवाओं में बतौर डायटीशियन करियर बनाने की तरफ रुझान बढ़ा है। एक डायटीशियन को संबंधित व्यक्ति की जीवन शैली, खाने की आदतों, सामाजिक स्तर, आयु और पाचन तंत्र की कार्यक्षमता के आधार पर आहार की सूची बनानी पड़ती है। एक डायटीशियन के रूप में आप नवजात शिशु से लेकर बुजुर्ग, बीमार और खिलाड़ि‍यों तक की डाइट का चार्ट बना सकते हैं। डायटीशियन लोगों को सलाह देता है कि स्वस्थ रहने के लिए उसे किस तरह का भोजन करना चाहिए।

डायटीशियन का कार्य जितना आसान दिखाई देता है वास्तव में वह उतना आसान नहीं है, क्योंकि रोगियों के लिए व्यक्तिगत आहार योजना बनाते हुए विभिन्न क्लीनिकल घटकों को ध्यान में रखना होता है। साथ ही रोगियों की जीवन शैली, खान-पान की आदतों पर भी विचार करना होता है।

कार्पोरेट क्षेत्र में माँग
डायटीशियन अमिषा तापड़ि‍या के मुताबिक कार्पोरेट स्तर पर भी डायटीशियन की माँग बढ़ी है। पाँच सितारा होटलों में भी डायटीशियनों की सेवाएँ ली जाती हैं। यहाँ वे शेफ की मदद से ग्राहकों के लिए संतुलित आहार चार्ट तैयार करते हैं। वे यह सुनिश्चित करने में भी मदद करते हैं कि ग्राहकों को परोसा जा रहा भोजन न सिर्फ खाने लायक हो, बल्कि पौष्टिक भी हो।

मौजूदा वक्त में मल्टीनेशनल कंपनियों में डिब्बाबंद और रेडी टू इट खाद्य पदार्थों का भी काफी चलन है। पिज्जा हट और जंक फूड के पार्लर सारे देश में छाए हुए हैं। यहाँ दाम की प्रतिस्पर्धा के साथ ही ग्राहकों को अच्छी गुणवत्ता और उचित कैलोरी आहार देने के दावे किए जाते हैं। इन सभी क्षेत्रों में डायटीशियनों के लिए बहुत अच्छी संभावनाएँ हैं।

इंटर्नशिप जरूरी
डायटीशियन पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद अनुभव प्राप्त करने के लिए इंटर्नशिप बहुत जरूरी है। ऐसे में आप किसी अस्पताल में इंटर्नशिप कर सकते हैं या किसी डायटीशियन के साथ भी काम कर सकते हैं। अगर आप स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस करना चाहते हैं, तो इसके लिए आपको रजिस्टर्ड डायटीशियन की परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। शैक्षिक योग्यता के साथ-साथ इस पेशे में एक वैज्ञानिक नजरिए की भी बड़ी जरूरत होती है। स्वास्थ्य व पोषण संबंधी विषयों की जानकारी होने के साथ व्यवहार कुशलता भी अनिवार्य है।

गुरुवार, 6 मई 2010

वामा



शादी के बाद बातें कम
जिस प्रकार आपकी बेटी स्टेज पर जाने से पूर्व ब्यूटी पार्लर में जाएगी, वैसे ही अभी यह लहँगा ब्यूटी पार्लर में जाएगा। इसे चमका दिया जाएगा। आपके सामने वह बिटिया जो ...
शादी से पहले लोग घंटों अपनी प्रेमिका या मंगेतर से बातें करते हैं । यहाँ तक कि फोन पर भी बातों का सिलसिला खत्म नहीं होता। लेकिन ब्रिटेन के शोधकर्ताओं के मुताबिक शादी के बाद धीरे-धीरे बातों का यह सिलसिला कम होने लगता है और शादी के 50 सालों के बाद तो लोग खाने के वक्त औसतन सिर्फ तीन मिनट ही अपने जीवनसाथी से बातें करते हैं ।
ये बातचीत भी ज्यादातर केचप माँगने तक ही सीमित होती है। इस दौरान लोग 150 से ज्यादा शब्दों का प्रयोग भी नहीं करते ।शादी से पहले लोग अपनी प्रेमिका या मंगेतर से करियर, दोस्तों, संगीत और बच्चों के बारे में एक घंटे में लगभग 50 मिनट तक बातें करते हैं। लेकिन शादी के तुरंत बाद यह आँकड़ा घंटे में चालीस मिनट तक आ जाता है। शादी के बीस सालों के बाद यह आँकड़ा घंटे में 21 मिनट और शादी के तीस साल बाद घंटे में 16 मिनट तक आ जाता है ।
बच्चों के आ जाने के बाद तो यह संवाद और भी कम हो जाता है। आँकड़ों के मुताबिक रात के भोजन के वक्त लगभग एक घंटे में लोग 35 मिनट तो बच्चों से बातें करते हैं लेकिन जीवनसाथी के लिए सिर्फ दस मिनट ही निकाल पाते हैं।
एक डेटिंग वेबसाइट द्वारा किए गए इस सर्वे में पाँच सौ ब्रिटिश जोड़ों को शामिल किया गया था।

