शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

सपने का सच तुम्हारा सच
ठीक पचास साल पहले के कल्पनापुरम की बात है। गर्मियों के दिन थे। बैशाख-जेठ के आकाश में बादल फाड़कर गर्मी बरस रही थी। सौ-पचास घरों के धूल भरे कस्बे में मनुष्य और पशु-पक्षी भाड़ में झोंके गए चनों की तरह अनुभव कर रहे थे। कोयल-कबूतरों के मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे।
आम-जामुन की पत्तियाँ असमय सूख कर गिर रही थीं। जमीन में ये बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई थीं। नलों की टोंटियाँ सूखे के दर्द से कराह रही थीं। धूप में इतनी तेजी थी कि अगर दाल-चावल में पानी डालकर पतीला खुले में रख दो तो घड़ीभर बाद खिचड़ी तैयार मिलती।
टीले के परली तरफ, जहाँ अब्बू और सुहानी अपनी अम्मी-दादू के साथ रहते, यही हालत थी। लेकिन दोनों बच्चों की चटर-पटर के कारण उनके टीन-टापरे के नीचे खुशनुमा माहौल बना रहता। दादू कहते कि गर्मी तो प्रकृति का फेर है। आज गर्मी है तो कल वर्षा होगी, फिर सर्दी आएगी। इसलिए खुश रहो। दादू का कहा मानकर अम्मी खुश रहती।

घर में जिस दिन जो है उसे ठीक-ठीक सबको परोस देती। यानी बच्चों को थोड़ा ज्यादा, बापू को ज्यादा। उसके बाद कम-ज्यादा कहने के लिए बचता ही बहुत थोड़ा। फिर भी यह देखकर खुश रहती कि सब खुश हैं।

ऐसे ही एक दिन सुबह अब्बू और सुहानी चाय-रोटी का नाश्ता कर रहे थे। गर्मी अभी बढ़ी नहीं थी। अब्बू और सुहानी लाल फूलों से लदे सेमल के नीचे बैठे थे। छोटी-छोटी चिड़ियाँ हल्की-मीठी चहकती टहनियों पर फुदक रही थीं। अब्बू को लगा कि उसने कहीं घंटियों को बजते हुए सुना।

यह आभास नहीं था क्योंकि सुहानी को भी घंटियों की आवाज सुनाई दी और साथ में गीत की पंक्तियाँ भी- आओ मेरे साथ चलो, जहाँ मैं जाऊँ तुम भी साथ रहो। न रहो तुम यदि संग तो, जान न पाओगे कभी जगह वो॥ यह अपने आप में काफी अटपटा गीत था, खासकर जिस तरह से इसे गाया जा रहा था। शरारती और सुनने वाले को बहकाता सा हुआ।

पहले तो अब्बू और सुहानी इसे सुनते रहे फिर हकबका कर अहाते के दरवाजे की ओर भागे। बाहर सड़क पर से कोई गुजर रहा था जो घंटियाँ बजाते हुए इस गीत को गा रहा था। सदर दरवाजे से बाहर निकल कर दोनों ने देखा कि एक साइकल रिक्शा धीमे-धीमे दूर होता जा रहा है। चार साँसों में वह सड़क मोड़ पर आँखों से ओझल हो गया।

इस इलाके में साइकल रिक्शा यों भी कभी नजर नहीं आता था। रंग-बिरंगी पताकाओं से सजा यह एक अजूबा था। मानो किसी दिलखुश राजकुमारी की सवारी हो। अब्बू और सुहानी कुछ दूर उस रिक्शा के पीछे दौड़े लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि ऐसा करना बेकार है।

घर लौटने के बाद उन्होंने हाँफते हुए दादू और अम्मी को अनोखे रिक्शे के बारे में बताया। धूप तेज होने से पहले दादू को काम जाना था सो वे मुस्कुराए और घर से बाहर निकल गए। अम्मी वैसे ही खुश, मुस्कुराती रहती थी इसलिए उनके चेहरे पर खास बदलाव नहीं आया। दिन चढ़ आने के बाद रोज की तरह अब्बू और सुहानी इमली सर्कस पहुँचे।

