शुक्रवार, 28 मई 2010

विचार-मंथन

कुत्ता मत कहो, बनकर दिखाओ
बड़ा दहाड़ते थे शेर जैसे
और कुत्ते जैसे बनकर
तलवे चाटने लगे।
- नितिन गडकरी, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी

भारतीय राजनीति में मानवीय मूल्यों का तो घनघोर अवमूल्यन हुआ ही है, अब कुत्ते जैसे मनुष्य के सबसे प्यारे दोस्त का भी अवमूल्यन होने लगा है। कौन कुत्ता आज किसी के तलवे चाटता है? इस बंदे ने तो आदमियों को कुत्ते के तलवे चाटते देखा है। कुत्ते आदमी के साथ डाइनिंग टेबिल पर लंच और डिनर करते हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि वे आदमी का खाना भी खाते हैं लेकिन आदमी ने अभी कुत्तों का खाना "पेडिग्री" आदि खाना शुरू नहीं किया है। आदमी कुत्तों का बर्थ डे मनाता है और केक काटता है।
उन्हें साबुन और शैंपू से नहलाता है। उनके बाल सँवारता है। उन्हें घुमाने ले जाता है और अपने बिस्तर तक में उन्हें सुलाता है। भारत में भी कुत्तों के अलग क्रैच या डे केयर सेंटर हैं। उनके अलग सैलून हैं। विदेशों में तो उनके अलग होटल तक होते हैं जहाँ कुत्ते छुट्टियां बिताते हैं और अपना स्ट्रेस दूर करते हैं। वे हम आम आदमियों से श्रेष्ठ हैं और यह श्रेष्ठता उनके अभिजात-व्यवहार में कूट-कूट कर भरी होती है। वे भौंकते हैं, सूँघते हैं जो उनका नितांत मानवीय अभिवादन है।
वे काटते नहीं। और मान लीजिए काट भी लें तो यह कतई जरूरी नहीं कि आदमी को रैबीज रोधी इंजेक्शन लगवाने पड़ें। उनका इतना मानवीकरण हो चुका है कि इंजेक्शन वे खुद अपने लगवाते हैं।
उनके अपने डॉक्टर और अपनी दवाएँ हैं। वे परिवारों को भरा-पूरा बनाते हैं और हमारे परिवार उन्हें अपने बच्चों की तरह पालते हैं। वे कुत्ते को कुत्ता नहीं कहते। मेरे एक रिश्तेदार के यहाँ एक कुतिया थी, वह अपनी मालकिन के कंधे पर चढ़ी रहती थी। रक्षाबंधन पर मेरी रिश्तेदार उस कुतिया से अपने बच्चों को राखी बँधवाती थी। उस कुतिया को कोई कुतिया नहीं कह सकता था। वह मेरी रिश्तेदार की बेटी थी।
इसलिए जब कोई किसी आदमी को कुत्ता कहता है तो उस आदमी की आत्मा जले या न जले, कुत्ते की आत्मा जल उठती है कि हाय आदमी को हमारे बराबर रखने की कोशिश की जा रही है। हाय हमारा अवमूल्यन किया जा रहा है। वे बहुत शालीनता से भौं-भौं करके अपना विरोध प्रगट करते हैं।
मगर इस बीच हुआ यह है कि कोई बारह बरस तक नली में रहने के बाद कुत्ते की पूँछ तो एकदम लोहे के सरिये की तरह सीधी हो गई मगर आदमी ने जिस नली में उसे रखा था, वह टेढ़ी हो गई।
कुत्ते ने आदमी के सामने पूँछ हिलाना बंद कर दिया तो आदमी ने कुत्ते के सामने पूँछ हिलाना शुरू कर दिया। आदमी, कुत्ता, कुत्ता, आदमी। दोनों एकाकार।
शायद इसी भावभूमि में मेरे एक बचपन के दोस्त ने एक दिन मुझसे कहाः "यार तू भी बड़ी कुत्ती चीज है" तो मैं इसका आशय समझ नहीं सका। किसी ने आज तक मुझे चीज तक नहीं कहा और यह मेरा मित्र मुझे "कुत्ती चीज" कह रहा है। मैंने गुस्से में उससे कहा यह क्या मजाक है तो वह हँसने लगा।
बोलाः "मेरा मतलब था एक पहुँचा हुआ, आदमी जो आत्मीय भी हो।" उस दिन मुझे बोध हुआ कि पहले जिस पहुँचे हुए आदमी को संत समझा जाता था, आजकल उस पहुँचे हुए आदमी को "कुत्ती चीज" कहा जाता है।
इसलिए आज शब्दों के अर्थ बदल गए हैं और मुहावरों को भाषा से बेदखल किया जा चुका है क्योंकि वे भ्रामक साबित होते हैं। इसलिए राजनीतिक भाषणों और विमर्श में मुहावरों का प्रयोग अव्वल तो करना ही नहीं चाहिए और वक्त-जरूरत पर करना पड़े तो संभाल कर करना चाहिए।