काव्य-संसार



तप लो तुम सूर्य
तपना है जितना तुम्हें
तप लो उतना
तुम सूर्य...।
धर कर कंधे गैती, फावड़ा
लेकर हाथों में कुदाल
हमें तो खोदना है
नहरें -कुएँ -ताल...
बनाना है मेड़ें, भरना है नीवें
तोड़ना पत्थर
सिर पर तसला रख
पहुँचाना है गारा
आखिरी मंजिल तक।
घड़ना है घर, मकान, भवन
लगाना है कहकहे, जमीन पर
सोना है गहरी नींद
आखिरी साँस तक जीना है जीवन
रहना है टन्न...।
तपना है जितना तुम्हें
तप लो उतना
सूर्य...।
तापते रहेंगे तुम्हें हम ऐसे
जैसे ताप रहे हों शीत में अलाव
रिसाते रहेंगे पसीना, ऐसे
जैसे रिसता है, पानी मिट्टी के घड़े से।
झेलेंगे तुम्हें, निडर बेफिकर
लगाए रहेंगे, छोड़ेंगे नहीं झड़ी लगने की आस
सूरज का ताप झेल
सहकर हम काले हुए
कोयले की तरह।
भीतर का ताप-दाब
सहकर पिघले-गले
तली में रहे
तेल की तरह।
भूतल पर चला हल
उर्वर किया जननी को
अंदर हमारे आग है भरपूर
जिएँगे धरती के संग
डिगेंगे नहीं... अंत तक...
रहेंगे डटे...।
तुम्हें जितने तपना है
तप लो तुम
उतना सूर्य...।


सुस्ताई हुई छाँव



* गर्मियाँ शुरू हो गई हैं
अब सहा नहीं जाता घाम
उड़ने लगी है धूल
जब भी देखता हूँ
किसी पेड़ के तले
सुस्ताई हुई छाँव को
सहसा याद आ जाता है तुम्हारा नाम।