पहाड़ी का ऊपरी हिस्सा सुनसान रहता था। वहाँ इमली का एक बहुत बड़ा पेड़ था। अभी तक किसी ने उसकी पतली से पतली टहनी तक काटी नहीं थी। इसलिए इमली का यह पेड़ इतना विशाल हो गया था मानो सर्कस का तंबू हो। हालाँकि कल्पनापुरम में कभी कोई सर्कस नहीं आया था, न ही किसी बच्चे ने देखा था। यह नाम ताऊ मास्टर का दिया हुआ था।

ताऊ-मास्टर कस्बे के सबसे बूढ़े व्यक्ति थे। कस्बे की इकलौती पाठशाला में वे पढ़ाते और गर्मी की छुट्टियों में बकरियाँ चराने के लिए इस पेड़ की छाँव में आ बैठते। कितने ही तरह के फुरसती जीव गर्मी की दोपहर काटने के लिए इस पेड़ तले इकठ्ठा होते और सर्कस-सा मजमा लग जाता।

पहले तो बच्चे इस वाकए को मजेदार सपना मानकर सुनते रहे। ऐसा सच में हुआ होगा। मानने के लिए कोई तैयार न हुआ। इस घटना को लेकर सब बच्चे ताऊ-मास्टर के पास पहुँचे। ताऊ-मास्टर ने पहले सारी बात ध्यान से सुनी और चुपचाप अपनी सफेद मुलायम दाढ़ी पर हाथ फेरते रहे।

काफी देर बाद उन्होंने अपना गला साफ किया। फिर आहिस्ता से बोले-यदि अब्बू और सुहानी ने सच में ऐसा कोई रिक्शा देखा है तो वह रिक्शा सच है। अगर बाकी बच्चे सोचते हैं कि रिक्शा एक सपना है तो वह सपना है।

ताऊ मास्टर का कहा किसी को समझ में नहीं आया और सब बच्चे यहाँ-वहाँ बिखर गए और थोड़ी ही देर में रिक्शे वाली बात आई-गई हो गई। अब्बू और सुहानी बड़े निराश हुए। चेहरों पर छाई उदासी देखकर माँ ने उन्हें समझाया- देखो, यदि वह रिक्शा सच में है तो वह तुम्हें फिर से दिखाई देगा। और ऐसा ही हुआ। एक सुबह फिर से घंटियों के स्वर गूँजने लगे।
अब्बू और सुहानी अपनी चाय-रोटी छोड़कर बाहर की ओर भागे। सड़क पर रिक्शा आगे बच्चे पीछे भाग रहे थे। देखने में तो रिक्शा धीमे-धीमे और बच्चे तेज भाग रहे थे फिर भी वे उसे पकड़ नहीं पा रहे थे। थोड़ी दूर तक भागने के बाद सुहानी थक कर रुक गई।

अब्बू दौड़ता रहा। वह नहीं चाहता था कि रिक्शा छूट जाए और सपना बनकर रह जाए।

सब कुछ भूलकर, या यों कहें कि भुलाकर अब्बू रिक्शे के पीछे दौड़ता जा रहा था। धीरे-धीरे वह कल्पनापुरम से दूर होता गया। सड़क की दोनों ओर के सूखे खेत खत्म हुए और बंजर जमीन आ गई। कहीं-कहीं चरती हुई गाय-भैंसें और गधे दिखाई दे रहे थे, वे भी गायब हो गए। निर्जन रास्ते पर वे दोनों ही थे। आते-जाते ताँगे और बैलगाड़ियाँ भी नहीं।

अब्बू को ध्यान में ही नहीं आया कि आसपास की सारी वस्तुएँ-नजारे कब अदृश्य हो गए और चारों ओर नीला-नीला छा गया। अब्बू को लगा मानो वह बादलों पर बैठा है। तभी जोर की गड़गड़ाहट होने लगी। बिजलियाँ चमकने लगीं और वर्षा होने लगी। वर्षा के साथ हवा में तैरते हुए अब्बू नीचे आने लगा। आश्चर्य की बात यह रही कि वह ठीक कल्पनापुरम में जा उतरा।