2 टिप्‍पणियां:

  1. यहा पर कोई अमीर या गरीब नही है यह एक संसार की व्यवस्था है परम की ? और यहाँ गरीब भी दुखी है तो अमीर भी दुखी है .अतीत में भी गरीबी थी आज है, और कल भी रहेगी, पाप कल भी था आज भी आने वाले कल भी रहंगे ? और जहा तक धर्म मोजूद है यह सब मोजूद रहेंगे ?
    विज्ञानं जड़ का सम्बन्ध है ,अध्यात्म चेतना का विज्ञानं है , जो परम है वह दोनों से है , दोनों मे से एक से ही परम नही बनता है ,चेतना का आनन्द या भोग लेना है तो वह भी जड़ के बिना असम्भव है ,और जड़ का अनुभव और भोग लेना है तो चेतना के बिना असम्भव है ,जड़ और चेतन की रूपान्तर यात्रा कभी न रुकने वाली है ,या होगी ? जड बुद्धि प्रधान है और चेतन मन प्रधान है, मन दोनों के सम हिस्सा से मोजूद है ,मन चेतन की तरफ बढ़ता है,तो हो सकता की उसे जड़ अपनी आकर्षित करता होगा ?
    और जड़ की और जाता है तो चेतन आकर्षित करता होगा ? इसलिए मन हमरा सबसे बड़ा दुविधा में है , हम एक का विरोध और दुसरे का प्रेम करते है, यह द्रेत अवस्था है , तो जीवन दोनों के प्रति सम भाव में है , यह सम भाव से दोनों स्पष्ट हो जाते है ,यही मोक्ष है , क्योकि दोनों हिस्से अपने अपने भाग में विभाजित हो जाते है , हो सकता है की जो ज्यादा भाग जड़ता का हो तो वह जन्म म्रत्यु के भव् चक्र में होगा ? और चेतना प्रधान देव योनी में हो ? और जो आज जड़ प्रधान हो कर जी रहा है वह परम से कोई लेना देना नही है वह देव योनी को ही महत्व दे रहा है, और देव योनी मुर्त्यु लोक से प्रसन्न होगा ? लगता यही है की मोक्ष किसी को भी नहीं चाहिए ? मोक्ष देवो को भी नहीं है ,और नही साधरण को भी है ? और सायद धर्म यही है , मोक्षादी जीवन इन दोनों से हट कर है ,और इस जीवन के सम्बन्ध में धर्म के पास कोई मार्ग नही दीखता है, अध्यात्म में धर्म की तरह यहा कोई विशेस नियम या सिंद्धांत या मान्यता काम की नही है, यह अध्यात्म है जो धर्म और धर्मो से उपर है , अध्यात्म जीवन सबसे अलग और अलोकिक है यहा जीवन भी है ,और मुक्ति भी है ,जो अध्यात्म या दार्शनिक नियम ,मान्यता ,सिद्धार्थ,विश्वास पर होगा वह भी धार्मिक और धर्म हो जाता है ,
    अज्ञात अज्ञानी

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