वामा


प्लस साइज के रूमानी सपने
तो चलिए साहब...सानिया और शोएब की शादी भी आखिरकार निपट ही गई... ढेर सारे 'डिरामे' के बाद आखिरकार आयशा बेगम से शोएब साहब ने छुटकारा पा ही लिया...कारण...? उनसे ये 'भारी' बला झेली नहीं जा रही थी। निकाह करते समय तो मासूम शोएब, आयशा के शरीर का क्षेत्रफल शायद नहीं भाँप पाए...हो सकता है एवज में मिलने वाली रकम या ऐसी ही किसी चीज को उन्होंने भाँप लिया हो... खैर... वो तो भला हो सानिया मैडम का कि उन्होंने शोएब को देह के उस परिमाप से बाहर निकाल लिया। लेकिन क्या सच में वे ऐसा कर पाई हैं?
असल में बात फिर उसी बरसों-बरस पुरानी बहस पर आकर रुकती है कि क्या इंसान का दैहिक रूप से सुंदर होना ही सबकुछ है या उसका मन भी उतना ही सुंदर होना चाहिए? भारतीय समाज में आज भी वैवाहिकी विज्ञापनों से लेकर लड़की देखने आए लोगों की पहली पसंद दुबली-पतली लड़कियाँ ही होती हैं।
यहाँ तक कि शादी के पहले न केवल लड़की के माता-पिता बल्कि उसका होने वाला पति तक उस पर ये दबाव डाल सकते हैं कि वो अपने शरीर से कुछ किलो कम कर ले। इतना ही नहीं शादी के बाद भी शरीर पर बढ़े एक्स्ट्रा किलो किसी भी महिला के दिमाग पर सैकड़ों किलो का बोझ बनकर छा जाते हैं... कि अगर वजन कम नहीं किया तो गया पति हाथ से। क्या पत्नी केवल देह के रूप में ही पति का साथ देती है?
सका रोज सुबह से उठकर पति की पसंद का खाना बनाना, घर और बच्चों की साज-संभाल करना, आर्थिक रूप से पति का हाथ बँटाना, पति की बीमारी में पागलों की तरह उसका ध्यान रखना... ये सब काम करना वो भी निस्वार्थ और खुद की तरफ देखे बिना...क्या इसका कोई मोल नहीं? फिर सबसे बड़ा प्रश्न, अपवादों को छोड़ दें तो क्या एक युवती मोटे लड़के से शादी करने से आसानी से मना कर सकती है या एक स्त्री अपने पति के मोटे होने पर उससे मुँह फेर सकती है?
एक बेकरी शॉप के सामने खड़ी वो 20-22 साल की क्यूट-सी युवती मुझे अब तक याद है जो किसी बच्चे की-सी हसरत से पेस्ट्रीज़ की तरफ देख रही थी। उसके साथ खड़ी उसकी माँ ने तुरंत टोका- 'गुड़िया, नहीं... याद है ना ये सब नहीं खाना है तुम्हें।' उतनी ही मासूमियत से उसने कहा-'अच्छा मैं नहीं खाऊँगी...पर माँ शादी के बाद मत टोकना...मैं शादी के बाद ये सब खाऊँगी।'
कुछ देर को उसकी माँ की भी आँखें सजल हो गईं और वो पास खड़ी महिला से बोलीं-'क्या करूँ...सब लड़कों को दुबली लड़की चाहिए। अपने बच्चे को खाने से टोकते हुए जी तो दुखता है...पर...।'
चौड़ी फ्रेम या थोड़ा भारी शरीर भारतीय महिलाओं की आधारभूत संरचना का हिस्सा है। और इस फ्रेम को बदलना इंसान के हाथ में तो कतई नहीं। आज से कई साल पहले तक थोड़े भरे बदन वाली महिलाओं को सुंदर श्रेणी में ही रखा जाता था... लेकिन अब तो सबको जीरो फिगर चाहिए...फिर चाहे इसके लिए कितने ही यंत्रणादायक या कृत्रिम तरीके क्यों न अपनाने पड़ें।
यह सही है कि शरीर का तंदरुस्त होना जरूरी है और बदलते समय के साथ व्यायाम तथा अन्य तरीकों से खुद को फिट बनाए रखना भी जरूरी है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं कि केवल शरीर के मापदंड पर किसी इंसान को मजाक बनाकर रख दिया जाए! या फिर स्लिम होने के बिलकुल हवाई मापदंड बना लिए जाएँ।

मंगलवार, 4 मई 2010

टीम इंडिया के साथ


वेलडन प्राची
कक्षा : सातवीं
स्कूल : एएनवी स्कूल, फरीदाबाद
रुचि : डांस, ड्रॉइंग और ट्रैवलिंग
आज से शुरू हो रहे टी-20 व‌र्ल्ड कप में टीम इंडिया के साथ मैदान में होगी नन्ही प्राची दुआ भी। वह वहां नेशनल एंथेम गाती हुई नजर आएगी। आओ मिलते हैं प्राची से..