वर्षा आने की खुशी में नाच-गा रहे लोगों के ऐन बीच में। लोग उत्तेजित थे कि उनका अपना अब्बू आकाश से पानी लेकर आया है। सुहानी नाच रही थी कि उनकी बातों को अब कोई झूठ नहीं कहेगा। अब्बू के दोस्त पानी में भीगते हुए कूद रहे थे।

दूर खड़े दादू-अम्मी के चेहरों पर वैसी ही खुशी दिखाई दे रही थी। फिर भीड़ में से ताऊ-मास्टर निकले। धीरे-धीरे वे अब्बू के पास आए। अपनी दाढ़ी पर से पानी की बूँदें सोरते हुए उन्होंने कहा कि तुम अगर सपने को सच मानते हो तो वह सच होकर ही रहेगा।

कहानी सपने का सच तुम्हारा सच
ठीक पचास साल पहले के कल्पनापुरम की बात है। गर्मियों के दिन थे। बैशाख-जेठ के आकाश में बादल फाड़कर गर्मी बरस रही थी। सौ-पचास घरों के धूल भरे कस्बे में मनुष्य और पशु-पक्षी भाड़ में झोंके गए चनों की तरह अनुभव कर रहे थे। कोयल-कबूतरों के मुँह से बोल नहीं फूट रहे थे।
आम-जामुन की पत्तियाँ असमय सूख कर गिर रही थीं। जमीन में ये बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई थीं। नलों की टोंटियाँ सूखे के दर्द से कराह रही थीं। धूप में इतनी तेजी थी कि अगर दाल-चावल में पानी डालकर पतीला खुले में रख दो तो घड़ीभर बाद खिचड़ी तैयार मिलती।
टीले के परली तरफ, जहाँ अब्बू और सुहानी अपनी अम्मी-दादू के साथ रहते, यही हालत थी। लेकिन दोनों बच्चों की चटर-पटर के कारण उनके टीन-टापरे के नीचे खुशनुमा माहौल बना रहता। दादू कहते कि गर्मी तो प्रकृति का फेर है। आज गर्मी है तो कल वर्षा होगी, फिर सर्दी आएगी। इसलिए खुश रहो। दादू का कहा मानकर अम्मी खुश रहती।

घर में जिस दिन जो है उसे ठीक-ठीक सबको परोस देती। यानी बच्चों को थोड़ा ज्यादा, बापू को ज्यादा। उसके बाद कम-ज्यादा कहने के लिए बचता ही बहुत थोड़ा। फिर भी यह देखकर खुश रहती कि सब खुश हैं।

ऐसे ही एक दिन सुबह अब्बू और सुहानी चाय-रोटी का नाश्ता कर रहे थे। गर्मी अभी बढ़ी नहीं थी। अब्बू और सुहानी लाल फूलों से लदे सेमल के नीचे बैठे थे। छोटी-छोटी चिड़ियाँ हल्की-मीठी चहकती टहनियों पर फुदक रही थीं। अब्बू को लगा कि उसने कहीं घंटियों को बजते हुए सुना।

यह आभास नहीं था क्योंकि सुहानी को भी घंटियों की आवाज सुनाई दी और साथ में गीत की पंक्तियाँ भी- आओ मेरे साथ चलो, जहाँ मैं जाऊँ तुम भी साथ रहो। न रहो तुम यदि संग तो, जान न पाओगे कभी जगह वो॥ यह अपने आप में काफी अटपटा गीत था, खासकर जिस तरह से इसे गाया जा रहा था। शरारती और सुनने वाले को बहकाता सा हुआ।

पहले तो अब्बू और सुहानी इसे सुनते रहे फिर हकबका कर अहाते के दरवाजे की ओर भागे। बाहर सड़क पर से कोई गुजर रहा था जो घंटियाँ बजाते हुए इस गीत को गा रहा था। सदर दरवाजे से बाहर निकल कर दोनों ने देखा कि एक साइकल रिक्शा धीमे-धीमे दूर होता जा रहा है। चार साँसों में वह सड़क मोड़ पर आँखों से ओझल हो गया।

इस इलाके में साइकल रिक्शा यों भी कभी नजर नहीं आता था। रंग-बिरंगी पताकाओं से सजा यह एक अजूबा था। मानो किसी दिलखुश राजकुमारी की सवारी हो। अब्बू और सुहानी कुछ दूर उस रिक्शा के पीछे दौड़े लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि ऐसा करना बेकार है।

