बुधवार, 31 मार्च 2010

महाप्रयोग

महाप्रयोग से बदलेगी विज्ञान की दुनिया
अपने रिसर्च प्रोजेक्ट के सिलसिले में मैं कुछ दिन पहले सेर्न से भारत आई थी, अब बुधवार शाम की फ्लाइट से वापस सर्न लौट रही हूँ, लेकिन इस बीच दुनिया बदल चुकी है।
सर्न में मौजूद दुनिया के सबसे बड़े पार्टिकल कोलाइडर एलएचसी में पहले विपरीत दिशा में दो अलग-अलग प्रोटॉन बीम छोड़ी गई, फिर आहिस्ता-आहिस्ता उनकी ऊर्जा का स्तर बढ़ाया गया और मंगलवार शाम करीब चार बजे इन दोनों शक्तिशाली बीम्स को एक-दूसरे के करीब लाकर, एलएचसी की 27 किलोमीटर लंबी गोलाकार सुरंगनुमा ट्यूब में लगभग रोशनी की रफ्तार से चक्कर काट रहे प्रोटॉन्स की आपस में टक्कर करवा दी गई।
जरा सोचिए ये सब कितना अद्भुत है। एक-एक सेकंड की निगरानी और शून्य से 271 डिग्री नीचे के तापमान में एलएचसी की बेहद संवेदनशील ट्यूब में दो अलग-अलग स्तर पर प्रोटॉन बीम्स चक्कर काट रही हैं।
कुदरत ने इन्हें जिस तरह रचा है, उस नियम के तहत दो प्रोटॉन्स एक-दूसरे के करीब नहीं आ सकते, क्योंकि प्रोटॉन्स के साथ धनावेश यानी पॉजीटिव चार्ज बँधा होता है और इसलिए करीब लाए जाने पर दो प्रोटॉन्स एक-दूसरे को दूर धकेलते हैं, क्योंकि समान आवेश हमेशा एक-दूसरे को दूर धकेलता है।
ठीक वैसे ही जैसे एक ऑफिस में एक ही पद पर दो बॉस नहीं हो सकते या फिर एक म्यान में दो तलवारें नहीं हो सकतीं। लेकिन हमारी तकनीक अब कुदरत के नियमों को तोड़कर काफी आगे निकल गई और यह ऐतिहासिक घटना ठीक उस पल घटी जब एलएचसी में जबरदस्त ऊर्जा से भरी दो प्रोटॉन बीम्स एक-दूसरे से जा टकराईं।
भारत समेत दुनियाभर के 80 से ज्यादा देशों के 8000 से ज्यादा वैज्ञानिकों की 14 साल की मेहनत मंगलवार को सफल रही। प्रयोग से कहीं कोई ब्लैक होल पैदा नहीं हुआ और धरती उसमें समा नहीं गई। मंगलवार को एलएचसी में प्रोटॉन्स की शानदार टक्कर के बाद अब हमने अज्ञान के ब्लैकहोल से बाहर निकलकर विज्ञान के उजाले की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।

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