यह छोटा-सा प्रोफाइल है एक साधारण सी बच्ची प्राची दुआ का, जो अब सेलिब्रिटीज की जमात में शामिल होने जा रही है। तुम यही सोच रहे होगे कि जाने-माने खिलाडियों के बीच ग्यारह साल की प्राची क्या कर रही है? हां, तो हैरान न हो। टी-20 व‌र्ल्ड कप क्रिकेट में उसे दुनिया भर के लोग क्रिकेट सितारों के साथ देखेंगे। दरअसल, वह क्रिकेट नहीं खेलेंगी, बल्कि टीम इंडिया में जज्बा भरने के लिए उनके साथ राष्ट्रगान में हिस्सा लेगी। प्राची के साथ देश भर से 15 लडकियां चुनी गई हैं। प्राची बताती है, दरअसल, मैदान में प्रवेश करने के बाद टीमें अपना-अपना राष्ट्रगान गाती हैं। मैं अपने देश की टीम के साथ राष्ट्रगान गाऊंगी। हर खिलाडी के साथ एक बच्ची होगी। मेरी ख्वाहिश है कि मुझे कैप्टन धौनी के साथ राष्ट्रगान गाने का मौका मिले। प्राची वेस्टइंडीज जाकर इंडिया के कल्चर का प्रचार-प्रसार करेंगी। वह कहती हैं, वहां के बच्चों के साथ कल्चरल-एक्सचेंज प्रोग्राम होंगे, जिनमें हिस्सा लेकर मैं अपने देश की खूबसूरती और यहां के गौरव का खूब बखान करूंगी। और हां, मैं अपने मेजबान कंट्री के बच्चों के लिए गिफ्ट्स भी ले जा रही हूं।आत्मविश्वास से लबरेज प्राची को इतना बडा मौका मिला कैसे? उसे इस महत्वपूर्ण आयोजन में एंट्री करने के बारे में किसने जानकारी दी? इस सवाल के जवाब में वह कहती है, फरवरी के अंतिम हफ्ते में मेरी क्लास टीचर ने हमें इस आयोजन के बारे में बताया था। ऑडिशन फॉर्म देते हुए उन्होंने बताया था कि ऑडीशन में सेलेक्शन का मतलब है टी-20 व‌र्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम के साथ वेस्टइंडीज जाना।क्या तुम्हें यकीन था कि ऑडिशन देने के बाद तुम्हारा सेलेक्शन हो जाएगा? बिल्कुल-प्राची कॉन्फिडेंटली जवाब देती है। लेकिन कैसे? ऐसा जरूरी तो नहीं? क्यों नहीं, मैं शुरू से ही डांस कॉम्पिटिशन में अवा‌र्ड्स लेती रही हूं। स्टेज शोज में हिस्सा लेना मेरे लिए कोई नई बात नहीं। इस तरह से यह ऑडिशन भी मेरे लिए मुश्किल नहीं था। मैंने यहां भी जिस गाने पर कहा गया, उस पर डांस किया, उसका वीडियो बना, उसे जज ने देखा और फाइनली मुझे कॉल आ गया। सच तो यह है कि कॉन्फिडेंस हो, तो सब कुछ संभव है-प्राची पूरे ठसक से जवाब देती है। वह वेस्टइंडीज अपने पापा के साथ गई है। जाने से ठीक एक दिन पहले अपनी पैकिंग, गिफ्ट्स, वहां होने वाले कल्चरल-एक्सचेंज प्रोग्राम आदि को लेकर वह काफी एक्साइटेड थी। फ्रेंड्स, टीचर, पैरेंट्स, बुआ, ताई सबके प्रोत्साहन और प्यार का जिक्र करते हुए वह फूले नहीं समा रही थीं, लेकिन एक अकेली बात ने उसे काफी सेंटी बना दिया था। वह कहती है, मेरे फ्रेंड्स मेरे वेस्टइंडीज जाने पर जितने एक्साइटेड और खुश हैं, उतने दु:खी भी। दरअसल, वे मुझसे बहुत प्यार करते हैं। इसलिए मेरे जाने की खबर सुनते ही वे रोने भी लगे। मैं भी उन्हें बहुत मिस करूंगी। प्राची पढाई में भी काफी अच्छी है। क्लास में हमेशा अच्छे नंबरों से पास होती रही है। एक महीने के वेस्टइंडीज टूर की वजह से वह पढाई में पिछड नहीं जाएगी? प्राची जवाब देती है, मेरे टीचर्स इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि क्लासेज मिस होने से मैं काफी पीछे रह जाऊंगी, इसलिए वापस लौटने के बाद मेरी रिकवरी के लिए वे एक्सट्रा क्लासेज की व्यवस्था करेंगे। प्राची पहली बार विदेश जा रही है। वैसे तो उसका पसंदीदा देश फ्रांस है, लेकिन द्वीपोंके किनारे बसे कई देशों के समूह वेस्टइंडीज की खूबसूरती को वह खूब एंज्वॉय करना चाहती हैं। दरअसल, उसे ट्रैवलिंग का बहुत शौक है।

और क्या-क्या अच्छा लगता है? यह पूछने पर वह बताती है कि ड्राइंग करना, बैडमिंटन खेलना खूब भाता है, अब चूंकि क्रिकेट की वजह से उन्हें टीम इंडिया का हिस्सा बनने का मौका मिल रहा है, तो वह इस खेल को भी खूब एंज्वॉय कर रही है। पसंदीदा क्रिकेट खिलाडी सचिन और द्रविड हैं। वह इस बात से थोडी दुखी हैं कि इस बार 20-20 में ये दोनों नहीं खेल रहे हैं।