घर लौटने के बाद उन्होंने हाँफते हुए दादू और अम्मी को अनोखे रिक्शे के बारे में बताया। धूप तेज होने से पहले दादू को काम जाना था सो वे मुस्कुराए और घर से बाहर निकल गए। अम्मी वैसे ही खुश, मुस्कुराती रहती थी इसलिए उनके चेहरे पर खास बदलाव नहीं आया। दिन चढ़ आने के बाद रोज की तरह अब्बू और सुहानी इमली सर्कस पहुँचे।

पहाड़ी का ऊपरी हिस्सा सुनसान रहता था। वहाँ इमली का एक बहुत बड़ा पेड़ था। अभी तक किसी ने उसकी पतली से पतली टहनी तक काटी नहीं थी। इसलिए इमली का यह पेड़ इतना विशाल हो गया था मानो सर्कस का तंबू हो। हालाँकि कल्पनापुरम में कभी कोई सर्कस नहीं आया था, न ही किसी बच्चे ने देखा था। यह नाम ताऊ मास्टर का दिया हुआ था।

ताऊ-मास्टर कस्बे के सबसे बूढ़े व्यक्ति थे। कस्बे की इकलौती पाठशाला में वे पढ़ाते और गर्मी की छुट्टियों में बकरियाँ चराने के लिए इस पेड़ की छाँव में आ बैठते। कितने ही तरह के फुरसती जीव गर्मी की दोपहर काटने के लिए इस पेड़ तले इकठ्ठा होते और सर्कस-सा मजमा लग जाता।

पहले तो बच्चे इस वाकए को मजेदार सपना मानकर सुनते रहे। ऐसा सच में हुआ होगा। मानने के लिए कोई तैयार न हुआ। इस घटना को लेकर सब बच्चे ताऊ-मास्टर के पास पहुँचे। ताऊ-मास्टर ने पहले सारी बात ध्यान से सुनी और चुपचाप अपनी सफेद मुलायम दाढ़ी पर हाथ फेरते रहे।

काफी देर बाद उन्होंने अपना गला साफ किया। फिर आहिस्ता से बोले-यदि अब्बू और सुहानी ने सच में ऐसा कोई रिक्शा देखा है तो वह रिक्शा सच है। अगर बाकी बच्चे सोचते हैं कि रिक्शा एक सपना है तो वह सपना है।

ताऊ मास्टर का कहा किसी को समझ में नहीं आया और सब बच्चे यहाँ-वहाँ बिखर गए और थोड़ी ही देर में रिक्शे वाली बात आई-गई हो गई। अब्बू और सुहानी बड़े निराश हुए। चेहरों पर छाई उदासी देखकर माँ ने उन्हें समझाया- देखो, यदि वह रिक्शा सच में है तो वह तुम्हें फिर से दिखाई देगा। और ऐसा ही हुआ। एक सुबह फिर से घंटियों के स्वर गूँजने लगे।
अब्बू और सुहानी अपनी चाय-रोटी छोड़कर बाहर की ओर भागे। सड़क पर रिक्शा आगे बच्चे पीछे भाग रहे थे। देखने में तो रिक्शा धीमे-धीमे और बच्चे तेज भाग रहे थे फिर भी वे उसे पकड़ नहीं पा रहे थे। थोड़ी दूर तक भागने के बाद सुहानी थक कर रुक गई।

अब्बू दौड़ता रहा। वह नहीं चाहता था कि रिक्शा छूट जाए और सपना बनकर रह जाए।

सब कुछ भूलकर, या यों कहें कि भुलाकर अब्बू रिक्शे के पीछे दौड़ता जा रहा था। धीरे-धीरे वह कल्पनापुरम से दूर होता गया। सड़क की दोनों ओर के सूखे खेत खत्म हुए और बंजर जमीन आ गई। कहीं-कहीं चरती हुई गाय-भैंसें और गधे दिखाई दे रहे थे, वे भी गायब हो गए। निर्जन रास्ते पर वे दोनों ही थे। आते-जाते ताँगे और बैलगाड़ियाँ भी नहीं।