बडी होकर क्या बनना चाहती है प्राची? इस पर वह थोडा ठहरकर अपनी फ्यूचर प्लानिंग का जिक्र करती हैं, मैं तो डॉक्टर बनना चाहती हूं, लेकिन अगर किसी वजह से ऐसा पॉसिबल नहीं हुआ, तो कोरियोग्राफर जरूर बनूंगी।

बेशक, जिस में इतना आत्मविश्वास हो और कुछ करने का जज्बा, वह जरूर अपनी मंजिल पाता है। ऑल द बेस्ट प्राची!

वामा


अंदर से बहती है खुशी
यूँ ये सवाल बड़ा पुराना है कि खुशी क्या है? और उसकी ग्यारंटी क्या? धीरे-धीरे समझदार लोग यहाँ तक पहुँच गए हैं कि कम से कम पैसा या भौतिकता तो खुशी की ग्यारंटी नहीं है। खुशी का स्रोत हम में ही कहीं है। वह कहीं बाहर से नहीं आती है। वह अंदर से बाहर की ओर बहती है। यकीन नहीं हो तो इसे पढ़ें।

एक दिन खबर मिली कि बचपन के दोस्त संजय ने नई कार खरीदी है तो बड़े उत्साह के साथ मैं सुबह उसे बधाई देने उसके घर गया। रास्तेभर सोचता रहा कि अत्यंत साधारण परिस्थिति से संजय ने समय को पहचानते हुए अलग-अलग व्यवसाय किए, अच्छी पहचान बनाई तथा आज उसका स्वयं का आयात-निर्यात का काम है। यह सोचते-सोचते उसका घर आ गया। बाहर पोर्च में खड़ी लाल चट कार को देखकर मन खुश हो गया। पास ही संजय खड़ा था। गर्मजोशी से उसको बधाई दी। उसने भी आत्मीयता से स्वागत किया।

इतने में एक 2 वर्षीय बालक हाथ में एक चकरी लेकर दौड़ता हुआ बाहर आया। चकरी यानी पेंसिल पर कागज को तिकोना मोड़कर नोक पर लगा दिया था। दौड़ने से वह पंखा घूमने लगता तथा वह बच्चा खुश हो जाता। घर के अंदर प्रवेश किया तो संजय की बेटी से सामना हुआ। कार खरीदने की बात सुनकर बेलगाँव से आई थी। उसी का बेटा मोनू था, जो हाथ में चकरी लेकर घरभर में दौड़ रहा था। कभी खिड़की के सामने तो कभी कूलर के सामने जाता तो उसका पंखा जोर से चलता और वह खुशी से उछल पड़ता।

इसी बीच संजय के दामाद का फोन आया। पहले उसने अपने ससुर को कार की बधाई दी फिर मोनू से कार के बारे में पूछा। पर वह तो अपनी चकरी के बारे में ही बात करता रहा। इतने में संजय की पत्नी ने प्रवेश किया। मेरे अभिवादन का उत्तर उन्होंने अत्यंत ठंडेपन से दिया। पानी का गिलास रखकर वह बोली, 'जरा काम है मैं अंदर जाती हूँ।' कुछ देर बाद मैं वहाँ से उठा तो संजय भी बाहर आया। वहाँ मैंने उससे पूछा, 'यार, नीता भाभी का व्यवहार समझ में नहीं आया, कुछ गड़बड़ है क्या?' छूटते ही बोला, 'नीता को गहरे नीले रंग की कार पसंद थी, पर घर में किसी और को वह रंग पसंद नहीं था अतः बहुमत को ध्यान में रखते हुए हमने यह कार पसंद की। पर हालत यह है कि उसने कार को देखा तक नहीं, बैठना तो दूर की बात है।'

इतने में मोनू फिर अपनी चकरी लेकर हमारे बीच से दौड़ते हुए किलकारी मारते हुए निकल गया, तो लगा खुशी पाने के लिए पैसों से ज्यादा मन की भावना जरूरी है। इसे उम्र का अंतर मानें या समझ का फर्क- वह लाल चट कार संजय के सीने पर बोझ बन गई, क्योंकि मोनू तो कल वापस बेलगाँव चला जाएगा।

विद्या बालन (अभिनेत्री)