अब्बू को ध्यान में ही नहीं आया कि आसपास की सारी वस्तुएँ-नजारे कब अदृश्य हो गए और चारों ओर नीला-नीला छा गया। अब्बू को लगा मानो वह बादलों पर बैठा है। तभी जोर की गड़गड़ाहट होने लगी। बिजलियाँ चमकने लगीं और वर्षा होने लगी। वर्षा के साथ हवा में तैरते हुए अब्बू नीचे आने लगा। आश्चर्य की बात यह रही कि वह ठीक कल्पनापुरम में जा उतरा।

वर्षा आने की खुशी में नाच-गा रहे लोगों के ऐन बीच में। लोग उत्तेजित थे कि उनका अपना अब्बू आकाश से पानी लेकर आया है। सुहानी नाच रही थी कि उनकी बातों को अब कोई झूठ नहीं कहेगा। अब्बू के दोस्त पानी में भीगते हुए कूद रहे थे।

दूर खड़े दादू-अम्मी के चेहरों पर वैसी ही खुशी दिखाई दे रही थी। फिर भीड़ में से ताऊ-मास्टर निकले। धीरे-धीरे वे अब्बू के पास आए। अपनी दाढ़ी पर से पानी की बूँदें सोरते हुए उन्होंने कहा कि तुम अगर सपने को सच मानते हो तो वह सच होकर ही रहेगा।

होली की मस्ती
अमिताभ बच्चन
होली रंग और मस्ती का त्योहार है और मुझे लगता है कि यह सिर्फ रंग का उत्सव ही नहीं, बल्कि इंसानों के बीच आपसी रिश्तों को जोड़ने वाला त्योहार है। फिल्मी परदे पर भी मैं होली की मस्ती को अपने किरदार में इसलिए ढालने में सफल रहा हूँ क्योंकि मुझे वास्तविक जिंदगी में यह त्योहार काफी खुशी प्रदान करता रहा है । रंगों में पुते रंगे चेहरों में एक आत्मीयता का बोध होता है। हम एक-दूसरे के चेहरे पर रंग गुलाल लगाकर, पिचकारियों से रंग छोड़कर उत्साहित ही नहीं होते, वरन अपनी आत्मीयता का प्रदर्शन भी करते हैं। क्योंकि यह एक दिन ऐसा होता है जिसमें रंग के स्पर्श, गंध और गुलाल-अबीर से आपसी रिश्तों की अनुभूति होती है। मैं होली अपने ढंग से मनाता रहा हूँ। मुझे और मेरे परिवार के सभी सदस्यों को बचपन से ही होली पसंद रही है और हम सब इसका भरपूर आनंद उठाते हैं।
सुष्मिता सेन
जब से मुंबई में हूँ, होली के दिन घर पर ही रहना ज्यादा पसंद करती हूँ। हाँ, कुछ दोस्त आ जाते हैं। एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देने के साथ गाल पर अबीर-गुलाल लगा लेते हैं लेकिन दिल्ली में तो होली के दिन सुबह से दोपहर तक अपने दोस्तों की टोली के साथ रंगों में ही डूबी रहती थी। रंग और गुलाल की मस्ती ऐसी चढ़ती थी कि भूख-प्यास भी नहीं लगती थी। मुंबई में एकाध बार होली खेली जरूर, पर वह आनंद और मस्ती नजर नहीं आई जिसे कभी दिल्ली में रहकर मैंने उठाया था ।
प्रियंका चोपड़ा
मेरे लिए हर त्योहार का दिन खास होता है, चाहे वह होली हो या दिवाली। स्कूल और कॉलेज के दिनों में मैंने होली में खूब मस्ती की है, होली के तीन-चार दिन पहले से ही यह मस्ती शुरू हो जाती थी। पिता के आर्मी में होने के कारण जहाँ भी उनकी पोस्टिंग रही, सारे अधिकारियों के परिवार वालों के साथ खूब मस्ती की। लेकिन जबसे फिल्मी दुनिया में आई हूँ मस्ती जरूर कम हो गई है। लेकिन होली के दिन रंग-गुलाल खेलना छूटा नहीं हैं। मुझे होली का त्योहार बहुत ही पसंद है क्योंकि यह एक ऐसा त्योहार है जिसमें आप छोटे-बड़े का फर्क नहीं करते।
अक्षय कुमार
होली का त्योहार मेरे लिए अब अपने बच्चों की खुशी में तब्दील हो गया है। इसलिए होली का त्योहार मेरे लिए कुछ वर्षों से अलग महत्व रखता है। घई साहब और अमित जी के यहाँ होली के दिन अलग ही माहौल में मैंने रंग खेला और रही आरके की होली की बात तो मैंने उनकी होली देखी नहीं, उसके बारे सुना और पढ़ा जरूर हूँ। लेकिन अपने बच्चों और सोसाइटी के लोगों के साथ होली खेलता हूँ। मुझे सूखे रंगों अबीर और गुलाल से होली खेलना पसंद है।