मेहनत बराबर,मेहनताना कम क्यों: विद्या
बातों -बातों में मुझे याद दिलाया कि 2010 में मैं अपने करियर के पाँच साल पूरे कर रही हूँ। मुझे तो एहसास ही नहीं हुआ था इस बात का।
पाँच साल का सफर यूँ तो बहुत छोटा है पर इन पाँच सालों में मेरे बहुत सारे सपने साकार हुए हैं। कभी तारीफ हुई तो कभी आलोचना भी। मैं 10-11 साल की थी जब सोच लिया था कि एक्टिंग करूँगी- कहाँ, कैसे, क्यों, कब नहीं पता था। छोटे-छोटे कदमों के सहारे मैं यहाँ तक पहुँची हूँ।
मुझे अपने करियर में परिणीता, पा और इश्कियाँ जैसी फिल्में करने का अवसर मिला है जिसमें हीरो सर्वेसर्वा नहीं था बल्कि हीरोइन का रोल भी अर्थपूर्ण था।
अब तक का रुझान यही रहा है कि ज्यादातर हिंदी फिल्में हीरो के इर्द-गिर्द लिखी गई हैं। दरअसल पुरुष के इर्द-गिर्द कहानी लिख कर फिल्म बनाना बहुत सुविधाजनक होता है क्योंकि शुरू से ही हमारी एक स्थापित सोच होती है। हम पुरुष प्रधान कहानियाँ पढ़कर और देखकर बड़े होते हैं। ऐसे में पुरुष प्रधान फिल्म बनाना एक सहज और आसान फॉर्मूला है।
लेकिन मुझे नहीं लगता कि आज का दर्शक फिल्मों को इस खाँचे में डालकर देखना चाहता है कि वो केवल पुरुष प्रधान हों या सिर्फ महिला प्रधान हों। हम बेहतर फिल्में देखना चाहते हैं जो आम लोगों के बारे में हों।

मेहनत बराबर, मेहनताना कम?
हिंदी सिनेमा में ये सवाल उठता रहा है कि हीरो के मुकाबले हीरोइनों को कम फीस मिलती है। पहले ज्यादातर फिल्में पूरी तरह हीरो पर आधारित होती थी तो फिल्म के चलने, न चलने का दारोमदार हीरो पर ज्यादा था।

इसलिए शायद उनका मेहनताना भी ज्यादा था। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फीस में अब भी काफी अंतर है पर चीजें बदल रही हैं। उम्मीद है और बदलाव आएँगे। आखिर उम्मीद पर दुनिया कायम है।

कदम जमीन पर रहें : रुपहले पर्दे की इस दुनिया में पैसा है, शोहरत है, ग्लैमर है, लोगों का प्यार है। लेकिन अभिनय के बारे में जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद है वो ये कि एक अभिनेत्री होने के नाते मुझे बहुत सारी जिंदगियाँ जीने को मिलती हैं। ये बहुत उत्साहित करता है मुझे।

मैंने अपना पहला ऑटोग्राफ तब दिया था जब मैं स्टार थी भी नहीं, मैं केवल एक विज्ञापन फिल्म शूट कर रही थी। शूटिंग देखने आए कुछ लोगों ने पता नहीं क्या सोचा कि मेरा ऑटोग्राफ ले लिया। अब कभी ऑटोग्राफ देती हूँ तो ये किस्सा याद आ जाता है।

सच में, हमारा और हमारे चाहने वालों का ये रिश्ता बड़ा प्यारा होता है। हम भले ही उनसे कभी मिल न पाएँ लेकिन एक कलाकार के लिए ये बात बहुत मायने रखती है कि उसके काम को लोग पसंद कर रहे हैं।

एक कलाकार के नाते इस इंडस्ट्री को और लोगों को मुझसे कुछ उम्मीदें हैं और कोशिश रहेगी कि इन्हें पूरा कर सकूँ। एक छोटी सी उम्मीद मेरी भी है कि फिल्म इंडस्ट्री और बेहतर फिल्में बनाए।

हमें ये बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि ये उद्योग और फिल्म बनाने की पूरी प्रकिया किसी भी हस्ती से बड़ी है। मैं ये हमेशा याद रखती हूँ कि शोहरत कितनी भी मिले, मैं इस इंडस्ट्री से बड़ी नहीं हूँ। यही बात मेरे कदम शोहरत के बावजूद जमीन पर रखती है।