रितिक रोशनमुझे तो सबसे पहले यह कहना है कि होली के दिन जो लोग नशा करते हैं और फिर नशे की हालत में ऊल-जुलूल हरकतें करते हैं उन पर मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आता है। होली खुशी का त्योहार है, रंग खेलिए अबीर-गुलाल लगाइए। न कि नशा कीजिए। इसीलिए मैं केवल रंगों की मस्ती में शामिल होता हूँ और मुझे रंगों में डूबना अच्छा भी लगता है। अमित जी के बंगले में बचपन से ही मैं होली के दिन जाता रहा हूँ। प्रतीक्षा में अभिषेक ने हर बार मुझे रंगों के टब में डुबोया है और हमने एक-दूसरे को खूब रंग भी लगाया है। मुझे दूसरों को रंग लगाने में भी बड़ा मजा आता है।

फिल्मों में होली
अब जिस तरह की फिल्में बन रही हैं, उनमें दिलों को जोड़ने वाले पर्वों को दिखाने की गुंजाइश बहुत है लेकिन ऐसा बहुत कम हो रहा है। फिल्मों का शौक रखने वाले युवा वर्ग की रूचि भी बदल रही है। शायद यही वजह है कि फिल्मों से होली कहीं दूर जाती नजर आ रही है।
होली हो और फिल्मों की बात न हो, ऐसा संभव नहीं। होली के रंग अकसर रूपहले पर्दे पर बिखरे दिखाई देते हैं। बॉलीवुड के कई निर्देशकों ने फिल्मों में होली का रंग डाला है। कई फिल्मों में होली के गीत इतने लोकप्रिय हुए कि आज भी होली के दिन वह दिनभर सुनाई देते हैं।
दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में होली नजर आई। फिल्म के निर्देशक अमिय चक्रवर्ती ने 1944 में होली का दृश्य शूट करके एक इतिहास रचा। फिल्मों में होली का रंग दिखाने में फिल्मकार यश चोपड़ा ने सभी निर्देशकों को पीछे छोड़ दिया।
यश चोपड़ा ने ‘सिलसिला’ में ‘रंग बरसे भीगे चुनर वाली’ के रूप में बॉलीवुड को होली का लोकप्रिय गाना दिया। इसके बाद ‘मशाल’ में ‘होली आई, होली आई, देखो होली आई रे’, ‘डर’ में ‘अंग से अंग लगाना’ और बाद में ‘मोहब्बतें’ में ‘सोनी-सोनी अंखियों वाली, दिल दे जा या दे जा तू गाली’ से चोपड़ा ने बड़े पर्दे पर होली के भरपूर रंग बिखेरे।
फिल्मों में होली का रंग बिखेरने वाले अभिनेताओं में बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन का नाम सबसे आगे आता है। रेखा के साथ ‘सिलसिला’ में रंग बरसाने के लंबे समय बाद अमिताभ ने हेमा मालिनी के साथ ‘बागबां’ में ‘होली खेले रघुवीरा’ के जरिए एक बार फिर पर्दे को रंगीन कर दिया। अमिताभ, विपुल शाह की ‘वक्त’ में अक्षय कुमार और प्रियंका चोपड़ा के साथ ‘डू मी ए फेवर, लेट्स प्ले होली’ गाते हुए भी खासे जँचे।
बॉलीवुड की एक और जोड़ी, धर्मेंद्र और हेमा मालिनी ने होली को फिल्मों में ऐतिहासिक बनाया है। इस जोड़ी पर फिल्माया फिल्म ‘शोले’ का गीत ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ आज भी होली की मस्ती में चार चाँद लगा देता है। इसके बाद इस जोड़ी ने फिल्म ‘राजपूत’ में ‘भागी रे भागी रे भागी ब्रजबाला, कान्हा ने पकड़ा रंग डाला’ गाकर भरपूर होली खेली।
बॉलीवुड ने होली के साथ होली के आयोजन का कारण रहे भक्त प्रहलाद को भी फिल्मों में कई बार दिखाया है। भक्त प्रहलाद पर पहली बार 1942 में एक तेलुगु फिल्म ‘भक्त प्रहलाद’ के नाम से बनी, जिसे चित्रपू नारायण मूर्ति ने निर्देशित किया। इसके बाद भक्त प्रहलाद पर वर्ष 1967 में इसी नाम से एक हिंदी फिल्म का भी निर्माण हुआ।
बॉलीवुड में ‘होली’ नाम से अब दो, ‘होली आई रे’ नाम से एक और ‘फागुन’ नाम से दो फिल्मों का निर्माण हो चुका है।
होली से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि कुछ फिल्मकारों ने इसे कहानी आगे बढ़ाने के लिए उपयोग किया, तो कुछ ने टर्निंग प्वाइंट लाने के लिए। कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने इसे सिर्फ मौज-मस्ती और गाने फिट करने के लिए फिल्म में डाला।
फिल्मकार राजकुमार संतोषी ने अपनी फिल्म ‘दामिनी’ में होली के दृश्य का उपयोग फिल्म में टर्निंग प्वाइंट लाने के लिए किया, जबकि ‘आखिर क्यों’ के गाने ‘सात रंग में खेल रही है दिल वालों की होली रे’ और ‘कामचोर’ के ‘मल दे गुलाल मोहे’ में निर्देशक ने इनके जरिए फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाया।
कई फिल्मों में होली के दृश्य और गाने फिल्म की मस्ती को बढ़ाने के लिए डाले गए। ऐसी फिल्मों में पहला नाम ‘मदर इंडिया’ का आता है, जिसका गाना ‘होली आई रे कन्हाई’ आज भी याद किया जाता है। इसके अलावा ‘नवरंग’ का ‘जा रे हट नटखट’, ‘फागुन’ का ‘पिया संग होली खेलूँ रे’ और ‘लम्हे’ का ‘मोहे छेड़ो न नंद के लाला’ गाने ने भी होली का फिल्मों में प्रतिनिधित्व किया।
कई फिल्मों में नायक रंगों के त्योहार होली के माध्यम से नायिकाओं के जीवन में रंग भरने की कोशिश करते भी दिखे। फिल्म ‘धनवान’ में राजेश खन्ना ने रीना रॉय के लिए ‘मारो भर-भर पिचकारी’ गाया’, तो वहीं ‘फूल और पत्थर’ में धर्मेंद्र, मीना कुमारी के लिए ‘लाई है हजारों रंग होली’ गाते दिखे। इसी तरह फिल्म ‘कटी पतंग’ में राजेश खन्ना पर फिल्माए गाने ‘आज न छोड़ेंगे बस हमजोली’ ने आशा पारेख को अपने अतीत की याद दिला दी।
कई फिल्में ऐसी भी रहीं, जिनमें होली के सिर्फ कुछ दृश्य दिखाए गए। केतन मेहता की फिल्म ‘मंगल पांडे’ में आमिर खान होली खेलते दिखे, तो वहीं विजय आनंद ने ‘गाइड’ में ‘पिया तोसे नैना लागे रे’ गाने में ‘आई होली आई’ अंतरा डाला।

नई जनरेशन और होली
देश के प्रमुख त्योहारों में होली बहुत ही विशेष है। चूँकि इसे मनाने में गाँठ में पैसे होना जरूरी नहीं है अत: इसे देश का गरीब से गरीब आदमी भी मना सकता है। यदि यह भी कहा जाए कि 'ऊँचे लोग, ऊँची पसंद, भूलते जा रहे, होली के रंग' तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।होली और हास्य-मस्ती का चोली-दामन का साथ है। आइए आपको हँसाने के लिए चंद क्षणिकाओं से रूबरू करवाता हूँ।

मुफ्त पिचकारी
मुफ्त पिचकारी का ऑफर पाकर
बच्चे और माँ-बाप दौड़े चले आए।
विक्रेता ने दी मुफ्त पिचकारी और कहा
कृपया इसमें भरे पानी की कीमत चुकाएँ।

मोबाइल
दूर से हमने समझा कि
उनके हाथ में है मोबाइल
रंगे जाने के बाद पता चला
पिचकारी की थी वह नई स्टाइल।
मंडप में खुद आओगी
लिखा है खत में तुमने कि
होली पर नहीं मिलोगी
घर पर ही रहकर
मेरे फोटो को रंगों से रंगोगी।
मुझे गिला नहीं यदि तुम
होली इस तरह मनाओगी
मगर वादा करो शादी के लिए
खुद मंडप में आओगी।
जिस तरह वेलेंटाइन डे जैसे प्यार के दिन को हम भारतवासियों ने अपनाया है उसी तरह होली जैसे त्योहार का भरपूर प्रचार विदेश में रह रहे भारत के नागरिकों को करना चाहिए। इन पंक्तियों के माध्यम से मैं अपनी बात रखना चाहूँगा कि
होली के रंग
रक्षाबंधन के धागे
संक्रांति की पतंग
दिवाली के पटाखे
साथियों खूब खुलकर
वेलेंटाइन डे मना‍ओ
मगर भारतीय त्योहारों को भी तो
जरा विदेशों में पहुँचाओ।
आजकल लड़कियों को बड़ा डर रहता है कि रंग उनकी कोमल त्वचा और बालों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
देखिए इस बारे में ये पंक्तियाँ क्या कहती हैं-
खराब न हो जाएँ
तुम्हारे गेसू
रंगों के लिए इसलिए मैं
जंगल से लाया टेसू
हमारी आधुनिक जनरेशन को टेसू के बारे में बता दें कि यह जंगल में उगने वाला एक फूल है जिसे गर्म पानी में बॉइल करके नेचरल कलर बनाया जाता है जो स्किन फ्रेंडली होता है।
तो फिर देर किस बात की। तुरंत अपने प्रियतम या अपनी प्रेयसी को चेतावनी भरे ये एसएमएस कर दें -
प्रेयसी को,
मेरे रंग तुम्हारा चेहरा
होली के दिन बिठाना पहरा।
दिल तुम्हारा पास है मेरे
अब बचाना अपना चेहरा।

प्रियतम को,
अपने आपको मेरे रंग में
चाहते थे तुम रंगना
यह डियर एसएमएस नहीं चेतावनी है
होली के दिन मुझसे बचकर रहना।

अंत में
रंग यस
भंग यस
रंग में भंग
बस-बस।
यदि आपको होली की उक्त शायरी अच्छी लगी तो अधिक के लिए विजिट करें...।

बजट भाषण में शेरो-शायरी
प्रश्न : दद्दू, लगभग हर रेल और वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में शेरो-शायरी को क्यों सम्मिलित करते हैं?
उत्तर- क्योंकि शेरो-शायरी उन्हें विपक्ष की भी तालियाँ दिला देती है।
तीन कंजूस फ्रेंड्‍स
तीन कंजूस फ्रेंड्‍स एक रोज प्रवचन सुनने के लिए गए। प्रवचन के बाद संत ने किसी सत्कार्य के लिए सभी से चंदा देने की अपील करते हुए कहा कि हरेक व्यक्ति कुछ न कुछ जरूर दें।
जैसे-जैसे चंदे वाला थाल कंजूसों के नजदीक आता गया, वे बेचैन हो उठे। यहाँ तक कि उनमें से एक बेहोश हो गया और बाकी दो उसे उठाकर बाहर ले गए।

रमन का पॉकेट
रमन- अपनी पॉकेट में चार-पाँच पत्थर लेकर घूम रहा था।
चमन ने पूछा- तुमने अपनी पॉकेट में पत्थर क्यों रखे हुए हैं।
रमन- क्या तुम्हें नहीं पता, यहाँ जिसका पॉकेट भारी होती है उसी की चलती है।

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